'कथादेश' के सम्पादक महोदय के नाम उद्भ्रांत जी का एक ज़रूरी ख़त - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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'कथादेश' के सम्पादक महोदय के नाम उद्भ्रांत जी का एक ज़रूरी ख़त

'व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ' -1

(हम पाठक हित में ये ख़त यहाँ छाप रहे हैं इस ख़त में किसी के प्रति कोई व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं रखी गयी है  -सम्पादक )


उद्भ्रांत
बी-463, केंद्रीय विहार,
सेक्टर-51,
नोएडा-201303
संपर्क: 09818854678

प्रिय महोदय,
 
‘कथादेश’ के जून, 2012 अंक में प्रकाशित सुश्री शालिनी माथुर के स्त्री विमर्श संबंधी स्तंभ ‘औरत के नज़रिये से’ कुछ और भी कहना ज़रूरी है’ में पवनकर्ण और अनामिका की दो कविताओं का साहसिक विश्लेषण करने वाला आलेख ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ में आये मुद्दों के संदर्भों में 13 जून, 2012 को संपादक से बात करते हुए मैंने बहस को आगे बढ़ाने की ज़रूरत महसूस की थी और पूछा था कि अगर उनके मन में मेरे लिए कोई पूर्वग्रह न हो तो मैं उसमें शरीक़ होना चाहूँगा। संपादक के यह कहने पर कि कोई पूर्वग्रह नहीं है, मैंने पूछा था जुलाई, 2012 के अंक के लिए आलेख कब तक लिया जा सकता है? उन्होंने 15 जून, 2012 निश्चित तिथि बताई थी। मैंने 15 जून, 2012 को ही अपना आलेख ‘औरत के नज़रिये से’ कुछ और भी कहना ज़रूरी है’ संपादक और लेखिका शालिनी माथुर को ई-मेल द्वारा भिजवा दिया था, इसके बावजूद जुलाई, 2012 के अंक में उसे नहीं छापा गया। शायद कवियों का ‘कार्टेल’ बचाव हेतु पर्याप्त समय चाहता था, यह सिद्ध हो गया पत्रिका के अगस्त, 2012 के अंक को देखकर जिसमें अर्चना वर्मा का 5 पृष्ठों का ‘प्रसंगवश’, अनामिका का 4 पृष्ठों का ‘बहस में उतरा आलेख’ जिसमें दोनों संदर्भित कविताओं का अकारण पुनर्मुद्रण-पुनर्पाठ के बहाने किया गया है-तो शामिल है ही मगर मेरे लेख को आधे से अधिक काटकर सिर्फ़ डेढ़ पृष्ठों में सीमित कर दिया। मेरे लेख के संबंधित हिस्सों में इस ‘कार्टेल’ को तर्कसम्मत ढंग से बेनक़ाब किया गया था और शालिनी माथुर के लेख में आये मुद्दों को बिंदुवार विवेचित किया गया है।
यह संपादक और ‘कार्टेल’ की मिलीभगत से ही संभव हो सकता था जो संपादकीय नैतिकता के खिलाफ है। (वैसे तो अपने प्रतिवाद में अनामिका ने साफ लिखा ही है कि ‘नैतिकता का ठेका तो, आप लें ही मत!)। मैंने इस संबंध में संपादक को कल 6 अगस्त, 2012 को यह एसएमएस किया-‘‘पहले अपना कमिट्मेंट भंग करते हुए एक माह डिले किया ताकि उसे पढ़कर कवि और उनके ‘कार्टेल’ को डिफेंस के लिए समय मिल जाये, फिर भी दिल नहीं भरा तो टूदि पॉइंट लेख को आधे से ज़्यादा काटकर क्या सिद्ध किया? संपादन की कमज़ोरी, परामर्शदाता का वर्चस्व या मेरे वो वास्तविक पूर्वग्रह जिसके बारे में मेरे पूछने पर इनकार किया था! मुझे उम्मीद है कि लेख का अप्रकाशित हिस्सा अगले अंक में देकर संपादकीय के अनुरूप चलने का साहस दिखायेंगे और अपनी एतद्विषेयक सहमति मुझे एसएमएस या फोन के ज़रिये अभी सूचित करेंगे। 

धन्यवाद, 

उद्भ्रांत।

एसएमएस और फोन से कोई उत्तर न मिलने का अर्थ स्पष्ट है। अब मैं विवश हूँ अपने मित्रों से अनुरोध करने के लिए कि इस रोशनी में मेरे संपूर्ण लेख को अपनी पत्रिका/ब्लॉग/वैब मैगज़ीन में स्थान दें ताकि पाठकों को ऐसे कवियों और उनके ‘कार्टेल’ की सही जानकारी मिल सके।

इस आशय का एसएमएस मैंने कल ही लेखिका सुश्री शालिनी माथुर को भी किया है। जो इस प्रकार है-‘‘गलत मुद्दे पर रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद ये लोग सारी लाज-शर्म छोड़ कर एक सुनिश्चित और हारी हुई लड़ाई के द्वारा अपनी फेससेविंग हास्यास्पद् कोशिश करते ड़रे हुए लोग हैं, जिनसे सहानुभूति भी प्रकट नहीं की जा सकती! मेरे टूदि पॉइंट लेख को एक माह डिले कराकर और आधा डिलीट कराकर इन्होंने इनडारेक्टली जघन्य अपराध का प्रमाण दे दिया है। आपसे अनुरोध है कि मेरे इस एसएमएस के साथ मेरे संपूर्ण लेख को अपने और मित्रों के ब्लॉगस या वैब मैगज़ीन अविलम्ब जारी करायें ताकि पाठकों को सत्य का पता लग सके।


धन्यवाद, 
उद्भ्रांत।

आशा है आप तुरंत समुचित कार्रवाई करने की कृपा करेंगे।
सधन्यवाद!

आपका 
उद्भ्रांत

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