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मनमोहन कसाना की कवितायेँ जिन्हें पकना बाकी है

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अक्तूबर 23, 2012 | मंगलवार, अक्तूबर 23, 2012



मनमोहन कसाना
(युवा हैं। उत्साही हैं। भरतपुर, राजस्थान की वैर तहसील के जगजीवनपुर गाँव में रहते हैं। अपने शुरुआती सफ़र में बहुत पत्र-पत्रिका में छप चुके हैं। उनके अच्छे भविष्य की कामनाएं।) 
मो-09672281281,9214281281



उत्पात

आज गली में
भारी उत्पात हुआ
परिणाम में
न्याय कोने में बने
सार्वजनिक पेशाबघर में
छिपकर सिसक रहा था
क्योंकि ...............................
बाहर कानून जो
खुले आम गुनहगारों के साथ मिलकर
लाठियां भांज रहा था ।


किसान और बरसात

1
बाछें खिल गई हैं
हरेक उस की,
जो खेतों में,
गाता और काम करता है,
क्योंकि..........................
मावट जो पड़ गई है।

2.
मुहं लटक गये हैं,
हिम्मत हार गये हैं,
वो जो खेतों में,
गाते और काम करते हैं,
क्योकि................................
पकी-खडी फसल पर
औलों के साथ-
बरसात जो पड़ गई है।

3.

आपा-धापी मच रही है,
हर तरफ भागदौड़
बादल झुके हैं,
बरसात न हो जाये,
इसलिए किसान भाग रहे हैं,
क्योंकि ...............................
अभी खेत तैयार करने हैं,
और खलिहान जो उठाने हैं।।

बोहनी!

1.
सुबह-सुबह गणेश जी की मूर्ति को,
(भगवान कोई भी हो सकता है)
पहली ब्रिकी का नोट छुआता है
और फिर
माथे से लगाता है बनिया।

2.
बूट पॉलिस वाला लड़का भी,
2 रु का सिक्का हर बार,
माथे से लगाता है और सोचता है
कि जल्दी से कोई दूसरा आये,
जिससे घर के खाने की व्यवस्था हो सके,
क्योंकि
घर उसके अलावा बूढे मां-बाप
उसका इंतजार कर रहे हैं।

3.
100 का नोट तो,
चमेली बाई भी तख्त के उपर वाले
(मुन्नी व शीला बाई भी हो  सकती हैं)
आरे में रखी मूर्ति के सामने पटकती है
जैसे
कमरे में मूर्ति रख के भगवान पर
मेहरवानी कर दी हो।


4.
ताउ(किसान) भी पहली बार,
फसल कुटने से पहले ही,
मेहत्तररानी को हिस्सा देकर,
भगवान से कहता है,
हे भगवान! बोहनी तो हुई,
इसीप्रकार
सबके हिस्से/कर्ज चुकवा देना
अबकी बार।

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लोकतंत्र

लोकतंत्र
उनके लिए धंधा है.
जिसमें वो राजा हैं
और हम प्रजा हैं
लेकिन
लोकतंत्र
हमारे लिए
आत्मा है देश की.
जिसमें
आजकल हम सभी
घुट घुट कर जी रहे हैं
और
हम वोट देते हैं
पर
प्रत्याक्षी उन्ही के होते हैं
हमारा तो बस देश है
जिसको वो
कम्पनी की तरह चला रहे हैं।
    

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                वो मेरे गले नहीं मिलता....

खुश तो मैं भी हुआ था
जब भी
तब वह पहली बार
उसकी कोख में आया था
और
मै तब भी खुश हुआ था
जब वह पहली बार माँ बोला था
और
आज भी मैं खुश  हुआ
जब वह  पहली बार
एक ईनाम जीत कर लाया था
लेकिन
एक हमारी वो हैं जो कहती है
कि मै उसे प्यार नहीं करता।
क्या पता उसे कि-
जब  वह सो जाती थी
तब मैंने कितनी बार उसको चूमा था
और कितनी बार
रात में सोते समय उसकी नेपकीन बदली थी
इसलिए कहीं वह गीले से जाग नहीं जाये।
लेकिन मैं खुश हो लेता हू।
अब भी जब वो दोनों गले मिलते हैं
पता नहीं क्यों ?
वो मेरे गले नहीं लगता।।
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कपड़े काले

आजकल
मैं पहनता हूँ 
कपड़े काले
                          क्योंकि.........
सफेद को तो
सफेदपोशों ने
बदनाम
जो कर दिया है
सो भला है उससे
यह अपना काला
                         क्योंकि.........
इसमें दाग का
जो डर नहीं है
लग न जाये कहीं
चलते-चलते दाग
इन गंदी गलियों में,
जहां सिर्फ
जुगाड़ और आरक्षण
नाम की सिफारिश चलती है
और
उडती हैं छीटें भ्रष्ट्राचार की।।
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