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आज की कविता पर डॉ ओम निश्‍चल की राय

Written By Manik Chittorgarh on मंगलवार, अक्तूबर 23, 2012 | मंगलवार, अक्तूबर 23, 2012


  •  डॉ ओम निश्‍चल की टिप्पणी



(यह अंश आज की कविता के अग्रसर कवियों के बारे में ओम निश्‍चल ने मूल रूप से तद्भव (संपादक अखिलेश) के अक्‍तूवर 2012 के अंक में चार कवियों विनोद कुमार शुक्‍ल, अरुण कमल, कुमार अम्‍बुज एवं बोधिसत्‍व के नए संग्रहों पर आधारित समीक्षा के एक्‍सटेंशन के रूप में लिखा था, जिसे उन्‍होंने युवा कविता का प्रस्‍तावन माना है । युवा कविता के विभिन्‍न रूपाकारों पर वे आगे इस प्रस्‍तावन के बिन्‍दुओं को आगे बढ़ाऍंगे।

तद्भव में समीक्षा के साथ यह पश्‍चलेख नही समाविष्‍ट हो सका जो यहॉं प्रस्‍तुत है। हम समालोचन के संयोजक संपादक कवि अरुण देव के आभारी हैं कि उन्‍होंने इसे अपने यहॉं जगह दी तथा युवा कवियों को मान देने वाले इस प्रस्‍तावन पर बहस आमंत्रित की। हम युवा कविता के हक में अपनी माटी’ में इन अंशों को पुन: प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

युवा कविता पर सुचिंतित निगाह रखने वाले ओम निश्‍चल का यह प्रस्‍तावन उनकी आगामी पुस्‍तक ‘’भाषा में बह आई फूल मालाऍं: युवा कविता के कुछ रूपाकार’’ का एक आधार लेख होगा। इस सीरीज़ में वे अन्‍य कई आलेख नया ज्ञानोदय, पूर्वग्रह, कादम्‍बिनी, साक्ष्‍य एवं उत्‍तर प्रदेश आदि पत्रिकाओं में लिख चुके हैं।-सम्पादक)


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संप्रति जो कविताऍं लिखी जा रही हैं, जिनका दीदार कभी कभी ब्‍लाग एवं बेवसाइटों पर भी हो जाता है, उनमें से अधिकांश को देख कर लगता है कवियों को अपने पाठकों की कोई फिक्र नहीं है। वे कुछ भी वृत्‍तांत जैसा बुन कर कविता की प्रतीति करा देना चाहते हैं। अक्‍सर युवा कवियों के नैरेटिव में गांव देहात या शहरों के गलीकूचों के ब्‍यौरे मिलते हैं, अक्‍सर लड़कियॉं मिलती हैं और उन लड़कियों के बारे में अपने अनुभव साझा करने का मनोविज्ञान प्रबल दिखता है। प्रेम कविता की हर चौहद्दी तोड़ने के लिए आतुर आज की युवा पीढ़ी के लिए वर्जनाओं की कोई वजह नहीं है। आर्थिक उदारतावाद की तरह यौन आकांक्षाओं के भाषाई इज़हार में भी उनकी उदारता सीमाऍं नहीं देखती। स्‍त्री को समझने की एकाधिकारवादी प्रवृत्‍ति के चलते ही प्‍यार में डूबी हुई मॉं, और  'बहन का प्रेमी' जैसी कविताओं के फार्मूले भी ईजाद किए गए जो कविता के बाजार में कुछ दिन चले भी। पर वे आम संवेदना का हिस्‍सा नहीं बन सके। 

यह स्‍त्री मेरे भीतर की पुरुषवाची समझ थी जो स्‍त्री के भीतर स्‍त्री को पढ़ने के बजाय खुद के मनोविज्ञान को आरोपित करने वाली थी। जिस अटपटेपन को कविता का नवाचार कह कर परोसा जा रहा है उसके भी प्रस्‍तावक हैं,  प्रशंसक हैं। चाहे थोड़े ही सही, पर कदाचित वे इन्‍हीं थोड़े लोगों के लिए लिख रहे हों । उनकी भाषा अटपटी और न बरती हुई-सी लगती है। पर उसमें संयम कम है, अतिरेक ज्‍यादा। यह भाषा जैसे भाषा-शोधन यंत्रों से निकल कर आ रही है जो हमारी प्राणवायु के लिए स्‍वास्‍थ्‍यकर नहीं है। इन रिफाइनरियों से भाषा का धुआं ज्‍यादा निकल रहा है, भाषा का निहितार्थ कम।एक प्रच्‍छन्‍न कलावाद का पुनर्भव है यह।
किन्‍तु इस प्रायोगिक अतिरेकों के बावजूद कुछ कवियों को देख पढ़ कर लगता है, भाषा अब भी गॉंवों, कस्‍बों, गली कूचों, कामगारों, किसानों, आदिवासियों और मलिन बस्‍तियों के बीच ढल रही है। वह भले ही वैयाकरणों की कसौटियों पर कमतर नजर आती हो, उसी में हमारी अभिव्‍यक्‍ति की क्‍वॉरी सॉंसें बसी हैं।  हमने भाषा को इतना बरता और भोगा है कि कुछ भी पढ़ते हुए लगता है इसे कहा जा चुका है। इस कहे जा चुके को जब कोई इस तरह कहे कि वह पहली बार कहे जैसा लगे और उतना ही प्राणवंत तो लगता है हॉं हॉं यहीं कहीं हमारे मन की बात है जो अब तक अदीठ थी। शहराती भावबोध ने हमारी भाषा की मासूमियत छीन ली है। 

