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कमलानाथ की कहानी 'रावी के उस पार'

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, सितंबर 10, 2012 | सोमवार, सितंबर 10, 2012


डॉ. रिचर्ड पॉवेल और मैं एक हेलिकॉप्टर में बैठे खैरी गाँव के आसपास के क्षेत्र की रेकी कर रहे थे जहाँ हिमाचल प्रदेश में चमेरा जलविद्युत परियोजना का भूगर्भीय बिजलीघर बनना था. कनाडा से सलाहकार के रूप में रिचर्ड एक भूगर्भवेत्ता और मैं मुख्यालय से जलविज्ञान विशेषज्ञ की हैसियत से यहाँ आये थे.

“और नीचे लो, थोड़ा और टेढ़ा करो, मैं यहाँ से ठीक तरह देख नहीं पारहा हूँ”- रिचर्ड ने आग्रह किया.
              
“सर, इससे ज़्यादा टेढ़ा करना इस हेलिकॉप्टर में मुमकिन नहीं है. अगर मैं और ज़्यादा नीचे लूँगा तो हो सकता है इसका पंखा किसी पेड़ में फँस जाये” – पायलट ने समझाया.
“अगर आप ये नहीं कर सकते तो मुझे उड़ाने दीजिए. मैं नीचे लेता हूँ. इस तरह मुझे चट्टानें नज़र नहीं आ रही हैं ”- रिचर्ड ने फिर कहा.

 मुझे लग रहा था रिचर्ड सचमुच दुराग्रह कर रहा था.चारों तरफ़ चीड़ के जंगल थे. पायलट हेलिकॉप्टर को नई उड़ान भरने के लिए पूर्व दिशा में ले आया था और तेज़ी से पश्चिम की ओर काफ़ी टेढ़ा करके नीचे की तरफ़ फिर से गोता लगा रहा था. रिचर्ड लगातार फ़ोटो खींचे जारहा था.नए चक्कर के लिए जब जब वो वापस आता था, नीचे मुझे छोटी छोटी बकरियां और उनके साथ कोई चरवाहा नज़र आता था. पेड़ों के झुण्ड के बीच यही ऐसा रास्ता था जहाँ से हेलिकॉप्टर बिना पेड़ों से टकराए गुज़र सकता था. मेरे लिए यह एक रोमांचक, बल्कि खौफ़नाक अनुभव था. मैं तब सिर्फ़ अपने आपको संयत रखने का प्रयत्न कर रहा था और अपनी सीट को कस के पकड़ कर बैठा हुआ था. मुझे मतली भी होने लगी थी. जब रिचर्ड ने मनचाही फ़ोटो लेलीं, वहीँ पेड़ों को काट कर बनाये हुए एक समतल स्थान पर हमारा हेलिकॉप्टर उतरा.

  अगले दो घंटों तक रिचर्ड चारों तरफ़ घूमते हुए अपने हथोड़े से तोड़ कर चट्टानों के नमूने इकट्ठे कर रहा था. मैं वहाँ से थोड़ी दूर निकल कर सेवा नदी के किनारे पर आगया था. सितम्बर अक्टूबर में इस नदी का बहाव जून से अगस्त के महीनों में होने वाले बरसाती बहाव से काफ़ी कम था. इस समय यह ऊपर पहाड़ों से पिघली बर्फ़ का बहाव ही था. यह नदी आगे जाकर रावी नदी में मिल जाती है, जो इससे बहुत बड़ी है. बिजलीघर से बिजली पैदा करने के बाद पानी को रावी और सेवा नदियों के मुहाने के आगे छोड़ दिया जायेगा.

इस समय यहाँ लगभग सन्नाटा सा था, बस बीच बीच में पक्षियों के चहचहाने की आवाज़, पानी बहने का शोर और कभी अचानक किसी कोयलनुमा काले पक्षी की तेज़ चीख़ इस सन्नाटे को तोड़ रही थी. इस सब के बीच हवा में लहर की तरह बह कर आती किसी औरत के गाने की आवाज़ भी टूट टूट कर सुनाई दे रही थी. मैंने ध्यान से  सुनने की कोशिश की पर कोई शब्द समझ में नहीं आये. शीशम और चीड़ के पेड़ों का यहाँ इतना घना जंगल था कि बहुत दूर तक देख पाना संभव भी नहीं था. 

लेकिन प्रकृति का शुद्ध रूप और कौमार्य यहाँ देखा जासकता था. मैं एक पेड़ के नीचे बैठ कर प्रकृति के इस अद्भुत नज़ारे को देख रहा था और सोच रहा था, कुछ ही महीनों में यहाँ के अधिकांश पेड़ काट दिए जायेंगे जहाँ अन्वेषण टीम के रहने के लिए कोटेज बनाई जाएँगी. यह शांति और नीरवता कुछ महीनों के बाद शोर में तब्दील होजायेगी और प्रकृति के इस कोमल सौंदर्य और कौमार्य पर तथाकथित विकास के राक्षस द्वारा बलात्कार होगा. प्रकृति हमेशा से अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए बेचैन रहती है और हम संवेदनहीनता के साथ उस पर प्रहार करते रहते हैं. इस द्वंद्व का अच्छा समाधान यजुर्वेद की एक ऋचा में है जहाँ प्रकृति संतुलन के लिए कहती है –“तुम मुझे दो, मैं तुम्हें दूं”.

