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'' सिर्फ दलित ही नहीं आदिवासी, अल्पसंख्यक और वंचित समुदाय भारतीय सिनेमा से लगभग गायब हैं ''-संजय जोशी

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 28, 2012 | रविवार, अक्तूबर 28, 2012


लखनऊ फिल्म समारोह इस आहवान के साथ समाप्त
‘बोलो कुछ करना है या काला शरबत पीते पीते मरना है’

लखनऊ, 28 अक्टूबर। 
जन संस्कृति मंच व लखनऊ फिल्म सोसायटी की ओर से आयोजित लखनऊ फिल्म फेस्टिवल के दूसरे व अंतिम दिन कल ऐसी फिल्मों का प्रदर्शन हुआ जो एक तरफ राज्य दमन को सामने लाती है तो वहीं इसके विरुद्ध जनप्रतिरोध को अभिव्यक्त करती हैं। इस समारोह का समापन वीरेन डंगवाल के इस गीत से हुआ कि ‘बोलो कुछ करना है या काला शरबत पीते पीते मरना है।’ यह गीत पटना से आई हिरावल ने पेश किया। इस दिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस की त्रासदी, वनटांगियों के शोषण, दमन पर बनी डाक्यूमेंटरी फिल्में तथा बथानी टोला नरसंहार पर कुमुद रंजन की वीडियो रिपोर्ट दिखाई गई। इसके अलावा खाप पंचायतों के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करने वाली नकुल स्वाने की महत्वपूर्ण डाक्यूमेंटरी ‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां’ भी दिखाई गई।

दूसरे दिन फिल्म समारोह की शुरूआत मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे की कालजयी फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ से हुई। इस फिल्म के बाद तराई के जंगलों में रहने वाले वनटांगियों के संघर्ष पर बनी धीरज सार्थक और आशीष कुमार सिंह की फिल्म ‘बिटवीन द ट्रीज’ दिखाई गई। यह डाक्यमेंटरी दिखती है कि किस तरह अंग्रेजी सरकार द्वारा साखू के जंगल तैयार करने के लिए बड़ी संख्या में गरीब मजदूरों को जंगल में लाया गया और उन्हें बंधुआ बनाकर काम लिया गया। आजादी के बाद भी वनटांगियों की स्थिति में कोई फर्क नहीं आया और उनका शोषण बदस्तूर जारी है। यही कारण है कि वनटांगिया आजाद भारत में अपने को आज भी गुलाम मानते हैं।

शाम के सत्र में नकुल स्वाने की फिल्म ‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां’ दिखाई गईं। इस डाक्यूमेंटरी का परिचय पीयूसीएल की सचिव बंदना मिश्र ने दिया। यह फिल्म खाप पंचायतों द्वारा सगोत्रीय विवाह, प्रेम विवाह और लड़कियों की शिक्षा के प्रति तालिबानी सोच और उसके कारणों की पड़ताल करते हुए इसके खिलाफ महिलाओं, लड़कियों के बहादुरी भरे संघर्ष को समाने लाती है। इस मौके पर मौजूद नकुल स्वाने ने दर्शकों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि खाप पंचायातों को दलितों और महिलाओं से जबर्दस्त चुनौती मिल रही है। इसलिए वे और ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं। खाप पंचायतों की इस सामंती और दकियानूसी सोच को जानने के लिए समाज में आ रहे परिवर्तनों को समझना बेहद जरूरी है।

