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'व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि ' -1 ( उद्भ्रांत )

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अगस्त 06, 2012 | सोमवार, अगस्त 06, 2012




  • ‘औरत के नज़रिये से’ कुछ और भी कहना ज़रूरी है!
  • उद्भ्रांत
  • ‘कथादेश’ का जून, 2012 का अंक

‘औरत के नज़रिये से’ स्तंभ में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ नामक लेख में शालिनी माथुर ने पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को सटीक विश्लेषण के ऑपरेशन थियेटर में बुद्धि की मेज पर रख अपने अचूक तर्कों के पैने औजारों की मदद से दोनों कविताओं के रोगग्रस्त अंग/अंगों--उपमानों/रूपकों--की सफल शल्यक्रिया कर दी है। इस जटिल और संवेदनशील ऑपरेशन के दौरान उन्होंने सूसन सोन्टैग, जॉन स्टुअर्ट मिल, मैरी वोल्सटन क्राफ़्ट, एड्रियन रिच, मार्क ट्वेन, कीट्स, सूसन ग्रिफिन, नाओमी वुल्फ़, सिल्विया प्लॉथ--उनकी कवयित्री बेटी फ्रीडा हयूज़ जैसी विदेशी कवियों-लेखकों, चितंकों, नारीवाद समर्थकों और अश्लीलता के आरोप में मुक़दमों का सामना कर चुके कथाकार मंटों के साथ कैंसर की ही शिकार हुई और पिछले दिनों बिग बॉस सीरियल से हिंदुस्तान में भी चर्चित ब्रिटिश अभिनेत्री जेड गुडी की जीवनगत स्थितियों, विचारों, कविताओं और मृत्युलेख तक के हवालों तक की भी विशेषज्ञ (स्पेशलिस्ट) मदद ली है।
यहाँ दूसरा रूपक एक अदालत का भी हो सकता है जिसमें जनता (हिन्दी के सजग पाठक) की अध्यक्षता वाली स्पेशल बेंच के सामने, दोनों कवियों द्वारा स्त्रियों के असाध्य रोग के निवारणार्थ हुई शल्य चिकित्सा के बाद उनके ऐम्प्यूटेड अंगों को माध्यम बनाकर की गई क्रूर अभिव्यक्तियों को ‘नारीवादी काव्य’ कहने के अक्षम्य अपराध का मिनट-दर-मिनट ब्यौरा देते हुए और उपर्युक्त शख़्सियतों के प्रमाण-वचनों के साक्ष्य में धुँआधार बहस करते हुए अंततः माननीय न्यायाधीशों से ऐसे दुर्दांत अपराधियों को कठोरतम दंड देने की मौन अपेक्षा की गई है। चूँकि इन कविताओं में भी स्त्री की असाध्य व्याधि और उसके परिणाम को नकारात्मक रूपक में बाँधा गया, ऑपरेशन थियेटर और अदालत के ये रूपक अनायास मन में कौंध गए।
यह तो रूपकों की बात हुई जिसके अंतर्गत कहा जा सकता है कि शालिनी माथुर ने कुशल चिकित्सक की तरह शल्यक्रिया को अंजाम दिया या एक जाने-माने वक़ील की तरह व्याधिग्रस्त स्त्रियों या ऐम्प्यूटेड अंगों को पर्सोनीफ़ाई करते हुए उनकी ओर से वेदना या स्थितियों का गर्हित मज़ाक न बनने देने के लिए सफल बहस की। अब बहस को उसकी वास्तविकता में देखा जाय।
संदर्भित कविताओं के काव्यांशों को बार-बार उद्धृत कर बारी-बारी से उनकी सूक्ष्म पड़ताल करते हुए शालिनी ने सम्बंधित कवियों को मौत की भयावहता का प्रतिक्षण सामना कर रहे रोगियों के दुख से आनंदित न होने, पोर्नोग्राफ़ी से बचने और कवियोचित संवेदना के साथ परकाया प्रवेश की सिद्धि पाने की परोक्ष सलाह दी है।