मैं फिर उठा और सेवा नदी के किनारे चलने लगा, यह देखने के लिए कि इसे पार करने की क्या जुगत हो सकती है. इस वक़्त ऐसी कोई सम्भावना नज़र नहीं आई. नक़्शे में मैंने देखा था सेवा नदी कई घुमाव लेकर अंत में रावी नदी में मिल जाती है, पर इसका यह हिस्सा लगभग सीधा ही था – क़रीब डेढ़-दो किलोमीटर तक.
रिचर्ड ने दूर से आवाज़ लगाई और आने का इशारा किया. शाम होने से पहले हमें बनीखेत लौट जाना था.

डलहौज़ी में हमलोग एक होटल में रुके हुए थे. हमारे लिए और परियोजना के सभी अफ़सरों के लिए यहीं रहने का इंतज़ाम था. काफ़ी ऊँचाई पर यह एक प्रसिद्ध हिलस्टेशन है, बनीखेत से लगभग 9-10 किलोमीटर पर. बनीखेत के पास ही चौरा गाँव में रावी नदी पर एक बाँध बनना था और लगभग 30 किलोमीटर दूर खैरी के पास ज़मीन के नीचे एक बिजलीघर. पहले यहाँ लगभग डेढ़ वर्ष तक अन्वेषण का काम होगा जिसके आधार पर परियोजना का सम्पूर्ण आकलन किया जायेगा. बनीखेत और खैरी के बीच कोई सड़क नहीं थी, सिर्फ़ खच्चरों के लिए या स्थानीय निवासियों के आवागमन के लिए एक पगडण्डी ही थी.सारी स्थितियों के मद्देनज़र यह निर्णय लिया गया कि समय और खर्चा बचाने के लिए बजाय सड़कें बनाने के, अन्वेषण सम्बन्धी सारे कामों के लिए हेलीकॉप्टरों की सहायता ही ली जाये. आगे चल कर सारी मशीनें, जनरेटर, तकनीकी कर्मचारी, मजदूर वगैरह सभी इसी तरह लेजाये लाये जायेंगे.

हमने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट दी, रिचर्ड कनाडा लौट गयाऔर मैं दिल्ली आ गया.

दो महीने बाद मैं फिर खैरी आया. पहले सा सन्नाटा तो अब नहीं रहा क्योंकि यहाँ प्लास्टिक की बनी बनाई पैनलों से 7-8‘झोंपडियां’ बना दी गयी थीं और मजदूरों कामगारों का शोरगुल सुनाई देता था. दूर देवदार के पेड़ की एक डाल पर बैठा चिड़ियों का एक जोड़ा जैसे इसी तरफ़ आश्चर्य और कौतूहल से देख रहा था. कुछ और समय बाद शायद यही जोड़ा निराशा और बेचैनी से देखेगा. हेलीकॉप्टरों ने बहुत सी ड्रिलिंग मशीनें और आदमी यहाँ उतार दिए थे.चट्टानों में कई जगह गहरे छेद करके इनकी नीचे तक की संरचना जानने के लिए नमूने लिए जायेंगे. रावी नदी और सेवा नदी पर मेरी निर्धारित की हुई जगहों पर हर रोज़ दो बार सुबह और शाम बहाव नापा जायेगा. मानसून के दिनों में देखा जायेगा कि पानी कितनी ऊँचाई तक उठ जाता है और कितनी मिट्टी ऊपर से बह कर आती है. ज़्यादातर काम करने वाले लोग बाहर के ही थे. पर एक कोई शेरसिंह हिमाचल का ही रहने वाला था जो जूनियर इंजीनियर था और जिसको मेरे साथ रहना था. खैरी के आसपास की उसको अच्छी जानकारी थी और यहाँ की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी भी उसी की थी.

मैं शेरसिंह को लेकर सेवा नदी के किनारे पर आया. यहाँ अभी प्रकृति का सुहानापन उसी तरह बरक़रार था, हल्की हल्की सी हवा, अलग अलग तरह की वनस्पतियों की मिलीजुली सुगंध, पक्षियों की बीच बीच में संगीतमय चहचहाहट, पेड़ों के झुरमुट, जंगली घास जो मोटी तो थी पर मुलायम थी, नदी के बहाव का शोर.....
मैंने शेरसिंह से पूछा- “यहाँ खैरी गाँव से मजदूरों को नहीं लिया प्रोजेक्ट में?”

“नहीं सर जी, इन लोगों को मशीन चलाना नहीं आता. एक दो आदमी हैं ऊपरी कामकाज के लिए, पर सारा स्टाफ़ तो प्रोजेक्ट का ही है.हाँ, जी एंड डी साइट के लिए यहाँ के लोकल लोग हैं” – शेरसिंह ने कहा.
जी एंड डी साइट, यानी गेज एंड डिस्चार्ज स्टेशन जहाँ से पानी के बहाव आदि सम्बन्धी सारी जानकारी इकट्ठी की जायेगी और माप लिए जायेंगे.
मुझे पिछली बार के रिचर्ड के साथ वाले दौरे के समय सुनाई दी गाने की आवाज़ के बारे में शेरसिंह से पूछना था पर संकोचवश मैंने ऐसा नहीं किया. वैसे ही रुक रुक कर आरही वही आवाज़ जैसे मेरे कानों में अब भी बह कर आरही थी.
“तुम लोगों ने सेवा नदी पार करने के लिए कोई छोटीमोटी पुलिया नहीं बनाई?” – मैंने पूछा.
“अभी तो सेवा नदी के पार सिर्फ़ जी एंड डी साइट वाले लोग ही जाते हैं सर जी. उन्होंने एक सीढ़ी डाल कर रास्ता बना लिया है” – वह बोला.
“चलो, वहाँ देखते हैं”.
शेरसिंह और मैं उस जगह तक आये जहाँ एक लंबी मोटे बांसों की सीढ़ी ने सेवा के दोनों किनारों को पाट रखा था.
“अरे, यह तो खतरनाक है, जब आदमी इस पर से जाते होंगे तो ये लचक नहीं जाती होगी?” – मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा.
“इस पर से एक एक कर के ही जाना पड़ता है सर जी. बीच में थोड़ी लचकती है पर जल्दी जल्दी जाने से कुछ नहीं होता” – शेरसिंह ने कहा.
“ठीक है, कल हम आयेंगे, जी एंड डी साइट देखने” – मैंने कहा.
“जी, सर जी”.

