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''कुमार अम्‍बुज की कविता,सोचती हुई कविता है।''-डॉ.ओम निश्चल

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अक्तूबर 25, 2012 | गुरुवार, अक्तूबर 25, 2012


  •  डॉ ओम निश्‍चल का आलेख











अमीरा रेखा
कुमार अम्‍बुज
नई दिल्‍ली-110059,
मूल्‍य 150 रुपये
(यह अंश 'तद्भव' के अंक 

अक्टूबर2012 में किंचित संपादित रूप में छपा है। 

पाठकों के लिए 

अपनी माटी द्वारा 

इस कलेवर में फिर प्रस्‍तुत है। हम अखिलेश जी के संपादकत्व में प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका

'तद्भव' और ओम निश्‍चल के आभारी तो हैं ही। साथ ही

युवा कवि अरुण देव के निर्देशन में प्रकाशित 

समालोचन जैसी वेब पत्रिका के आभारी है जहां ये समीक्षात्मक आलेख पहले छप चुका है उस पर

फेसबुकी बहस भी बहुत हद तक आगे बढ़ी है।-

सम्पादक)  




       
इस निर्माण में शामिल है हमारी भी कुछ मिट्टी
       रात के सिरहाने अपना पुराना कंबल रखते हुए
       कवि कहता है 
      इस दुनिया का मैं भी छोटा सा कारीगर हूँ
      मेरे पास भी एक रंदा है, एक छैनी, एक फावड़ा
      लेकिन तुम अपने मुखौटों की छीलन देखते हो
      और उन्‍हें इज्‍जत की एक रोटी भी नहीं देते।' 

हमारे समय के महत्‍वपूर्ण कवि कुमार अम्‍बुज की हाल में  ही आई किताब 'अमीरी रेखा'  की 'पूर्वजों की लिपि' शीर्षक कविता की ये पंक्‍तियॉं इस बात की साखी हैं कि इस देश के निर्माण में लगे कारीगरों,मजदूरों, किसानों,कलाकारों, कवियों की आज कोई हैसियत नहीं है। सारी की सारी व्‍यवस्‍था इस मुहिम पर लगी है कि कैसे इनकी जुबान बंद की जाए। उसके लेखे, देश का नव निर्माण तो वे लोग कर रहे हैं जो किसानों की जोत को औने पौने दामों खरीद कर लोगों की रिहाइश के नाम पर इनकी रोजी रोटी छीन रहे हैं।    'कहीं कोई ज़मीन नहीं' कविता बिल्‍डरों की इन्‍हीं कारगुजारियों पर केंद्रित है :  

'फसलें जला दी गयी हैं /
सल्‍फास खा चुके हैं किसान/
और बचे खुचे लोग बिल्‍डरों से ही रोजी मॉंग रहे हैं/
पृथ्‍वी बिल्‍डर की डायनिंग टेबल पर रखा एक अधखाया फल।'

इन दो उदाहरणों से यह बात साबित हो जाती है कि अब 'गरीबी रेखा' पर बहसें बहुत हो चुकीं, यह अमीरों के बारे में सोचने का दौर है और आज वही चल रहा है : गरीबी उन्‍मूलन के नाम  पर गरीबों का उन्‍मूलन। आज हालात ये हैं कि किसानों को खेती की लागत भी वसूल नहीं हो पा रही, बुनकरों के हथकरघे ठप हैं, कारपोरेट घरानों के सामानों की कीमत पहुँच से बाहर है और बिल्‍डरों की निगाह किसानों की ज़मीन पर है। लिहाजा किसानों के पास सल्‍फास खाकर आत्‍महत्‍या करने के अलावा क्‍या विकल्‍प बचा है ?

किवाड़’, ‘क्रूरता’, ‘अनंतिमऔरअतिक्रमणके बादअमीरी रेखाका प्रकाशन वास्तव में हमारे समय के निरंतर स्खलित होते मान-मूल्यों की पड़ताल करती कविता का पुनर्भव है। हमेशा से जिरह और संवेदना के नाजुक तारों को मिलाती हुई कुमार अम्बुज की कवि मनुष्यता के उत्तरोत्तर अधोपतन से लेकर राजनीतिक और नैतिक उच्चादर्शों के भीतरी विचलनों पर एक कवि के अचूक अवलोकनों का साक्ष उपलब्ध कराती है। 'अमीरी रेखा' के बहाने वैभव और ऐश्वर्य के स्रोतों पर काबिज धनाढ्यों की हृदयहीनता पर सवाल उठाते हुए कवि का यह कहना कि :