पहले पोर्नोग्राफ़ी को लें
पोर्नोग्राफ़र मानसिक रुग्णता से ग्रस्त व्यक्ति है। उसकी आत्मा मर चुकी होती है और वह करुण अथवा वीभत्स स्थितियों तक में मानसिक व्यभिचार में लिप्त रहता है। साहित्यकार भी अपनी कृतियों में कथा की माँग के अनुरूप ऐसे पात्रों, स्थितियों का सृजन करता है जिस कारण उस पर अश्लील लेखन के आरोप लगते रहे हैं। मंटो का उल्लेख यहाँ आया है जिनकी कृतियों पर बिना गहराई से विचार किये अश्लीलता का आरोप लगा और उन्हें मुक़दमों तक का सामना करना पड़ा। पिछली सदी में यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय से लेकर चतुरसेन शास्त्री व द्वारका प्रसाद (घेरे के बाहर) जैसे लेखकों के उपन्यासों पर अश्लीलता के आरोप लगे और स्वातंत्र्योत्तर काल में कृष्णा सोबती, मृदृला गर्ग, मैत्रेयी जैसी लेखिकाओं की कृतियों के साथ कमलेश्वर (माँस का दरिया), डॉ. माहेश्वर (पेशाब) और कामतानाथ (लाशें) के नाम भी इस संदर्भ में स्मरण आते हैं। ‘लाशें’ का नायक तो लाश के साथ संभोगरत होता है। रमाकांत श्रीवास्तव की कहानी ‘मध्यांतर’ में चौराहे पर पड़ी किसी बेहोश या मृत स्त्री की उघाड़ी देह को ढाँकने की जगह भीड़ की निगाहें उसकी नंगी टाँगों के बीच की जगह का मुज़ाहिरा करने जैसी मानसिक विकृति प्रदर्शित करती हैं। ‘यारों के यार’ जब ‘नई कहानियाँ’ में छपी थी तो बड़ा तूफ़ान खड़ा हुआ था और पूरे साल भर पत्रिका में बहस चलती रही थी।
इस तरह की बहसों में यह निकलकर आया था कि अश्लीलता देह या चित्र या शिल्प या रचना या वहाँ प्रयुक्त गालियों में नहीं, लेखक/चित्रकार/मूर्तिकार के नज़रिये में होती है। अजंता, ऐलोरा की गुफाओं और खजुराहों के शिल्पों में उत्कीर्णित मैथुनरत युगलमूर्तियों में कलात्मकता ही देखी जाती है। जयदेव के ‘गीत गोविंद’ और विद्यापति की पदावलियों में राधा की अनावृत देह के सौंदर्यचित्र मिलते हैं जिनमें अश्लीलता नहीं देखी जाएगी। कालिदास के काव्य में ऐसे अंश बहुतायत में मिलेंगे।
शालिनी माथुर ने कविता जैसी संवेदनशील विधा में घुसपैठ कर रही पोर्नोग्राफ़िक बीमारी की पड़ताल के लिए अपनी परखनली में जिन दो कवियों की कविताएं ली हैं वे हिंदी कविता के जाने-पहचाने चेहरे हैं। पवन करण युवा कवि हैं और अनामिका निःसंदेह पिछले दो-ढाई दशकों की अवधि में उभरकर आई जानी-मानी कवयित्री हैं। उन्हें ‘शीर्ष कवयित्री’ कहना हिन्दी की स्नेहमयी चौधरी, सुनीता जैन और चम्पा वैद जैसी कवयित्रियों की अवमानना होगी। पवन करण को भी शालिनी जी ने ‘शीर्ष’ विशेषण दे दिया है। यह ठीक है कि आज के समय में सृजन के क्षेत्र में दस-पन्द्रह वर्ष होते ही अथवा एकाध पुरस्कार का जुगाड़ करने के बाद हर युवा कवि में स्वयं को ‘शीर्ष’ पर बैठा देखने-कहने और मनवाने की बेतुकी ललक देखी जा रही है, मगर समीक्षक अथवा सम्पादक को तो उनके लिए ऐसे विशेषणों से बचना चाहिये। पवन करण को शीला सिद्धांतकर सम्मान ‘स्त्री मेरे भीतर’ संग्रह पर दिया गया था। 

