मेरी नज़र में महामंदिर,मंडोर,ओसियाँ-अशोक जमनानी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

मेरी नज़र में महामंदिर,मंडोर,ओसियाँ-अशोक जमनानी

ओसियां


ओसियां जिसका एक पुराना नाम उपकेशपट्टन भी  है ओसवालों के इतिहास का पहला अध्याय है। यहाँ स्थित सच्चिका माता या सच्चियाय माता का मंदिर हिन्दुओं और ओसवालों दोनों की श्रद्धा का केंद्र है। साथ ही बहुत खूबसूरत शिल्प को संजोये जैन मंदिर भी श्रद्धा के साथ-साथ कला-प्रेमियों के भी आकर्षण का केंद्र हैं। सच्चिका माता मंदिर भी जिस पहाड़ी पर स्थित है वहां तक जाने वाले मार्ग में सीढ़ियों के साथ बने तोरणों की एक लम्बी श्रंखला बरबस ही जाने वालों का मन मोह लेती है। मंदिर का अपना शिल्प भी अद्भुत है और कलात्मक स्तम्भ और   देवालय भी दर्शनीय हैं।

वैसे मंदिर में  श्रद्धालुओं  की अनवरत श्रंखला ठहरकर शिल्प निहारने की इज़ाज़त नहीं देती और न ही मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के नाम पर किया गया खिलवाड़ भी कोई ख़ुशी देता है। भारत ही एक ऐसा देश है जिसने संस्कृति को परिभाषित करते हुए सत्य और शिव के साथ सुन्दर भी जोड़ा। भारतीयों का सौंदर्य-बोध अत्यंत उच्च श्रेणी का रहा है और जहाँ भी अवसर मिला इसका समुचित प्रकाट्य भी हुआ है। हमारे प्राचीन मंदिर तो शिल्प के जिस अद्भुत सौन्दर्य को समेटे हुए हैं उसे देखने तो पूरी दुनियां से लोग आते हैं। 

लेकिन अब न जाने हमारा वो सौन्दर्य-बोध कहाँ लुप्त हो गया है। अत्यंत कलात्मक कृतियों के साथ हम जो अविवेकी आचरण करते हैं वो तो हमारे सारे किये कराये पर पानी फेर देता है। सच्चिका माता मंदिर में भी श्रद्धालुओं को धूप-पानी से बचने के लिए प्लास्टिक के बेहद भद्दे शेड बनाये गए हैं जो शिल्प के  समस्त कलात्मक सौन्दर्य की लगभग हत्या कर देते हैं। ऐसे प्रयोग केवल यहीं नहीं किये गए हैं वरन सारे  देश का यही हाल है। पता नहीं क्यों ऐसे स्थानों पर प्रबंध करने वालों में एक भी ऐसा व्यक्ति कभी शामिल नहीं किया जाता जो ऐसी व्यवस्था बनाये जिसमे लोगों को सुविधा तो मिले लेकिन कलात्मक सौन्दर्य के मखमल में बेवजह टाट का पैबंद लगने से बच जाये। श्रद्धा धर्म से जुड़ी है और कलात्मकता  संस्कृति से लेकिन दोनों में एक अद्भुत जुड़ाव है और दोनों  को इस देश में  एक साथ जन-जन के जीवन से जुड़ाव की भी जो सामर्थ्य प्राप्त है वो पूरी दुनियां के लिए एक मिसाल है। कोशिश होनी चाहिए जहाँ धर्म के साथ कलात्मक सौन्दर्य के प्रतीक भी मौजूद हैं उनके प्रबंधन में अविवेकी आचरण से बचा जाये वरना हो सकता है एक दिन टाट के पैबंद पूरे मखमल को ही ढक लें !