फेस्टिवल के अंतिम सत्र में गोरखपुर फिल्म सोसाइटी और द ग्रुप-जन संस्कृति मंच द्वारा पूर्वी उत्तर प्रदेश की इंसेफेलाइटिस की त्रासदी पर बनाई गई डाक्यूमेंटरी खामोशी दिखाई गई। यह डाक्यूमेंटरी इंसेफेलाइटिस से मर रहे और विकलांग हो रहे बच्चों के परिवारों की मार्मिक दास्तान है। गोरखपुर फिल्म सोसाइटी के संयोजक मनोज कुमार सिंह ने दर्शको से बातचीत करते हुए बताया कि अभी इस डाक्यूमेंटरी का एक ही भाग बना है। दूसरे भाग में इसंफेलाइटिस के खात्मे में बरती गई सरकारी की आपराधिक लापरवाही का खुलासा किया जाएगा। फेस्टिवल के दूसरे दिन सुबह और शाम के सत्र में पटना से आई हिरावल की टीम ने गोरख पांडेय, दिनेश कुमार शुक्ल, वीरेन डंगवाल, प्रकाश उदय सहित कई कवियों की कविताओं की शानदार सांगीतिक 

’भारतीय सिनेमा के सौ साल पर हुआ परिसंवाद

प्रो जवरीमल्ल पारख ने भारतीय सिनेमा के सौ साल पर बोलते हुए कहा कि हिन्दी फीचर फिल्मों पर पारसी थियेटर का बहुत प्रभाव रहा है। फीचर फिल्मों में पारसी थियेटर की तरह ही नृत्य, गीत, मेलेड्रामा का खूब प्रयोग होता रहा है। शुरूआत में बनी अधिकतर फिल्में पौराणिक और जादुई यर्थाथ व प्रेम कहानियों पर आधारित थी इसके बावजूद इन फिल्मों में धार्मिकता और रूढिवाद पर बल नहीं दिया गया। मनोरंजन की दृष्टि से फिल्में बन रही थीं पर सामाजिक विषयों का भी ध्यान रखा गया। जाति प्रथा का विरोध करने वाले संतों पर कई फिल्में बनीं। देश में वामपंथ के उदय का प्रभाव भारतीय फिल्मकारों पर भी पड़ा और किसानों, मजदूरों के ’शोषण व समस्याओं पर फिल्में बनीं। 

प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा से जुड़े कलाकारों, लेखकों ने कई फिल्मों में न केवल अभिनय किया बल्कि कहानी, स्क्रिप्ट लिखे। धरती के लाल और नीचा नगर इसका उदाहरण है। हिन्दुस्तानी सिनेमा को प्रगतिशील आंदोलन ने खूब प्रभावित किया। यह जरूर है कि भारतीय सिनेमा कभी भी क्रान्तिकारी नहीं रहा लेकिन बेहतर समाज और सौहाद्र बनाने में उसका योगदान है। उन्होंने कहा कि कैमरे के उपयोग ने सिनेमा की दुनिया में बहुत बदलाव किया है। प्रो पारख ने कहा कि आज का सिनेमा पूरी तरह बाजार की गिरफ्त में है और लोकप्रियता इसका एक अनिवार्य तत्व बन गया है।

नाटककार राजेश कुमार ने अपने वक्तव्य में भारतीय सिनेमा में दलित चरित्रों के निरूपण और दलितों व उनकी समस्याओं पर बनी फिल्मों के कथानक पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अधिकतर फिल्मकारों ने जानबूझ कर दलितों के रेडिकल सवालों को नजरअंदाज किया और एक सुविधाजनक रास्ता चुना। फिल्मकार एवं ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी ने कहा कि सिर्फ दलित ही नहीं आदिवासी, अल्पसंख्यक और वंचित समुदाय भारतीय सिनेमा से लगभग गायब हैं लेकिन डाक्यूमेंटरी सिनेमा में ऐसा नहीं है। कई फिल्मकार सीमित सुविधाओं में दलितों, आदिवासियों, मजदूरों पर बेहतरीन डाक्यूमेंटरी बना रहे हैं और अपनी इन फिल्मों के जरिए कार्पोरेट, मीडिया, सत्ता के गठजोड़ से प्राकृतिक संसाधनों के लूट, जनता के शोषण और दमन को सामने ला रहे हैं।


समीक्षक 
जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227


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