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महीने-महीने भर गांवों में नाटक करते रहते थे गुरुशरण सिंह

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अक्तूबर 04, 2012 | गुरुवार, अक्तूबर 04, 2012

‘हमने पाठ्य पुस्तकों में अपने देश को जिस रूप में जाना था, उससे बिल्कुल भिन्न रूप से देश और देश की जनता को जानने का मौका मिला। एक बाबा था मंच पर, बेडि़यों और हथकडि़यों में, जिसके कपड़े फटे हुए थे। वह बाबा हमारा देश था, जिसे भगतसिंह जैसे इंकलाबी आजाद कराने में लगे थे। नाटक था- इंकलाब जिंदाबाद। मैंने बाबा की भूमिका की थी। 80 का दशक था, आरा में छोटे बच्चों की एक नाट्य टीम बनी थी- नवांकुर। उसी वक्त बिहार प्रदेश किसान सभा बनी थी, उसके मंच से नवांकुर के कलाकारों ने किसानों की एक जनसभा के मंच से उस नाटक को पेश किया। बाद में उसकी 100 से अधिक प्रस्तुतियां हुईं। यह काफी असरदार नाटक था। इसके कैरेक्टर बहुत फेमस हुए। इसके डायलाग हमारे लिए मार्गदर्शक थे। इस नाटक के लेखक गुरशरण सिंह थे।’ 

जसम से संबद्ध नाट्य संस्था ‘संगवारी’ की ओर से प्रख्यात जननाट्यकर्मी गुरशरण सिंह की याद में कनाट प्लेस, नई दिल्ली के इंडियन काफी हाउस में 1 अक्टूबर 2012 को आयोजित एक बातचीत के दौरान बिहार की चर्चित नाट्य संस्था ‘युवानीति’ के पूर्व सचिव सुनील सरीन ने अपने अनुभवों को साझा किया। उन्हें न केवल गुरशरण सिंह की प्रस्तुतियों को करीब से देखने का मौका मिला था, बल्कि उन्होंने उनके कुछ नाटकों का मंचन भी किया था। गुरशरण सिंह जन संस्कृति मंच के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, जिनका पिछले साल 28 सितंबर को निधन हो गया। जन नाट्यकर्म के क्षेत्र में  उन्होंने जो बेमिसाल भूमिका निभाई, वह आज भी इस क्षेत्र में कार्य करने वालों के लिए बेहद उत्पे्ररक है। 

सुनील सरीन ने बताया कि पहली बार उन्होंने गुरशरण सिंह को मंच से तब देखा, जब उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में शहीद साथियों को याद करते हुए यह गाया था कि ऐ लाल फरेरे तेरी कसम/ इस खून का बदला लेंगे हम। उनके नाटक जबर्दस्त उर्जा से भरे होते थे। जब आरा में उनके नाटक की प्रस्तुति होनी थी, तो उम्मीद से कहीं ज्यादा लोग उसे देखने के लिए जुटे थे। उनके नाटक दर्शकों को उद्वेलित करते थे और इंकलाब जिंदाबाद हो या जंगीराम की हवेली, दर्शक अक्सर उनके नाटकों में अभिनेताओं के साथ एक्शन में उतर पड़ते थे। उनके नाटकों की प्रस्तुति के दौरान अभिनेताओं और दर्शकों के बीच एक गहरा रिश्ता बन जाता था। काफी रियलस्टिक एप्रोच था उनका। उनके नाटकों की शैली और शिल्प अभी भी प्रासंगिक है। बे्रख्त के नाटकों का जैसा असर दर्शकों पर होता होगा, वैसा ही असर गुरशरण के नाटकों का होता था। उनके नाटक जनता की आवाज हैं और किसान-मजदूरों की ताकत को बढ़ाने वाले हैं। सुनील सरीन ने यह भी बताया कि वे फैज का जिक्र खूब किया करते थे। वे ‘हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे’ की प्रस्तुति भी करते थे। 

जसम के राष्ट्रीय पार्षद युवा आलोचक अवधेश ने कहा कि गोरख पांडेय पर काम करते हुए उन्हें गुरशरण सिंह के बारे में पता चला। जब गोरख जसम के संस्थापक महासचिव बने थे, तब गुरशरण जी को अध्यक्ष की जिम्मेवारी मिली थी। 2007 में जब भाकपा-माले ने शहीद-ए-आजम भगतसिंह के शहादत दिवस पर उनकी जन्मशती और 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के 150 साल को ध्यान में रखते हुए दिल्ली में इंकलाब रैली की, तब रैली से पूर्व रात में देश भर की कई सांस्कृतिक संस्थाओं ने अपनी प्रस्तुतियां की थीं। वृद्धावस्था के बावजूद गुरशरण जी वहां मौजूद थे और उनकी टीम ने ‘मैं भगतसिंह बोल रहा हूं’ नाटक पेश किया था। नाटक पंजाबी में था और रैली में आए लोगों में बड़ी तादाद बिहार के लोगों की थी, पर सबकुछ संपे्रषित हो रहा था। अवधेश ने बताया कि गुरशरण सिंह घर से जीप लेकर निकल जाते थे और महीने-महीने भर गांवों में नाटक करते रहते थे। 

