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नवरात्रि पर मनीषा कुलश्रेष्ठ की एक कविता

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अक्तूबर 16, 2012 | मंगलवार, अक्तूबर 16, 2012

नवरात्रि पर 
अपने ढंग से मनीषा कुलश्रेष्ठ
का ये कविताना अंदाज़ 
प्रस्तुत कर रहे हैं 
जो उन्होंने फेसबुक पर साझा किया था। 
ऐसा लगता है 
ये रचना उनके चित्तौड़ प्रवास पर 
दुर्ग चित्तौड़ पर स्थित कालिका मंदिर 
के बिम्ब को 
साकार करती हुए लगती है।
गहरे अर्थों में ये रचना बहुत सी बुराइयों 
पर चोट करती हुयी प्रतीत होती हैं। 
वहीं यहाँ रचनाकार का 
आस्थावादी रुझान भी साफ़ झलकता है।
-सम्पादक 

काली तुम मेरा भय हो
आस्था भी
बचपन के दु:स्वप्नों में
ख़ामोश किले के बुर्ज पर
एक काली शिला पर 

उदास बैठे देखा है तुम्हें
तुम शायद ही कभी मुस्काईं
करती रही रखवाली मेरी नींद की
तब तक कि
जब तक
मैं रजस्वला हुई
उसके बाद मेरे भीतर जागी थीं तुम
उस पहले पल में
जब देह पर पड़ी पहली बुरी नज़र
मेरी चोटी खुली थी और आँखें लाल

बहुत सुनी थीं किंवदंतियाँ
चढ़ाते थे बलि और शराब जोगी और सिद्ध
फहरती रही लाल पताका
तुम उदास बनी रहीं
तुम उन सब की उदासी पहने थीं
जिन्हें मैं जानती थी
जिन्हें समाज कहता था
काली, कल्लो, काली माई !
तुम उन अँधेरों को पहने रहीं
जिन अँधेरों में उबलता था गुस्सा
खून भरे खप्पर में

और एक दिन
सौंप कर मुझे मुझ को
उठा कर खून भरा खप्पर और कटार
अपनी उदास साँवली - ताम्बई देह पर
भस्म मल चली गईं थीं तुम
शव पर आरूढ़
विदा के पलों में भी नहीं मुस्कुराईं थीं तुम
हाथ रखा था अपना संवलाया - सुर्ख
मेरी कोख पर और कुछ बुदबुदाईं थीं

आज याद कर रही हूँ तुम्हें श्यामा !
अँधेरे में तुम्हारी विद्युतलता सी आँखें
अपनी ही कोख के भीतर उतर
याद करने की कोशिश कर रही हूँ
वह मंत्र और ढूँढ रही हूँ
वह काली शिला
और अभिमंत्रित तलवार !
.............ईशानी च भुजौ रक्षेत्, कुक्षौ नाभिं च कालिका।








का एक परिचय 
  • जन्म : 26 अगस्त 1967, जोधपुर
  • बी.एससी., एम. ए. (हिन्दी साहित्य), एम. फिल., विशारद ( कथक)
  • प्रकाशित कृतियाँ –
        • कहानी संग्रह - कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, बौनी होती परछांई,
    • केयर ऑफ स्वात घाटी (संग्रह शीघ्र प्रकाश्य),
    • उपन्यास-  शिगाफ़ ( कश्मीर पर),  ‘शालभंजिका’
    • नया ज्ञानोदय में इंटरनेट और हिन्दी पर लिखी लेखमाला की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य.
  • अनुवाद – माया एँजलू की आत्मकथा ‘ वाय केज्ड बर्ड सिंग’ के अंश, लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास ‘हाउस मेड ऑफ डॉन’ के अंश, बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद
  • अन्य : हिन्दीनेस्ट के अलावा, वर्धा विश्वविद्यालय की वेबसाईट ‘हिन्दी समय. कॉम’ का निर्माण, संगमन की वेबसाईट ‘संगमन डॉट कॉम’ का निर्माण व देखरेख.
  • पुरस्कार व सम्मान फैलोशिप :  चन्द्रदेव शर्मा नवोदित प्रतिभा पुरस्कार – वर्ष 1989 ( रा. साहित्य अकादमी),
    • कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप – 2007,
    • डॉ. घासीराम वर्मा सम्मान – वर्ष 2009
  • रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष 2010 ( राजस्थान साहित्य अकादमी),
    • कृष्णप्रताप कथा सम्मान – 2012 ,
  • हायडलबर्ग जर्मनी के साउथ ऎशियन इंस्टीट्यूट में ‘शिगाफ’ का वाचन. 
  • विश्व हिन्दी सम्मेलन 2012 जोहानसबर्ग में भागीदारी 
  • संप्रति – स्वतंत्र लेखन और इंटरनेट की पहली हिन्दी वेबपत्रिका ‘हिन्दीनेस्ट’ का 12 वर्षों से संपादन.
  • ई – पता – manishakuls@gmail.com
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