सुबोध श्रीवास्तव की प्रेम कविताएं - अपनी माटी Apni Maati

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सुबोध श्रीवास्तव की प्रेम कविताएं

इजाज़त दो, तो..
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एक कविता
लिखना चाहता हूं
तुम पे-
अगर / इजाज़त दो, तो..!
ज्यादा कुछ नहीं
बस, नाम ही काफी है
तुम्हारा
सार्थक करने को
कविता।
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तुम
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तुम,
उदास मरुस्थल में
जल की
मोती सी चमकती
इक बूंद जैसी
जो सभी अभाव/ दर्द
विस्मृत कर देती है।
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याद
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रात,
जब थककर
हाथों के तकिए पे
सिर रखकर
सपनों के बिस्तर में
सो जाती है-
मेरे सिरहाने
बिना अलसाये
देर तक जागती है
याद तुम्हारी..।
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मन की कह लें..
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साथ-साथ
दूर तलक
बहुत कुछ बुन लिए
आओ, अब मन की कह लें।
पाँखुरी-पाँखुरी
बहुत फूल बिखरा लिए
आओ, अब उन्हें दुलार लें।
दूर-दूर
बहुत दिन रह लिए
आओ, अब दूरियां तय कर लें।
रेत में, रेत के-
घर बहुत गिरा लिए
आओ, अब इक घर बसा लें..।
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अलग बात है
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जि़न्दगी जीते रहना
अलग बात है
और
अहसासों में जान फूंकना अलग
वैसे ही/ जैसे-
मन में संवेदना का होना
और / उसको दम तोड़ते
खामोशी से देखना।
जि़न्दगी-
तुम भी जी रहे हो
मैं भी/ लेकिन..
संवेदनाओं का अबोध शिशु
तुम्हारी गोद में
बिलख रहा है कब से
और / मेरे हाथ जकड़े हैं
मर्यादा की डोर से..!

(सभी कविताएं काव्य संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' से)




सुबोध श्रीवास्तव,
(नई कविता, गीत, गजल, दोहे, कहानी, व्यंग्य, रिपोर्ताज और बाल साहित्य  रूचि है। रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण के बहुतेरे अवसर प्राप्त रचनाकार)
संपर्क:-'माडर्न विला', 10/518,खलासी लाइन्स,कानपुर,(उप्र)-208001,मो.09305540745,ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in
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