शाम का धुंधलका होने लगा था इसलिए हम वापस अपनी कॉटेज में लौट आये.
रात को एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता था. कभी बीच बीच में किसी पेड़ पर पक्षियों के फड़फड़ाने की आवाज़ चौंकादेती थी.  बाहर से कभी कभी पत्तों की चरमराहट या सरसराहट की आवाज़ भी आती थी, किसी जंगली जानवर या सांप वगैरह के निकलने से. मैं लेटा लेटा सोच रहा था दिन में प्रकृति की सुंदरता रात की नीरवता में कैसा खौफ़ घोल देती है.

अगले दिन सुबह नाश्ता करके शेरसिंह और मैं निकल पड़े. अभी कुछ कुछ ठंडक थी इसलिए मैंने स्वेटर पहन लिया था. दोपहर गर्म होजाती थी. सेवा नदी पार करके रावी नदी पर जी एंड डी साइट थी, दोनों नदियों के मुहाने के बाद. हम वहाँ पहुंचे जहाँ सेवा नदी को पार करने के लिए अस्थाई तौर पर सीढ़ी रखी थी.इस सीढ़ी के कोई 2-3 फ़ीट नीचे सेवा नदी बह रही थी. चूँकि नदी का यह हिस्सा सीधा था इसलिए पानी के बहाव का अंदाज़ा मुश्किल था, बहरहाल कुछ दूर पर नदी में पड़े पत्थरों पर से बहाव देखने से लगता था यह काफ़ी था. पहले शेरसिंह सीढ़ी के बीच के बांसों पर पैर रखता हुआ तेज़ी से दूसरी तरफ़ निकल गया.
“आजाइए सर जी इसी तरह” – उसने आवाज़ लगाई.

मैं सोच रहा था अगर इस गीली सीढ़ी पर मैं तेज़ी से गया तो हो सकता है मैं फिसल जाऊं. फिर मुझे तैरना भी नहीं आता. पर हिम्मत करके मैं सीढ़ी पर चलने लगा, सम्हल सम्हल कर नीचे देखता हुआ कि मेरे पैर बीच के बांसों पर ठीक तरह पड़ें. नीचे नदी का बहाव दाहिनी ओर से बायीं ओर था. बहाव देखते देखते मुझे ऐसा भ्रम होने लगा कि मैं सीधा न चल कर बाँई तरफ़ झुक रहा हूँ. अपने आपको सीधा करने की गरज़ से मैं दाहिनी ओर झुका. मेरे इस झुकाव और वज़न के कारण सीढ़ी टेढ़ी हुई और मैं सेवा नदी में गिर पड़ा. सौभाग्यवश गिरते समय मेरे हाथ में सीढ़ी आगई और मैं इसे पकड़ कर लटक गया. मेरे हाथ सीढ़ी थामे हुए थे और सारा शरीर सेवा के पानी में डूबा हुआ था. पहाड़ों की बर्फ़ के पिघलने से ही नदी में बहाव था इसलिए पानी काफ़ी ठंडा था. मैंने स्वेटर और जींस पहन रखे थे इसलिए गीले होकर ये भारीहोगये थे.

शेरसिंह को समझ में नहीं आरहा था मुझे कैसे बचाए. वह घबराहट में सिर्फ़ इधर उधर दौड़ रहा था. लटके लटके थोड़ी देर में मुझे भी लगने लगा जैसे मैं आत्मविश्वास खो रहा हूँ, हालाँकि मैं चाह रहा था धीरे धीरे सीढ़ी के सहारे खिसकता हुआ किनारे तक आजाऊं. मुझे थोड़े से मनोवैज्ञानिक सहारे की ज़रूरत थी जो मुझमें यह विश्वास जगा सके कि खिसकने से मेरे सीढ़ियों पर से हाथ छूट नहीं जायेंगे. मैंने शेरसिंह से कहा कोई कपड़ा लाकर मेरे गिर्द लपेट दे ताकि मैं खिसकने की कोशिश कर सकूं. वह इधर उधर देखने लगा. शायद उस समय वह अपनी कमीज़ भी खोल कर लपेट सकता था पर न उसे और न मुझे यह सूझा.
सौभाग्य से उसी समय हमने देखा एक 17-18 वर्ष की लड़की 3-4 बकरियों को लेकर उधर से गुज़र रही थी. उसने अपने सर पर दुपट्टा बांध रखा था. मैंने शेरसिंह से कहा उसे जल्दी बुलाये. उसने आवाज़ लगाईं –“ओ पुरवा, जल्दी दौड़ आ”. वह उसे जानता था.पुरवा दौड़ती हुई आई और वहाँ का नज़ारा देखा कर थोड़ा डर गयी. मैंने शेरसिंह से कहा इससे कहो जल्दी से सीढ़ी पर आकर अपना दुपट्टा मेरे गिर्द लपेट दे. यह सुन कर पुरवा सीढ़ी पर चढ़ गयी और उसने अपना दुपट्टा मेरे दोनों हाथों के बीच से निकाल कर पीठ पर कस दिया. मेरा आत्मविश्वास अब लौटता सा दिखाई दिया और मैं धीरे धीरे सीढ़ी को पकड़े हुए इंच इंच खिसकता हुआ सेवा के किनारे तक आगया.

