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शक्करबार शाह ‘बागड़ के धणी‘

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अगस्त 03, 2012 | शुक्रवार, अगस्त 03, 2012


  • रमेश सर्राफ धमोरा


राजस्थान में एक दरगाह ऐसी भी हैं जहाँ श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर मेला भरता है । झुंझुनूं जिले के नरहड़ कस्बे में स्थित पवित्र हाजीब शक्कर बार शाह की दरगाह, जो कौमी एकता की जीवन्त मिशाल हैं। इस दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता हैं कि यहां सभी धर्मो के लोगों को अपनी-अपनी पद्धति से पूजा अर्चना करने का अधिकार है । कौमी एकता के प्रतीक के रुप मे ही यहाँ प्राचीन काल से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशाल मेला भरता है जिसमे देश के विभिन्न हिस्सों से हिन्दूओं के साथ मुसलमान भी पूरी श्रद्धा से शामिल होते हैं।

यह मान्यता है कि पहले दरगाह की गुम्बद से शक्कर बरसती थी इसी कारण यह दरगाह शक्कर बार बाबा के नाम से भी जानी जाती हैं। शक्करबार शाह अजमेर के सूफी संत ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती के समकालीन थे तथा उन्ही की तरह सिद्ध पुरुष थे। शक्करबार शाह ने ख्वाजा साहब के 57 वर्ष बाद देह त्यागी थी।

राजस्थान व हरियाणा मे तो शक्करबार बाबा को लोक देवता के रुप मे पूजा जाता है। शादी, विवाह, जन्म, मरण कोई भी कार्य हो बाबा को अवश्य याद किया जाता है इस क्षेत्र के लागो की गाय, भैंसों के बछड़ा जनने पर उसके दूध से जमे दही का प्रसाद पहले दरगाह पर चढ़ाया जाता हैं तभी पशु का दूध घर में इस्तेमाल होता है। हाजिब शक्करबार साहब की दरगाह के परिसर में जाल का एक विशाल पेड़ हैं जिस पर जायरीन अपनी मन्नत के धागे बांधते हैं। मन्नत पुरी होने पर गाँवो में राती जगा होता है जिसमें महिलाएँ बाबा के बखान के लोकगीत जकड़ी गाती हैं।

दरगाह में बने संदल की मिट्टी  को लोग श्रद्धा से अपने साथ ले जाते हैं जिन्हे खाके शिफा कहा जाता हैं। लोगो की यह मान्यता है कि इस मिट्टी को शरीर पर मलने से पागलपन दुर हो जाता हैं। दरगाह में ऐसे दृश्य देखे जा सकते हैं। हजरत के अस्ताने के समीप एक चांदी का दीपक हर वक्त जलता रहता हैं। इस चिराग का काजल बड़ा चमत्कारी माना जाता है । इसे लगाने से आंखो के रोग दूर होने का विश्वास हैं।

दरगाह के पीछे एक लम्बा चौड़ा  तिबारा है जहां लोग सात दिन की चौकी भरकर वहीं रहते है नरहड दरगाह मे कोई सज्जादानसीन नही हैं। यहाँ के सभी खादिम अपना अपना फर्ज पूरा करते हैं। दरगाह मे बाबा के नाम पर देश -विदेश से प्रतिदिन बड़ी संख्या मे खत आते है जिनमे लोग अपनी-अपनी समस्याओं का जिक्र कर बाबा से  मदद की अरदास करते हैं। दरगाह कमेटी के पूर्व सदर मास्टर सिराजुल हसन फारुकी ने बताया कि जिस प्रकार ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती को ‘सूफियों का बादशाह ‘ कहा गया है। उसी प्रकार शक्करबार शाह ‘बागड़ के धणी ‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं।

यहाँ के बारे में किवदंती है कि नरहड़ कभी प्राचीन जोड़ राजाओं की राजधानी था। और उस वक्त दिल्ली पर पठानों का शासन था एंव लोदी खाँ नामक पठान वहाँ का गर्वनर था । पठानो व राजपूतो के मध्य हुए युद्ध में पठान निरंतर परास्त होते गये एवं नरहड़ मे आकर उनके सैनिक व घोड़े थकते गए । एक रात दिव्यवाणी द्वारा पीर बाबा ने कहा कि तुम युद्ध कैसे जीत सकते हो । तुमने तो मेरी मजार पर घोड़ों का अस्तबल बना रखा हैं। उसी वक्त पठान सेना ने वहां से अस्तबल हटाया व विजय हासिल की। उसी वक्त से यहां उनका आस्ताना कायम हैं।

इतना महत्तवपुर्ण स्थल होने के उपरांत भी राजस्थान वक्फ बोर्ड की उदासीनता के चलते यहां का समुचित विकास नही हो पाया है इस कारण यहां आने वाले जायरीनो को परेशानी उठानी पडती हैं। झुंझुंनू जिला प्रशासन को इस प्रसिद्व दरगाह परिसर का योजनाबद्व ढ़ंग से समुचित विकास करवाना चाहिये ताकि यहंा आने वाले श्रृद्वालुओं को असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़े।




रमेश सर्राफ
स्वतंत्र लेखक और रचनाकार 
झुंझुंनू,राजस्थान
मोबाईल-9414255034 
ई-मेल-rameshdhamora@gmail.com

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