''मुंशी प्रेमचंद का ‘सम्राटत्व’ कोई उनसे छीन नहीं पाया /''-उदय प्रकाश - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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''मुंशी प्रेमचंद का ‘सम्राटत्व’ कोई उनसे छीन नहीं पाया /''-उदय प्रकाश

प्रेमचंद: एक सम्पूर्ण लेखक  

छायाचित्र गूगल से साभार 
जब मुंशी प्रेमचंद को ‘कथा सम्राट’ या ‘भारत का गोर्की’ कहा गया था, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि कितनी व्यापक स्वीकृति उन्हें भारतीय, और खासकर हिन्दी समाज से मिल चुकी थी। क्योंकि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध से लेकर आज तक उन्हें सामान्य पाठकों और तत्कालीन प्रशंसकों द्वारा दिये गए इन दोनों अलंकरणों पर बाद में भी कभी किसी विद्वान आलोचक ने आपत्ति नहीं उठाई। प्रेमचंद के ही युग के रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी जब ‘गुरुदेव’ पद से संबोधित किया गया, या इससे कुछ पहले जब गांधी जी को ‘महात्मा’ के पद से सम्मानित किया गया, या और उसके भी पहले जब हरिश्चंद्र को ‘भारतेन्दु’ कहा गया,  तब भी इस पर कभी आपत्ति नहीं उठाई गई। ज़ाहिर है, मुंशी प्रेमचंद, जो जन्म से धनपत राय और बाद में उर्दू लेखक के रूप में नवाब राय हुआ करते थे और जिन्हें उस समय की अंग्रेज़ सरकार ने प्रतिबंधित-सा कर रखा था, वही नवाब राय जब हिन्दी के मुंशी प्रेमचंद बने, तब से लेकर आज तक एक बेजोड़, अप्रतिम, महान कथाकार के रूप में उनका ‘सम्राटत्व’ कोई उनसे छीन नहीं पाया, जब कि बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते अतीत के कई दिग्गज आइकनों-महानों की मूर्तियाँ तक ढहा दी गईं। वे सारे अपने दौर के जगमगाते सितारे इतिहास की कई-कई करवटों के अंधेरों-कोनों में कहीं बिला-खो गए, उनका नाम तक अब बहुत मुश्किल में याद आता है, लेकिन प्रेमचंद जहां तब थे, आज तक अविचलित अपनी उसी पुरानी जगह पर प्रतिष्ठित हैं। अपनी उसी चमक और उसी उजाले के साथ।

उनके इस ‘सम्राटत्व’ की पहेली क्या है? इसे समझने की कुंजी बहुत आसान जगह पर मौजूद है। वह कुंजी है बीसवीं सदी के तीसरे चौथे दशक से ले कर आज इक्कीसवीं के दूसरे दशक तक निरंतर बनी रहने वाली उनकी प्रासंगिकता। उन्हें आज भी जितना पढ़ा और जितना उद्धृत किया जाता है, उतना शायद किसी अन्य आधुनिक खड़ी बोली के भारतीय लेखक-कथाकार को नहीं। अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए उन्हें किसी आलोचक अध्यापक की ज़रूरत नहीं। उनकी रचनाएँ ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति हैं। आज भी जब कोई ‘कफन’ पढ़ता है, तो उसे अपने समय के मनुष्य की वंचना, अभाव और गरीबी की अमानुषिक परिणतियों का मार्मिक-भयावह चेहरा दिखाई देता है। घीसू-माधव उसे अपने आस-पास जीते और सांस लेते दिखाई देते हैं। आज भी जब कोई ‘गोदान’ पढ़ता है, तो उसे कर्ज़ के बोझ में दबा और टूटता हुआ होरी आत्महत्या की मार्मिक पगडंडी पर रेंगता हुआ दीख जाता है। ‘ठाकुर का कुआं’ या ‘सद्गति’ पढ़ता है, तो उसे खैरलांजी, शंकर बीघा , बथानी टोला आदि उन हजारों जगहों की याद आती है, जहां दलितों के भयावह जन-संहार आज के हमारे समय में हुए। औपनिवेशिक भारत और आज के भारत की परिस्थितियाँ बहुत बदली नहीं हैं, बल्कि पहले से और अधिक जटिल और गंभीर हुई हैं। मुंशी प्रेमचंद भारतीय ग्रामीण व्यवस्था के यथार्थ के सबसे प्रामाणिक कथाकार तब भी थे और आज भी हैं। किसानों के महाजनी शोषण का सिर्फ बाहरी रूप बदला है, साहूकार की जगह आधुनिक बैंक आ गए हैं, लेकिन सूदखोरी और ऋण वसूली का काम उतना ही नहीं बल्कि उससे भी कहीं अधिक बर्बर हो चुका है। ऐसा अगर न होता तो इतनी संख्या में गावों से किसान पलायन और आत्महत्याएं  क्यों करते।

