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काव्य कृति ‘नींद की गोलियां’ एक मनोवैज्ञानिक संग्रह -सूर्यभान कुशवाहा

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अगस्त 20, 2012 | सोमवार, अगस्त 20, 2012

पुस्तक समीक्षा
        
कश्यप पब्लिकेशन, गाजियाबाद से हाल ही में प्रकाशित युवा रचनाकार अशोक कुमार पटेल का काव्य संग्रह ’’नींद की गोलियां’’ पढ़नें को मिला। संकलन की लगभग सभी रचनाए  सामाजिक, राजनैतिक व मनुष्य की वर्तमान व्यस्ततम जिन्दगी की मानसिक मनोदशा पर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करती दिखीं। वर्तमान  में आम जनमानस का साहित्य के प्रति अनुराग निरंतर कम होता नजर आ रहा है । इस परिपेक्ष में युवा कवि नें अपनी कृति में कुशल रचनाधर्मिता का परिचय दिया है । आज वास्तव में नींद एक मानसिक मनोवृत्ति बन कर समूचे समाज को दीमक की तरह खाती दिख रही है। वर्तमान पूंजीवादी व अधिक से अधिक धनोपार्जन की होड़ में मनुष्य  जीवन शैली में परिवर्तन के फलस्वरूप  अनिद्रा जैसी मानसिक बीमारी का शिकार हो रहा है। वहीं समाजिक विषमता के चलते कई व्यक्ति आज भी नारकीय जीवन जीनें को विवश है, आज भी इनका जीवन मनुष्य की मूल भूत आवश्यकताओं से परे है। 

वे शहर की गंदी नालियों के किनारे बस अड्डों अथवा फुटपाथों पर जीवन जीनें हेतु विवश है। चूंकि नींद का सीधा संबंध मस्तिष्क से होता है,मानसिक शांति के समय ही अच्छी भरपूर नींद ली जा सकती है।अर्थात यहां भी इसका आभाव है, कवि की कुछ पंक्तियां देखें- 

’’मैं प्राकृतिक नींद चाहता हूं
पर मैं मजबूर हूं
नींद की गोलियां खरीदनें के लिए
क्योंकि प्राकृतिक नींद नहीं बिकती।’’

कवि अशोक पटेल के वन्य पहाड़ी अंचल शहडोल से जुड़े होने के कारण  इनकी कई रचनाओं में प्रकृति के अत्यंत मनोरम चित्र दृष्टव्य  है ।साथ ही यहां पर निवास करनें वाले जन जातीय वर्ग गोड़,बैगा,भील,कोलों इत्यादि की लोक सांस्कृतिक परंपराओ एवं रीति रिवाजों का भी बखूबी मर्मस्पर्शी चित्रण करते हुए, आदिवासियों की प्रसिद्ध गोदना कला को ’गोदनारी’नामक शीर्षक की कविता में बड़े ही सुंदर ढंग से किया है।कवि का मानना है,कि गोदनाकला संस्कृति की पहचान के रूप में है,जो अब यह फैशन के दौर में ब्युटीपार्लर में आ कर सिमट गई है साथ ही पाश्चात्य संस्कृति के चलते अब इसे गोदना नहीं बल्कि ’परमानेंट टैटू’ कहा जानें लगा है ।कवि कि पंक्तियाँ देखें-
’’आज की युवा पीढ़ी
शरीर पर स्थाई गोदना गुदवाते हैं
पर गोदनारी से नहीं
शहर के बड़े ब्युतिशियन से
वे इसे गोदना नहीं परमानेंट टैटू कहते है।’’

युवा कवि अशोक कुमार पटेल जी ने आपने काव्य संग्रह में प्रकाशित 42 छोटी बड़ी रचनाओं के माध्यम से विभिन्न विषयों पर अपनीं कुशल सृजनात्मक कला का अनूठा परिचय दिया है । उम्र, अनुभव के निंरतर प्रयास से इनकी लेखनी और भी ज्यादा परिमार्जित होगी । इसी विश्वास के साथ युवा कवि को बधाई व साधुवाद ।

सूर्यभान कुशवाहा
कवि/लेखक 
लोकसंस्कृति स्थाई स्तंभ कार, 
पंचायत संदेश मासिक पत्रिका,
नई दिल्ली

 ’’एकता सृजन कुटीर’’
 हनुमान नगर,नई बस्ती,सतना,
संपर्क - 9827751120


युवा रचनाकार अशोक कुमार पटेल का पहला कथा संग्रह 'मिलन ' शीर्षक से बोधि प्रकाशन से साल दो हज़ार ग्यारह में ही आया है.उनका संपर्क सूत्र 
उनका ब्लॉग 
मो-9098389331,
ashok.shani@rediffmail.com
है.

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