कैस जौनपुरी की कवितायेँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

कैस जौनपुरी की कवितायेँ


कैस जौनपुरी
जौनपुर,उत्तर प्रदेश का जन्म। 
देश की बहुत सी प्रतिष्ठित
पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके। 
फिल्म राईटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया,
मुम्बई के एसोसिएट मेंबर।
सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमाधारी। 

ई-मेल-qaisjaunpuri@gmail.com
मोबाईल:-9004781786
वेबसाईट:-www.qaisjaunpuri.com



















मैं रेल की पटरी हूँ...





मैं रेल की पटरी हूँ...
कुछ कहना चाहती हूँ...
मैं रेल की पटरी हूँ...
पड़ी रहती हूँ
अपनी जगह पर
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
थूकते भी हैं
गन्दगी भी करते हैं
मगर मैं, रेल की पटरी हूँ...
चुपचाप सब सहती हूँ
कभी बुरा नहीं मानती
बस चुप ही रहती हूँ
क्योंकि मैं बुरा मानूंगी तो
लोग बुरा मानेंगे
लोग बुरा मानेंगे तो
लोग नहीं आएँगे
लोग नहीं आएँगे
तो मैं बुरा मानूंगी
इसलिए मैं कभी
बुरा नहीं मानती
क्योंकि मैं रेल की पटरी हूँ...
बुरा मानना मेरा काम नहीं
लोग कहते हैं
अगर बुरा ही मानना था
तो यहाँ बिछी क्यों हो...
उठो, खड़ी हो जाओ
अगर बिना बिछे
जिन्दा रहने की
हिम्मत रखती हो तो
मैंने तो नहीं कहा था
यूँ बिछी रहने को
यूँ पड़ी रहने को
अब बिछी हो
और पड़ी हो
तो नखरे न दिखाओ
यूँ ही बिछी रहो
यूँ ही पड़ी रहो
हमें आने दो
हमें जाने दो

मैं रेल की पटरी हूँ...
कभी-कभी सोचती हूँ
उठ जाऊं, खड़ी हो जाऊं
मगर फिर डरती हूँ
मैं तो एक रास्ता हूँ
अगर खड़ी हो गई तो
रास्ता न रहूँगी
और अगर रास्ता न रही तो
लोग नहीं आएँगे
फिर मैं खड़ी-खड़ी
सड़ने लगूंगी
जंग लग जाएगी मुझमें
फिर किसी कोने में
फेंक दी जाउंगी
क्यूंकि मैं हूँ ही क्या
एक रेल की पटरी ही तो हूँ
मैं उठ जाउंगी
तो दूसरी बिछ जाएगी
या बिछा दी जाएगी
आखिर रास्ता तो चाहिए ही
अगर रास्ता न होगा
तो लोग किधर जाएंगे
लोग भटकने लगेंगे
इधर-उधर
रास्ते की खोज में
कुछ गलत रास्ते पकड़ लेंगे
फिर मेरा क्या फायदा

मैं रेल की पटरी हूँ...
सोचती हूँ
क्यूँ मेरे नसीब में
सिर्फ बिछना ही लिखा है...
क्यूँ बोझ सहना ही लिखा है...
क्यूँ जब गलती से ही कोई फूल
मुझ पर आ गिरता है
तब आने-जाने वालों के कदम
कुचल देते हैं उस नाजुक फूल को
क्यों लोग कोई पत्ता भी
टिकने नहीं देते मुझपर
क्यूँ मैं मजबूर हूँ
धूप में जलने को
ठंड में ठिठुरने को
क्यूँ मैं हर मौसम में
मजबूर हूँ एक सी रहने को
क्यूँ नहीं मेरे भी
पंख निकल आते
मैं भी उड़ती
लोगों की तरह
लोगों के साथ
क्यूँ सब मुझे
इतना मजबूत समझते हैं...?
क्यूँ सब मुझे
गले नहीं लगाते...?
क्यूँ सब मुझे
पैरों तले ही रखते हैं...?
क्या इसलिए कि
मैं सिर्फ एक रास्ता हूँ...?
और रास्ता सिर्फ गुजरने
के लिए होता है...?
क्यूंकि रास्ता हमेशा
पैरों तले ही होता है...?

मैं रेल की पटरी
सोचती हूँ
क्यूँ न ऐसी दुनिया हो
जहाँ मैं भी सबको
गले लगा के चलूँ

मैं रेल की पटरी
थक चुकी हूँ
अब उठना चाहती हूँ
खड़ी होना चाहती हूँ
क्या कोई मुझे अपनी
बाहों का सहारा देगा...?


खुदा मेरा दोस्त था...