यद्यपि मैंने पूर्व में पवन की कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में देखी थीं और उनमें से कुछ कविताएं अच्छी भी लगी थीं, मगर संदर्भित संग्रह देखने का अवसर मुझे अभी तक नहीं मिला। यही स्थिति अनामिका के साथ है। सम्मान समारोह में मैं उपस्थित था। अनामिका पवन की कविताओं पर बोली थीं। शायद वे निर्णायक मंडल की सदस्य भी थीं। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि कैंसर जैसी व्याधि पर लिखी पवन की कविता ‘स्तन’ के बाद उन्होंने भी उसी व्याधि पर ‘ब्रेस्ट कैंसर’ जैसी कविता लिखी। पवन की कविता संगीतारंजन के लिए और अनामिका की कविता वनिता टोपो के लिए निवेदित है। स्पष्ट है कि दोनों कवियों के लिए यह व्याधि अनुभव के दायरे के बाहर होगी, मगर कवि के लिए यह ज़रूरी नहीं होता कि वह सिर्फ़ अपने अनुभव को ही व्यक्त करे। इसके लिए उसे परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त करनी होती है। ऐसा न होने पर वही होता है जैसाकि संदर्भित कविताओं में दिखाया गया है।
कविता की रचना प्रक्रिया को उद्घाटित करना आसान नहीं है, मगर उसकी बुनियादी शर्त यह तो है ही कि कवि ने संदर्भित व्यक्ति या स्थिति के साथ सम्पूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया हो। निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ या ‘भिखारी’ या नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, नागार्जुन या रघुवीर सहाय या श्रीकांत की अनेक कविताओं को इन संदर्भों में देखा जा सकता है। उनके प्रभाव आज भी हमारे मन पर वैसे ही अंकित हैं। गांधी की हत्या पर लिखी सैकड़ों कविताएं या बच्चन की बंगाल के अकाल पर लिखी लम्बी कविता, शमशेर की बैल--इन सारी कविताओं में कवि अपने स्वत्व को विलीन कर उसका संपूर्ण रूपांतरण कर चुकता है तब कालजयी कविता जन्म लेती है। जैसे ‘मेटामॉर्फ़ासिस’ का नायक एक सुबह जब उठता है तो अपने को एक कीड़े में तब्दील हुआ पाता है।
शालिनी मानती हैं कि ये दोनों कविताएं रोगग्रस्त स्त्रियों द्वारा जेड गुडी की तरह अनुमति देने के बाद रची गई होंगी। मुझे शक़ है। भले ही कैंसर की व्याधि से ग्रस्त थी, मगर जेड गुडी अभिनेत्री थी। उसका क़िस्सा दूसरा था। उसकी मानसिकता दूसरी थी, संस्कार दूसरे थे। टीवी प्रसारण के अधिकार देते हुए ज़रूर उसके मन में उसके शेष परिवार--जो और जैसा हो मुझे उसकी अधिक जानकारी नहीं--के लिए जीवन-निर्वाह के अधिकतम साधन सुलभ कराना भी हो सकता है। पश्चिम की संस्कृति कितनी ही भोगवादी क्यों न हो--इतनी क्रूर और अमानवीय नहीं हो सकती, फ्रीडा ह्यूज की कविता इसका प्रमाण है।
इसलिए मुझे शक़ है कि उक्त कविताएं संदर्भित स्त्रियों द्वारा अनुमति देने के बाद लिखी गई हैं। संभव है कि पवन करण ने संगीतारंजन की बीमारी के बारे में सुना हो, पढ़ा हो और स्त्री मेरे भीतर है--इस दावे की परख के लिए उन्होंने उस पर कविता रच दी हो। कालांतर में उनकी प्रशंसक/गुरू/पुरस्कार समिति की जूरी की सदस्य को जब वनिता टोपो का केस पढ़ने या जानने को मिला हो तो पवन की स्त्री के एक स्तन खोने के बरक्स ब्रेस्ट कैंसर के कारण दोनों छातियाँ गँवाने के मामले ने उनकी कवयित्री की प्रसन्नता दोगुनी बढ़ा दी हो, जिसने हमें ‘ब्रेस्ट कैंसर’ जैसी कालजयी कविता से गुज़रने का यह दुर्लभ अवसर दे दिया!
