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अल्पना मिश्र का कहानी संग्रह - क़ब्र भी क़ैद औ’ज़ंजीरें भी

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, सितंबर 25, 2012 | मंगलवार, सितंबर 25, 2012

समकालीन हिंदी कहानी के परिदृष्य पर नजर डालें तो की युवा कथाकारों ने अपनी कहानियों में शिल्प के अलावा उसके कथ्य में भी चौंकानेवाले प्रयोग किए हैं आज की नई पीढ़ी के कहानीकारों के पास अनुभव का एक नया संसार है जिसको वो अपनी रचनाओं में व्यक्त कर रहे हैं पहले यह माना जाता था कि जो कहानीकार रूप और शिल्प में नयापन पेश करेगा वह पाठकों को अपनी ओर खींच लेगा और आलोचक भी उनकी कृतियों का नोटिस लेने को विवश हो जाएंगे लेकिन नई पीढ़ी ने जिसमें वंदना राग, मनीषा कुलश्रेष्ठ, जयश्री राय और गीताश्री जैसी कई कहानीकारों ने रूप और शिल्प के अलावा विषय की नई भावभूमि से पाठकों को रूबरू कराया  

विषय और अनुभव के नए प्रदेश में पाठकों को ले जाने का कहानीकारों का यह प्रयोग सफल भी हुए हैं और हिंदी जगत ने उनका नोटिस भी लिया पर हिंदी में कुछ कहानीकार ऐसे हैं जो पुरानी पद्धति और लीक पर ही कहानियों का सृजन कर रहे हैं अल्पना मिश्र का कहानी संग्रह - क़ब्र भी क़ैद ज़ंजीरें भी उसी तरह के संग्रहों में से एक है नौ कहानियों के इस संग्रह में अल्पना ने गोरिल्ला तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अपने पाठकों को चौंकाने की कोशिश की है हिंदी कहानी में यह तकनीक बेहद पुरानी हो चुकी है जहां अचानक से किसी अनपेक्षित स्थितियों पर ले जाकर कहानी खत्म कर दी जाती है अल्पना मिश्र के संग्रह की पहली कहानीगैरहाजिरी में हाजिर- में भी कथाकार इसी तकनीक का इस्तेमाल करती है इस कहानी में शुरू से लेकर आखिर तक समाज और अफसरशाही में गहरे तक जमे जाति व्यवस्था को उघारते हैं फिर भटकते हुए लाल बिंदी के बहाने से समाज की एक और बुराई की तरफ इशारा करती हैं लेकिन जब कथा अपने मुकाम पर पहुंच रही होती है तो अंत में नायिका के भाई की अनायास मौत पर कहानी खत्म होती है

दूसरी कहानी गुमशुदा भी अल्पना मिश्रा की सपाट बयानी का बेहतरीन नमूना है एक बछड़े की मौत के बहाने वो नेताओं पर मीडिया पर कटाक्ष करती है लेकिन कहानी को संभाल नहीं पाती है इस कहानी में अल्पना एक जगह बताती हैं कि एक खबरिया चैनल को एक नेता धमका कर अपने कवरेज के लिए तैयार कर लेता है धमकी के बाद चैनल से वहां एक कर्मचारी भेजा जाता है जिसे कैमरा चलाना नहीं आता लेकिन वो वहां पहुंचकर अपनी उपस्थिति मात्र से चैनल को नेता के प्रकोप से बचा लेता है यहां तक तो ठीक था लेकिन उसके बाद अल्पना ने कह दिया कि नेता जी चैनल पर भाषण देकर अखबारों को फोन करने लगे स्थिति बड़ी विकट है जब रिकॉर्डिंग नहीं आती तो नेता का चैनल पर भाषण कैसे हो सकता है कहानी में अल्पना की कल्पना को देखते हुए रूस के मशहूर समीक्षक विक्टर श्क्लोव्सकी के विचार साफ तौर पर याद आते हैं जब वो कहते हैं- प्लाट जीवन एवं मानव संबंधों के व्यवस्था क्रम के बारे लेखक की अपनी समझदारी को दर्शाता है इस कहानी में भी खबरिया चैनल और उसके प्रसारण को लेकर लेखिका की लचर समझ एक्सपोज हो जाती है   अल्पना की इस कहानी में कथा कई छोरों और कोनों में भटकती हुई जब कसाईबाड़े तक पहुंचती है तो फिर से घटना शॉक देने की कोशिश के साथ कहानी खत्म होती है

पुलिस पर सालों से ये आरोप लगते रहे हैं कि अपराधियों के नाम पर वो निर्दोष लोगों की गिरफ्तारी दिखा कर वाहवाही लूटती है जब से देश में आतंकवादी घटनाएं बढ़ी हैं तब से पुलिस पर आतंकवादियों के नाम पर एक खास समुदाय के लोगों को बगैर सबूत के गिरफ्तार कर लिया जाता है इस संग्रह की एक कहानी- महबूब जमाना और जमाने में वे- भी एक ऐसी ही कहानी है जिसमें फुटपाथ पर अपना कारोबार करनेवाले दो बेकसूर रहमत और रामसू को पुलिस ने मुठबेड़ में मार गिराया इस कहानी और अखबार की रिपोर्ट में ज्यादा फर्क नहीं है इस रिपोर्टनुमा कहानी में लेखिका कुछ और पात्रों के मार्फत कथारस डालना चाहती है लेकिन पात्रों से प्रभाव पैदा नहीं हो पाता है इसके अलावा पुष्पक विमान और महबूब जमाना और जमाने में वे, का पुलिसवाला और दुकानवाला दोनों का व्यक्तित्व एक सा दिखाया गया है कहानियों में कहीं ना कहीं से खबर, अखबार और चैनल आदि भी ही जाते हैं

इस संग्रह की एक और कहानी मेरे हमदम, मेरे दोस्त में औरतों के प्रति समाज के नजरिए को सामने लाया गया है नायिका सुबोधिनी और उसके पति में अनबन चल रहा होता है इस बात का पता उसके दफ्तर के सहयोगियों को चलता है तो सब उस स्थिति का फायदा उठाना चाहते हैं और सुबोधिनी में अपने लिए संभावना तलाशते हैं यह भी एक साधारण कहानी है जिसको पढ़ते हुए पाठकों के मस्तिष्क में कोई तरंग उठेगी उसमें संदेह है इस संग्रह के अंत में नामवर सिंह का दशकों पहले का एक कथन सर्वथा उपयुक्त होगा- आज भी कुछ कहानीकार नाटकीय अंतवाले कथानकों की सृष्टि करते दिखाई पड़ते हैं, परंतु ये वही लोग हैं, जिनके पास या तो कहने को कुछ नहीं है या फिर जीवन के प्रति उनका अपना कोई विशेष दृष्टिकोण नहीं है हिंदी में किताबों के ब्लर्ब हमेशा से प्रशंसात्मक ही लिखे जाते हैं और इस संग्रह में ज्ञानरंजन ने उसका निर्वाह किया है







दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता के दाँव-पेच सीखने वाले कलमकार हैं.आई.बी.एन.-7 के ज़रिये दर्शकों और पाठकों तक पहुंचे अनंत विजय साल दो हज़ार पांच से ही मीडिया जगत के इस चैनल में छपते-दिखते रहें हैं.उनका समकालीन लेखन/पठन/मनन उनके ब्लॉग हाहाकार पर पढ़ा जा सकता है.अपनी स्थापना के सौ साल पूर चुकी दिल्ली के वासी हैं.-journalist.anant@gmail.com

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