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होड़ लगी हुई है कि कौन कितना अश्लील, विकृत-कामुक रचना लिख सकता है।

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अगस्त 14, 2012 | मंगलवार, अगस्त 14, 2012

जाग मच्चंदर की ऑडियो सी.डी. की समीक्षा

आज हिंदी में इसका बहुत रोना रोया जाता है कि कविताओं के पाठक या श्रोता कम हो गए हैं। कवि-सम्मेलनों और मुशायरों के आयोजन कम हो गए हैं, जो मंच हैं भी, उन पर चुटकुलेबाजों या अराजनीतिक प्रतिक्रियावादी किस्म के लोगों का कब्जा है। सुनने की क्रिया भी सृजनात्मकता से परे नहीं होती, पर बाजार ने व्यक्ति को एक ऐसे मशीन में  तब्दील करने की कोशिश की है, जो सिर्फ अपनी तात्कालिक भावोत्तेजना या क्षणिक सुकून के लिए कलाओं का उपभोग करना चाहता है। इसी प्रक्रिया में गंभीर वैचारिक कविताओं के बारे में कुछ इस तरह की राय बनाने की कोशिश की जाती है, मानो लोगों तक उनका पहुंच पाना उनकी कोई बुनियादी कमजोरी हो। हालांकि कई बार ऐसा भी लगता है कि कुछ कवियों ने कविता के गाये जाने को ही श्रेष्ठ कविता का पैमाना बना दिया है। उन्हें शायद अपनी श्रेष्ठ कविता के आम हो जाने की कोई जरूरत भी महसूस नहीं होती। लेकिन जो कविताएं जनता के लिए लिखी बताई जाती हैं, उन्हें जनता तक पहुंचाने की जद्दोजहद से कोई जेनुइन कवि कैसे अलग रह सकता है? दरअसल मामला सिर्फ मुक्तछंद की कविता को लोगों तक पहुंचाने का ही नहीं है, बल्कि जो अच्छे गीत हैं और जो जनभाषाओं में रचे गए हैं, उन्हें भी जनता तक ले जाने की कोशिशें कम हैं। नतीजतन बालीवुड के फिल्मी गीतों और जनभाषाओं में उनके ही भद्दे, अश्लील, स्त्रीविरोधी संस्करण सुनने को लोग विवश होते हैं।



भोजपुरी भाषी होने के कारण भोजपुरी की जो दशा बाजार ने की है, उसे देखकर मुझे बेहद कोफ्त होती रहती है। भोजपुरी गीत-संगीत बाजार में तो जैसे इसकी होड़ लगी हुई है कि कौन कितना अश्लील, विकृत-कामुक रचना लिख सकता है। ऐसे में कथाकार सुभाषचंद्र कुशवाहा द्वारालोकरंगआयोजन में जाना बहुत सुकून प्रदान करता रहा है। हालांकि वहां अभी संरक्षण पर ही ज्यादा जोर है, जनभाषाओं में  नई रचनाशीलता के उदाहरण अभी कम सामने आए हैं। लेकिन जिस तरह हर साल होने वाले इस आयोजन में अवधी-भोजपुरी के महान लोकगीतकारों की रचनाओं से लोगों का परिचय कराया गया है, वह भी अगर नए रचनाकारों को प्रेरणा दे, तो यह कम उपलब्धि नहीं होगी। जोगिया जनूबीपट्टी-कुशीनगर में आयोजित होने वाले इस आयोजन में तीन साल पहले जब मैं गोरखपुर से चला, तो बस में एक कैसेट बज रहा था- चांद मारे किरनिया के बान करेजवा में तानि तानि के। बचपन में इस गीत को सुना था और अब भी उसका जादू बदस्तूर था। दिल्ली आने पर अपनी पंरपरा में गहरी रुचि रखने वाले साथी धर्मेंद्र सुशांत ने बताया कि यह छपरा के मशहूर गीतकार अशांत जी का गीत है और कि उनके कई गीत बेहद मशहूर रहे थे। उस कैसेट में कई ऐसे भी गीत थे, जिनमें बदलता हुआ जमाना अभिव्यक्त हो रहा था। मसलन, खेल के पिरितिया के खेल/ दिमाग हमार फेल कइलू चिरई। लेकिन सिर्फ पुरुष के नजरिये से रचे गए गीत ही नहीं थे, बल्कि उसी कैसेट में एक गीत था, जिसमें नशेड़ी पति की जमकर खबर ली गई थी। बाद में मैं पता करता रहा, पर उसे बनाने वाली कंपनी का नाम मालूम नहीं हो सका। असल में लय या संगीत के साथ पेश करने से कविता की हेठी नहीं होती, बल्कि उसकी ताकत बढ़ती है। एक बार गाने का मूड आया तो मैंने कुमार मुकुल की कई कविताओं को गाया, उसमें भोजपुरी का एक गीत भी था। उस गीत और कविताओं के गायन को मित्रों ने काफी सराहा।