मुझे लगा उस समय पुरवा एक परी की तरह आसमान से उतर कर आई थी मुझे बचाने. मैंने उसे धन्यवाद दिया, शाबाशी दी और कुछ इनाम देने की पेशकश की जो उसने क़ुबूल नहीं की.वह मासूमियत से सिर्फ़ हँस भर दी. शेरसिंह ने कहा “ये हमारे सर जी हैं, हम रावी तक जारहे थे”. पुरवा ने मुझे हाथ जोड़े और बोली –“ साब जी, अच्छा हुआ आज मैं घर से थोड़ा जल्दी निकल आई. आपको बचाना जो था”. वह फिर हँस दी. उसकी बकरियां इधर उधर बिखरने लग गयी थीं, यह देखते ही उसने वहीँ से आवाज़ लगाई –“हुर्र..हुर्र..” और सीढ़ियों से वापस दौड़ती हुई लौट गयी. शेरसिंह ने बताया, दो किलोमीटर दूर पुरवा का घर है. उसका बाप जंगलात महकमे में फ़ोरेस्ट गार्ड था और अब रिटायर हो गया है. पेंशन मिलती है. पुरवा दिन में बकरियां चरा कर शाम से पहले घर पहुँच जाती है. कभी कभी इस तरफ़ से भी निकल जाती है, वर्ना इसका रास्ता कोई तय नहीं है. अच्छा हुआ कि वह आज इधर से ही निकली.

पुरवा मुझे बेहद मासूम, सुन्दर और कोमल लगी थी. निश्चित ही वह थी भी. यहाँ की प्रकृति की सारी सुंदरता जैसे उसमें बस गयी थी और खुशनुमा मौसम का सारा निखार उसमें सिमट आया था. उसकी बड़ी बड़ी भोलीभाली आंखें समन्दर सी गहराई लिए हुए थीं और लहरों की तरह ही चंचलता से डोलती हुई बिखर भी पड़ती थीं. जब वह पलकें झपकती थी तो समंदर शांत होजाता था और आँखें खोलते ही लहरें हिलोरे भरने लगती थीं. जब वह ऊपर सीढ़ी पर बैठे हुए मेरे साथ साथ धीरे धीरे खिसक रही थी और मैं नीचे पानी में, ऐसा लग रहा था उसका दुपट्टा नहीं बल्कि उसकी खूबसूरत आँखों की रेशमी डोरियाँ मुझे खींच कर किनारे की ओर ले जारही हैं. रावी और सेवा नदियों के मुहाने पर पहुँचने तक दो तीन किलोमीटर मैं चुप ही रहा और पुरवा के बारे में ही सोचता रहा. लगता था शेरसिंह तब भी सदमे में ही था और चुप था. कोई भी अनहोनी घट सकती थी. उसने बड़े संकोच और नम्रता के साथ बताया कि कभी भी बहाव की तरफ़ नहीं देखना चाहिए, बल्कि सामने की तरफ़ ही देखना चाहिए नदी पार करते समय. नीचे देखने से पानी के बहाव की दिशा में ही चलने का भ्रम होजाता है और हम अपना संतुलन खो बैठते हैं. मेरे साथ यही हुआ था. लौटते वक़्त मैंने बिना नीचे सेवा के बहाव की तरफ़ देखे आसानी से सीढ़ी पार करली थी.

अगले दिन जी एंड डी साइट से ज़्यादा मुझे पुरवा को देखने की उत्सुकता हो रही थी. पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा था. मुझे पुरवा अच्छी लगी थी. उसके चेहरे में कुछ था कि कोई भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकता था. हो सकता है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव मुझे खींच रहा था. मैं नहीं चाहता था शेरसिंह मेरे साथ आये. पर उसे डर था कि फिर कोई हादसा न होजाए. हालाँकि मैंने उसे समझाया अब मुझे पता लग गया किस तरह सीढ़ी पार करनी चाहिए, जी एंड डी साइट का रास्ता भी मुझे पता था, और फिर उसे कैम्प का दूसरा काम भी सम्हालना चाहिए, पर फिर भी वह मेरे साथ सेवा नदी तक आया और जब मैं सीढ़ी पार कर गया तभी लौटा.