अवधेश ने पिछले वर्ष 1 अक्टूबर को ही चंडीगढ़ में आयोजित शोकसभा को याद करते हुए कहा कि वह शोकसभा एक संकल्प सभा थी। इतनी बड़ी शोकसभा उन्होंने पहली बार देखी थी, जिसमें लोग अपने अपने साधनों से पहुंचे थे। कोई ट्रैक्टर से आ रहा था, तो कोई पैदल। किसी सरकार ने लोगों को वहां आने के लिए गाडि़यों का इंतजाम नहीं किया था या पैसे नहीं दिए थे। लोग यह भी कह रहे थे कि अगर यह सभा अमृतसर में होती, तो इससे भी ज्यादा लोग जुटते। पंजाब का शायद ही कोई बड़ा बुद्धिजीवी होगा, जो उस रोज वहां नहीं पहुंचा था। और उन्हें याद करते वक्त लोग अपने व्यक्तिगत संस्मरण सुनाने के बजाए लगातार गुरुशरण जी के काम और मकसद के बारे में बोल रहे थे। दरअसल कलाकार दो तरह के होते हैं, एक वे जो सरकारी पैसा से सरकार के लिए कलाकर्म करते हैं और दूसरे वे जो जनता पर निर्भर रहते हुए उसके लिए कलाकर्म करते हैं। गुरशरण सिंह दूसरी तरह के कलाकार थे। जिस तरह का रूतबा उन्होंने हासिल किया, वैसा किसी संस्थानिक कलाकार के लिए संभव नहीं है। 

यह उन्हीं के साथ हुआ कि सरकार ने उनके नाम पर थियेटर बनाने में देर किया, तो जनता ने खुद थियेटर का निर्माण कर दिया। गांवों में कई ओपेन थियेटर तो उनके जीवित रहते ही बनाए गए थे। अवधेश ने खालिस्तानी पृथकतावादी आंदोलन के दौरान गुरशरण सिंह द्वारा पुलिस प्रोटेक्शन न लेने तथा सुरक्षा के लिए जनता पर भरोसा करने को भी याद किया। उनके उपर हमले भी हुए, पर जनता के साथ एकजुटता को ही उन्होंने ताकत समझा और उसी ताकत के बल पर लगातार अपना परिवर्तनकारी संस्कृतिकर्म जारी रखा। 
संगवारी के रंगकर्मियों ने आज के दौर में जननाट्यकर्म के समक्ष मौजूद चुनौतियों की भी चर्चा की। शाहनवाज ने कहा कि वे रोजगार और शिक्षा के सवाल को लेकर नाटक करते रहे हैं। आज जहां भी लोग अपने हक-अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, उसे लेकर नाटक करने की जरूरत है। रिजवान ने कहा कि गुरशरण सिंह जिस दौर में सामने आए वह आपातकाल के बाद का दौर था। आज की स्थिति उससे कतई अलग नहीं है। जनांदोलनों के दमन पर उतारू आज के तथाकथित लोकतंत्र के असली चेहरे को उजागर करना बहुत जरूरी है। सोना बाबू ने कहा कि असम की घटनाओं को लेकर देश में जो सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने की कोशिश की जा रही है, उसके खिलाफ भी नाटक करना चाहिए। 

संगवारी के कलाकारों- सउद अहमद, प्रवीण, सैनुद्दीन खान, फिरोज आलम, राजा बाबू अग्निहोत्री और मुस्तफा अंसारी ने गुरशरण जी को याद करते हुए उनकी परंपरा और विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस बातचीत की सूचना बगल की मंडली में बैठे तरुण शर्मा को मिली, तो उन्होंने कुमार मुकुल को बताया कि वे भी किसी दौर में गुरशरण सिंह के नाटकों की पांच सौ के करीब प्रस्तुतियां कर चुके हैं। हमने उन्हें बातचीत में आमंत्रित किया। तरुण शर्मा आजकल स्वामी अग्निवेश के साथ काम करते हैं। हरियाणा में दिशा सांस्कृतिक मंच की ओर से किए गए सांस्कृतिक कार्या को याद करते हुए उन्होंने बताया कि भाषण और लेखों से जितना माक्र्सवाद समझ में नहीं आता था, उससे कहीं अधिक उन्हें वह गुरशरण सिंह के नाटकों से समझ में आया। उनके नाटक जनता की राजनैतिक चेतना को बढ़ाने वाले थे। 

आज जबकि माल और मल्टीप्लेक्स के दौर में जब मनोरंजन को भी धनिक वर्ग तक सीमित किया जा रहा है, तब जनता को मनोरंजन प्रदान करना भी जनसंस्कृतिकर्मियों का ही कार्यभार होना चाहिए। बातचीत में साम्राज्यवादी संस्कृति के हमले, मीडिया का शासकवर्गीय हितों में इस्तेमाल और असामाजिकता व व्यक्तिवाद की बढ़ती प्रवृत्ति की भी चर्चा हुई। नौजवान संस्कृतिकर्मियों ने समाज मे सुविधापरस्ती और आत्मकेंद्रियता के फलसफे से अपने टकरावों और उस टकराव के कारण अपने भावजगत में पैदा होने वाली बेचैनियों को भी साझा किया। लोग इस निष्कर्ष पर भी पहुंचे कि सांस्कृतिक बदलाव के अपने सपने को पूरा करने के लिए अपने जैसे लोगों की तलाश और संघर्षशील वर्ग से गहरा जुड़ाव जरूरी है, उसी के जरिए गुरशरण सिंह की लड़ाई को भी जारी रखा जा सकता है। इस मौके पर डाॅ. रवि कुमार और लोकमित्र प्रकाशन के आलोक शर्मा भी मौजूद थे।

सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959


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