आशुतोष दुबे, प्रेमरंजन अनिमेष, एकांत श्रीवास्‍तव, गीत चर्तुवेदी, तुषार धवल और पंकज राग जैसा लिखने वाले आज भी कम हैं। युवा कवियों में कोलाहल ज्‍यादा है, अपनी पहचान  बनाने की हड़बड़ी भी। कविता की पदावलियों में दूर की कौड़ियों को सहेजने की प्रवृत्‍ति संप्रेषणीयता में अवरोधक बनी है। बोधिसत्‍व ने दुखतंत्र में अपनी एक निजी कविता-प्रविधि खोजी थी: स्‍त्री को जानने का एक नया तरीका ईजाद किया था, उसे सफलता भी बेशक मिली। एकांत श्रीवास्‍तव की कविता जैसी लोक-लय की अनुगूँज अन्‍यत्र दुर्लभ है। 

अंशु मालवीय ने 'दक्‍खिन टोला' से उम्‍मीद की जिस आमद का आभास कराया था,वह अभी नि:शेष नहीं हुई है। अनुज लुगुन ने कविता परिदृश्‍य में अचानक हस्‍तक्षेप से यह सिद्ध किया है कि बिना किसी सार्थक मुद्दे के कविता अंत:करण का समर्थन नहीं जुटा सकती। उनके साथ आदिवासियों के अभावों और शोषण को संज्ञान में लेने वाली एक नई काव्‍यात्‍मक भाषा ने जन्‍म लिया है। यह कविता में कुलीनतावाद से होड़ लेती कविता है। नए कवियों में प्रभात, अरुण  देव, अंशुल त्रिपाठी, कुमार अनुपम और विमलेश त्रिपाठी के यहॉं ध्‍यानाकर्षण के अनेक तत्‍व हैं। 

नीलोत्‍पल और शिरीष कुमार मौर्य ने कविता में एक बड़ी हद तक मौलिकता का उत्‍खनन किया है। अमित कल्‍ला के यहॉं (होने न होने के परे)आत्‍म-अनात्‍म की सुखद व्‍यंजनाऍं हैं। सौमित्र ने कविता की छोटी छोटी इकाइयों में जीवन के स्‍फुलिंगों का संधान किया है। गिरिराज किराड़ू की कविता में गतानुगतिकता को लॉंघने की व्‍यापक संभावनाऍं हैं बशर्ते निज के ऊहापोहों से उबर कर वह जीवन और समाज की समस्‍याओं में भी दिलचस्‍पी लेना आरंभ करे। व्‍योमेश शुक्‍ल ने भाषा और संवेदना की अपनी प्रयोगशाला में काफी काम किया है, मनोज कुमार झा ने भी ; इधर सबद पर जारी अंबर रंजना पांडेय की कुछ कविताओं में भी एक खास तरह का नयापन नजर आता है, पर अनेक अच्‍छी कविताओं के साथ इनके यहॉं भी भाषा की तोड़फोड़ कम नहीं है। 

यह सब कविता को भाषा और संवेदना के नवाचारों की कविता बनाने की नीयत से ही हो रहा है। गए सालों में देवीप्रसाद मिश्र ने भी लंबी कविताओं के कई बेहतर प्रयोग किए हैं। कविता की फंतासी में धँसते हुए उन्‍होंने आज के यथार्थ के दुर्वह निहितार्थ को रचने की कोशिश की तो उसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाऍं हुईं। व्‍योमेश शुक्‍ल के कविता-शिल्‍प ने भी आलोचकों के समक्ष काफी चुनौतियॉं खड़ी की हैं पर हम यह देखें कि आज लिख रहे केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण,लीलाधर मंडलोई और खुद लीलाधर जगूड़ी तक जो प्रयोगों के आविष्‍कर्ता समझे जाते हैं, उनके यहॉं ऐसे अटपटे प्रयोगों वाली कविताऍं नहीं है।

कविता पर वैसे ही आरोप कम नहीं हैं कि उसने उत्‍तरोत्‍तर अपने पाठक खोए हैं, वाचिक गुणवत्‍ता गँवाई है, और सर्कुलेशन खो चुकी भाषा के सहारे कविता का साम्राज्‍य खड़ा करने की कोशिशें हो रही हैं। लोग कविता का मर्सिया पढ़ने को तैयार बैठे हैं। एक वक्‍त जार्ज सेफरीज़ ने यह कहा था कि उन्‍हें काव्‍य पाठ के लिए ज्‍यादा लोगों की दरकार नहीं है।  क्‍या आज के युवा कवि भी यही सोचते हैं कि उन्‍हें पाठकों और श्रोताओं की जरूरत नहीं है। वे अपने एक सीमित और विशिष्‍ट काव्‍यास्‍वाद वाले कुनबे के बीच लिख कर खुश हैं। यदि ऐसा है तो सदियों से स्‍मृति में रची बसी आ रही कविता के लिए यह खतरे की घंटी है।



समीक्षक  
बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,
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1 टिप्पणी:

  1. मेरा यह आलेखांश केवल युवा कविता का प्रस्ता वन भर है। इसे प्रस्ता वना के रूप में देखने पर इसमें कुछ अधूरापन लग सकता है, जिसके बारे में समालोचन के कैनवस पर कुछ बातें कह चुका हूँ। विस्तृात आलेख में उल्लि खित युवा कवियों के कृतित्वह को विस्तांर से आकलित किया जाएगा।

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