प्रेमचंद गांधी द्वारा अनुदित कविताओं की दूसरी खेप - अपनी माटी

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प्रेमचंद गांधी द्वारा अनुदित कविताओं की दूसरी खेप






हिन्दीजगत के युवा रचनाकारों की जमात में अच्छा खासा नाम रखते है।
देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं.इनका एक ब्लॉग है।
'कुरजां' पत्रिका के सम्पादक हैं. मूल रूप से कवि है।
कविता संग्रह 'इस सिंफनी में', निबंध संग्रह 'संस्कृति का समकाल' प्रकाशित।
जानेमाने स्तंभकार, कुरजां जैसी पत्रिका के प्रवेशांक से ही चर्चा में हैं। 
लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई और राजेन्द्र बोहरा सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। साहित्य के साथ ही सिनेमा में भे लेखनगत रूचि है।
कुछ समय से  'हे मेरी तमहारिणी'  श्रृंखला से कवितायेँ लिखी है।


मो 09829190626,



(ये कवितायेँ सीधे सवाल बनती हुयी लगती है। 
जिन विषयों को हमारे कथित प्रगतिशील समाज में आज भी
 'गंदे' विषय करार दिया जाता है 
उन्हें ही बेबाकी से इन कविताओं में उठाया गया है। 
सार्थक रचनाओं का यथोचित अनुवाद करने के लिए 
पाठक समाज की तरफ से 
प्रेम चंद गांधी को शुक्रिया।-सम्पादक)


(1)


गर्भपात
......
‘’क्या था तुम्हारे पेट में?’’
मेरी मां की सवालिया आंखें
नासमझी का आवरण ओढ़े
उबल पड़ती हैं
ठण्डी हवा खड़खड़ाती चली जाती है

इस बीच मैं अविचल खामोश खड़ी रहती हूं
धुले हुए गर्भाशय की दीवारों से जद्दोजहद करती
उस दर्द का वह फूला हुआ घाव सहते हुए
जो उसे देह से अलगाने के कारण लिपट गया दीवारों से

‘’यह ज़रूर ग़ैर यहूदी बच्चा रहा होगा
तुमने इसे इसीलिये छोड़ दिया ना कि
वो शख्स़ यहूदी नहीं था।‘’

मैं झुकते हुए हंसती हूं
आंसुओं से भरा विरोध जताते हुए

मेरी जिंदगी में किसी दूसरे के लिए कोई जगह नहीं
चाहे कोई कितना भी सुंदर क्यों ना हो
तुम जानती हो मां
मैं तो अभी शुरुआत कर रही हूं
जागने की
खुशियों की एक नई भोर लाने की
मेरी अपनी बच्चों जैसी हंसी पाने की
जिसे तुम या कोई नहीं छीन सकता मुझसे
अब चाहे तुम कितनी भी त्यौंरियां चढ़ा लो।



*नीना सिल्वर *


(2)

‘’हर दिन तुम उसे भरती हो
अपनी रूह के असबाब से
जैसे कोई घड़ा’’ – सिल्विया प्लाथ
***
रात का खाना एक कुरबानी है
बासी खाना और करीने से सजी मेज
जैसे ही वह उंडेलता है उसमें अपने दुख
वह इस कदर भर जाती है दुखों से कि
बमुश्किल हिल-डुल पाती है

फिर भी वह हर शाम उसे अपनी ही तरह अपनाती है
सूप और सलाद के दौरान
सुकून का जाम सजाने के बीच
उसके गिलास में ताकत भरते हुए
ख़ुद का गिलास उसका खाली ही रहता है

इसमें कुछ भी नया अथवा असामान्य नहीं है
उसकी मां और दादी ने भी यही सब किया होगा

मैं खुली आंखों से दुनिया देखने वाली
ग़ौर से देखती हूं यह सब
और प्रतिज्ञा करती हूं कि
जब मैं गिलास भरने लायक बड़ी होउंगी
तो सिर्फ एक गिलास होगा और
वो होगा मेरा अपना केवल...

*स्टीफनी हैरिस की कविता *




(3)
जननी 
-
-------
‘’दूधों नहाओ और पूतों फलो !’’
सेब और सांपों की चमकदार जगहों में 
बुदबुदाती-गूंजती है यही आवाज़ 

‘’क्या तुम्हारा परिवार है ‘’ 
अजनबी पूछते हैं ऐसे 
जैसे एक बच्चा‍ ही इकलौता फल है 
मेरे जैसी उम्र की एक स्त्री के लिए
और संभावित प्रसवन-शक्ति ही
दुनिया के लिए उसका आखि़री विश्वास है

जैसे-जैसे मेरे जन्मवदिन चालीस की ओर लपकते हैं
मेरे भीतर हर मौसम में परिवार और
उसके गुणसूत्र नाचते रहते हैं लेकिन
एक छोटे और जिद्दी शिशु की परवरिश के लिए
मैं सुबह चार बजे नहीं उठ जाती हूं

जब मैं गीत लिखने लगती हूं
गर्भावस्था के सपने देखने लगती हूं
प्रेरणाओं से भरा फूला हुआ पेट
जो पैदा करता है स्वर और शब्दों को
मेरे दिल के बाहर निकाल फेंकता हुआ
चीख कर उन्हें अपनी ही जिंदगी देता हुआ

अब मैं कविताएं करती हूं
मैं गूंजते व्यंजनों से
बेतरह भर दूंगी इस दुनिया को,
मैं ख़तरों से अंजान लोगों की देहरियों पर
रक्तिम छवियां और विलाप करते शब्द छोड़ जाउंगी
मैं बेशर्म दुस्साहसिकता की मांस-मज्जा
और उम्मीद की अस्थियों से भर देने वाली
रातों के रूपक पैदा कर छोड़ जाउंगी।

* पॉला अमान *



(4)
अपनी आखिरी माहवारी के लिए 
------------
अच्छा लड़की अलविदा 
अड़तीस बरस बाद आखिर अलविदा 
इन बीते अड़तीस बरसों में 
तुम कभी नहीं आई मेरे लिए 
परेशानियों के बिना 
अपनी शानदार लाल पोशाक में
कहीं भी किसी भी तरह 

अब आखिर यह विदाई हो चुकी है
मैं उस दादी मां की तरह महसूस कर रही हूं जो
बदचलन कहे जाने वाली लड़की के दिन गुज़र जाने के बाद
हाथों मे अपनी तस्वीर लिये बैठी है
और आहें भर रही है कि
क्या वह सुंदर नहीं थी...
क्या वह खूबसूरत नहीं थी

*लूसिलै क्लिफ्टन*


(5)
अपने गर्भाशय के लिए कविता ........ 
अरे गर्भाशय तुम 
तुम तो बहुत ही सहनशील रहे हो 
जैसे कोई ज़ुराब

जबकि मैं ही तुम्हारे भीतर सरकाती रही
अपने जीवित और मृत शिशु
अब वे ही काट फेंकना चाहते हैं तुम्हें

जहां मैं जा रही हूं वहां
अब मुझे लम्बी जुराबों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी
कहां जा रही हूं मैं बुढ़ाती हुई लड़की
तुम्हारे बिना मेरे गर्भाशय
ओ मेरी रक्तरंजित पहचान
मेरी एस्ट्रोजन रसोई
मेरी कामनाओं के काले झोले

मैं कहां जा सकती हूं
तुम्हारे बिना
नंगे पांव और
कहां जा सकते हो तुम
मेरे बिना

*लूसिलै क्लिफ्टन* 

1 टिप्पणी:

मुलाक़ात विद माणिक


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