जब मैं नमाज नहीं पढ़ता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब भी कोई काम पड़ता था
लड़ता था झगड़ता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब भी परेशां होता था
मेरा काम बना देता था
खुदा मेरा दोस्त था...
जब से नमाज पढ़ने लगा हूँ
वो बड़ा आदमी हो गया है
उसका रुतबा बड़ा हो गया है
मुझसे दूर जा बैठा है
अब भी मेरी दुआएँ
होती हैं पूरी
लेकिन हो गई है
हम दोनों के बीच दूरी
वो बड़ा हो गया है
मैं छोटा हो गया हूँ
मैं सजदे में होता हूँ
वो रुतबे में होता है
पहले का दौर और था
जब मुश्किलों का ठौर था
बन आती थी जब जान पे
था पुकारता मैं तब उसे
अगर करे वो अनसुनी
था डांटता मैं तब उसे
कहता था जाओ खुश रहो
खुदा मेरा दोस्त था...
अब कि बात और है
वो हक बचा न दोस्ती
न कर सकूँ मैं जिद अभी
वो हो गया मकाम पे
जा बैठा असमान पे
थी कितनी हममें दोस्ती
है बात अब न वो बची
आ जाए गर वो दौर फिर
हो जाए फिर वो दोस्ती
आ जाए चाहे गर्दिशी
मिल जाए मेरी दोस्ती
मैं कह सकूँ उसे जरा
अगर मेरी वो ना सुने
मैं डांट दूँ उसे जरा
क्या फायदा नमाज से
कि दोस्त गया हाथ से
मैं सोचता हूँ छोड़ दूँ
ये रोजे और नमाज अब
ना जाने है कहाँ छुपा
वो मेरा दोस्त प्यारा अब
मैं खो गया हूँ भीड़ में
रिवायतों की भीड़ में
वो सुनता है अब भी मेरी
न चलती है मर्जी मेरी
वो देता है जो चाहिए
मगर मुझे जो चाहिए
वो ऐसी तो सूरत नहीं
अगर यूँ ही होता रहा
जन्नत मेरी ख्वाहिश नहीं
मुझे वो दोस्त चाहिए
मुझे वो दोस्त चाहिए
मुझे वो हक भी चाहिए
मुझे वो हक भी चाहिए
जो कह दूँ एक बार में
हो दोस्ती पुकार में
वो सुनले एक बार में
तू सुनले एक बार में
खुदा तू मेरा दोस्त था
खुदा तू मेरा दोस्त था....





मैं तुम्हें कुछ दे नहीं सकता


मैं तुम्हारे हाथों में
सोने के मोटे कंगन तो नहीं पहना सकता
किसी टहनी से एक डंठल तोड़कर
तुम्हें दे सकता हूँ
जिसके हरे पत्‍ते
तुम्हारे होंठों जैसे लगते हैं
जितने पत्‍ते
उतने तुम्हारे होंठ
गिनती जाओ
हंसती जाओ
मुझे तुम्हारे होंठों पे
गहरी लाली नहीं फबती
मुझे तुम्हारे सुर्ख, रूखे, सूखे होंठ
बड़े अच्छे लगते हैं
मैं तुम्हें खुश रखने को
ढ़ेर सारी दौलत तो नहीं जुटा सकता
एक फूल दे सकता हूँ
जो तुम्हारे चेहरे जैसा लगता है
एक फूल देखता हूँ
तो तुम्हारा चेहरा दिखता है
वही फूल
तुम्हारे चेहरे के आगे रख सकता हूँ
मैं तुम्हें दुनिया की
सैर तो नहीं करा सकता
तुम्हारे साथ किसी पेड़ के नीचे
जब तक चाहो बैठ सकता हूँ
मैं तुम्हें दिखावे का
समाज तो नहीं दे सकता
हाँ, तुम्हारी जरूरत पे
तुम्हारे साथ खड़ा हो सकता हूँ
मैं तुम्हारे साथ, दिन-रात
रह तो नहीं सकता
तुम कभी बीमार रहो
तो मुझे पता चल सकता है
मैं तुम्हें रोज नए
कपड़े तो नहीं दे सकता
हाँ, तुम्हें अपने हाथों से
कुछ ऐसा पहना सकता हूं
जिसमें तुम परी लगो
कभी जब तुम इन
मोटे कंगनों के भार से थक जाओ
मेरी तरफ हाथ बढ़ाना
मैं तुम्हारे साथ हूं
कभी जब तुम दुनिया की सैर करके
थक जाओ, तसल्‍ली से थोड़ी देर बैठना चाहो
मुझे आवाज देना
मैं तुम्हारे साथ हूं
कभी रोज नए कपड़े अच्छे न लगें
चली आना उसी एक जोड़े में
जिसमें तुम परी लगती हो
कभी तुम्हारा समाज
तुम्हें अनसुना करे
मुझसे कहना
मैं तुम्हारे साथ हूं
मैं तुम्हारे साथ हूं
बिना किसी शर्त
बिना किसी बात
मैं तुम्हारे साथ हूं
तो बस एक ही है बात
कि तुम हो
सबसे अलग
सबसे जुदा
और तुममें दिखता है
मुझे मेरा खुदा

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