 'तुम्हें यह देखने के लिए जीवित रहना पड़ सकता है /
कि सिर्फ अपनी जान बचाने की खातिर/
तुम कितनी तरह का जीवन जी सकते हो'

आज के समय का एक अबोला यथार्थ है।विडंबना है कि गये बरसों में हमारे देश में 'गरीबी-रेखा' पर तमाम बहसें हुई हैं और आज भी चल रही हैं लेकिन 'अमीरी रेखा' पर कोई बहस आज तक नहीं हुई। अमीरी रेखा पर कोई लगाम नही है। कौन नहीं जानता कि जिन लोगों की मेहनत और काबिलियत से अमीरी का सूचकांक उत्तरोत्तर बढ़ा है, उन्हें रोटी तो क्या, नमक भी ठीक से नसीब नहीं है। इसीलिए जब सत्ता के नियामक बत्तीस  रुपये में भरपेट भोजन की उपलब्धता का शंखनाद करते हैं तो यह प्रसंग साहिर की शायरी 'हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक' की तरह हास्यास्पद  और मर्मभेदी हो उठता है। 


कुमार अबुज जी 
आज कमाई के स्रोतों को कुछ कारपोरेट घरानों, बिल्‍डरों, ठेकेदारों, बिचौलियों के हवाले करने और जरूरी मदों के लिए दी जाने वाली सब्‍सिडी खत्‍म किए जाने की जो राजनीतिक कवायद चल रही है, उससे अचरज नहीं कि विदर्भ के किसानों की तरह आम आदमी, मजदूरों,कारीगरों के लिए एक दिन आत्‍महत्‍या के अलावा रास्‍ता न बचे। इस घनीभूत पीड़ा को हृदयहीन राजनीतिज्ञ नहीं, अर्थशास्‍त्री और समाजशास्‍त्री भी नहीं, केवल कवि ही समझता है। वह राजनीतिज्ञों की  तरह जनता से दूर नहीं, बल्‍कि उसके सुख-दुख से उसका गहरा वास्‍ता है। वही सबसे ज्‍यादा जानता है कि 'हर चीज का उत्‍तर फूल नही हो सकते हालॉंकि वे खूबसूरत हैं और यहीं पास में उगे हुए हैं।' वह  यह कहने में नहीं चूकता कि :



'अगर हमारे जीवन में जोखिम नहीं/
तो तय है वह हमारे बच्‍चों के जीवन में होगा/
सिर्फ संपत्‍तियॉं उत्‍तराधिकार में नहीं मिलेंगी/
गलतियों का हिसाब भी हिस्‍से में आएगा' 

(रचनाप्रक्रिया,पृष्‍ठ 17)। 

कुमार अम्‍बुज की कविता में चीख नहीं, आत्‍मा के सबसे गहरे तलघर की

पुकार सुनायी देती है। यह और बात है कि वे लिखते हैं : 'जीवन में अगर चीख है तो क्‍या बुरा है 

कि वह कविता में सुनायी दे।'

अरुण कमल कहते हैं, 'ऐसे समय जब देश में पूँजी का कोई वास्‍तविक विपक्ष बचे ही नहीं, कविता जीवन का अंतिम मोर्चा , अंतिम चौकी है।' कुमार अम्‍बुज की कविता यही  काम करती है। वह पूँजी के प्रभुत्‍व से आतंकित नही होती। वह हत्‍यारों को हमेशा सवालों की नोक पर रखती है और मनुष्‍य की कोमल इच्‍छाओं पर कुंडली मार कर बैठी ताकतों  से यह कहती है कि : 'मुझे हमेशा हक चाहिए, मुआवजे नहीं।' उसे पता है धर्म की पताका फहराने वालों को मेहनतकश, किसान, मजदूर, कामगार नही दिखते, जो अपना हिंदू-मुसलमान होना भूल कर जीवन की चक्‍की में जुते हैं। उन्हें कहॉं फुर्सत कि वे धर्म के नाम पर लामबंद हों, वे तो हारी-उधारी में पड़े ठंडे फर्श पर पड़े निरगुनिया गाते गाते सो जाते हैं। कुमार अम्‍बुज जानते हैं कि चीजों को देखने का नजरिया काफी बदल चुका है। हमारे लिए जो सुंदर और सराह्य है, वह  किसी और के द्वारा वेध्‍य भी है। 'सब तुम्‍हें  नही  कर सकते प्‍यार' में कुमार यही तो  कहते हैं-- 

