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जन्मशती विशेष: डॉ. रामविलास शर्मा

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012 | शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012

10 अक्टूबर - डॉ. रामविलास शर्मा और इप्टा




-राजेन्द्र रघुवंशी

(इप्टा के संस्थापक सदस्य,उपाध्यक्ष,2003 में दिवंगत)
रामविलास शर्मा 1943 में आगरा आये। उस समय बंबई में प्रगतिशील लेखक संघ के चौथे राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ और तभी इप्टा के विधिवत गठन की घोषणा की गई। बंबई में प्रगतिशील लेखकों के साथ समान विचार वाले सांस्कृतिक क्षेत्र के कलाकर्मी भी एकत्रित हुए थे, जो अलग-अलग नामों की संस्थाओं के साथ प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन चला रहे थे। पीडब्ल्यूए और इप्टा का यह सहकर्म आगरा में सक्रिय रूप से कार्य करता रहा। लेखकों ओर जागरूक कलाकर्मियों के निकटतम संपर्क को ही इस बात का श्रेय है कि आगरा में सांस्कृतिक प्रवृत्तियां कभी सूखी नहीं और नए-नए विचारों, समीचीन कला-रूपों और नई-नई प्रस्तुतियों ने सांस्कृतिक जन-जीवन को सदा हरा-भरा रखा।



डॉ रामविलास शर्मा ने आगरा इप्टा के कार्य का समय-समय पर मूल्यांकन कर इसे सही दिशा-निर्देश ही नहीं दिया, अपितु, इसके लिए विशेष रूप से नाटकों की रचनाएं भी कीं। आगरा में प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा की यह बड़ी उपलब्धि है कि दोनों ने एक-दूसरे की प्रवृत्तियों में पिछले चार दशकों से सक्रिय रूप से हाथ बंटाया है। इनमें डॉ रांगेय राघव ने बंगाल के अकाल पर विशेष रूप से एक नाटक लिखा, उसका निर्देशन किया और उससे हुई आय को बंगाल के अकाल पीड़ितों की सहायतार्थ भेजा। यह आगरा से बंगाल गए डाक्टरी जत्थे के साथ डॉ रांगेय राघव के जाने के पहले की बात है। बंगाल से लौटकर उन्होंने अकाल की विभीषिका पर रिपोर्ताज लिखे और उनकी रचना को नाट्य-रूप में प्रस्तुत किया गया। गोवा के संघर्ष पर उन्होंने ‘आखिरी धब्बा’ नाटक लिखा।

डॉ रामविलास शर्मा उन युवकों के लिए प्रेरणा के स्रोत रहे, जो बौद्धिक रूप से विकसित थे और ट्रेड यूनियनों में, किसान संगठनों में काम करते थे, उन्होंने उन शोषितों-पीड़ितों के यथार्थ जीवन पर कहानी और नाटक लिखने के लिए उन्हें प्रेरित किया। प्रेरित ही नहीं किया, अपितु शर्त लगाई कि ‘तुम्हानी कहानी तभी सुनूंगा, जब चमड़े के कारखाने के उन मजदूरों के बारे में होगी, जिनके बीच तुम संगठन का कार्य करते हो’ अथवा ‘तुम्हारा नाटक तभी देखने आऊंगा, जब जूते के कारीगरों की समस्याओं के बारे में खेलोगे।’ 


डॉ रामविलास शर्मा उन युवकों के लिए प्रेरणा के स्रोत रहे, जो बौद्धिक रूप से विकसित थे और ट्रेड यूनियनों में, किसान संगठनों में काम करते थे, उन्होंने उन शोषितों-पीड़ितों के यथार्थ जीवन पर कहानी और नाटक लिखने के लिए उन्हें प्रेरित किया। प्रेरित ही नहीं किया, अपितु शर्त लगाई कि ‘तुम्हानी कहानी तभी सुनूंगा, जब चमड़े के कारखाने के उन मजदूरों के बारे में होगी, जिनके बीच तुम संगठन का कार्य करते हो’ अथवा ‘तुम्हारा नाटक तभी देखने आऊंगा, जब जूते के कारीगरों की समस्याओं के बारे में खेलोगे।’ ताज टेनरी यमुना किनारे बिल्कुल एकांत में ऐसी गंदगी की सृष्टि करती थी कि खड़ा होना भी मुश्किल था। वहां पुरबिये मजदूर उस जमाने में छह आने रोज पर चमड़ा साफ करने का काम करते थे। बीवी-बच्चों को ‘देश’ में छोड़कर आना ओर कारखाने में 18-18 घंटे काम करना-यही उनकी नियति थी। इनता नहीं जोड़ पाते थे कि घर के लिए किराया हो जाये ओर बीवी-बच्चों को देख आएं। चार-चार, छह-छह वर्ष यूं ही कोल्हू के बैल बने बीत जाते थे।


