Latest Article :
Home » , , » डॉ.महेंद्र भटनागर की प्रकृति के करीब की रचनाएं

डॉ.महेंद्र भटनागर की प्रकृति के करीब की रचनाएं

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अगस्त 06, 2012 | सोमवार, अगस्त 06, 2012





डॉ.महेंद्र भटनागर   
मूल रूप से ग्वालियर,मध्य प्रदेश के हैं.कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी के सहपाठी भी रहे.फिलहाल सेवानिवृत प्रोफ़ेसर हैं. लिखने, पढ़ने, छपने में गहरी रूचि है. खुद को कविता रचना के सबसे करीब और मुफीद पाते हैं.उम्र लगभग छियासी पार है.कई किताबें प्रकाशित हुई और अनुदित भी.

पता-110,बलवंत नगर,गांधी रोड़,ग्वालियर,मध्य प्रदेश-474 002,फोन-0751- 4092908,ई-मेलब्लॉग फेसबुक







(1)     आसक्ति
.
भोर होते
द्वार वातायन झरोखों से
उचकतीं-झाँकतीं उड़तीं
मधुर चहकार करतीं
सीधी सरल चिड़ियाँ
जगाती हैं,
उठाती हैं मुझे!
.
रात होते
निकट के पोखरों से
-
कभी झींगुर; कभी दर्दुर
गा - गा
सुलाते हैं,
नव-नव स्वप्न-लोकों में
घुमाते हैं मुझे!
.
दिन भर
रँग-बिरंगे दृश्य-चित्रों से
मोह रखता है
अनंग-अनंत नीलाकाश!
.
रात भर
नभ-पर्यंक पर
रुपहले-स्वर्णिम सितारों की छपी
चादर बिछाए
सोती ज्योत्स्ना
कितना लुभाती है!
अंक में सोने बुलाती है!
.
ऐसे प्यार से
मुँह मोड़ लूँ कैसे?
धरा   इतनी मनोहर
छोड़ दूँ कैसे?
q

(2)अभिलषित
.
दिन भर
धरती पर लेटी पसरी
रेशम जैसी
चिकनी-चिकनी दूब से,
आँगन में उतरी
खुली-खुली
फैली बिखरी
हेमा-हेमा धूप से,
यह अलबेला
एकाकी
जम कर खेला !
दिन भर खेला !
.
दिन भर
ताजे़ टटके गदराए
फूलों की छाँह में,
हरिआए - हरिआए
शूलों की बाँह में,
उनकी मादक-मादक गंधों में
अटका-भटका;
ऊला-भूला !
.
शर्मीली-शर्मीली भोली
कलियों की,
लम्बी-लम्बी पतली-पतली
फलियों की,
डालों-डालों झूला !
लिपट-लिपट कर
टहनी-टहनी पत्ती-पत्ती झूला !
दिन भर झूला !
.
दिन भर
सुन्दर रंगों छापों वाली साड़ी पहने
उड़ती मुग्धा तितली पर,
वासन्ती रंग-रँगी
मदमाती प्रेम-प्रगल्भा
प्रौढ़ा सरसों पर,
जी भर राँचा,
संग-संग खेतों-खेतों नाचा !
दिन भर नाचा !
.
दिन भर
इमली के
अमरूदों के पेड़ों पर
चोरी-चोरी डोला!
झरबेरी के कानों में
जा-जा,
चुपके-चुपके
जाने क्या-क्या बोला !
दिन भर डोला !
q

(3)पातालपानी की उपत्यका से
.
तुम्हारे अंक में
विश्रांति पाने आ गया
भटका प्रवासी
मैं !
.
अनावृत वक्ष-ढालों पर
सहज उतरूँ
सबल चट्टान रूपी बाँह दो,
शीतल अतल-की छाँह दो !
.
तप्त अधरों को
सरस जलधार का
सुख-स्पर्श दो,
युग मूक
मन को हर्ष दो!
.
अतृप्त
आत्मा को सुखद
अनुराग-संगम बोध दो !
एकांत में
कल-कल मधुर संगीत से
दो
स्वप्न का अधिवास बहुरंगी,
ओ गहन घाटी !
आ गया हूँ मैं
तुम्हारा प्राण
चिर-संगी !
.
कुछ क्षणों को बाँध लूँ
अल्हड़ तुम्हारी धार से
बेबस उमड़ती भावना का ज्वार !
फिर इस जन्म में
इस ओर
आना हो, न हो !
.
क्या मुझ प्रवासी का
नहीं इतना तनिक अधिकार
छोड़ जाऊँ जो
प्यार सूचक
चिह्न ही
दो ..
चार .... ?
q

