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'राजधानी में एक उज़बेक लड़की' से कविताओं की आख़िरी खेप

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अगस्त 08, 2012 | बुधवार, अगस्त 08, 2012


प्रेम और संवेदना की अतुल भावनाओं पर केन्द्रित इस कविता संग्रह की सभी कविताएँ प्रकृति से संवाद चाहती है, बाजारीकरण में बिकते मनुष्य को बचाना चाहती है, भय से मुक्त मानवीय रिश्तों को फिर से जोड़ना चाहती है और कवि यह महसूस करता है कि दुनिया में उम्मीद कायम है, देह के अन्दर देह और साँस के अन्दर साँस होने की आशा ही उसे सृजन-पथ पर बनाये रखती है । अपने भावों को कविता की भाषा में उकेरते समय कवि ने कई रंगों का सहारा लिया है। प्रेम व संवेदना के दर्द में भाषा मुलायम व गंभीर है तो आक्रोश के समय सुलगती चिनगारी भी है । भाषा व भाव एक दूसरे के साथ चल रहे हैं । शब्दों का नया प्रयोग जैसे- ‘मुलायमियत’ तथा प्रतीकों का नवीन प्रयोग इस संग्रह को संग्रहणीय बना देता है ।-डॉ राजेन्द्र कुमार सिंघवी 







 डॉ.अरविंद श्रीवास्तव जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता, बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।अशेष मार्ग, मधेपुरा (बिहार),मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है।

बिहार से हिन्दी के युवा कवि हैं, लेखक हैं। संपादन-रेखांकन और अभिनय -प्रसारण जैसे कई विधाओं में आप अक्सर देखे जाते हैं। जितना आप प्रिंट पत्रिकाओं में छपते हैं, उतनी ही आपकी सक्रियता अंतर्जाल पत्रिकाओं में भी है।यहाँ आपके सध्य प्रकाशित कविता संग्रह 'राजधानी में एक उज़बेक लड़की'  से कुछ कवितायेँ प्रकाशित की जा रही है .मूल रूप सेराजधानी में एक उज़बेक लड़कीसमसामयिक विषयों सहित बाज़ारवाद के संकट से जूझ रहे एशियाक्ष महादेश के अविकसित राष्ट्रों की अंतर्कथा की बानगी है। ग्लोबल मार्केट में दैहिक शोषण तथा अन्यान्य विषयों पर केन्द्रित इस संग्रह  को यश पब्लिकेशन्स दिल्ली ने प्रकाशित किया.



सुखद अंत के लिए


महत्वपूर्ण बातें अंत में लिखी जाती हैं
महत्वपूर्ण धोषणाएँ भी अंत में की जाती है
और महत्वपूर्ण व्यक्ति भी अंत में आता है

हम बहुत कुछ शुरूआत भी अंत में करते हैं

अंत से हमारा रिश्ता आरम्भ से ही होता है
जैसे कोई परिणाम या पका फल
हमें अंत में मिलता है
प्रेम में भी हम
अंत पर पहुँचने के उतावले होते हैं

निर्नायक संधर्ष और अन्तिम विजय
चाहता है खंदक मे छिपा
चौकन्ना सैनिक
अन्तिम गोली बचाये रखता है
अपराधी और पुलिस भी
कई तरह के अन्तिम अस्त्र
छिपाये रखता है
कुशल राजनीतिज्ञ दिमाग में

महामहिम का निर्णय भी अंत मे आता है

हमारे लिए जिज्ञासा और उम्मीदों से भरा होता है अंत

हम अंत सुखद चाहते हैं
बच्चे जुटे होते हैं
सुखद अंत के लिए
शुरुआत से ।

दुर्भाग्य पर एक मध्यमवर्गीय सोच
आप शापिंग की लिस्ट बनावें
रिक्शा करें या स्कूटर
विज्ञापन टटोलें
कर्म में भरोसा रखें
धर्म में विश्वास छोड़ें नहीं
आप सोचें
आपकी फितरत में है सोचना
आनुवंशिक संक्रमण की तरह
और यही है आपकी सेहत का राज भी
आप सोचते हैं सौरमंडल के बारे में
गिलहरी और कछुवे के बारे में
मोक्ष के बारे में आप सोचते हैं
क्योंकि आप सोच सकते हैं
सोचना एक सनातन कला है
एक वर्ग की जो सोच सकता है-
दुर्भाग्य को निहत्था करने के उपाय
जो कतर सकता है दुर्भाग्य के पर
जो पलट सकता है दुर्भाग्य की बाजी
क्योंकि सवाल से पहले
आपने दुरुस्त रखे हैं जवाब

दुनिया आपकी नहीं माने
तो आप बदल दें दुनिया !