डॉ शर्मा ने सब बातें बड़े विस्तार से सुनीं-कैसे उनका संगठन किया गया, कैसे दुनिया से कटे-फटे लोगों को अधिकार का ज्ञान कराया गया, कैसे विषम परिस्थितियों में हड़ताल कराई गई, कैसे कुछ मांगें हासिल हुईं। वरना जिस दुनिया में वे रह-सह रहे थे, उसमें तो जैसे शाश्वत अंधकार था, सूरज कभी झांकता ही नहीं था। आगरा की आर्थिक व्यवस्था जूते के व्यवसाय पर टिकी हुई है-कोई बड़ा कारखाना तो है नहीं। अब तो टुटपुंजिये हो भी गए हैं, पहले तो सब कुटीर उद्योग का ही खेल था। उनका संगठन बनाना, उनमें काम करना ऐसा ही था, जैसे मेंढकों को तौलना। लेकिन नगर की इस समय 25 फीसदी जनता तो वही है- उसकी समस्याओं की पेचीदगियों को साहित्यिक-सांस्कृतिक रूप में प्रस्तुत करना राजनीतिज्ञों और अर्थशास्त्रियों से भी पेचीदा काम है। परंतु डॉ शर्मा सदृश, सुहृदय मार्गदर्शक ने बड़ा हौसला बंधाया। इस हौसला अफजाई के बल पर ही आगरा इप्टा जन-जीवन से सदा जुड़ा रहा और इसीलिए सदा जिंदा रहा। इसने रोजमर्रा के जीवन पर लिखकर, बहुत सी बार बिना लिखे ही आशु (इम्प्रोवाइज्ड) नाटकों को खेला। जूतों के मजदूरों के लिए चौराहा मीरा हुसैनी पर (जहां अब बाटा का गोदाम है) एक हॉल में स्थायी रंगमंच (यूनिटी हॉल-सं.) स्थापित किया गया। यहां हर हफ्ते चार आने का टिकट लगा कर विविध कार्यक्रम- सामयिक कोरस गीत व नृत्य तथा एकांकी होते। शू वर्कर्स यूनियन की ओर से स्थायी मंच, प्रकाश व पर्दे की व्यवस्था कर दी गई थी।


डॉ रामविलास शर्मा इस समय स्थायी साहित्यिक निधि संजोने में संलग्न हैं, लेकिन वर्षों तक उन्होंने सामयिक समस्याओं पर ‘अगिया बैताल’ आदि नामों से व्यंग्य कविताएं लिखी थीं। डॉ शर्मा के लेखन में व्यंग्य का इतना जबर्दस्त पुट है, यह इसलिए कि मानवीय मनोभावों को समझने की उनमें अद्भुत क्षमता है और उसे अभिव्यक्ति देने के लिए शब्दों का अपरिमित भंडार है। चित्रांकन की बेजोड़ खूबी डॉ शर्मा में है। यदि आपने सोहनलाल द्विवेदी की रचनाओं पर समीक्षा ‘बापू के छौने’ पढ़ी होगी, तो आप अनुमान कर सकते हैं कि डॉ राम विलास शर्मा में सिद्ध नाट्यकार के सभी गुण मौजूद हैं।


डॉ शर्मा ने हमसे ही अच्छे-अच्छे सामयिक नाटक नहीं लिखवाये, खुद भी ‘कानपुर के हत्यारे’ लिख कर दिया, जिसे हमने जगह-जगह खेलकर खूब चेतना जगाई। हड़ताली मिल-मजदूरों पर अंधाधुंध गोली चलाने वाले बदहवास दरोगा का इस नाटक में ऐसा सटीक खाका खींचा गया था- उसकी भूमिका करने वाले को ‘दर्शकों की थू-थू’ वरदान सिद्ध हुई। अभी प्रकाशित बिल्कुल नए प्रकार की कृति ‘घर की बात’ में उस समय रामविलास जी के नाम उनके भाई श्री मुंशी के पत्रों में इस नाटक का उल्लेख है- "कानपुर पर जब तुम्हारा नाटक आया, तब पीसी (पूरन चंद जोशी) हम लोगों के सेल में थे। संगल ने पढ़कर सुनाया- ‘हम लोग ओवरटाइम गोली चलाता है’ इत्यादि, पीसी खूब हंसे। "‘जमींदार कुलबीरन सिंह’ डॉ रामविलास शर्मा लिखित नौटंकी थी। आज रंगकर्म को लोक संस्कृति से जोड़ने की सामान्य चर्चा होती है, किंतु इस कार्य को दशकों पूर्व डॉ शर्मा ने किया था। बाद में उन्होंने ब्रज क्षेत्र के खड़ी बोली के लोकमंच भगत और नौटंकी के अध्ययन के लिए मेरे पुत्र जितेन्द्र   को प्रेरित किया।