यह मेरा अनुमान है। आमतौर से रचनाकार अपनी रचना में जिसे केन्द्र में रखते हैं, उसे कभी पता  तक नहीं चलता कि उसके लेखक मित्र या यह ख़बर पढ़ते-सुनते हुए दूरस्थ किसी लेखक पाठक/श्रोता ने उसकी बीमारी का क्रूर मज़ाक उड़ाने वाली रचना बुनने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है!
लेकिन  अगर उन्हें पता लग जाए कि उन्हें किस तरह का पात्र बनाया गया है या उनकी असाध्य व्याधि का रस लेकर कैसा रंजक चित्र उपस्थित किया गया है तो शायद उनकी मानसिकता अँधेरे में बलात्कृत स्त्री की मानसिकता से भिन्न नहीं हो सकती जिसके चलते ऐसी स्त्री स्वयं को समाज से काटते हुए आत्महत्या जैसा भयानक क़दम भी उठा सकती है।
और अगर ऐसा हो तो उसके जिम्मेदार क्या ऐसे कवि या लेखक ही नहीं होंगे? हो सकता है कि आत्महत्या से पूर्व लिखे अपने पत्र में उस चरम स्थिति तक पहुँचाने के बीज-कारण को वे स्मरण न रख पाएं, या दुनियाँ से विदा होने की चरम उदात्त मनःस्थिति के चलते उसका उल्लेख न करें, लेकिन उससे ऐसी रचनाओं अथवा उनके रचनाकारों का अपराध क्या कम हो जाएगा? सवाल यह भी है कि ऐसे कवि या लेखक--अगर उन्होंने अपनी संवेदनशीलता को गिरवी न रख दिया हो--क्या अपने ऐसे कृत्य के लिए किसी अपराधबोध से गुज़रने, अनंतर उसका प्रक्षालन करने का साहस दिखाएंगे?
बच्चन ने अपनी क्लैसिक आत्मकथा में लिखा है कि एक कवि सम्मेलन में अपने अवसादग्रस्त गीतों का पाठ करने के बाद जब वे रात्रि में ट्रेन से लौट रहे थे तो कवि सम्मेलन में उनके गीतों की फ़रमाइश कर बार-बार सुनने वाले एक युवक ने उसी ट्रेन से कटकर जब आत्महत्या कर ली, तब उन्हें अहसास हुआ कि वे जो कविता लिख रहे थे वह मॉरबिड पोइट्री थी जो समाज के संवेदनशील युवा पर आत्महंता प्रभाव डाल रही थी। इस त्रासदी ने उनके कवि को भीतर तक हिला दिया और जैसे पश्चात्ताप स्वरूप ही उन्होंने ऐसी कविता रचने से स्वयं को सायास मुक्त कर लिया!
कविता करना क्या कोई खेल है? समाज की कवि जैसी संवेदनशील इकाई क्या सैडिस्ट हो सकती है? या इसे यों कहें कि क्या कोई सैडिस्ट, कवि हो सकता है? शास्त्रों में कवि को ‘परिभू स्वयंभू’ कहा गया। ईश्वर की ही तरह सृष्टि की रचना करने वाला। कविता को आनंद देने वाली कृति के अतिरिक्त सामाजिक रुचियों का परिष्कार करने वाला भी माना गया है। कवि की इसीलिए हमेशा से बड़ी प्रतिष्ठा रही है क्योंकि समाज उससे संस्कारित होता है। ये कविताएं समाज को नहीं, स्त्री देह को नहीं, यहाँ तक कि संदर्भित जटिलतम व्याधि को भी संस्कारित नहीं करतीं, उल्टे उसके साथ परपीड़क आनंद से भरा खिलवाड़ करती हैं।
शालिनी अपने लेख में कविता के पाठक के सामने निम्न प्रश्नों की एक श्रृंखला रखती हैं:

