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जाने कहाँ खो गयी रंगमंचीय कला रामलीला

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अक्तूबर 08, 2012 | सोमवार, अक्तूबर 08, 2012


 रमेश सर्राफ धमोरा

आम जन तक रामकथा को पहुंचाने की परम्परागत रंगमंचीय कला रामलीला शेखावाटी क्षेत्र से धीरे-धीरे लुप्त प्राय: होती जा रही हैं। इस क्षेत्र के देहाती इलाकों में रहने वाले रामलीला के परम्परागत दर्शक टेलीविजन वीडियो व सिनेमा जैसे माध्यमों को महत्व देने लगे हैं। धीरे-धीरे दम तोड़ रही रामलीला के कारण रामलीला मंडलियों में कार्य करने वाले कलाकार खिन्न होकर रामलीला के स्थान पर गांवो में भजन गायकी, खेत मजदुरी व विभिन्न संस्थानो में चौकीदारी, बस कन्डक्टरी जैसे कार्य करने लगे हैं। 

शेखावाटी क्षेत्र के सीकर व झुंझुनूं जिलों के गांवों में रामलीला मंडलियो द्वारा रामकथा की रामायण की चौपाईयों के साथ नाट्य प्रस्तुतियां की जाती हैं। रामलीला करने का सिलसिला क्षेत्र के गांवों में कस्बों व शहरों की तरह केवल दशहरा व दीपावली के दिनो में ही नही बल्कि साल भर चलता रहता हैं। एक दशक पूर्व तक शेखावाटी क्षेत्र में करीब 40 रामलीला मंडलियां होती थी। जिनमें हर मंडली में 15 से 20 कलाकार होते थे, मगर अब मात्र 8-10 मंडलियां ही रह गई हैं। जो धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है। 

इस क्षेत्र की रामलीला मंडलियों के कार्यक्रम वर्षात के मौसम को छोडक़र वर्ष भर चलते रहते हैं। ये मंडलियां एक गांव से दूसरे गांव अपने पूरे साजो सामान के साथ जाती रहती हैं। गांव के किसी सार्वजनिक चौक में दो-चार काठ से बने तख्ते रखकर रंगमंच तैयार करते हैं। रंगमंच के पिछे विभिन्न दृश्यों के परदे लगायें जातें हैं जो घटना क्रम के अनुसार बदलते रहतें हैं। रामलीला में इन पर्दों का बहुत महत्व रहता है। रामलीला मंचन के दौरान ही दर्शको से आरती की थाली में दक्षिणा ली जाती हैं। रामलीला मंडलियां एक गांव में दस से पन्द्रह दिनों तक ठहर कर अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं तथा लोगों से मिलने वाला चढ़ावा ही आय का मुख्य साधन होता है।  

एक दशक पहले तक रामलीला मंडलियों की प्रस्तुती का जादू लोगो के सिर चढकर बोला करता था। गांवो में लोग रामलीला मंडली का बेताबी से इंतजार किया करते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान इन गांवों में रामलीला के प्रति उत्साह में जबरदस्त गिरावट आई हैं। दूरदर्शन पर रामायण के प्रसारण को प्राय: सभी लोगों ने देखा हैं। इसलिए दूरदर्शन की चमक दमक के समक्ष गांवो में प्रस्तुत की जाने वाली रामलीला लोगों को अब अर्थहीन ‘ड्र्रामा ‘लगने लगी हैं।

झुंझुंनू जिले की पहली रामलीला झुंझुंनू शहर के गांधी चौक में 53 वर्षों पूर्व राम का अभिनय करने वाले मांगीलाल महमिया कहते हैं कि पहले लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन रामलीलायें ही होती थी आज वो बात कहां। आज मनोरंजन के तरीके ही बदल गयें हैं। अपने पात्रों को सजीव दर्शानें के लिये पहले हम महिनों रिहर्सल किया करते थे आज इतना समय किसके पास है। वर्षों रामलीला में राम का अभिनय करने वाले संजय सैनी का कहना है कि दूरदर्शन पर रामलीला के प्रदर्शन के बाद से तो इन रामलीलाओं का क्रेज ही समाप्त हो गया है।