अभी इन्हीं दिनों जब खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के लिए देशी-विदेशी कारपोरेट कंपनियों ने सरकार के साथ मिलकर देहाती इलाकों से किसानों और आदिवासियों को विस्थापित करना शुरू किया तो बहुतों को ‘रंगभूमि’ के अंधे पात्र सूरदास की ज़रूर याद आई होगी। वही सूरदास जो अपनी ज़मीन में खुलने वाले किसी कारखाने के विरुद्ध अपनी निहत्थी अहिंसक लड़ाई लड़ता है। बहुतेरे आलोचकों ने इसे उस समय राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन में गांधीवाद के असर के रूप में देखा है, हो सकता है यह सच भी हो, लेकिन बहुत बड़ा आज का सच यह भी है कि स्वयं गांधीवाद की प्रासंगिकता भी आज पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी है। हमारा राष्ट्र-राज्य मुनाफी और धन कमाने के जिस डरावने उन्माद में आज फंस चुका है, जिसे वह बार-बार ‘विकास’ का नाम देता है, और उसके हाथों में जितनी सैनिक ताकत आ चुकी है, जिसके चलते वह देश के एक नहीं हजारों स्थानों में आए दिन जालियांवाला बाग जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहा है, उसे देखते हुए एक बार फिर गांधी और प्रेमचंद दोनों एक साथ याद आते हैं।

जैसा स्वयं प्रेमचंद,जो खुद को ‘भाषा का मजदूर’ मानते थे, ने कहा था –‘हर लेखक स्वभावत: प्रगतिशील होता है’ , उसी के विस्तार में कहा जा सकता है कि आज का हर लेखक गांधी और प्रेमचंद के बिलकुल करीब, उनकी परंपरा में ही कहीं होता है। अगर ऐसा नहीं है तो वह किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता तो हो सकता है, लेखक नहीं।

मुंशी प्रेमचंद हर मायने में एक सम्पूर्ण लेखक थे। .... और लेखक होना और बने रहना उतना सरल नहीं, जितना अक्सर समझ लिया जाता है।

(उदय प्रकाश जी की फेसबुक नोट से पाठक हित में  कट-कोपी पेस्ट किया है )

उदय प्रकाश जी 
मशहूर कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार के रूप में एक पहचान । कई किताबें अंग्रेजी, जर्मन, जापानी सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनिदुत हुयी हैं । समस्त भारतीय भाषाओं में रचनाएं अनूदित। इनकी कहानियों पर फीचर फिल्में भी बन चुकी हैं। कई कहानियों के नाट्यरूपंतर और सफल मंचन हुए हैं।  उनसे udayprakash05@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। कई सम्मानों सहित उन्हें अखिल भारतीय मुंशी प्रेमचंद सम्मान से अगस्त 2012 में नवाज़ा गया है  इनका पूरा परिचय यहाँ उपलब्ध है 

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