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पुस्तक समीक्षा :-मैं कवि नहीं हूं न मूल्यों का वर्णन मेरी कविता है

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012 | शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012

पुस्तक समीक्षा
‘खामोशी हमारी पहचान है...’

          कश्मीर में आतंकवाद के दंश ने कश्मिरी जनमानस को जो पीड़ा पहुंचायी है, उससे उपजी हृदय-विदारक वेदना तथा उसकी व्यथा-कथा को साहित्य में ढालने के सफल प्रयास पिछले लगभग दो दशकों के बीच हुए हैं। कई कविता-संग्रह, कहानी-संकलन,औपन्यासिक कृतियां आदि सामने आए हैं, जो कश्मीर में हुई  आतंकी बर्बरता और उससे जनित एक विशेष जन-समुदाय के ‘विस्थापन’ की विवशताओं को बड़े ही मर्मस्पर्शी अंदाज में व्याख्यायित करते हैं। इस सन्दर्भ में कश्मीर के चर्चित कवि ब्रजनाथ ‘बेताब’ के कविता-संग्रह ‘मैं कवि नहीं हूं...’ का उल्लेख करना परम आवश्यक है।अपनी विशिष्ट रचना-शैली,भावाभिव्यक्ति तथा विषय-वस्तु की दृष्टि से यह संग्रह न केवल पठनीय बन पडा है अपितु मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करने वाला एक सुचिन्त्य एवं संग्रहणीय दस्तावेज भी बन पडा है। ‘माइग्रेण्ट कल्चर’ को केन्द्र में रखकर कवि ने जो बिम्ब और रूपक इस संग्रह की कविताओं में उकेरे हैं, वे मर्म को छूने वाले तो हैं ही, ‘विस्थापन’ की पीडा और त्रासदी से जनित कवि के मन की आकुलता एवं आक्रोश को बडी कलात्मकता के साथ रूपायित भी करते हैं। भोगी हुई पीडा के प्रतिक्रियास्वरूप ‘बेताब’ की स्थितियों को समझने-देखने की क्षमता उनकी अद्भुत प्रतिभा/मनस्विता का परिचय देती है। ‘माइग्रेण्ट कल्चर’ की परिभाषा कवि ने इन शब्दों में की है-
            
‘माइग्रेण्ट कल्चर'
जिसमें न भूत है, न भविष्य, न वर्तमान,
और जहां न भूत, न भविष्य, न वर्तमान हो,  
वहां कविता हो ही नहीं सकती...। पृ0 6

           ‘बेताब’ का चिंतन विस्थापन की त्रासदी को समूचे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आंकता-परखता है।कवि की पीडा का स्वर इतिहास के पन्नों को खंगालते हुए बडे ही तीखे और आक्रोश-भरे  अंदाज में यों कटाक्ष करता है-

मेरी कविता मुख्यमंत्री का वह पद है
जिसपर एक पिता अपने पुत्र की अपने 
स्वर्गवासी पिता की तरह ताजपोषी कराकर
उसे सिंहासन पर विराजमान करता है....।पृ0 11

भावस्थितियों की विविधता ‘बेताब’ की कविताओं में विपुल मात्रा में देखने को मिलती है।कहीं बेबसी है तो कहीं कर्मोत्साह है।कहीं दैन्य है तो कहीं आक्रोष है। कहीं चीख है तो कहीं मूक संगीत है।कुल मिलाकर कवि की हृदय-तन्त्री से निकले हुए हर भाव का समायोजन संगह की कविताओं में बडी कुशलता और सटीकता से हुआ है। एक स्थान  पर कवि कहता है-

पहले संगीत बजता था तो दिल के तार भी बजते थे
अब दिलों के बीच तार लगा दी गई है
और संगीत चीखता है....।
अब हर कोई चीखता है और
मेरे देशवासियों की चीखें शिखर पर बैठे
कवि के कानों तक नहीं पहुँच पातीं....।पृ019
         प्रायः समझा जाता है कि कवि कल्पनाशील होता है और भविष्य के सुनहरे आदर्शवादी ताने-बाने बुनने में उसकी अधिक दिलचस्पी रहती है।मगर, ‘बेताब’ की कविताएं ऐसा कुछ भी संकेत नहीं देतीं। वे ठोस यथार्थ और भोगे हुए कडुए सत्य को भावाकुलता के साथ उद्घाटित करने वाली जीवन्त शब्द-रचनाएं हैं-
 
मैं कवि नहीं हूं
न भविष्य मेरी कविता है
मेरी कविता वर्तमान है
जिसमें चौराहे पर जलता हुआ एक दिया
जलकर राह चलते लोगों को
राह दिखाता है।.....पृ025-026