1. नारीवादी कवि व्याधि पर कविता रचते समय क्या इस बात पर कभी विचार करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर व्याधिग्रस्त समाज कैसा अनुभव करेगा?

2. साहित्य में क्या स्त्री दृष्टि और पुरुष दृष्टि अलग-अलग होती हैं?

3. छंद, लय आदि शिल्प वाले अनुशासन से मुक्त तथाकथित कविता का स्वरूप क्या ऐसा होना स्वीकार्य हो सकता है कि किसी विचारवान पाठक को उसमें कविता नहीं, कुछ और विद्रूप झाँकते नज़र आयें?

4. क्या स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है?

5. क्या स्त्री देह मनविहीन या हृदयहीन वस्तु है?

6. ज्ब विकलांगता को परिभाषित करने वाले समाज में प्रचलित हीनताबोधक शब्दों की जगह समाज का संस्कारित तबक़ा बेहतर शब्दों का प्रयोग कर सकता है तो कविता जैसे संवेदनशील रूप में, कटे हुए अंग को लेकर एक कवि के द्वारा व्याधिग्रस्त-व्यक्ति की संज्ञा को आमफ़हम करने की प्रवृत्ति क्या उचित कही जा सकती है?

7. क्या व्याधि की भी कोई स्मृति होती है/हो सकती है?

8. ‘सही प्रयोग’ और ‘लगभग सही प्रयोग’ में क्या अंतर है?

9. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ठेका क्या कवियों ने ही ले रखा है? उनकी कविताएं पढ़ने वाले पाठक क्या उस अधिकार से वंचित हैं कि ऐसी कविताएं पढ़कर भी ख़ामोश रहें?

10. क्या शेयर मार्केट का कार्टेल हिंदी कवियों के कार्टेल में तब्दील हो गया है?

इन सवालों के उत्तर ढूँढते हुए हम हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य की हौलनाक तस्वीर से रू-ब-रू होते हैं जिसमें कवि हैं, आलोचक हैं, सम्पादक हैं, जिनके अलग-अलग गिरोह बने हैं और जो अपने सदस्य कवि या कवयित्री को प्रकाशन, पुरस्कार, सम्मान आदि के ज़रिये उठाने-गिराने के दुष्कृत्य में तल्लीन हैं; बिना इसकी परवाह किये कि इनसे अलग हिंदी का एक सजग पाठक वर्ग भी है जो इनकी एक-एक हरक़त पर नज़र रखे है और अंततोगत्वा जिसके सामने ऐसा हर कवि या कवयित्री अपने अपमूल्यित रचना कर्म का हश्र देखने को बाध्य होगा।

अब सवालों पर ग़ौर करें:

1. दूसरे कवियों के बारे में नहीं कह सकते, मगर संदर्भित कवियों ने इस सम्बंध में कोई विचार नहीं किया होगा।

2. आजकल बहुत से लोग ऐसा मानने लगे हैं, जैसे कि दलित विमर्श वाले मानते हैं। लेकिन सच यह है कि रचनाकार न स्त्री है न पुरुष--या फिर वह दोनों ही है--जैसे कि ब्रह्म!

3. जवाबी प्रश्न। जब हिंदी कविता के स्वयंभू कवियों ने अनुशासन की जटिलता से स्वयं को मुक्त कर लिया तो उन्हें पाठक की परवाह क्यों होगी?

4. यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि स्त्री विमर्श के ज़्यादातर पुरोधाओं के लिए स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना मात्र है!

5. मनुस्मृति से लेकर इस उत्तर आधुनिक समय तक हुईं अधिकांश घटनाएं स्त्री की देह के भीतर मन या हृदय ही नहीं--बुद्धि को भी--नकारती हैं, नज़रअंदाज़ करती हैं--यद्यपि प्रत्येक समय में अपवाद स्वरूप स्त्री ने अपना सही स्वरूप (मैं उसे प्रतिपक्ष नहीं कहूँगा) प्रमाणित किया है। अठारहवीं सदी से इसमें उत्तरोत्तर प्रगति भी हुई है। मगर ज़रूरी नहीं कि वह हिंदी के सभी नारीवादी कवि-कवयित्रियों तक पहुँच सकी हो।

6. आप या मेरे जैसे पाठक या पाठिका के लिए अनुचित होगी, मगर सम्बंधित कवि या कवयित्री के लिए वैसा होता तो ऐसी कविताएं जन्म ही क्यों लेतीं?

