नई पुस्तक:-'मैं एक हरफ़नमौला- ए .के. हंगल - अपनी माटी

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नई पुस्तक:-'मैं एक हरफ़नमौला- ए .के. हंगल


'सब कुछ वैसे ही हुआ जैसी कि उम्मीद थी । मैंने अधिकारियों को सन्देश भिजवा दिया कि मैं अब हिन्दुस्तान जाने के लिए तैयार हूँ । कुछ दिन बाद मुझे कराची के एडमिनिस्ट्रेटर के सामने पेश किया गया - ताकि मैं अपने फैसले के बारे में ख़ुद उसे बता सकूँ । उसने अपनी रजामन्दी दे दी और मुझे घंटे के अन्दर-अन्दर मुल्क छोड़ने का हुक्म सुना दिया गया अगली सुबह कराची बन्दरगाह पर कुछ और दोस्त और पार्टी के साथी मुझे अलविदा कहने आये । मेरे साथ मेरी पत्नी और बेटा भी था 

उन लम्हों की छटपटाहट को बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं । उस ज़मीन को छोड़ कर जाना जहाँ मैं पला-बढ़ा, जहाँ मैंने अपनी राजनीतिक लड़ाइयाँ लड़ी थीं, संगीत और थियटर की दुनिया से अपने तार जोड़े थे, और जाने कितने करीबी दोस्त बनाये थे -कोई ख़ुशगवार एहसास नहीं था ।' आत्मकथा'मैं एक  हरफ़नमौला'  के पृष्ठ संख्या 64 अलविदा कराची! से, - ए .के. हंगल 

पुस्तक के सन्दर्भ में ...

'कुछ अरसा पहले, दिल्ली में, मेरी मुलाकात स्टर्लिंग पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री 
 
एस.के. घई से हुई थी। वह श्री गौतम कौल की पुस्तक ‘सिनेमा एंड द फ्रीडम स्ट्रगल’ की रिलीज का मौका था, जिसे स्टर्लिंग पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया था। श्री कौल इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस के डायरेक्टर जनरल रह चुके हैं।

इस पुस्तक का लोकार्पण (रिलीज) भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा के हाथों हुआ था, और इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में मुझे भी बॉम्बे से आमंत्रित किया गया था।

अपना भाषण देने के बाद जब मैं मंच पर अपनी सीट पर वापस बैठा तो मैंने मि. घई को बिल्कुल अपनी बगल में बैठे पाया। जल्दी ही हमारे बीच यह बात तय हो गई कि मैं अपनी आत्मकथा लिखूँगा और वे उसे प्रकाशित करेंगे। लेकिन बॉम्बे लौटने के बाद जब मैं कागज-कलम लेकर लिखने बैठा तो मुझे यह काम काफी मुश्किल लगा। पहली बात तो यह कि मैं एक लेखक नहीं हूँ। दूसरे मैंने किसी डायरी वगैरह की शक्ल में अपनी जिंदगी का कोई हिसाब-किताब भी नहीं रखा था। मेरे पास एक डायरी जरूर रहती है, लेकिन उसमें सिर्फ मेरी शूटिंगों, रिहर्सलों, यात्राओं, स्टेज-कार्यक्रमों और अन्य सार्वजनिक समारोहों की तारीखें दर्ज रहती हैं। तारीखों के मामले में मेरी याददाश्त कोई खास अच्छी नहीं है। बतौर एक एक्टर मेरा अहम काम है जिंदगी में पूरी-पूरी शिरकत करना, अपने आस-पास की चीजों को ध्यान से देखना, परखना और समझना, और लोगों, चरित्रों वगैरह का गहराई से अध्ययन करना।

सच्चाई यह है कि मैंने अपने जन्मदिन की तारीख याद रखने की भी परवाह नहीं की है। आमतौर से इसे 15 अगस्त लिखा जाता है, लेकिन यह सही तारीख़ नहीं है। सिर्फ इत्तफ़ाक  से ही यह तारीख़ मेरे साथ चिपक गई है, जिसके बारे में पाठक विस्तार से इस पुस्तक में पढ़ेंगे। एक फ्रीडम फाइटर होने के नाते मैंने इस तारीख़ को ज्यों-का-त्यों रहने दिया है।

कई वर्ष बाद, जब अपना पासपोर्ट बनाने के सिलसिले में मुझे अपने जन्मदिन की सही तारीख़ बताने की जरूरत पड़ी तो मैंने अपने बुजुर्गों और रिश्तेदारों से पूछकर इसका पता लगाया था। फिर भी, अगर पाठकों को पुस्तक में अन्य कहीं किसी तारीख़ को लेकर कोई शंका महसूस हो, तो मेरा उनसे अनुरोध है कि मुझे इस संबंध में सूचित करने में जरा भी संकोच न करें। मैं उनका आभारी रहूँगा। 
 मैं उन सभी व्यक्तियों के प्रति भी अपना आभार प्रकट करना चाहूँगा जिन्होंने इस पुस्तक के लेखन में मेरी मदद की है।'-
  
ए.के. हंगल, 
  31 दिसंबर, 1998
लेखक -ए .के. हंगल के सन्दर्भ में...

जजों और डिप्टी-कमिश्नरों के खानदान से होने के बावजूद ए. के. हंगल ने एक दर्जी के रूप में अपनी ज़िन्दगी की शुरुआत करने का फैसला किया -बावजूद इसके की ब्रिटिश सरकार उन्हें उनके पिता की तरह एक प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त करने के लिए तैयार थी  । अपने मामा की उँगली छुड़ाकर भीड़ में 'खो गए' एक नन्हें और उत्साही बालक की तरह ए. के. हंगल जिन्दगी भर अपने इस 'खोएपन' का मजा लेते रहे हैं,  और राजनीति से लेकर रंगमंच और सिनेमा तक हर क्षेत्र में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के रंग बिखेरते रहे हैं 
उनकी आत्माकथा हर तरह के पाठकों के लिए -खासकर प्रगतिशील विचारधारा थिएटर और सिनेमा में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए -एक अत्यन्त रोचक, विचारोत्तेजक  और आनंददायक अनुभव साबित हो सकती है   वाणी प्रकाशन ने वर्ष 2008 में इनकी आत्मकथा 'मैं एक हरफनमौला' प्रकाशित की थी।'पद्मभूषण' से सम्मानित एक समर्पित समाजसेवी, रंगकर्मी और फ़िल्म अभिनेता ने  26 अगस्त 2012 को दुनिया से अलविदा कह दिया  । वाणी प्रकाशन उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है ।

अनुवादक के सन्दर्भ में...
युगांक धीर  पिछले  सत्रह वर्षों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत रहे , कुछ वर्षों से अनुवाद-कार्य से जुड़े हुए हैं । 'इजाडोरा की प्रेमकथा', 'रूसो की आत्मकथा', 'मादाम बोवारी', 'गान विद द विंड' और 'हालीवुड बुला रहा है' (इन्ग्रिड बर्गमेन की जीवन-कथा) जैसी उनकी कुछ अनूदित कृतियाँ काफी लोकप्रिय हुई हैं 

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