साहित्य और रंगकर्म के साहचर्य को अमली जामा पहना कर ही सांस्कृतिक गतिविधियों को जीवंत बनाया जा सकता है। प्रगतिशील लेखक संघ के साथ मिलकर कार्य करने से आगरा इप्टा ने अपनी साहित्यिक समझ-बूझ के बल पर हिंदी की श्रेष्ठ कृतियों के नाट्य-रूपांतरण का कार्य सन् 1949 से ही प्रारंभ कर दिया था। इसने सबसे पहले ‘गोदान’ का नाट्य-रूपांतरण किया और उसे प्रलेस की जयंती के अवसर पर ही प्रस्तुत किया। ‘हंस’ में इसकी विस्तृत समीक्षा डॉ घनश्याम अस्थाना ने की थी। डॉ रामविलास शर्मा ने इन साहित्यिक कृतियों को मंचित करने के अध्यवसाय को बहुत पसंद किया और हमें प्रेमचंद की कहानियों के रूपांतर मंचित करने के लिए भी प्रेरित किया। उपन्यासों में ‘गोदान’ के अलावा ‘सेवासदन’, ‘प्रेमाश्रम’ और ‘रंगभूमि’ के नाट्य रूपांतर एवं कहानियों ‘कफन’, ‘निमंत्रण’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘मंत्र’, ‘लाटरी’ आदि के अभिनय शहर और देहात एवं देश के विभिन्न भागों में खूब सफल हुए। इस प्रकार उस समय अच्छे नाटकों के उपलब्ध न होने की समस्या भी हल हो गई, दूसरे हम श्रेष्ठतम कृतियों को सर्वसाधारण तक पहुंचाने में समर्थ हुए।


डॉ रामविलास शर्मा मुंशी प्रेमचंद को जनता का असली लेखक मानते हैं। राजमर्रा के जीवन से उठाए गए पात्र, प्रसंग, कथोपकथन और घटनाक्रम नाटकीय आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। जीवन के गहन अध्ययन के कारण ही प्रेमचंद जन-जन में प्रिय हुए। डॉ रामविलास शर्मा ने आगरा इप्टा की मांग पर ‘तुलसीदास’ पूर्णकालिक नाटक लिखा, जिसमें रत्नावली से हुए कथोपकथन तुलसीदास के संबंध में स्थापित पूर्व धारणाओं को खंडित करते हैं। इसकी प्रधान भूमिका को सेंट जोन्स कॉलेज के तत्कालीन प्रवक्ता श्री प्रकाश दीक्षित ने बड़े मनोयोग से निबाहा- हां, रत्नावली की भूमिका के लिए हमें पुरुष पात्र की शरण लेनी पड़ी, क्योंकि आगरा कॉलिज हॉल के इंचार्ज इतिहासविद् डॉ आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव किसी महिला पात्र को मंच पर लाने की अनुमति देने को तैयार न थे। मराठी में महिला पात्रों के अभिनय में पारंगत ग्वालियर निवासी श्री विनायक फड़के (अब सुप्रसिद्ध सितारवादक) ने हमारी चिंता दूर की।


पं. अमृतलाल नागर, डॉ रामविलास शर्मा के अभिन्न मित्र हैं। नागर जी का उपन्यास ‘सेठ बांकेमल’ डॉ शर्मा को बहुत प्रिय हैं, इसका उनके जीवन-प्रसंगों में कई जगह उल्लेख है। एक बात तो यह है कि उपन्यास आगरा के परंपरागत मोहल्ले गोकुलपुरे की परंपरागत बोली में बड़ी अनौपचारिक शैली में लिखा गया है। बात-बात में बात, दूसरे, डॉ शर्मा खुद भी सबसे पहले आगरा आगमन पर गोकुलपुरा में रहे थे। नागर जी की ससुराल के सामने वाले घर में, अत: जिन विभूतियों का चित्रण उस उपन्यास में जिस रंग में और जिस टकसाली शब्दावली में हुआ था, उसका पूरा मर्म और रस डॉ शर्मा ग्रहण करने में समर्थ थे। डॉ शर्मा ने ‘सेठ बांकेमल’ को कई रूपों में मंचित करने की प्रेरणा दी और आगरा इप्टा ने भी उसे खेल कर खूब वाहवाही लूटी। इतना ही नहीं, सेठ बांकेमल पात्र का और उसकी बोली का आगरा इप्टा ने कई अन्य सामयिक नाटकों में उपयोग किया। 