मण्डोर 

मैं जिन दिनों 'बूढी डायरी ' उपन्यास लिख रहा था उन दिनों बार-बार यही सोचा करता था कि काल का प्रवाह कितना शक्तिशाली है जिसने एक अति   समृद्ध प्राचीन नगरी त्रिपुरी का नामो-निशान मिटा दिया . त्रिपुरी पौराणिक नगरी होने के साथ-साथ कलचुरी राजवंश की राजधानी भी थी और बहुत लम्बे कालखंड तक  उसका वैभव बना रहा आज वो राजधानी अपना पूरा  अस्तित्व खो चुकी है और अब वहां एक छोटा सा गाँव है जिसकी जमीन कभी-कभी कुछ मूर्तियाँ उगल देती है तो त्रिपुरी का भूला-बिसरा वैभव फिर सांस लेने लगता है। मध्य-प्रदेश की इस दास्तान को जरा दूसरे ढंग से मैंने महसूस किया देश के ठेठ  पश्चिमी राजस्थान के मण्डोर  में। कहते हैं कभी यहाँ मांडव्य ऋषि का आश्रम था और तब इसका नाम   मांडव्यपुर था .  एक कहानी मय दानव की भी है जो रावण का ससुर था और इसी जगह पर रावण और मंदोदरी का विवाह भी हुआ था। 

खैर छोडिये कहानियां तो बहुत सी हैं और फिर अतीत का विस्तार भी चाहे  तो कहाँ से कहाँ तक ले जाए इसलिए जरा वर्तमान की बात करें और किस्से को पूरा करें . एक हरा-भरा क्षेत्र जो जोधपुर से 8-9 किलोमीटर दूर होगा बेहद खूबसूरत छतरियों के कारण शिल्प-प्रेमियों को बहुत देर तक रोके रखने की  सामर्थ्य रखता है।  अलंकृत स्तम्भ और दीवारें, तोरणों के खूबसूरत घुमाव, मंडप और शिखर ............. बस देखते रहिये और याद कीजिये उन अनाम कलाकारों को जो एक ऐसा खजाना छोड़ गए हैं जिन्हें सदियाँ बीतने पर भी काल का प्रवाह बहुत थोडा ही नुक्सान पहुंचा पाया है। मण्डोर पहले ऋषि भूमि थी फिर राजधानी बनी . कई युद्ध इसने देखे फिर जोधपुर राजधानी बन गया तो मण्डोर हार-जीत के खेल से मुक्त हो गया।

मण्डोर  से जोधपुर राजधानी ले जाने के पीछे एक कारण यह भी था कि मण्डोर बहुत दुर्गम नहीं था और अधिकांश लड़ाइयों में शत्रु सेना ने इस पर कब्ज़ा हासिल कर  लिया था . अब हारने वाली जगह कौन राजधानी बनाये रखना पसंद करता बस मेहरानगढ़ की नींव रखी  गयी और मण्डोर इतिहास बनता चला गया। एक ऋषि-भूमि युद्ध और संघर्ष से मुक्त हो गयी और हारी मगर उसे हरिनाम मिल गया अब वहां शान्ति का साम्राज्य है , शिल्प का सौंदर्य है, हरियाली है और पर्यटकों की भीड़ भी है यही भीड़ जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में भी आती है लेकिन वहां की बहुत ऊँची दीवारों में राजसी गर्व उसे उतनी सहजता की इज़ाज़त नहीं देता जितनी  सहजता मण्डोर देता है। मेहरानगढ़ भी  क्या करे हुकम को शांति का फलाहार ही पसंद होता तो वो मण्डोर में ही न बस जाते ...... बेचारी दिल्ली वो भी अशांत और परेशान है क्या करे राजधानी जो  ठहरी .

महामंदिर

कभी-कभी ऐसा होता है कि हम अपनी ही जमात के लोगों के आचरण से क्षुब्ध हो उठते हैं. अपने आप को लेखक और बुद्धिजीवी कहलाने का शौक पाले लोगों की असली बौद्धिकता का पता तब चलता है जब आप हकीकत से रूबरू होते हैं. जोधपुर के महामंदिर की तलाश में ऐसा ही कुछ घटित हुआ. मैंने  कई विद्वानों की लिखी किताबों में इस मंदिर के बारे में पढ़ा था और उसी संकल्पना के साथ मैंने ऑटो रिक्शा वाले से महामंदिर चलने के लिए कहा. कुछ देर बाद उसने मुझे जहां छोड़ा वहां तो कोई मंदिर था ही नहीं. विद्वानों की लिखी किताबों के अनुसार तो यह मंदिर ५७० भवन वाला सवा मील की  परिधि वाला भव्य मंदिर था . मैं हैरान था आखिर इतना बड़ा मंदिर जिसका इतना अधिक ऐतिहासिक महत्त्व है गया तो गया कहाँ !! 