अंकों का अनुबंध


कभी न खुलने वाले ताले की चाभी
लेकर चला जाऊँगा एक दिन

कई-कई गोपनीयता
हमारे साथ ही दफन हो जायेंगी
कितने खाते नम्बर
पिन नम्बर
किस्म-किस्म यूजर नंेम
पासवर्ड कई
अंकों से लवालब मस्तिष्क
फूटेगा भड.ाम से
आग की लपटों में
खत्म होगा अंकों का अनुबंध
पंचभूत शरीर के साथ
कई लघुत्तम
महत्तम समावर्त में प्रवेश करेगा

सर्च इंजन मेंरे चिट्ठे खोलेंगे
ब्लॉगस्पाट मेरी कविताएं
अंतरजाल पर मैं मुस्कुराऊँगा!

लोकतंत्र


दुनिया की सबसे निश्छल लड़की
यदि करती है मुझसे प्रेम
और कहती है ‘आई लव यू’
तो इसे मैं मानूँगा नहीं
और यदि मानता भी हूँ तो
उसे देने के लिए
मेरे पास कुछ भी नहीं है
और यदि एक झूठा
फरेब और मक्कार राजनेता
कहता है यही
तो कम से कम उसे देने के लिए
मेरे पास
एक ‘मत’ है !

तस्वीर में माँ और उनकी सहेलियाँ

अक्सर कुछ चीजें
हमारी पकड़ से दूर रहती हैं

अगली गर्मी फ्रिज खरीदने की इच्छा
ओर बर्फबारी में गुलमर्ग जाने की योजना

कई बार हमसे दूर रहता है वर्तमान

कई - कई खाता -बही रखती है स्मृतियाँ
एक ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीर दिखी है
अभी- अभी पुराने एलबम में
जिसमें अपनी कुछ सहेलियों के साथ
शामिल है माँ
उन्होंने खिंचवायी थीं ये तस्वीरें
सम्भवतः आपस में बिछुड़ने से पहले
तस्वीर में एक लड़की ने
अपने गाल पर अंगुली लगा रखा है
दूसरे ने एक लट गिरा रखा है चेहरे पर
एक ने जैसे फोटोग्राफर से आग्रह कर
एक तिल बनवा रखा है ललाट पर
चौथी खड़ी है स्टैच्यु की मुद्रा में
और पांचवी ने, जैसा कई बार होता है
अपनी आँखें झपका ली है
आँख झपकाने की बात
उस सहेली को हफ़्तों सालती रही थी
जैसा कि माँ ने मुझे बताया था

कमोबेश एक सी दिखनेवाली ये लड़कियाँ
माँ - दादी और नानी बनकर
बिखर चुकी है दुनिया में

उन्होंने अपने नाती- पोतों के लिए
जीवित रखी है वह कथित कहानी
- कि जब कुआं खुदा रहे थे हमारे पूर्वज
अंदर से आवाज आयी थी तब
- ये दही लोगे....

एक और दुनिया बसती है हमारे आसपास
राक्षस और परी की

उन्होंने बचाये रखा है स्मृतियों में
मुगल-ए - आज़म और बैजू बावरा के साथ
शमशाद व सुरैया के गीतों को
नितांत अकेले क्षण के लिए
जैसे मिट्टी में दबी होती है असंख्य जलधारा

उनके निजी चीजों में
सहेलियों की दी गयी चंद स्वेटर के पैटर्न
रुमाल और उस पर कढाई के नमूने,
हाथ के पंखे, प्लास्टिक तार के गुलदस्ते
और बेला, चंपा जैसे कई उपनामों सहित
उनकी ढेर सारी यादें थीं

माँ और उनकी सहेलियाँ बिछुड़ी थीं
अच्छे और बुरे वक्त में मिलते रहने की
उम्मीद के साथ
लेकिन ऐसा नहीं हो सका था
तस्वीर के बाहर !



रात



रात आंगन में उतरी थी
अरायश का पैगाम लिए
मैनें जलायी बत्ती
और हत्या कर दी रात की !


यह अपार्टमेंट



डुगडुगी बजबायी
काटे गये पेड़
नष्ट की गयीं वनस्पतियाँ
चिड़ियों को किया गया घर-बदर
झुलसाये गये
ततैये और मधुमख्यिों के छत्ते
खदेड़ा गया सांपों को
तिलचट्टों पर हुआ केमिकल का छिड़काव
हजार-हजार चीटियों की मांद
की गयी ध्वस्त!

इस तरह कई-कई आबाद घरों को
नेस्तनाबूत कर
यहाँ जो बहुमंजिली इमारत बनी
मैंने मुस्कुराते हुए कहा
मेरा घर है यह
यह अपार्टमेंट मेरा है!


अंधेरा

बल्व-बत्ती
सीएफएल-नियोन
और कितना होगा दंडित
अंधेरा!


अंत में

ठोका-बजाया
बहलाया-फुसलाया
..........
............
मरना कोई नहीं चाहता !

प्रकाशक 

यश पब्लिकेशन्स
1/10753,गली न.3,
सुभाष पार्क ,
नवीन सहादरा,
कीर्ति मंदिर के पास 
दिल्ली-110032,
मो-09899938522
वेबसाईट-www.yashpublications.com
सजिल्द मूल्य-195/-


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