नपुंसक उदासीनता के चलते भी बघेली की अक्षर यात्रा प्रवाहित है । - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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नपुंसक उदासीनता के चलते भी बघेली की अक्षर यात्रा प्रवाहित है ।


  • पुस्तक समीक्षा-
  • बघेली की रसवन्ती फुहार: गांव गोहार
  • चिन्तामणि मिश्र,सतना,मध्य प्रदेश 
बघेली की काव्य परंपरा जीवंत व प्रवाहमान हैं । लोक कवि सूर्यभान कुशवाहा  की उन्तीस बघेली कविताओं का संकलन ’’गांव गोंहार’’यह आस्वस्त करता है,कि सरकारी संस्थाओं की बैशाखी  के बगैर तथा बघेलखण्ड में उगे विश्वविद्यालय की बघेली के प्रति नपुंसक उदासीनता के चलते भी बघेली की अक्षर यात्रा प्रवाहित है ।गांव गोहार की लगभग सभी रचनायें ग्राम्य परिवेश और वहां से बिदा ले रहे पर्यावरण को समेटनें का बेहतरीन दस्तावेज़ हैं।संकलन की सभी रचनाओं को पढ़नें से ज्ञात होता है,कि प्रकृति के साथ दासी जैसा व्यवहार करके हमनें बहुत कुछ खो दिया है। शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों की नें अनाथ जैसा जीवन जीनें को मजबूर कर दिया है। कुशवाहा नें इस विडंबना को बेहद गहराई से उकेरा है ।

’’सूखिगै पोखरी,सूखिगै तलइया
बंधी है पियासन,परसों से गइया।’’

नदी नाले कुआ तालाब हमनें मार डाले हैं।पानीं का अकाल दबे पाव आ गया है ।आदमी ही नहीं पशु पंक्षी सभी जीव जंन्तु पानी के अभाव में हलाकान है। कवि नें गुलतुल बोल बघेली की बचपन में कभी गुड़ की डली अपनी जीभ और कलम में रखी होगी तभी वह इस तरह बघेली का सरल सरस व मार्मिक  परिचय दे सका है।

’’सूखी रोटी नोन कनेमन,अउर कहौं गुड़भेली के
महतारी के जइसन पिरिया,गुलतुल बोल बघेली के।’’

बघेली की मिठास को कुशवाहा अपनेंपन की प्यास से रची बसी अनुभव करते है।वैसे भी बघेली बहुत ही समर्थ व अपनेपन की बोली है।जिसमें मुहावरे लोक संगीत और लोक जीवन के साथ विशाल साहित्य का आसमान चमकता है ।बघेली के जादू से महाकवि तुलसी भी नहीं बच सके।ऐसी समृद्ध बोली में कवि सूर्यभान कुशवाहा की यह काव्य कृति पढ़ कर मन को ढाढ़स होता है,कि बघेली का उपवन कभी बंजर नहीं होगा ।

कवि सूर्यभान अपनी माटी अपनें गांव वहां के लोक सांस्कृतिक  परंपराओं के साथ वहां के प्राकृतिक परिवेश को पूरी आत्मीयता के साथ देखते व समझते है ।इसे देखनें में जो कंपन और हल्की टीस मन में जगती है वही गांव गुहार बन जाती है ।

आफत के मोटरी धरे,तिलमिल होय कपार
मुड़धरिया कोउ नहीं,मचिगा गांव गोहार।’’

कुशवाहा मित्तकथन के कवि है,और शब्दो की सादगी ऐसी होती है,कि जिसका गहरा प्रभाव पाठक पर पड़ता है ।वे सामान्य विंम्बों को भी कुशल चित्रकार की तरह बडी  ही प्रभावशाली कविता का सृजन करते हैं।

’’मदिर मां पंडितजी देउता नहबामै
 महजिद मा मुल्लाजी अल्ला गोहरार्मै।’’

संग्रह की कई कविताएं विसंगतियों को पूरी क्षमता के साथ परत दर परत उधेड़ती है।

’’बालापन के उमिर मा केत्यो,दिन भर करै मजूरी
 आजिउ भला कहां रूकि पाई,बाल श्रमिक मजदूरी।’’
 आगनबाड़ी के खिचड़ी से भइसी हैं गमरानी
 खाय खाय सरकारी हलुआ गइऔ खूब पल्हानीं ।’’

आजादी आम आदमीं और गांव देहात तक अभी भी नहीं पधारी कहां अअक गई है ,किसने छुपा लिया है।सबके साथ कवि भी परेशान होकर अपनें भाव प्रकट करते हुए कहता है,कि-

’’कहां लुके आजादी मइया,हमका नहीं देखानें
 उचे उचे महल मा बइठे,खूब मलाई छानें ।’’

हर साल आजादी की वर्षगाँठ आ जाती है,किन्तु गरीब कैसे मनाये आजादी की रोज इस देश की व्यवस्था को दिगंबर कर रही है। उसकी विवशता को कवि नें शब्द दिया है। इन शब्दों की सरलता इतनी मार्मिक और भेदक है,कि इससे पाठक छटपटाछट और बेचैनीं महसूस  करता है।

’’लगी पचासन ठेगरी बंडी,केही जाय देखाई
 आजादी के बरिसगाठ हम कइसन आज मनाई
 उडिगै सोन चिरइया फुर्र से,किहिस खोधइला छूंछ
 काट दिहिस मनई नीचे से,बिरबा होइगा ठूंठ ।’’

कवि आज जड़ जमा चुके बाजारवाद में अपने गांव तथा जन्मभूमि’’मरौहां’’ को नहीं भूला उपभोक्तावाद की संस्कृति देशी विरासत को लील नहीं सकी । कवि अपनीं माटी की सोंधी सुगंध को महसूस करते हुए कहता है,कि -

’’इहैं आय पइदाइस मोरौ,एहिन माहीं खेलेन
 निकहे घिनहे सब दिन भइया,एहिन माहीं झेलेन।’’
 लये नगड़िया लोलरा कक्का,खूब टनाटन मारैं,
 ढोलकी पीटै दिन्ना कक्कू,खूब धमाधम झारैं ।’’

साथ ही पत्नी के मायके जानें पर गृहस्थी का सारा भरमजाल पति किस प्रकार झेलता है,कवि ने अपनी एक कविता ’’जबसे जले गया तुम मइके ’’ में बेहद हास्य व विनोदपूर्ण तरीके से चित्राकित किया है । संकलन की सभी रचनायें पठनीय व शब्द परंपरा की ताजगी तथा वैभव की साक्षी है।
                                    
समीक्षक-
चिन्तामणि मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार एवं चिन्तक

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