(4) गौरैया
.
गौरैया
बड़ी ढीठ है,
सब अपनी मर्ज़ी का करती है,
सुनती नहीं ज़रा भी
मेरी,
बार-बार कमरे में आ
चहकती है ; फुदकती है!
.
इधर से भगाऊँ
तो इधर जा बैठती है,
बाहर निकलने का
नाम ही नहीं लेती !
जब चाहती है
आकाश में
फुर्र से उड़ जाती है,
जब चाहती है
कमरे में
फुर्र से घुस आती है !
.
खिड़कियाँ-दरवाजें बंद कर दूँ ?
रोशनदानों पर गत्ते ठोंक दूँ ?
पर, खिड़कियाँ-दरवाज़े भी
कब-तक बंद रखूँ ?
इन रोशनदानों से
कब-तक हवा न आने दूँ ?
गौरैया नहीं मानती।
.
वह इस बार फिर
मेरे कमरे में
घोंसला बनाएगी,
नन्हें-नन्हें खिलौनों को
जन्म देगी,
उन्हें
जिलाएगी.... खिलाएगी !
.
मैंने
बहुत कहा गौरैया से
मैं आदमी हूँ
मुझसे डरो
और मेरे कमरे से भाग जाओ!
पर,
अद्भुत है उसका विश्वास
वह मुझसे नहीं डरती,
एक-एक तिनका लाकर
ढेर लगा दिया है
रोशनदान के एक कोने में !
.
ढेर नहीं,
एक-एक तिनके से
उसने रचना की है
प्रसूति-गृह की।
.
सचमुच, गौरैया !
कितनी कुशल वास्तुकार हो तुम,
अनुभवी अभियन्ता हो !
यह घोंसला
तुम्हारी महान कला-कृति है,
पंजों और चोंच के
सहयोग से विनिर्मित,
तुम्हारी साधना का प्रतिफल है !
कितना धैर्य है
गौरैया, तुममें।
.
इस घोंसले में
लगता है
ज़िन्दगी की
तमाम ख़ुशियाँ और बहारें
सिमट आने को
आतुर हैं !
.
लेकिन ; यह
सजावट-सफ़ाई पसन्द आदमी
सभ्य और सुसंस्कृत आदमी
कैसे सहन करेगा, गौरैया
तुम्हारा
दिन-दिन उठता-बढ़ता नीड़ ?
.
वह एक दिन
फेंक देगा इसे
कूडे़दान में !
गौरैया !
यह आदमी है
कला का बड़ा प्रेमी है,
पारखी है !
इसके कमरे की दीवारों पर
तुम्हारे चित्र टँगे हैं !
चित्र
जिनमें तुम हो,
तुम्हारा नीड़ है,
तुम्हारे खिलौने हैं !
.
गौरैया
भाग जाओ,
इस कमरे से भाग जाओ !
अन्यथा ;
यह आदमी
उजाड़ देगा तुम्हारी कोख !
.
एक पल में
ख़त्म कर देगा
तुम्हारे सपनों का संसार !
और तुम
यह सब देखकर
रो भी नहीं पाओगी।
.
सिर्फ़
चहकोगी,
बाहर-भीतर भागोगी
बेतहाशा,
बावली-सी
भूखी-प्यासी !
q


वर्षा

(5) आह्लाद
.
बदली छायी, बदली छायी!
.
दिशा-दिशा में बिजली कौंधी,
मिट्टी महकी सोंधी-सोंधी!
.
युग-युग
विरह-विरस में डूबी,
एकाकी घबरायी ऊबी,
अपने प्रिय जलधर से मिल कर,
हाँ, हुई सुहागिन
धन्य धरा,
मेघों के रव से
शून्य भरा!
.
वर्षा आयी, वर्षा आयी!
उमड़ी शुभ घनघोर घटा,
छायी श्यामल दीप्त छटा!
.
दुलहिन झूमी
घर-घर घूमी!
.
मनहर स्वर में
कजली गायी!
बदली छायी!
वर्षा आयी!

Share this article :

1 टिप्पणी:

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template