Latest Article :
Home » , , , » जिसने मुझे बिगाड़ा :-किशोर चौधरी

जिसने मुझे बिगाड़ा :-किशोर चौधरी

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, सितंबर 06, 2012 | गुरुवार, सितंबर 06, 2012



किशोर चौधरी 
किसी ज़माने में जोधपुर में एक अखबार से पत्रकारिता की हुरुआत करने वाले किशोर,आकाशवाणी जैसे नामचीन विभाग में उदघोषक हैं.पहले सूरतगढ़ स्टेशन के बाद अब फिलहाल बाड़मेर केंद्र पर पदस्त हैं. हथकढ़ नामक ब्लॉग के ज़रिये डायरी लेखन करते हैं. जीवन के सभी पड़ाव पर अपने आस-पास को देखने की नई दृष्ठि रखते हैं.महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय,अजमेर से कला स्नातक और कोटा ओपन से जर्नलिस्म में मास्टर डिग्रीधारी हैं.उनका फेसबुक खाता ये रहा 

शीर्षक सौजन्य:हंस पत्रिका के कालम से साभार 

बीएसएफ स्कूल जाने के लिए वर्दी पहने हुए संतरियों को पार करना होता था. उन संतरियों को नर्सरी के बच्चों पर बहुत प्यार आता था. वे अपने गाँव से बहुत दूर इस रेगिस्तान में रह रहे होते थे. वे दिन में ही अपने बच्चों और परिवार से मिल लेने का ख़्वाब देखते रहे होंगे. वे कभी कभी झुक कर मेरे गालों को छू लेते थे. उन अजनबियों ने ये अहसास दिया कि जिससे भी प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा. लेकिन जिनको गुरु कहा जाता रहा है, उन्होंने मुझे सिखाया कि किस तरह आदमी को अपने ही जैसों को पछाड़ कर आगे निकल जाना है. 

मुझे आज सुबह से फुर्सत है. मैं अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ सूफी संगीत सुन रहा हूँ. इससे पहले एक दोस्त का शेयर किया हुआ गीत सुन रहा था. क्यूँ ये जुनूं है, क्या आरज़ू है... मुझे बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं. तर्क ए ताअल्लुक के तज़करे भी याद आ रहे हैं. मैं किसी को मगर भुलाना नहीं चाहता हूँ. उनको तो हरगिज़ नहीं जिन्होंने मुझे रास्ते के सबब समझाये. नौवीं कक्षा के सर्दियों वाले दिन थे. शाम हुई ही थी कि एक तनहा दीवार के पास चचेरे भाई ने अपनी अंटी से मेकडोवेल्स रम का पव्वा निकाला. मैंने अपने हिस्से का आधा पिया आधा गिराया. भाई तुम मेरे बेहतरीन गुरु हो. तुम न होते तो मैं छत पर शामें गुज़ारने की जगह एक दिन दुनिया से भाग जाता. 

एक दिन आठवीं क्लास की एक लड़की को लम्बे वालों वाले गवैये माड़साब के साथ देख लिया था. स्कूल के पार्क वाली साइड में खुलने वाली उस खिड़की के भीतर वे खाली कमरे में यकीनन देशगीत का रिहर्सल नहीं कर रहे थे. मैं सफ़ेद रंग के सदाबहार के फूलों को भूल गया. रेलवे स्कूल का वह दिन बहुत बुरा था. बुरे दिन अक्सर सबसे अच्छे गुरु होते हैं. उस दिन मैं इस मिस मैच पर बहुत उदास रहा था. मैं अपनी उस सीनियर को घर तक पहुंचा कर आना चाहता था. 

बहुत दूर के रिश्ते का या बिना किसी रिश्ते का एक बहुत बड़ा भाई था. दस साल बड़ा. चला गया है, अब कभी लौट कर नहीं आएगा. उसके दफ़्तर से कोई सामान लाना था. दफ़्तर सूना था और उसके पास का कमरा बंद था. मैंने बड़ी टेबल पर लगे कांच के ऊपर रखे हुए पेपरवेट को घुमाते हुए इंतज़ार किया. थोड़ी देर बाद भाई आ गया. मुस्कुरा रहा था. मैंने दूसरे दरवाज़े की तरफ देखा. भाई ने आँख मारते हुए कहा, तेरी दूसरी भाभी है. मालूम नहीं क्यों मैं बहुत देर तक मुस्कुराता रहा. उस दफ़्तर से घर तक पसरी हुई रेत पर चलते हुए मैंने चाहा कि अपने चप्पल उतार कर हाथ में ले लूं और नंगे पांव इस रेत पर दौड़ने लगूं. 