असल में  यह मंदिर महाराजा मानसिंह द्वारा अपने गुरु आयस देवनाथ जी के लिए बनवाया गया था और देवनाथ जी नाथ सम्प्रदाय की जलंधरनाथ पीठ के प्रमुख पुजारी थे . उनके आदेश को मानकर ही मानसिंह जी ने जालोर से जाने का विचार त्याग दिया था जिसके कारण वो जोधपुर महाराजा की आकस्मिक मृत्यु के बाद जोधपुर के महाराजा बने. बाद में जब आयस देवनाथ जोधपुर आये तो उनके लिए अति भव्य महामंदिर बनवाया गया. कई किताबों में यह कहानी और महामंदिर के चित्र मिल जायेंगे जिनमे से कुछ किताबें तो इसी वर्ष का प्रकाशन भी हैं. परन्तु दुःख इस बात का है कि किसी भी लेखक ने वहां जाकर वास्तविक स्थिति का अध्यन करना जरूरी नहीं समझा कट-कॉपी-पेस्ट आज के लेखन का मूल-मन्त्र जो  बन चूका है. 

वास्तविकता तो यह है कि महामंदिर का सारा का सारा भूगोल बदल चुका है अब वहां एक घनी आबादी वाला मोहल्ला और एक लम्बा-चौड़ा बाज़ार है. कोई भी आपको महामंदिर का पता तक नहीं बताता बड़ी मुश्किल से पूछते-पूछते जब मैं उस ऐतिहासिक इमारत तक पहुंचा तो उसका दरवाजा बंद था . किसी तरह भीतर गए तो पता चला कि मुख्य  मंदिर के बीच के  हिस्से को छोड़कर शेष हिस्से में एक स्कूल चलता है. मंदिर के चारो और घनी बसाहट के कारण मंदिर लगभग छुप सा गया है . मंदिर की बेशकीमती पेंटिंग्स ख़त्म होने की कगार पर हैं और मंदिर की ख़ूबसूरती और भव्यता केवल उन महान लेखकों की किताबों के चित्रों में सुरक्षित है जो शायद कभी वहां गए ही नहीं हैं.

एक भव्य ऐतिहासिक मंदिर खो गया है और बुद्धिजीवी इतिहासकार अपनी किताबों में उसका बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन कर रहे हैं . मंदिर के आँगन में एक महिला कपड़े धो रही थी मैंने पूछा कि कितने लोग इस मंदिर को देखने रोज़ आते हैं ? उसने कहा ' तीन महीने पहले कुछ अंग्रेज आये थे.' मैं समझ गया उन अंग्रेजों ने उन्हीं किताबों में से किसी एक किताब का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ा होगा जिन्हें पढ़कर मैं महामंदिर देखने चला आया . वो महामंदिर जिसकी परिधि कभी सवा मील की थी और जिसका पता आज वो भी नहीं बताते जो उस मौहल्ले में रहते हैं जिसका नाम है- महामंदिर.
    


3 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut accha varnan hai aur jo aapne kataksh kiya hia vo bhi ekdum sahi hai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिल्हे में जो श्रीगोंदा तहसील के मांडवगण गाव मैं यह मांडव्य ऋषि का आश्रम हैं। वहा यह शांडली और अनुसुया कि कथा हुई है।
    वहा भगवान शंकरजी का बडा मंदिर है ओर मांडव्यऋषि का बडा आश्रम हैं।

    संपर्क-9422337456 श्री अजय लांडगे

    उत्तर देंहटाएं
  3. Nice and beautyful temple of jalandharnath ji ( Gorakhnath ji Peeth ) 84 pillars in mahamandir jodhpur { India }

    उत्तर देंहटाएं

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here