इधर 'हेमंत शेष' की 3 कवितायेँ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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इधर 'हेमंत शेष' की 3 कवितायेँ

हेमंत शेष की रचना प्रक्रिया में हमेशा एक नई त्वरा दिखाई पड़ती है।वे तय खांचो से अलग जाकर लिखते हैं। ज़माने की परवाह किये बगैर अपनी डगर पर चलता हुआ एक रचनाकार-चित्रकार हेमंत शेष। आज  दिनों के बाद  उनकी तीन अलग-अलग भाव की कविताओं के साथ अपनी माटी में प्रस्तुत है।-सम्पादक 

(1)

एक काली सलवार देख कर  


गर्ल्स-हॉस्टल की खिड़की में
खुले आम सूखती नई एक काली सलवार मन्टो के शीर्षक की तरह
छप जाती है दिमाग में अचानक।
उसे भूलने को एक बेहतरीन जगह हो शायदचम्बल गार्डन
पथराई एक स्त्री वहां शिल्पकार उषा हूजा के कारण खड़ी है अनथक- फव्वारे के नीचे।
छपी हुई सलवार से बेखबर। बाहर है ऐस टी डी का चमकता पीला चौकोर।
वहीं से मैं प्रधानमंत्री से फोन पर बात करना चाहता हूं
हैलो प्रधानमंत्री जी फव्वारा। स्त्री। बगीचा। सलवार। खिड़की हॉस्टल
हॉस्टल खिड़की सलवार। बगीचा। स्त्री। फव्वारा।
दृश्यों के मेरे इस दिमागी अमूर्तन का मायना क्या है
सुनता हूं मैं जवाब में एक धीर-गम्भीर आवाज़ :
हैलो मैं अभी पश्चिम अफ्रीका के देश बुर्किना फासो के राष्ट्राध्यक्ष से विमर्श कर रहा हूं मुझे खेद है मैं आप की कोई सहायता नहीं कर सकता पर आप कविता के अलावा कोई ढंग का काम क्यों नहीं करते
हैलो प्रधानमंत्री जी मैं आजचम्बल गार्डनगया था भूलने को काली सलवार।
नहीं देख सका अंधेरे में
लड़के की गोद में निश्चिंतता से लेटी उस किशोरी का चेहरा। भीग रहा होगा वह प्रथम-प्रेम के फव्वारों से।
लड़की की सलवार का रंग काला नहीं था फिर भी वह लड़की थी प्रेम में
गया हूं शहर भर में घूम कर थक हार कर घर।
अगर नहीं चाहिए मुझे इस तरह कवि होना
अगर नहीं चाहिए मुझे इस तरह भटकना
अगर नहीं करनी चाहिए मुझे चुभते हुए दृश्य में कविता की खोज
तो नहीं सुखानी चाहिए किसी लड़की को कभी भी अपनी नई काली सलवार खुल्लमखुल्ला कुछ यों।
अब आप ही बतलाइए
अन्तर्राष्ट्रीय और गहन गम्भीर समस्याओं से जूझते प्रधानमंत्री को
एक साधारण कवि की रचना-प्रक्रिया के बारे में
उतनी ही मामूली सी बात कौन कह सकता है भला ?


(2)


सागर-कथा

समुद्र अनंत तक बड़ा था
और तट पर सिर्फ़ एक थी नाव
समुद्र के बीच था कोई अनदेखा टापू
लोग सदियों से सुनते आये थे टापू पर है-
बड़े बड़े मोतियों का खेत
हर आदमी दूसरे की हत्या कर
अँधेरे मं पहुँचा किनारे पर
खेता रहा पूरी रात नाव
टापू पर सबसे पहले
अकेला पहुँच जाने के लिए

टापू पर हरेक ने देखा
सूर्योदय
पर नहीं बची थी वहाँ तिल धरने की जगह
टापू पर लोग ही लोग थे
वे सब भी जो एक दूसरे के हाथों मारे जा चुके थे

जितने लोग थे किनारे पर उतनी ही थी नावें

और
टापू भी कैसा विलक्षण
हर चीज़ थी वहाँ, हर चीज़
अगर नहीं था तो बस वही -
मोतियों का खेत !

(3)

देहावसान

किसी भी दिन चुपचाप निकल जाऊंगा हर एक की पकड़ से परे
गिरते हुए पत्तों के बीच मुझे वे कुछ देर के लिए सुला देंगे
परिक्रमा देते हुए भी वे मेरी तरफ देखने से बचना चाहेंगे
हो सकता है उन में से किसी के भीतर एकाएक फूट पड़े देर से दबी रुलाई
और आसपास के लोग हमें देखने लगें- कुछ आश्चर्य, कुछ उदासी से
हो सकता है कोई थाम ले हौले से रोने वाले का कंधा
और थपथापाना चाहे उसे नकली सान्त्वना में
फिर उस की सांत्वना भी थम जाए सुबकियों की तरह
लोग अकेले और चुप होते भी जाना चाहेंगे एक दूसरे के पास
बातों से समय काटने की तजवीज़ में
बहुत तेज़ है आग और असहनीय हैं इस की लपटें
क्या पता किसी को यह लगे और मजबूरी में वह मेरी निश्चल स्थितप्रज्ञ मुद्रा से प्रभावित होना चाहे
वे दृश्य से मेरी देह पूरी तरह विलीन होने तक वहां से जाएंगे नहीं
सहमे सहमे गुमसुम इन्तजार करने लगेंगे समाप्ति का
या तो वे लगातार बातें करेंगे या चुप रहेंगे
जीवन की निस्सारता या ऐसे ही किसी अमूर्त खयाल में मशगूल
एक ठन्डी चुप प्रतीक्षा में तब तक जमे रहेंगे
जब तक सब कुछ साफ नहीं कर देती आग
आखिरी बार वे जल्दी-जल्दी निपटा देना चाहेंगे हर रस्म
और जाना चाहेंगे मंडराते हुए अंधकार से बाहर
अपनी उसी रोती-गाती-चिल्लाती दुनिया में
उन्हें घर में पड़े काम याद आने लगेंगे एकाएक
यह भी आयेगा याद कि भूख लग रही है और
चप्पल में चुभती हुई कील, जिसे मेरी वजह से भूल गया था
कुछ देर को कोई रिश्तेदार,
उस के तलुवे में फिर और जोर से गड़ना शुरू कर देगी।

हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक 
अधिकारी रहे साथ 
ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है।
लेखक,कवि और कला समीक्षक
 के नाते एक बड़ी पहचान।
इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' 
को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है।
अब तक लगभग तेरह पुस्तकें 
प्रकाशित हो चुकी है।
हाल के दस सालों में सात 
किताबें संपादित की है।
साथ ही
 'राजस्थान में आधुनिक कला' 
नामक 
एक किताब जल्द आने वाली है।
'कला प्रयोजन' पत्रिका के 
संस्थापक सम्पादक हैं।
सम्पर्क सूत्र
40/158,मानसरोवर,जयपुर-302002
फोन- 0141-2391933 (घर),मो:09314508026
ईमेल-hemantshesh@gmail.com



3 टिप्‍पणियां:

  1. Every poem of Hemant Shesh is a piece of art to be adored and enjoyed. It is beyond comments, since comments do not matter either to him or to his readers. The readers only love to read him for sheer enjoyment and for the magic the literary artist creates in all his writings.
    KN Sharma

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  2. हेमंत जी!

    अच्छी कविताएं हैं।

    मनोज श्रीवास्तव।

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