नागर जी के ‘नवाबी मसनद’ की कहानियों का भी आगरा इप्टा ने जी भर कर उपयोग किया और जब दृष्टिकोण बन गया, तो कृष्ण चंदर की ‘नीलकंठ’, अमृता प्रीतम की ‘पांच बहनें’, उदयशंकर भट्ट का ‘दस हजार’ आदि को भी परखने की समझ आई और उन्हें सफलता से रूपांतरित कर मंचित किया गया। डॉ शर्मा की आगरा नगर में उपस्थिति हम सबके लिए गौरव की चीज रही है। बाहर के बहुत से लोग आगरा को ताज की वजह से जानते हैं और बहुत से डॉ रामविलास शर्मा की वजह से। परिस्थितियों एवं लेखन संबंधी अन्य कार्यों के कारण वह यहां के जन-जीवन में घुल नहीं पाते हैं। अन्य टेम्पेरामेंटल चीजें भी हो सकती हैं। महान व्यक्तियों की महान बाते हैं, पर आगरा इप्टा को डॉ शर्मा और उनके पूरे परिवार का सहयोग और साथ शुरू से मिला है।

नागर जी के ‘नवाबी मसनद’ की कहानियों का भी आगरा इप्टा ने जी भर कर उपयोग किया और जब दृष्टिकोण बन गया, तो कृष्ण चंदर की ‘नीलकंठ’, अमृता प्रीतम की ‘पांच बहनें’, उदयशंकर भट्ट का ‘दस हजार’ आदि को भी परखने की समझ आई और उन्हें सफलता से रूपांतरित कर मंचित किया गया। डॉ शर्मा की आगरा नगर में उपस्थिति हम सबके लिए गौरव की चीज रही है। बाहर के बहुत से लोग आगरा को ताज की वजह से जानते हैं और बहुत से डॉ रामविलास शर्मा की वजह से। परिस्थितियों एवं लेखन संबंधी अन्य कार्यों के कारण वह यहां के जन-जीवन में घुल नहीं पाते हैं। अन्य टेम्पेरामेंटल चीजें भी हो सकती हैं। महान व्यक्तियों की महान बाते हैं, पर आगरा इप्टा को डॉ शर्मा और उनके पूरे परिवार का सहयोग और साथ शुरू से मिला है। उनकी दोनों पुत्रियों ने, जब वे बच्चियां ही थीं ‘गोदान’ में सोना और रूपा की भूमिका की थी। उनके भ्राता श्री रामशरण शर्मा ‘मुंशी’ इप्टा के मंच पर सक्रिय रूप से भाग लेते रहे हैं। यूपी इप्टा ने अखिल भारतीय जननाट्य आंदोलन में 1946 में सबसे पहले प्रांतीय सम्मेलन करने का श्रेय हासिल किया था। कानपुर में हुए इस सम्मेलन में मुंशी इलाहाबाद इप्टा के साथ आए थे। उनकी पत्नी धनवंती जी (धन्नो) ने भी इप्टा में सक्रिय भाग लिया। आगरा में धन्नो जी का परिवार अब तक हमसे जुड़ा हुआ है।


महात्माओं के बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां प्रचलित होती हैं। डॉ शर्मा इसके अपवाद नहीं। उस समय पुनर्संगठन की दृष्टि से  1974 में आगरा में प्रलेस का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलन हम लोगों ने आयोजित किया था। रामविलास जी इसकी आयोजन समिति के अध्यक्ष बनने पर सहमत हो गये, साथ ही यह भी कहा- ‘‘मैं कुछ बोलूंगा नहीं।’’



‘पहलवान’ आलोचक के रूप में स्थापित रामविलास जी की सौम्य छवि सभी आक्षेपों को निर्मूल करने में सक्षम रही। उनका अनौपचारिक पहनावा, उठना-बैठना हम समय-बेसमय आने वालों को पीरहरन का निमंत्रण देता रहता था और भाभीजी के सुस्वादु व्यंजन क्षुधा-निवारण का। जीवन-संघर्ष बढ़ने, इप्टा की प्रवृत्तियों के फैलाव और संपर्क घट जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा। डॉ शर्मा और स्व. भाभीजी से इतना कुछ पा लिया है कि वह कभी चुकने वाला नहीं। 


(यह लेख इप्टा संवाद- 7, आगरा, 1985 में प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुति:सचिन श्रीवास्तव फिलहाल यहाँ से कट-कोपी-पेस्ट )
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