अख़बार के दफ़्तर में एक ट्रेनी साथ काम करने आई थी. दफ़्तर के बाहर, कमसिन उम्र की उस पहली मुलाकात में उसने इतने दुःख बयां किये और इस कदर रोई कि मैं उस रेस्तरां से भाग जाना चाहने लगा. उस दिन के बाद से अब तक घबराया हुआ हूँ कि हर लड़की के पास अनगिनत दुःख हैं और तुम उसे संभालने की कोशिश करोगे तो सैलाब में डूब जाओगे. बहक बहक कर चलने की जगह, बच बच के चलना. थेंक्यू रोने वाली लड़की. कई सालों बाद एक लड़की ने कहा. उस बेवकूफ लड़के के बारे में मत सोचो, जो मुझे यहाँ ड्रॉप करके गया है. हम अभी एक आईस्क्रीम खाते हैं, एक जूस लेते हैं. यही हो सकता था मगर आप सीख सकते हैं कि कटे हुए हाथों से बंधे हुए हाथ बेहतर होते हैं. मैं उस दिन से किसी को अपनी ज़िन्दगी से जाने नहीं देना चाहता हूँ कि बेवकूफ लड़के अक्सर रिलेशन्स को ड्रॉप कर देते हैं. 

एक सुबह पापा ने छोटे भाई से कहा. तुम कर सकते हो अगर तुम चाहो. ये दिन फिर से लौट कर नहीं आएगा. उसने कर दिखाया. वह एसिस्टेंट कमिश्नर ऑफ़ पुलिस, रात की तन्हाई में शहर की आवारा सड़कों पर कभी गश्त का मुआयना करते हुए बेतरह पापा को याद करता है. जन्म तो कोई भी दे सकता है, उनके सिवा, वो हौसला और वो रौशनी कौन दे सकता है. उससे भी छोटा एक भाई है. उसने बेहद अवसाद में दसवीं कक्षा पास की थी लेकिन कभी हताशा का ज़िक्र नहीं किया. उसने ख़ुद अपनी मंज़िलें चुनी. अकेले सारा रास्ता तय किया. वह इतिहास का एसोसियेट प्रोफ़ेसर है. मुझे उसने सिखाया कि भाई घबराना मत. 

एक लड़की ने कहा था कि क्या फर्क पड़ता है, शादी के बाद कोई जीये या मर जाये? मैंने ख़ुद से कहा था फर्क पड़ता है. ये कह कर अच्छा किया. वह हर रात मुझे बचा लेती है हज़ार आफ़तों से, हर सुबह भुला देती है सारी शिकायतें. एक दोस्त ने कहा था कि तुम लिखो कि मुझे तुम्हारी किताब चाहिए अपने बैड पर. उसने लिखवाया. उसने हर शाम फोन करके कहा. हाँ तुम अवसम हो. वह कभी भी किसी से मिले तो ज़िक्र यही होता है, केसी को पढ़ा है कभी ? ये पढो... 

मैंने आवारगी और बेपरवाही में बिताये कई सालों से बुनी हुई चादर के नीचे पनाह पाई है. मैंने क्रांतिकारियों के गीत गाये. लाल रंग के परचम तले खड़े होकर यकीन को पाया. सीखा कि यही दुनिया है इसी को सुंदर बनाया जाना, सबसे बड़ा सच है. मैं जो कुछ भी बना हूँ वह लोगों का बनाया हुआ है, मैं जो कुछ भी बिगड़ा हूँ ये मेरी ख्वाहिश है... लव यू डैड, माँ, मेरे भाइयों, बीवी और दोस्तों कि जब तुम मेरी तरफ प्यार से देखते हो, कोहिनूर का नूर बुझ जाता है मेरी आँखों को देख कर... तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है. हेप्पी टीचर्स डे. 

मैंने जो सीखा है, वह शायद तम्हें पसंद न आये मगर उदास न होना.
Share this article :

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (08-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. हम तो इनके लिखे के आशिक हैं ...
    सांस रोक के पढ़ जाते हैं इनका लिखा ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. http://ruraltourismnotheast.blogspot.in/
    कृपया इस ब्लॉग पर जाएँ और अपनी टिप्पणी दे.

    उत्तर देंहटाएं

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template