मैं सेवा के किनारे किनारे रावी नदी की तरफ़ एकाध किलोमीटर ही चला होऊंगा कि मुझे फिर से वही मीठी आवाज़ हवा की तरंगों के साथ बहती हुई सुनाई दी. चीड़ के घने जंगल में कहीं अंदर से गाने की यह आवाज़ आरही थी. मैंने धीरे धीरे उसी तरफ़ रुख किया. पेड़ों की खुशबू, हवा से पत्तों की खड़खड़ाहट, सूखे पत्तों की मेरे जूतों से निकली चरमराहट, उस वक़्त सब कुछ संगीत सा ही लग रहा था. मुझे संकोच हो रहा था उधर जाने में. पता नहीं कौन होगी, क्या सोचेगी मेरे बारे में. पर मैं अपने आपको वहाँ जाने से रोक नहीं पा रहा था. जैसे जैसे मैं झुरमुट की तरफ़ बढ़ा, गाने की आवाज़ और साफ़ होती गयी. मुझे कुछ इस तरह समझ में आरहा था  -
“सोण महीनेजियाँ जो बरखा लगियाँ, छम छम बरसे नीर”  .......”दो पल बै जायाँ......”
अब मैं उसको ठीक तरह देख सकता था. यह पुरवा ही थी. देवदार के एक पेड़ के नीचे उसने अपने दोनों हाथ घुटनों में बांध रखे थे और अपनी ही सुध में आगे पीछे ताल से हिल रही थी. उसकी तीन बकरियां पास ही चर रही थीं. मेरे जूतों से सूखे पत्तों की चरमराहट से चौंक कर उसने मेरी तरफ़ देखा और खड़ी होगई.
“साब जी, आप इधर?”
“ मैंने तुम्हें बेकार ही चौंका दिया. मैं रावी के मुहाने तक जारहा था, तुम्हारी प्यारी प्यारी सी आवाज़ सुनी तो चला आया”.
वह शर्मा गयी. उसके गुलाबी चेहरे पर एक लाल रंग की सी लहर दौड़ गयी.
“नहीं साब जी, मुझे गाना नहीं आता, यूं ही गुनगुना लेती हूँ”. फिर कहा –“बैठो साब जी”.
हम वहीँ पेड़ के नीचे बैठ गए.
“अभी छम छम पानी बरसने में तो देर है, और सोण महीना भी नहीं आया” – मैंने वैसे ही बात बढ़ाते हुए कहा.
वह फिर  बेहद शर्मा गयी और उसने दोनों हाथों से अपना मुंह ढांप लिया.
“ये कोई गाना है?” मैंने फिर पूछा.
“हाँ साब जी यहाँ का लोकगीत है. जब भी बादल घिर आते हैं तो लगता है पानी बरसेगा. एक बार चम्बा में थी तो इतनी तेज़ बारिश हुई कि हम दौड़ कर भी घर नहीं पहुँच सके. पर फिर हम बारिश में ख़ूब नहाये – तब तक, जब तक कि बारिश होती रही” - उसने कहा.
“चम्बा में तुम्हारा कोई है?” – मैंने उसे उकसाया.
“हाँ साब जी, है. मेरा मंगेतर. उसका नाम रोशन है, चम्बे में रहता है” – उसने कहा.
“ओ हो, तो रोशन के साथ बरसात में भीग रही थीं. क्या करता है रोशन?” – मैंने पूछा.
“खेतों में उपज का हिसाब किताब रखता है”.
“अपने खेतों में या सबके खेतों में?”
“उसके बाबा का तो छोटा सा खेत है. सबके खेतों का ही रखता होगा”.
“पटवारी है?”
पता नहीं. उसने कुछ बताया तो था, मुझको याद नहीं, क्या”.
“रोशन यहाँ आता रहता है?”
“नहीं, चार महीने पहले आया था, जब हम दूसरी बार मिले थे. मेरे बाबा उसके बाबा को जानते हैं. मुझे वो बहुतअच्छा लगा” – उसने लजाते हुए कहा.
“और वो तुम पर लट्टू होगया होगा” – मैंने कहा.
“पता नहीं, पर मैं भी उसे अच्छी लगी. उसके बाबा ने उसके लिए मेरा हाथ माँगा” – वह बोली.
“तो तुम्हारी सगाई होगई?” – पता नहीं मैंने ये सवाल क्यों पूछा.
“नहीं, अगले साल होगी. अभी तो बात पक्की हुई है” – उसने फिर भी बताया.
“कैसा है रोशन?”
“साब जी, बहुत अच्छा है, भला है और खूबसूरत. मैं एक बार चम्बा गयी थी बाबा के साथ. तब वहाँ पहली बार रोशन से मिली थी और वो मुझे गद्दी बंजारों के मेले में लेगया था. वहाँ बड़े अच्छे अच्छे नाच और गाने हो रहे थे. पता है साब जी, गद्दी लोगों के लोकगीत बड़े प्यारे होते हैं” – वह बोली.
“तुमको आता है उनका कोई गीत?” – मैंने वैसे ही पूछा.
“नहीं जी, पर ये मालूम है उस दिन उन्होंने कुंजू और चांचलोके गीत गाये – लड़कों और लड़कियों ने मिल कर”.
“कौन कुंजू और चांचलो?” – मैंने पूछा.
“चम्बा के प्रेमी और प्रेमिका” – वह फिर शर्माई.
“जैसे हीर-रांझा, रोमियो-जूलियट?”
“पता नहीं, शायद हाँ” – उसने कहा.
“गद्दी लोग चम्बा के होते हैं?” – मैंने फिर पूछा.
“हाँ जी, जन्माष्टमी के बाद मणिमहेश की यात्रा भी होती है चम्बा में. वहाँ भारमौर में गद्दियों का छः दिन का मेला भी होता है. गुग्गा नाग देवता का”.
“..हूँ.. इसीलिए तुमको चम्बा अच्छा लगता है. इतना सब होता है वहाँ”.
“नहीं साब जी, मुझे तो चम्बा इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि वहाँ रोशन रहता है”.
मैंने बात बदलते हुए कहा –“ तुमको यहाँ अकेले डर नहीं लगता?”
“डर काहे का और अकेली क्यूं साब जी? यहाँ सब मेरे ही तो हैं - मेरी बकरियां, मेरे पेड़, मेरे पंछी, मेरा जंगल, मेरा पहाड़, मेरी नदियाँ, मेरी पुरवैया....” – बड़े भोलेपन से उसने कहा.
मुझे पुरवा उस समय फिर से बेहद सुन्दर लग रही थी. जिस मासूमियत से वो बात कर रही थी, ऐसा लगता था उसने यह क्रूर और मक्कार दुनियां अभी देखी ही नहीं थी. गाँव का ठेठ भोलापन, निश्छल और कोमल उमंगें, उत्साह, बेलौस खुलापन....शहर की लड़कियों से कितना कुछ अलग. वहाँ भीड़ और चहलपहल में रहते हुए भी वे डरी डरी सी रहती हैं- सहमी, असहज, असुरक्षित, कृत्रिम. यहाँ ये बिल्कुल स्वाभाविक. मेरी इच्छा होरही थी उसका कोमल हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाऊँ – पर फिर मुझे लगा कहीं मेरा शहरीपन मुझ पर हावी तो नहीं होरहा? उसके अल्हड़ शोखपन पर यह एक भद्दी गाली की तरह लगने लगा खुद मुझे ही. वो क्या सोचेगी?
“साब जी, आप यहीं रहते हैं?” – उसने पूछा.
“नहीं, मैं दिल्ली रहता हूँ. यहाँ तो कभी कभी आता हूँ. बिजली का प्रोजेक्ट बन रहा है उसी सिलसिले में”.
“हाँ, बाबा ने बताया था”.
“मैं कल वापस जाऊँगा”.
“फिर कब आओगेसाब जी?”
“देखो, काम थोड़ा आगे बढ़ेगा तब”.
मुझे लगने लगा यहाँ बातों में कहीं देर न होजाए वापस लौटने में. मैंने कहा – “पुरवा, अभी मैं जाता हूँ. रावी के मुहाने तक जा कर लौटना है. अपना ध्यान रखना”.
“नमस्ते साब जी” – भोलेपन से पुरवा ने कहा. वह भी खड़ी होगई और अपनी बकरियों को इकठ्ठा करने के लिए इधर उधर दौड़ने लगी. मैं पुरवा के बारे में सोचता हुआ रावी की तरफ़ बढ़ गया.


