नई पुस्तक:-साझा संस्कृति,साम्प्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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नई पुस्तक:-साझा संस्कृति,साम्प्रदायिक आतंकवाद और हिन्दी सिनेमा


हम जब किसी धार्मिक समुदाय की बात करते हैं, तो इस बात को भूल जाते हैं कि वह समुदाय एक आयामी नहीं होता  ।  उसमें  भी वे सभी भेद- विभेद होते हैं  जो दूसरे धार्मिक समुदायों में होते हैं  । एक अभिजात मुसलमान और एक गरीब मुसलमान का धर्म भले ही एक हो ,लेकिन उनके हित एक से नहीं होते । यदि ऐसा होता तो ('मुगले आज़म' फ़िल्म के सन्दर्भ में ) अकबर सलीम की शादी ख़ुशी-ख़ुशी अनारकली से कर देता,क्योंकि सलीम और अनारकली का धर्म तो एक ही था  दूसरा पहलू देखें  तो यदि सलीम किसी राजपूत स्त्री से विवाह करना चाहता तो क्या अकबर एतराज़  करता ? नहीं , इतिहास हमें बताता है मुग़ल और राजपूत दोनों का धर्म अलग जरुर था,लेकिन दोनों का सम्बन्ध अभिजात वर्ग से था  

यह विचार का विषय है कि 1947 से पहले और 1947 के बाद भी लगभग दो दशकों तक मुसलमान समुदाय पर जो भी फ़िल्में बनीं, वे प्राय: अभिजात वर्ग का प्रस्तुतीकरण करती थीं  इन फ़िल्मों की साथर्कता सिर्फ इतनी  थी कि इनके माध्यम से सामंती पतनशीलता को मध्ययुगीन आदर्शवादिता से ढंकने की कोशिश जरुर दिखती थी । इन फ़िल्मों  के माध्यम से मुसलमान की एक खास तरह की छवि निर्मित की गयी जो उन करोड़ों  मुसलमान से मेल नहीं खाती थी,जो हिन्दुओं  की तरह खेतों और कारखानों में काम करते थे , दफ्तरों में क्लर्की करते थे या स्कूलों -कॉलेजों में पढ़ते थे  जो  न तो बड़ी -बड़ी हवेलियों में रहते थे , न खालिस उर्दू बोल पाते थे और न ही शेरो शायरी कर पाते थे  इन ढहते सामंती वर्ग के यथार्थ को पहली बार सही परिप्रेक्ष्य में ख्वाजा अहमद अब्बासी  ने 'आसमान महल ' (1965) के माध्यम से पेश किया था ।  

लेकिन इस फ़िल्म  को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था उतना नहीं मिल सका । इसके बाद ' गरम हवा ' (1973) ने बताया कि  मुसलमान भी वैसे ही होते हैं जैसे हिन्दू ।  इसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा ।  राजेंद्र सिंह  बेदी ( दस्तक ),सईद अख्तर मिर्ज़ा ( सलीम लंगड़े  पे मत रो, नसीम ), श्याम बेनेगल ( मम्मो ,हरी -भरी ), मनमोहन देसाई ( कुली ), शमित अमीन ( चक दे इंडिया ) और कबीर खान (न्यूयार्क ), करण जौहर ( माई नेम इज़  खान ) और  कई अन्य फ़िल्मकारों ने उन आम मुसलमानों को अपना पात्र बनाया जिन्हें कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है 

लेखक के सन्दर्भ में.....
जवरीमल्ल पारख का जन्म 1952 में जोधपुर , राजस्थान में हुआ था  । इन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय से 1973 में  बी.ए. आनर्स और 1975 में एम.ए . हिंदी प्रथम श्रेणी से उतीर्ण  करने के बाद , प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में 'नयी कविता का अंत:संघर्ष'  विषय पर पीएच.डी.की उपाधि  सन 1984, में जवाहर लाल नेहरु  विश्वविद्यालय नयी दिल्ली से प्राप्त की । 1975 से 1987 तक  रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय में व्याख्याता रहे ,1987 से 1989 तक इंदिरा गाँधी  राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय  नयी दिल्ली में व्याख्याता रहे । 
 
1989 से 1998 तक रीडर और 1998  से प्रोफेसर , 2004 से 2007  तक मानविकी विद्यापीठ  के निर्देशक पद पर कार्य किया सम्प्रति :-  इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर पद पर कार्यरत । सिनेमा सम्बन्धी पुस्तकें : हिंदी  सिनेमा का समाजशास्त्र, लोकप्रिय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ । साहित्य सम्बन्धी पुस्तकें- आधुनिक हिंदी साहित्य : मूल्यांकन और पुनमुल्यांकन, संस्कृति और समीक्षा के सवाल, नयी कविता का वैचारिक परिप्रेक्ष्य।  

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