7. किसी भी व्याधि की स्मृति नहीं हो सकती जब तक उसका मानवीकरण न हो। मगर यहाँ तो व्याधि के मानवीकरण की जद्दोज़हद नहीं। व्याधिग्रस्त स्त्री की स्मृति है, मगर उसमें कहीं दुःख नहीं, पीड़ा नहीं, हताशा नहीं, अवसाद नहीं, व्याधि से मुक्त होने का संतोष नहीं। इसके उलट इनमें व्याधिग्रस्त होने को लेकर किसी कवि द्वारा खिलवाड़ करने और स्त्री की अस्मिता को अपमानित करने का भाव ही मुखर है। शेष तो आप स्वयं समझदार हैं। 

8. ‘सही प्रयोग’ या ‘लगभग सही प्रयोग’ सिर्फ़ वाग्जाल है। या तो सही प्रयोग होगा, या सही प्रयोग नहीं होगा; अर्थात् ग़लत प्रयोग होगा।

9. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो पाठक के पास भी है, मगर सम्बंधित कवियों को ऐसा लगता होगा कि उनके यश के चकाचौंध में पाठक बेचारा अपने को अभिव्यक्त करने का साहस कहाँ जुटा पायेगा! अभी तक के समय ने उसके भ्रम को सिद्ध भी किया है। किस सामान्य पाठक ने आज तक इस पर बात की? वह बेचारा करता भी तो उसे छापता कौन? किताब तो कई वर्ष पहले छपी, मगर आप जैसी विद्वान पाठिका भी पिछले वर्ष ही उसे नोटिस में ले पाईं और अगर आपके पास यह स्तंभ न होता तो आप उसे प्रकाशित भी शायद न करवा पातीं! तो साहित्य में ऐसा ही भेड़ियाधसान चलता है मैडम! आपको बधाई कि आप उस आम पाठक की प्रतिनिधि के तौर पर साहसपूर्वक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उस तथाकथित क़ानूनी अधिकार का उपयोग कर पाने की स्थिति में हैं?

10. ‘कवियों का कार्टेल’ की जगह ‘हिंदी आलोचना अथवा ‘सम्मान देने-दिलाने वाली संस्थाओं का कार्टेल’ वाला पद अधिक उपयुक्त होगा।