इस दौरे के बाद प्रोजेक्ट की मीटिंगों के लिए हालाँकि दो बार बनीखेत गया था, लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष बाद ही फिर खैरी जाने का मौक़ा आया. इस बीच अन्वेषण का काम लगभग ख़त्म होने को था लेकिन जल सम्बन्धी सभी नापजोख चलती रहनी थी, आगे तक. इन डेढ़ वर्षों में सौभाग्य से इस क्षेत्र के पर्यावरण में कोई ख़ास बुरा परिवर्तन नहीं आया था. केवल उन्हीं जगहों के आसपास का हिस्सा साफ़ किया गया था जहाँ ड्रिलिंग मशीनें लगी थीं. बहरहाल जहाँ सुरंगें बनाई गयी थीं वहाँ ज़रूर काफ़ी बड़े क्षेत्र में वन की कटाई हुई थी, मशीनों को पहाड़ों तक पहुँचाने के लिए सड़क बनाने के कारण.

पिछली बार की तरह ही मैंने अकेले रावी तक जाने का फ़ैसला किया  और उसी तरह सेवा नदी को सीढ़ी के ज़रिये पार करके मैं किनारे किनारे चलने लगा. मुझे आखिरी बार पुरवा को देखने की भी इच्छा थी. अब तक तो उसकी सगाई भी होगई होगी – या होसकता है रोशन भी उसके साथ ही हो. रावी तक जाते समय मुझे आसपास या दूर तक पुरवा कहीं नहीं दिखाई दी. लौटते वक़्त भी मैं बेकार ही कल्पना कर रहा था कि वहीँ कहीं बकरियां चराते हुए मुझे पुरवा मिल जायेगी. पर सचमुच मुझे कुछ ऐसा ही आभास हुआ मानो किसी गाने की आवाज़ मेरे कानों तक पहुंची हो. ध्यान से सुनने पर लगने लगा यह पुरवा की ही आवाज़ थी जो कोई लोकगीत गुनगुना रही थी. आसपास देवदार, शीशम, और साल के पेड़ थे – कुछ दूर दूर, कुछ पासपास. एक बड़ा सा रंगबिरंगा नीला सा पक्षी ऊपर से उड़ता हुआ दूर किसी पेड़ पर जा बैठा. ऐसा लगा जैसे बिना लंबी पंखों वाला मोर हो. आगे अंदर पेड़ों के झुरमुट की तरफ़ जाने पर पुरवा के गाने के कुछ कुछ शब्द साफ़ सुनाई देने लगे-
“माई ने मेरिये, शिमले दी राहें चम्बा कितनीक दूर....... ओ लाइयां मोहब्बतां दुर दराजे, अँखियाँ तों होया कसूर.....”
हाँ, यह पुरवा की आवाज़ ही थी. वैसी ही  मधुर, कोमल. उसने दूर से मुझे देखा और गाना बंद कर दिया. उसके पास पहुँच कर मैंने उससे पूछा –“पुरवा कैसी हो?”
उसका चेहरा कुछ फीका सा पड़ गया था, आँखों में पहले वाली शरारत भी नहीं थी.
“तुम्हारी तबियत खराब है क्या?” –मैंने फिर पूछा.
“नहीं साब जी, मैं ठीक हूँ” – उसने कहा.
वही पक्षी उड़ कर फिर आगया था. मैं उसे कौतूहल से देख रहा था. पुरवा ने बताया उस पक्षी का नाम था मोनल.

