Latest Article :
Home » , , , , » किलों का पौरुष,महलों की नफासत और मंदिरों का श्रद्धानत शिल्प Vaya जैसलमेर

किलों का पौरुष,महलों की नफासत और मंदिरों का श्रद्धानत शिल्प Vaya जैसलमेर

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अगस्त 27, 2012 | सोमवार, अगस्त 27, 2012





जैसलमेर की हवेलियाँ  
पत्थरों पर अवर्णनीय सौंदर्य की सृष्टि करना राजस्थान युगों से जानता है. किलों का पौरुष महलों की नफासत और मंदिरों का श्रद्धानत शिल्प तो कुछ उदहारण भर हैं असल में तो मालवा के पग-पग रोटी डग-डग नीर की तर्ज़ पर राजस्थान में पग-पग पर और  डग-डग में पत्थरों पर सृजित सौंदर्य का अनूठा संसार बिखरा मिल जायेगा. यह सोचकर आश्चर्य भी होता है कि शौर्य की अनूठी मिसालें पेश करने वाले इस प्रदेश ने कलात्मक सौन्दर्य की सृष्टि में  कितना बड़ा योगदान दिया है. जैसलमेर की हवेलियाँ भी इसी कलात्मक सौंदर्य की अनूठी मिसालें हैं. पटवों की हवेली, सालम सिंह की हवेली और नथमल की हवेली आज भी  जैसलमेर में आकर्षण का केंद्र हैं. पत्थरों पर अलंकरण की अद्भुत काव्यात्मक कृतियाँ . उन्हें देखने के बाद मैंने जब कुछ नए निर्माण देखे तो मुझे न जाने क्यों अपनी बनारस यात्रा याद आ गयी.

वहां बनारसी साड़ी बनाने वाले एक बुनकर ने मुझे एक ऐसी साड़ी दिखाई थी जिसे देखकर मैं दंग रह गया था. पर जब उसने उसकी कीमत बताई तो आश्चर्य चकित होकर मैंने पूछा था 'इतनी महंगी !!'  तब उसने एक बहुत अच्छी बात कही थी उसने कहा था ' बाबूजी ये बारीक काम  है और ऐसा काम हाथों से नहीं होता ऐसा काम रूह से होता है.' राजस्थान में और पूरे देश में आज भी कलात्मक निर्माण होते हैं अब तो पत्थरों को तराशने के लिए मशीने भी उपलब्ध हैं. लेकिन ना जाने क्या बात है कि कोई भी निर्माण सौंदर्य के उस स्तर को छू भी नहीं पाता जिसे हमारे साधन विहीन पूर्वजों ने स्थापित किया है. 

न केवल शिल्प के क्षेत्र में वरन हर एक कलात्मक सृजन में या तो नक़ल का भौंडापन है या फिर अपरिपक्वता और सतही सोच का दृष्टिविहीन प्रदर्शन है . साधनों की प्रचुरता है पर परिणाम में ऐसा दारिद्र्य है कि  सोच कर आश्चर्य  होता है पर उस बुनकर की बात पर विचार करता हूँ तो कारण स्पष्ट हो जाता है . आज चाहे हमारे पास अनेक साधन हों , मशीनों का सहयोग मुश्किल से मुश्किल काम को आसान कर सकता हो पर कलात्मक काम असल में जिस समर्पण की मांग करते हैं वो केवल हमने नहीं खोया बल्कि पूरे विश्व ने खोया है. ..... और बाबूजी कलात्मक काम बहुत बारीक होता है वो मशीनों से नहीं होता , हाथों से भी नहीं होता ..... वो तो रूह से होता है .       


गढ़ीसर                




जैसलमेर के पीताभ पत्थरों की सोनारी आभा लिए कई इमारतें जैसलमेर में हैं. किले और हवेलियों से इतर कुछ ऐसी रचनाएँ भी हैं जिनसे जुड़ी कहानियां उतना ही सौन्दर्य बिखेरती हैं जितना सौन्दर्य इन इमारतों में हैं.ऐसा ही एक स्थान है - गढ़ीसर . नगर के मध्य में स्थित इस खूबसूरत सरोवर के घाट, मंदिर और सरोवर के मध्य में स्थित जल-महल बहुत आकर्षक हैं परन्तु एक रोचक कहानी सुनाता है टीलां का प्रोल.

गढ़ीसर जिसका एक नाम घड़सीसर भी है का मुख्य द्वार टीलां का पोल कहलाता है. इस खूबसूरत द्वार का निर्माण एक वैश्या-टीलां ने करवाया था. निर्माण तक तो सब ठीक रहा लेकिन द्वार बनने के बाद  लोगों ने वहां के नरेश से कहा कि एक वैश्या के बनवाये द्वार से जनता और राज-परिवार कैसे निकलेगा . उन्हें बात ठीक लगी और उन्होंने उसे तोड़ने के लिए सेना भेजी लेकिन जब तक वो वहां पहुँचती तब तक टीलां को खबर लग गयी और उसने तुरंत द्वार की ऊपरी मंजिल में भगवान की प्रतिमाओं की स्थापना कर दी. तोड़ने वाले मंदिर को कैसे तोड़ते बस वो द्वार बच गया जो आज भी ये कहानी सुनाता है तो समाज के दोमुंहेपन पर हँसता भी है क्योंकि वैश्या के पास जो धन था वो था तो उसी समाज का................ और हाँ भगवान वहां विराजे हैं ,जनता द्वार से आती-जाती है पर राजवंश आज भी उस द्वार का प्रयोग नहीं करता ...... सत्ता भगवान् और इंसान से अलग होती है न .. 

Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template