अब यहाँ कुछ सवाल मेरी ओर से भी

कार्टेल जिस तरह शेयर मार्केट में शेयरों को उठाने-गिराने का कार्य करता है उसमें ज़्यादातर अच्छे शेयर पिटते हैं और ख़राब शेयर चढ़ जाते हैं। कार्टेल का उद्देश्य ही यही होता है तभी उसे या उससे जुड़ी कम्पनियों को एक दिन या कुछ घंटों के भीतर ही लाखों-करोड़ों का लाभ हो पाता है। कम पूँजी वाला आम निवेशक इसी कारण अंत में लुट-पिटकर बाहर हो जाता है, जिसकी ऐसी दशा पर दो आँसू बहाने वाला भी कोई नहीं मिलता! साहित्य के शेयर मार्केट में भी ऐसा ही हो रहा है।
पवन करण को मिले एक पुरस्कार का तो मैं साक्षी रहा हूँ। आपका कहना है कि उन्हें सात पुरस्कार मिले हैं और (या इसलिए) वे शीर्ष कवि हैं! अनामिका ऐसा पुरस्कार प्रदान करने वाली कवयित्री हैं तो ज़ाहिर है कि वे तो और भी ऊँचे शीर्ष पर होंगी! ल्ेकिन इस समाज में एक सजग, सचेत बुद्धिजीवी की भूमिका निभाते हुए क्या आप सचमुच नहीं जान सकीं कि पुरस्कारादि कैसे लिये-दिये जाते हैं? साहित्य में इनका अपना कार्टेल है, इसे अब गै़र साहित्यिक लोग भी जान और पहचान चुके हैं।
अब जब अपने लेख द्वारा आपने इन्हें तथाकथित ‘शीर्ष’ से उतारकर उनकी सही जमीन दिखाने का काम कर ही दिया है तो उनका कार्टेल क्या ख़ामोश बैठा रह जाएगा? वह बाँस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुनः त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष’ के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्य करेगा। नतीज़ा यह होगा कि आपकी परखनली से प्रमाणित होकर निकलीं ऐसी क्रूर, हिंसक, हृदयहीन कविताओं के ये सर्जक साहित्य के शेयर मार्केट में कुछ समय के लिए नीचे आकर फिर पूर्ववत रूप में जगमगाते नज़र आएंगे! चर्चा तो होती ही रहेगी। तो क्या यह मानना सही नहीं होगा कि इस तरह इन्हें ताज़ी चर्चा में लाने का श्रेय आप जैसी सजग लेखिका द्वारा भी हो ही गया? आज के शातिर समय में बहुत से लोग चर्चा में बने रहने के लिए गालियाँ तक खाने को तैयार रहते हैं--‘बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा’ वाली तर्ज़ पर! यही स्थिति देखकर नयी पीढ़ी को भी यही सब करने का हौसला मिलता है।
मेरा सीधा सवाल आपसे यह है कि नारी विमर्श पर दूसरे कवि भी कविताएँ लिख रहे हैं। स्नेहमयी चौधरी से लेकर सविता सिंह और नीलेश रघुवंशी तक। उनकी कविताओं पर आपकी नज़र क्यों नहीं जाती? आत्मोल्लेख को अशिष्टता माना जा सकता है, मगर इस अँधेरे समय में उसका ख़तरा उठाते हुए भी अब यह बताना ज़रूरी लगता है कि स्त्री-केन्द्रित कविताओं का मेरा एक कविता संग्रह ‘इस्तरी’ दो वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था (सौभाग्य से जो प्रायोजित पुरस्कारों से वंचित रहा!)। उसकी 18 कविताएं डॉ. परमानंद श्रीवास्तव के लेख ‘उद्भ्रांत की स्त्री-विषयक कविताएं’ के साथ ‘इरावती’ में छपी थीं। उनमें से कुछ--‘अधेड़ होती औरत’, ‘बड़ी हो रही बेटियाँ’, ‘स्त्री की जगह’, ‘इस्तरी’, ‘डायन’ और ‘तलाक़-तलाक़’ मैंने गत वर्ष 12 दिसम्बर, 2011 को लखनऊ स्थित दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के कार्यालय में मुद्राराक्षस की अध्यक्षता में हुए अपने उस एकल काव्यपाठ के दौरान पढ़ी थीं जिसमें आप भी उपस्थित थीं और मेरे सम्पूर्ण काव्यपाठ पर आपने समेकित वक्तव्य दिया था। जानता हूँ कि सुनी-सुनाई कविताओं के आधार पर कुछ लिखा नहीं जा सकता। मगर यह तो आप जान ही चुकी थीं कि और भी कवि हैं जो स्त्री-विमर्श पर गम्भीरता से कार्य कर रहे हैं। उनकी तरफ़ आपकी दृष्टि क्यों नहीं गई? इसी तरह बरसों पहले मेरी मित्र सुधा अरोड़ा जब ‘कथादेश’ में ही अपना चर्चित कॉलम लिख रही थीं, तब दूरभाषवार्ता के दौरान उन्हीं दिनों ‘वर्तमान साहित्य’ में प्रकाशित लम्बी कविता ‘एक थी सुरसती’ की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उसे ‘स्त्री त्रासदी का महाकाव्य’ कहा था, मगर उसके बारे में कभी एक पंक्ति तक नहीं लिखी! लिखने के लिए उनके पास हमारे मित्र कवि के जीवन की त्रासदी वाला पारिवारिक प्रसंग भर था। हमारे समय और समाज की सजग, प्रखर और तेजस्वी नारीवादी लेखिकाओं का समूचे परिदृश्य को आकलन करने वाला दृष्टिकोण कही एकांगी ही होकर तो नहीं रह गया है?
ख़राब रचनाओं की भीड़ में अच्छी रचनाएं पहले तो लोगों तक पहुँचती नहीं, उनके पहुँचने से पहले ही ख़राब रचना को साहित्य का कार्टेल इस क़दर चर्चा में ला देता है कि जिन्हें अच्छी रचनाओं की पहचान हो सकती है, वे भी उन ख़राब रचनाओं के अवगुणों को ढूँढने और उसे उजागर करने में अपना सारा श्रम और शक्ति लगा देते हैं। फलस्वरूप अच्छी रचनाओं की ओर ध्यान देने-दिलाने का उनके पास समय ही नहीं बचता! उन्हें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिये कि ख़राब रचनाएं या रचनाकार अपनी चौंकाऊ नकारात्मकता और कॉर्टेल-पोषित होने के कारण लगातार चर्चा में बने रहते हैं। अच्छी रचनाओं को यह सुविधा नहीं मिलती और उन्हें भवभूति के अनंत समय और विराट पृथ्वी की बाट जोहनी पड़ती है! अर्थशास्त्र के इस नियम से आप भी वाकिफ़ होंगी कि खोटा सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है। यह नियम साहित्य के अर्थशास्त्र में भी लागू होता है! इस कारण औरत के हक़ में लड़ाई मज़बूत नहीं हो पाती और उसके नज़रिये से जो लेखन सामने आता है, उसमें इतना विलंब हो चुका होता है कि वह अपने मूल उद्देश्य की प्रभावी ढँग से प्रतिपूर्ति करने में पूर्णतया सक्षम नहीं हो पाता।

