अर्चना ठाकुर की दो कवितायेँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

अर्चना ठाकुर की दो कवितायेँ

(1)
जब हर उम्मीद ,


     निराशा की दहलीज़ पर ,
     दम तोड़ती है ,
तब ,
फिर कोई दर्द की झाइयों से ,
     भरा सुस्त चेहरा ,
निरुत्साही आंखो में उम्मीद पाले ,
     रेत के घरोंदे सी ,
     आशा के साथ ,
कापँती देह साथ ,
     बोझ उठाए ,
बढ़ जाता है ,
एक नए काफिले की ओर ||
             
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(2)
मेरा मन बुझा बुझा सा रहता  है,
मेरा मन कभी अनबुझा  सा रहता है,
न कुछ सुनता है ,
न कुछ कहता है,
अपने में गुम रहता है, 
    मेरा मन बादलो सा घुमड़ता रहता है,
    न खिलता  है,
    न बरसता है
    अपने में सहमा  रहता है,
मेरा मन वृक्ष  सा तना रहता है,
न पतों  सा सूखता है,
न फूलों सा खिलता है,
अपने में सिमटा रहता है,
     मेरा मन ख्वाबो में चलता है,
     न प्रेमी सा मिलता है,
     न हरजाई सा बिछुरता है,
     अपने मे मचला रहता है,
मेरा मन हवाओ संग दौड़ता है ,
न बूंदों सा बरसता है ,
न कोहासे सा उतरता है ,
अपने में घुला मिला रहता है ,
      मेरा  मन बुझा बुझा सा रहता है,
       मेरा  मन अनबुझा सा रहता है....।
                    
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जन्म : 05 मार्च, 1980
जन्म स्थान : कानपुर(उत्तर प्रदेश)
शिक्षा : मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि,परामर्श में डिप्लोमा,एम0 फिल  (मनोविज्ञान)
प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथा  आदि का प्रकाशन
सम्पर्क :  अर्चना ठाकुर, तेजपुर ,सोनित पुर जिला ,आसाम
             arch .thakur30 @gmail .com
            archana.thakur.182@facebook.com

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