झुंझुनूं जिले के मानोता गांव के 50 वर्षीय भागीरथ रामलीला वाले ग्रामीण क्षेत्र में रामलीला के पितामह माने जाते हैं। विगत 35 वर्षो से अनवरत रामलीला कर रहें हैं। उनके दो भाई मदन व रामनिवास की रामलीला मंडलियां भी क्षेत्र में सक्रियता से कार्यरत हैं। इन तीनों भाइयों के अभिनय और काबलीयत को लोग दाद देते नही थकते थे । मगर भागीरथ अब रामलीला से खिन्न हैं। क्योंकि लोगों की आस्था रामलीला के प्रति तेजी से खत्म होती जा रही हैं। अब एक-एक पैसे के लिए लोगों को कहना पड़ता हैं पहले ऐसा नही था। पहले लोगों द्वारा रामलीला मंडलियों को अपने घरों पर बुलाकर बड़े प्रेम के साथ भोजन करवाया जाता था। भागीरथ नही चाहते कि उनकी अगली पीढियां रामलीला करें । उनका कहना है कि मुझे तो अब इस धंधे से घृणा होने लगती हैं। रामलीला के बहाने कुछ राम भक्ति हो जाती हैं। इस कारण यह कार्य कर रहा हूँ।

गुढागौडज़ी कस्बे के रामावतार शर्मा द्वारा रामलीला में हनुमानजी के पार्ट की सजीव प्रस्तुती की जाती थी। संजीवनी बूटी लाते वक्त जब वे सौ फीट की ऊंचाई से सीने के बल रस्सी पर चल कर नीचे आते वक्त दर्शक रोमांचित हो उठते थे। मगर रामलीला में काम करने वाले वरिष्ठ कलाकार धीरे-धीरे उपेक्षित हो अन्य लाईन में जा रहें हैं। रामलीला मंडलीयों से जुड़े कलाकार इसी रवैये से व्यथित हैं। उनका कहना है कि चकाचौंध के दौर में रंगमंच पिट रहा हैं। उनके पास इतने पैसे भी नही है कि वे आधुनिक थियेटर के गुणों वाले मंच गांवों में तैयार करें और वैसी आय की उम्मीद भी गांवों में नही हैं। सरकारी स्तर पर भी इन रामलीला मंडलियों को कोई सहायता या संरक्षण नही मिल पाता हैं। 




रमेश सर्राफ
स्वतंत्र लेखक और रचनाकार 
झुंझुंनू,राजस्थान
मोबाईल-9414255034 
ई-मेल-rameshdhamora@gmail.com


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3 टिप्‍पणियां:

  1. इस तरह की रामलीलाएं और रासलीलाएं न केवल लोक संस्कृति को जीवित रखती हैं, बल्कि नयी पीढ़ी को जानकारी भी देने में योगदान करती हैं. दुर्भाग्य है कि सिनेमा, वीडियो, इंटरनेट जैसे माध्यमों ने हमारी परम्पराओं को नुक्सान पहुचाया है. सभी संस्कृति प्रेमी व्यक्तियों को और सरकार के लोकसंस्कृति विभाग को मदद के लिए आगे आना चाहिए.

    बड़ी सुन्दर प्रस्तुति है. लेखक को और आपको बधाई.

    दिनेश वैद्य

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैं भी अक्सर कभी बचपन में गाँव में देखी रामलीला को खूब याद करती हूँ ..तब तो अब तो बहुत अंतर आ गया है अब तो टीवी से ही काम चलता है ..
    बहुत बढ़िया मेरे मन की सी याद दिलाती रचना ..धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं

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