उद्भ्रांत जी 
उद्भ्रांत जी 
साहित्य जगत का एक बहुत ज़रूरी और बड़ा नाम.२००८ के भवानी प्रसाद मिश्र सम्मान से नवाजे जा चुके वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत जी पिछले समय उनकी पुस्तक अस्ति  से भी चर्चा में रहे हैं.उनसे जुड़ी एनी चर्चाएँ यहाँ अपनी माटी वेबपत्रिका में और भी आगे जानकारी के लिहाज से पढ़ी जा सकती है.संपर्क सूत्र--बी-463, केन्द्रीय विहार,सेक्टर-51,नोएडा-201303,मोबाइल: 09818854678


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2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बेहद उम्दा आकलन किया है ………आज भेडचाल पर ही साहित्य टिका है । जहाँ तक उक्त चर्चा की बात है वो हम सबने पढी और अपने अपने विचार व्यक्त किये मगर यहाँ दूसरा पहलू कोई नही देखना चाहता …………जैसे कि उस दौर मे जिस पीडा , हताशा या अवसाद से वो स्त्री गुजरी होगी और कभी कभी उसे ऐसे भी ख्याल आये होंगे कि इस जीवन से तो मौत बेहतर थी क्योंकि ये रोग और इसकी चिकित्सा बेहद भयावह है अच्छे से अच्छे जीवट के हौसले पस्त कर देती है तो एक आम स्त्री जिसका सारा संसार अपने पति और बच्चों घर परिवार तक सीमित हो उसके लिये तो ये किसी मौत के फ़रमान से कम नही और ऐसे मे जब वो इस बीमारी से लडकर खुद को मु्क्त करती है तो कभी कभी शुरुआती दौर मे एक पीडा उसे झकझोरती है अपनी अपूर्णता की या कोई स्त्री जो वात्सल्य सुख से वंचित रह गयी हो और अब संभव भी ना रहा हो वो सुख पाना उसकी पीडा का अनुमान कौन लगा सकता है ? अगर ऐसी पीडा पर भी यदि कोई लिखता है तो उसे भी ये समाज नकार देता है क्योंकि यहाँ सिर्फ़ एक ही दृष्टिकोण है दूसरा कोई देखना ही नही चाहता। अगर सोचा जाये और देखा जाये तो ना जाने कि्न किन हालातों और समस्याओ से वो स्त्रियाँ बाद मे भी गुजरती होंगी मगर उस पर लिखना यहाँ मना है बस लिखो तो सिर्फ़ आशावादी या उत्साहवर्धक ………पीडा पर नही, किसी क्षणिक लम्हे पर नहीं।

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  2. अपनी माटी बेब पत्रिका का में भी सदस्य हूँ. इस के लेख हिंदी के उच्च कोटि के साहित्यकार] कवि लेखक क़ि रचनाये बहुत ह़ी सार्थक जीवन जीने के लिए प्रेरणादायी होती है. छोटी से छोटी कविता या लेख को स्थान देना यह सम्पादक क़ि म्हणता होती है. यदि किसी लेखक या कवि क़ि कविता का मंच से प्रकाशन हो या समाचार पत्र में प्रकाशन हो जाना उसके लेख क़ि सार्थकता हो जाती है. उसका प्रयास सफल हो जाता है. इस प्रकार के लेख ह़ी भारतीय महिलायों क़ि आबरू अस्मत को बचा सकते है. आपको बहुत बहुत धन्यवाद. संतोष गंगेले अध्यक्ष प्रेस क्लब नौगाव जिला छतरपुर मध्य प्रदेश

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'अपनी माटी'
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