“तुम कोई नया लोकगीत गा रही थीं? वो बरखा वाला भूल गयीं क्या? या अब उसकी ज़रूरत ही नहीं है, अब तो हर महीना सोण महीना है, तुम्हारा रोशन जो आगया है”– उसे देखने की खुशी में मैं बोलता गया.
वह सिर्फ़ मुस्करा दी.
“आज तुम्हारी बकरियां दिखाई नहीं दे रहीं. दूर कहीं निकल गयीं क्या चरते चरते?”
“बकरियां नहीं हैं साब जी, मैं अकेली ही आई हूँ”.
“तुम खुश नहीं लग रहीं. सब ठीक तो है? तुम्हारी सगाई होगई?” – मैंने पूछी.
“अभी नहीं हुई साब जी”- उसने कहा.
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ –“अरे, पिछली बार तुम बता रहीं थीं, एक साल बाद होनी थी तुम्हारी सगाई. रोशन ने धोखा दिया क्या?”
“नहीं साब जी, ऐसा मत कहो. रोशन तो बहुत अच्छा लड़का है. वो मुझको पसंद करता है, मैं उसकोपसंद करती हूँ. मैं कोई राली थोड़े ना हूँ.” – पुरवा बोली.
“राली? राली कौन?” मैंने पूछा.
“साब जी, हिमाचल में, कांगड़ा में राली की मिट्टी की मूरत बनाते हैं अप्रेल के महीने में ही”.
“क्यों?”
“इसकी कहानी है साब जी”.
“क्या कहानी है?”

“राली की शादी उसकी मर्ज़ी के बिना ज़बर्दस्ती कर दी गयी थी. अपने ससुराल जाते वक़्त उसने नदी में छलांग लगा दी. उसको बचाने के लिए उसके पति ने भी नदी में छलांग लगा दी. फिर उन दोनों को बचाने के लिए उसका भाई नदी में कूद पड़ा. पानी का बहाव बड़ा तेज़ था. तीनों डूब कर मर गए. तब से राली की मूरत बनाते हैं वहाँ. कुंवारी लड़कियां अपना मनपसंद पति पाने के लिए प्रार्थना करती हैं और शादीशुदा नईनवेली लड़कियां अपनी खुशहाली के लिए”.
मुझे लगा मैंने बेकार ही रोशन के बारे में ऐसी बात कह कर उसका दिल दुखाया.
“हाँ, तुमने ठीक कहा, रोशन तो तुम्हारा मनपसंद मंगेतर है” – मैंने बात सम्हालते हुए कहा.
अचानक पुरवा ने कहा- “साब जी, आप मेरा एक काम करोगे? आप कुछ पूछना मत.”
“बताओ क्या काम है?”

उसने अपनी कुर्ती की जेब टटोली और उसमें से एक चांदी का छल्ला बाहर निकाला.
“साबजी, आपको रोशन मिलेगा. ये उसको देदेना. वह सब समझ जाएगा. साब जी, वादा करो आप उसे ज़रूर दे दोगे.”

मुझको बड़ा अजीब लगा. वह खुद ही क्यों नहीं दे देती?
“पर मैं तो कल निकल जाऊँगा, रोशन नहीं मिला तो? और मैंने तो उसे देखा ही नहीं, मैं उसे कैसे पहचानूंगा?” – मैंने पूछा.
“साब जी, आप उसे देखते ही पहचान जाओगे. मेरा रोशन ऐसा ही है. वर्ना वो ही मिल लेगा आपसे, आज ही” – उसने कहा.
मैंने वो छल्ला लेलिया और अपने पर्स की ज़िप वाली जेब में सम्हाल कर रख लिया.
“ठीक है”- मैंने कहा.
वह उठी. बोली –“नमस्ते साब जी, अब मैं चलती हूँ”. और वो चली गयी रावी की तरफ़.
पीछे से मैंने कहा – “ठीक है पुरवा, अपना ख्याल रखना”.
मैं वापस खैरी कैम्प में लौट आया.

अगले दिन सुबह ही हेलिकॉप्टर को आना था मुझे लेने बनीखेत के लिए. शाम को खाना खाते समय मैंने शेरसिंह से पूछा पुरवा के बारे में. क्या वो खुश नहीं है? उसकी सगाई क्यों नहीं हुई? पिछली बार वो कह रही थी होने वाली है एक साल में.
शेरसिंह एक दो क्षण खामोश रहा, फिर बोला – “क्या बताएं सर जी, बहुत बड़ा हादसा होगया.”
मुझे धक्का सा लगा – “क्या हादसा?”

शेरसिंह ने बताया - “सर जी,पुरवा और उसके मंगेतर की सगाई होने वाली थी. उसके लिए वो लोग चम्बा से आए थे. पहले दिन दोनों रावी के किनारे घूम रहे थे. अचानक पुरवा का पैर फ़िसला और वो नदी में गिर पड़ी. बड़ा अच्छा तैरना जानती थी पर तेज़ बहाव के कारण बह गयी. पीछे पीछे उसका मंगेतर भी उसको बचाने के लिए कूद पड़ा नदी में.वो भी बेचारा बह गया. दो दिन बाद उन दोनों की लाशें मिलीं बहुत नीचे नदी में. मछलियों ने कई जगह खा लिया था उनको”.
मुझे लगा मैं चक्कर खा कर यहीं लुढ़क जाऊँगा. मेरे रोंगटे खड़े होगये और मुझे लगा मेरे चेहरे का रंग ज़रूर उड़ गया होगा. मैं भौंचक्का सा शेरसिंह की तरफ़ देख रहा था.