मधुशाला जैसी रचनाओं को तो कई लोगों ने गाया है। गायक मन्ना डे के खाते में ऐसे कई लोकप्रिय गीत हैं। ऐसी रचनाओं को गैरफिल्मी कहा जाता था। लेकिन हिंदी की कविताओं के गायन के कैसेट कम ही मिलते हंै। आज से 13-14 साल पहले मुझे मेरे एक मित्र ने एक आॅडियो कैसेट दिया था, जिसमें अजय राय की आवाज में निराला और प्रसाद समेत कई हिंदी के बड़े कवियों की रचनाओं को गाया गया था। हालांकि उसमें में भी गीत ही थे।

अभी मुझे बिहार की चर्चित सांस्कृतिक संस्थाहिरावलद्वारा बनाए गए एक आडियो सीडी सुनने का मौका मिला। गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, रमाकांत द्विवेदी रमता, महेश्वर, रामकुमार कृषक, अदम गोंडवी सरीखे सारे महत्वपूर्ण जनगीतकारों की रचनाओं के गायन के लिए हिरावल जानी जाती रही है। हाल के वर्षों में हिरावल के कलाकारों ने कई ऐसी रचनाओं को संगीतबद्ध करके पेश किया है, जिसने इस धारणा को गलत साबित किया है कि आम लोगों को वैचारिक कविताएं पसंद नहीं आतीं या उसे वे सुनना नहीं चाहते। इन कविताओं का संगीत किसी पापुलर धुन की पैरोडी नहीं है, जिसके अनगिन उदाहरण भक्तिगीतों का नशीला संगीत बाजार रोजाना जबरन हमारे कानों में ठूंसता है। संगीत यहां रचनाओं में व्यक्त परिवर्तनकामी भावों और वैचारिक आशयों का बेहतरीन सहचर लगता है। हिरावल की ओर से ऐसी आठ रचनाओं की एक आडियो सीडी बनाई गई हैं, जिनमें से कई विभिन्न आयोजनों में गाई जा चुकी हैं और बेहद मकबूल हैं।

फैज, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, निराला, वीरेन डंगवाल और दिनेश कुमार शुक्ल की रचनाओं पर आधारित आॅडियो सीडीजाग मछंदरका परिचय देते हुए कहा गया है कि यह उन सबके लिए है जिन्होंने इंसानी जिंदगी को बेमतलब और बेसबब बना देने वाली स्थितियों और ताकतों से दो-दो हाथ करने का हौसला बचाए रखा है। रचनाओं का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है और हर रचना को उसके कथ्य के अनुरूप संगीतबद्ध करने और उसी के अनुरूप गाने की कोशिश की गई है। फैज, नागार्जुन, शमशेर जिनकी अभी जन्मशताब्दी गुजरी है, उन्हें एक तरह से इसके जरिए एक संगीतमय श्रद्धांजलि भी दी गई है।