'जीवन में तुम  रंगीन चिड़िया की तरफ देखो/
जो किसी का मन मोह लेती है/
और ठीक उसी वक्‍त /
एक दूसरा उसे देखता है/

शिकार की  तरह' यानी सारी की सारी सुंदर चीजों को हम लगातार नष्‍ट होते हुए देख रहे हैं। एक वक्‍त सोने की चिड़िया कहे जाने वाले इस देश पर भी क्‍या शिकारियों की निगाह नहीं है ?अम्‍बुज अपने तल्‍ख और तार्किक तेवर के अलावा कुछ भिन्‍न मिजाज की कविताऍं भी लिखते हैं।  मसलन, 'स्‍वांत: सुखाय' जिसे हम लगभग एक अहिंसक किस्‍म के विशेषण के रूप में इस्‍तेमाल करते आए हैं, अम्‍बुज उसके दूसरे पहलू को सामने लाते हैं। यानी जिसमें केवल अपना ही सुख साध्‍य हो, ऐसा कृत्‍य स्‍वांत:सुखाय की श्रेणी में आता है। बकौल कवि:

'जो स्‍वांत:सुखाय था/
उसकी सबसे बड़ी कमी यह नही थी/
कि उसे दूसरों के सुख की कोई फिक्र न थी/
बल्‍कि यह थी कि वह अक्‍सर ही/
दूसरों के सुख को /
निगलता हुआ चला जाता था'

(स्‍वांत:सुखाय,पृष्‍ठ31) 

अम्‍बुज की कविता में यह खासियत है कि वह हमेशा चीजों को उनके नए आयाम में देखती है, हमें नए अनुभव से सम्‍पन्‍न करती है। 'पियानो' को ही लें तो कवि उसे भिन्‍न रूप में देखता है। वे कहते हैं पियानो उस राजा की तरह है जो संगीत के पक्ष में अपना राजपाट ठुकरा कर यहॉं आ गया है-- और उसकी यह जो धीर-गंभीर आवाज़ है वह भीतर के चिंघाड़, विलाप और क्रोध की सांगीतिक परिणति है। पर पियानो को साध सकना आसान नहीं। कवि के लेखे: '

उसके संगीत को वही जगा सकता है/
जिसे कुछ अंदाजा हो जीवन की मुश्‍किलों का/
जो रात का गाढ़ापन, तारों की झिलमिल/
और चाँद का एकांत याद रखता है'

(-पियानो 79)। 

जाने अनजाने इस साध सकने की मुश्‍किल को हम एक कवि की रचनात्‍मक मुश्‍किलों के बरक्‍स रख कर भी देख सकते हैं। इनके अलावा, 'जिन्‍हें तुम धन्‍यवाद देना चाहते हो', 'तानाशाह की पत्रकार वार्ता','पत्‍थर हूँ', 'शरणस्‍थली और कत्‍लगाह', 'हासिल', 'स्‍मरण', 'था बेसुरा लेकिन जीवन तो था', और 'बचाव' आदि तमाम कविताऍं अलग से ध्‍यान खींचने वाली कविताऍं हैं। पिताओं के बारे में अम्‍बुज की एक कविता अज्ञेय की पिता के बारे में ज़रा भिन्‍न तरीके से लिखी कविता की याद दिलाती है तो 'खाना बनाती स्‍त्रियॉं' पढ़ते हुए हरिओम राजोरिया की 'गाने वाली औरतें' और 'रुदन' कविता की अनायास याद हो आती है। जैसे खाना बनाने से स्‍त्री को मुक्‍ति नहीं, गाने और रोने से भी उसका शाश्‍वत रिश्‍ता है। 

अम्‍बुज राजोरिया के भावात्‍मक संसार से उठ कर तार्किक निष्‍कर्षों की परिणति तक जाते हैं।  'खाते पीते आदमियों का यकीन' कविता आश्‍चर्यजनक ढंग से गरीबों के बारे में बंद वातानुकूलित कमरों में चल रहे चिंतन की पोल खोलती है तो कभी कभी 'था बेसुरा लेकिन जीवन तो था' कविता पढ़ते हुए धनिये की खुशबू-भर से बेसुरेपन में भी जीवन का अहसास होता है। गरज यह कि अम्‍बुज की कविता जितना हमारे सामने खुलती है उतना ही वह अपना पट बंद भी रखती है। एक कविता में कवि जब कहता है कि 'मुझे खोलना उतना आसान नहीं, मैं इतना चुप जितना हजारों गम खाया इंसान', तो लगता है यह स्‍वयं कहीं न कहीं अम्‍बुज की कविता की खासियत भी है।