“क्या हुआ सर जी?” – शेरसिंह ने मुझे इस तरह देख कर पूछा.
“कुछ नहीं. बड़ा बुरा हुआ उनके साथ. मैं खाना नहीं खाऊंगा, मेरा पेट कुछ गड़बड़है”– मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा और उठ कर अपने कमरे में आगया.

मैंने शेरसिंह को अपनी पुरवा के साथ हुई मुलाक़ात और बातचीत के बारे में कुछ नहीं बतलाया. मैं नहीं चाहता था कि कोई भी पुरवा के अस्तित्व के बारे में शक करके या उसको नकार कर उसका अपमान करे. मुझे कुछ भी सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं लगी. मैं सचमुच पुरवा से ही मिला था. पुरवा ने मुझसे कितनी बातें की थीं. राली की कहानी बताई थी. मुझे तो कुछ पता भी नहीं था इनके बारे में. अब किसको बताऊँ? कौन करेगा विश्वास? कभी मुझको लगने लगा था या तो मैं फ़ंतासियां बुन रहा हूँ या पागल होगया हूँ. क्या ये किसी फ़िल्मी कहानी की रीलें चल रही थीं मेरे सामने? यह सब मैं किसी को कह भी नहीं सकूंगा. कभी भी. मैंने अपने पर्स की ज़िप वाली जेब को खोल कर देखा. छल्ला वहीँ था. वह भोलीभाली लड़की जिसको रोशन के साथ सगाई होने का इंतज़ार था  - वह मासूम सी लड़की जो रोशन को इस छल्ले का तोहफ़ा देना चाह रही थी, अब भी भटक रही थी इन्हीं जंगलों में. मैं रोशन को कहाँ ढूंढूं? कैसे पहचानूंगा उसे? कैसे ढूंढेगा रोशन मुझे? पुरवा ने कहा था वो आज ही मुझसे मिल लेगा खुद ही. अगर जो कुछ शेरसिंह ने बताया वो सच था तो क्या यह सब संभव था? रोशन कैसे आएगा?

मैं रात भर सोया नहीं, रोशन का इंतज़ार करता रहा. मैं सोच रहा था जिस तरह पुरवा मुझे मिली, हो सकता है रोशन भी आकर मुझसे मिले और ये छल्ला मैं उसे देदूं पुरवा की तरफ़ से. पर रोशन नहीं आया. मैं सुबह तक उसका इंतज़ार करता रहा था, हेलिकॉप्टर में बैठने से पहले तक. मैं बनीखेत लौट गया और अगले दिन दिल्ली. 

पुरवा का वो छल्ला मेरे पास अब भी है अमानत की तरह और मैं अब भी रोशन का इंतज़ार कर रहा हूँ. पुरवा रावी के उस पार अब भी अपनों के बीच ही घूम रही है – उसके अपने पेड़, उसकेअपने पंछी, उसके अपने जंगल, उसकेअपने पहाड़, उसकी अपनी नदियाँ....या शायद हमेशा घूमती रहेगी.

पुरवा अब भी जैसे पूछ रही है – “माई ने मेरिये, शिमले दी राहें चम्बा कितनीक दूर?”रोशन का चम्बा.

कमलानाथ
(कमलानाथ की कहानियां और व्यंग्य ‘60 के दशक से विभिन्न पत्रिकाओं जैसे मधुमती, साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, वातायन, राजस्थान पत्रिका, लहर, जलसा आदि में छपते रहे हैं. वेदों, उपनिषदों आदि में जल, पर्यावरण, परिस्थिति विज्ञान सम्बन्धी उनके हिंदी और अंग्रेज़ी में लेख पत्रिकाओं, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों व विश्वकोशों में छपे और चर्चित हुए हैं)
पूरा परिचय पढ़ा जा सकता है 
8263, सैक्टर बी/XI
नेल्सन मंडेला मार्ग, वसंत कुंज
नई दिल्ली-110 070.
ई-मेल: er.kamlanath@gmail.com
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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत रोचक कहानी है. बधाई लेखक को और आपको भी.
    हालाँकि यह कहानी ही है पर इसमें कुछ ‘होता है या नहीं होता’ जैसी दिलचस्प सम्भावना दिखाई देती है, ठीक वैसे ही जैसे टैरट कार्ड, प्लेनचिट, ज्योतिष, वास्तु, न्यूमरोलोजी वगैरा में कई लोगों को. कहानी ऐसे लगती है जैसे यह घटना सचमुच घटी हो. लेखक को फिर बधाई.
    दिनेश वैद्य

    उत्तर देंहटाएं
  2. अद्भुत-रस जगाती कहानी जो एक सक्षम लेखक की कथा-रौ में बरबस बहा ले जाती है! भाई, आप इनसे अनुरोध करके बराबर लिखवाएं- हम आपके पन्नों की लगातार प्रतीक्षा में होंगे....

    उत्तर देंहटाएं
  3. अभी कमलानाथजी को 'समालोचन' में भी एक बहुत श्रेष्ठ व्यंगकार के रूप में भी देखा था !

    उत्तर देंहटाएं

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