फैज की नज्मइंतेसाबको और लोगों ने भी गाया है, परआज के नाम और आज के गम के नामको सुनते हुए पुराने धुन की याद नहीं आती, खासकर नज्म के दूसरे हिस्से में हमारे दौर के ग़मों  का बयान बड़े मार्मिक अंदाज में हुआ है। इस आॅडियो कैसेट के लोकार्पण के मौके पर बिल्कुल पहली बार हिरावल के कलाकारों की आवाज में इसे सुनते हुए एक नौजवान कवि की प्रतिक्रिया थी, कि गमों की दास्तान को सुनते-सुनते उसकी आंखे नम हो आईं। मुक्तिबोध को आमतौर पर जटिल भाव-संवेदन का कवि माना जाता है। बिहार में एक राजनीतिक कार्यकर्ता कभी इसी बात पर बहस कर बैठे थे कि दिनकर और मुक्तिबोध में दिनकर की कविताएं जनता को ज्यादा समझ में आती हैं। जाहिर है मुक्तिबोध की कविताओं में मौजूद लय और उसकी ताकत से वे अनभिज्ञ थे। हिरावल के कलाकारों ने मुक्तिबोध की बहुचर्चित कविताअंधेरे मेंका एक अंश चुनकर गाया और आज इस अंश को सुनाए जाने की श्रोताओं की ओर से बहुत मांग होती है। ये पंक्तियां मेरे आदर्शवादी मन/ मेरे सिद्धांतवादी मन/ अब तक क्या किया/ जीवन क्या जीया...’ आज के दौर में कायम नाउम्मीदी, निष्क्रियता और यथास्थिति से बड़े कारगर तरीके से टकराती है। इस कविता में जो उतार-चढ़ाव है और जो छटपटाहट है, इसे संगीत में बखूबी बांधा गया है। जब यह पंक्ति वेग के साथ कानों से गुजरती है कि बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गए, तो जाने कितने स्तर पर आत्मालोचन के भाव पैदा होते हैं। शमशेर के सौंदर्यबोध के इजहार में ये कलाकार पूरी तरह कामयाब रहे हैं। उनकी कविताशाम हैमें दमन झेलने वाले गरीब मजूरों और उनके प्रति संवेदित कवि दोनों के हृदय का हाहाकार सामूहिक गायन और संगीत के जरिए बखूबी अभिव्यक्त हुआ है।

जयशंकर प्रसाद के गीततुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मनको आशा भोसले ने भी गाया है, संगीत और उनका गायन बेहद परिष्कृत है, पर हिरावल के इस आडियो सीडी में हृदय की उस बात को कहने पर ज्यादा जोर है, उसकी जो विकलता है, वह सुनने वाले के मर्मस्थल में तीक्ष्णता से उतरती है। बाबा नागार्जुन के एक छोटे से गीत का चुनाव लाजवाब है और कहा जाए तो इस कैसेट की उपलब्धि है। भादों की अंधेरी रात है और उसमें चमकते जुगनू हैं, जो जान भर रहे हैं जंगल में, लगता है उजाले और अंधेरे के बीच कोई जंग है। कवि की समझदारी है कि यही जीतेंगे शक्ति प्रदर्शन के दंगल में। कवि का आग्रह है- इन्हें तुम बेचारे मत कहना, अजी यही तो ज्योतिकीट हैं। दरअसल जुगनू जनसामान्य के प्रतीक हैं और उनके होने की महत्ता और उनकी ताकत में भरोसे की यह अद्भुत रचना है, जिसका संगीत काफी मेलोडियस है, जो सहज ही जुबान पर चढ़ जाने की क्षमता रखता है।  