ये कविताऍं बताती है कि अम्‍बुज ने जीवन को बहुत करीब से देखा है। स्त्री पर बिना किसी अतिरिक्‍त चीख पुकार के उन्‍होंने जो कविता लिखी है वह 'स्त्री विमर्श' के मचान पर बैठे बिगुल बजाते विमर्शकारों से जयादा संजीदा है। अम्‍बुज ने ट्रेड यूनियन की लड़ाइयॉं भी लड़ी हैं और उसकी चुनौतियॉं भी झेली हैं किन्‍तु एक कामगार की-सी निष्‍कंप स्‍वाभिमानी चेतना से प्रतिश्रुत होते हुए दरबारे-खास में मत्था नही टेका। यही वजह है कि इन कविताओं में एक जुझारू कवि का आत्‍मसंघर्ष बोलता है। तानाशाह को लेकर हिंदी में कविता लिखने का खूब चलन रहा है। बहुत उबाऊ किस्‍म की बयानबाजी से लेकर जनवादी लटके झटकों वाली कविताओं तक--- किन्‍तु अम्बुज की 'तानाशाह की पत्रकार वार्ता'(पृष्‍ठ50) का मिजाज बिल्‍कुल अलग है। उसे हू बहू उद्धृत करना अम्‍बुज की उस हिकमत की थाह लेना है जो अभिधा की ताकत से पैदा हुई है:

      वह हत्‍या मानवता के लिए थी
      और यह सुंदरता के लिए
      वह हत्‍या अहिंसा के लिए थी
      और यह इस महाद्वीप में शांति के लिए
      वह हत्‍या अवज्ञाकारी नागरिक की थी
      और यह जरूरी थी हमारे आत्‍मविश्‍वास के लिए
      परसों की हत्‍या तो उसने खुद आमंत्रित की थी
      और आज सुबह आत्‍मरक्षा के लिए करनी पड़ी
      और यह अभी ठीक आपके सामने
      उदाहरण के लिए

कुमार अम्‍बुज की कविता सोचती हुई कविता है। वह हमारे समाज का जस का तस आईना नही है, वह उम्‍मीदों, प्रार्थनाओं और हताशाओं से बनी है । वह भाषा के फलदार वृक्ष के लिए उद्विग्‍न रहने वाली कविता है, जिसकी डालियॉं छूने भर से झुकने को आतुर दिखती हैं । उसके हृदय की अविरल गहराइयों में जंगल,नींद,तारे, सफलताओं, विफलताओं, सभी के लिए जगह है। वह बेजान चीजों से भी कुछ जरूरी कहने का रास्‍ता निकाल लेती है। गिरते उड़ते पत्‍ते, पत्‍थर हूँ, संग्रहालय, और 'राख' में उनकी यही कोशिश दिखती है।

सहनशीलता, कृतज्ञता, संस्‍कार, सभ्‍यता, स्‍मृति और मानव-स्‍वभाव की पेचीदगियों से अपनी इन सोचती हुई कविताओं के जरिए अम्‍बुज ने हिंदी के काव्‍यास्‍वाद को फिर एक नया उत्‍कर्ष दिया है और मुश्‍किलों में भी जीवन की खोज को वरीयता दी है। राजेश जोशी और मंगलेश डबराल की पीढ़ी के बाद के कवियों में कुमार अम्‍बुज ने न केवल अपनी पहचान निर्मित की है, बल्‍कि भाषा और शिल्‍प की सलवटों को बारीकी से सँवारा है। 'स्‍मरण' में वे कहते हैं: 'घोंघा भी चलता है तो रेत में, धूल में/उसका निशान बनता है/ फिर मैं तो एक मनुष्‍य हूँ।' हिंदी कविता को शाइस्‍तगी से आगे बढाते हुए वे वहॉं तक ले आए हैं जहॉं पहुँच कर खुद उनकी कविता यह याद दिलाना नही भूलती कि :
      इस निर्माण में शामिल है हमारी भी कुछ मिट्टी
      हमने भी डाला है कुछ पानी
      इस चेहरे के शिल्‍प में एक सलवट है
      हमारे चेहरे की भी।

समय के चेहरे की सलवटों को बारीकी से पढ़ने के लिए अम्‍बुज की कविता को अब एक बड़े मोड़ की जरूरत है।


समीक्षक  

बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,
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