निराला के गीतगहन है यह अंध कारामें सचमुच अंधेरे और घुटन का अहसास होता है। धीमी पिच की आवाज और उसमें बांसुरी का इस्तेमाल, ऐसा लगता है मानो कोई गहरी बेचैनी हो, मुक्त होेने की कोई गहरी तड़प हो। स्वार्थ के जिन अवगुंठनों से निराला जैसे संवेदनशील कवि का मन अपने दौर में परेशान रहा, उसके बाद के दौर में वह पूरी तरह से सभ्यता का फलसफा ही बन गया, अपनी कविताहमारा समाजमें वीरेन डंगवाल उसी फलसफे से बहस करते हैं, पहले समझाने के अंदाज में कि यह कौन नहीं चाहेगा कि उसे मिले प्यार, फिर कई सामान्य चाहतों का जिक्र आता है और अचानक कविता चाह से सवाल की ओर बढ़ती है और गीत का तेवर बदल जाता है- हमने ये कैसा समाज रच डाला है, जिसमें वही चमकता है जो शर्तिया काला है। और अंत में यह सवाल भी कि बोलो तो कुछ करना भी है या काला शरबत पीते-पीते मरना है। इस कविता को हिरावल द्वारा ही पहली बार संगीतबद्ध किया गया था और इसे काफी लोकप्रियता भी हासिल हुई। इसी तरह जिस गीत पर आॅडियो कैसेट का नाम रखा गया है, दिनेश कुमार शुक्ल के उस गीत में हारमोनियम का बड़ा प्रभावी इस्तेमाल किया गया है। एक फाइटिंग स्प्रीट और जहां सब कुछ बिक रहा है, उससे टकराने की ललकार इस गीत को सुनते हुए लगातार महसूस होती है। अपने वक्त की वस्तुगत समझ है और उस वक्त को बदल देने की अपील है- सो रहा संसार/ पूंजी का विकट जाल/ किंतु सर्जना के एक छोटे से नगर में/ फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर जाग मेरे मन मछंदर। जहां मन और तन, देश और दृष्टि, हर्ष-विषाद, कल्पनाएं-भावनाएं, नाद-निनाद सब कुछ बिक रहा है, जहां अपने बिक रहे हैं और सपने बिक रहे हैं, वहां पहुंचकर गायन और संगीत पल भर को मानो थमने सा लगता है, पर फिर तेजी से गोरख के नवगीतों को याद करते हुए जोश के साथ पलटता है संगीत भी और गायक की आवाज भी और दोनों कवि के मकसद को और भी अर्थवान बना देते हैं।

ये संगीतबद्ध रचनाएं अपने सुनने वालों से थोड़ा वक्त चाहती हैं, इन्हें चलताऊ अंदाज में नहीं सुनना चाहिए। ये देर तक हमारे जेहन में ठहरने वाली रचनाएं हैं। कविता को लोगों तक उसके अपने मिजाज के अनुरूप ले जाने की यह कोशिश तो है ही, साथ ही साथ यह उर्दू-हिंदी की साझा प्रगतिशील परंपरा से परिचित कराने का भी प्रयास है। यह एक समन्वय भी है प्रगतिशील साहित्य के विरासत के साकारात्मक स्वरों का। हम तो यही कामना करेंगे कि हिरावल की ओर से यह सिलसिला जारी रहे। रचनाओं को संतोष झा और विस्मय चिंतन ने संगीतबद्ध किया है। आवाज समता राय, डीपी सोनी, अंकुर राय, सुमन कुमार और संतोष झा की है। इसे बनाने में कपिल शर्मा और इमरान का विशेष सहयोग रहा है।

इसकी कीमत 125 रुपये है। इसे हिरावल, मदनधारी भवन, दूसरी मंजिल, एस.पी. वर्मा रोड, पटना, बिहार-800001 के पते पर संपर्क करके हासिल किया जा सकता है। हिरावल का ईमेल- hirawal@gmail.com है। हिरावल के गायक- रंगकर्मी  संतोष झा ने बताया कि हमने किसी बड़े आर्थिक मुनाफे के लिए यह आॅडियो कैसेट बनाया नहीं है। इसका खर्च निकल आए, इतना काफी है। अगर इस तरह के आॅडियो कैसेट की मांग ज्यादा बढ़ेगी तो भविष्य में कीमत इससे कम भी हो सकती है। असल चीज यह है कि कविताएं और उनमें मौजूद विचार लोगों तक पहुंचे और उनके जीवन का हिस्सा बनें, उनके जीवन की जरूरत बनें। कविताएं आम लोगों के जीवन में घुलमिल जाएं और उनमें अभिव्यक्त सपने साकार हों।

सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959

 
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