विरोधाभासी शैली का इस्तेमाल करना ‘बेताब’ की कविताओं की खास पहचान है मनोभावों को व्यंग्य के नुकीले बाणों ;कैक्टस के नुकीले कांटों की तरहद्ध द्वारा पाठक के अन्तर्मन को छूते हुए उसके मस्तिष्क में एक कौंध जगाना यों एक सरल कार्य तो नहीं है, मगर ‘बेताब’ की कविताओं में यह ‘क्वालिटी’ खूब देखने को मिलती है। वह पाठक को झिंझोडती ही नहीं, उसे बहुत-कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है-
 
मैं कवि नहीं हूं
न मूल्यों का वर्णन मेरी कविता है,
मूल्यों का वर्णन करने  वाला
विधायक,मंत्री,नेता हो जाता है,
और विधायक,मंत्री,नेता 
कविता नहीं,उपदेश देते हैं
अपने स्वार्थ रूपी महाभारत के युद्ध में,और
बना देते हैं कुरुक्षे़त्र
समस्त देश को।...पृ0 33

विस्थापन की त्रासदी ने कवि के मन-मस्तिष्क को बहुत गहरे तक आक्रांत कर दिया है।उसकी यह पीडा उसके रोमरोम में समायी हुई है। घर-परिवार की सुखद स्मृतियों से लेकर आतंकवाद की आग तक की सारी क्रूर स्थितियां कवि की एक-एक पंक्ति में उभर-उभर कर सामने आती हैं। आतंकी विभीषिकाओं का कवि द्वारा किया गया वर्णन और उससे पैदा हुई सामाजिक असमानता/स्थितियां मन को यों आहत करती हैं-


मैं कवि नहीं हूं
न मेरी धरा के सीने में छिपा मेरा लहू
मेरी कविता है।
क्योंकि मैं अपने लहू को छिपाने का नहीं
लहू से धरा को सींचने का आदी रहा हूं।
यही मेरी विरासत,मेरी परंपरा है
जिसे निभाते निभाते मैं 
बहुसंख्यक होते हुए भी अल्पसंख्यक हो गया हूं।...प0ृ42

एक अन्य स्थान पर कवि द्वारा किए गया ‘कर्फ्यू’ का वर्णन कैसा मर्मांतक बन पडा है,यह देखिए-

मेरी कविता कर्फ्यू से उत्पन्न वह सन्नाटा है
जिसमें एक बच्चे के बिलखने की आवाज
किसी भी कान तक नहीं पहुंचती।...
और जब बच्चा रोता है 
तो मां उसे यह कह कर दबोच लेती है-
बेटा चुप हो जा, नहीं तो मुखबिर आएगा
और जहां मुखबिर के डर से 
भूख की मार सहनी पडे
वहां कविता हो ही नहीं सकती।...पृ0 45-46

कुल मिलाकर ब्रजनाथ ‘बेताब’ के कविता-संग्रह ‘मैं कवि नहीं हूं...’  में संकलित कविताएं कवि के मन से निकले ऐसे उद्गार हैं जो उनके भोगे हुए यथार्थ से साक्षात्कार कराते हैं और इसके लिए वे परिस्थितियों को नहीं अपितु अपने पुरखों को दोषी ठहराते हैं और मोटे तौर पर सम्भवतः इस संकलन की सार्थकता भी इसी बात को रेखांकित करने में है-
 
मेरी कविता
मेरे पुरखों का वह ‘पाप’ है
जिसकी सजा मैं 
इस ‘कारागार’ में काट रहा हूं।....पृ050
      
  • समीक्ष्य पुस्तक का नामः  मैं कवि नहीं हूँ 
  • लेखक का नाम:  ब्रजनाथ ‘बेताब’
  • प्रकाशक :8/4 न्यू मिण्टो रोड एपार्टमेंटस, नई दिल्ली 110002
  • मोबाइल-09811787278                          

समीक्षकः


डा. शिबन कृष्ण रैणा
कोलेज शिक्षा में प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए हैं।सालों से राजस्थान में लिखते,पढ़ते और छपते रहे हैं।फिलहाल अलवर में साहित्यिक गतिविधियों को संभालती संस्था 'साहित्य संगम' के अध्यक्ष हैं।मूल रूचि और विषय हिंदी में ही निहित रहा है।भारतीय अनुवाद परिषद के द्विवागीश पुरस्कार,राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के प्रथम अनुवाद-पुरस्कार तथा देश की विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित-पुरस्कृत  हैं साथ ही बिहार राजभाषा विभाग द्वारा कश्मीरी की लोकप्रिय रामायण ‘रामावतारचरित’ के श्रेष्ठ हिन्दी- अनुवाद के लिए पुरस्कृत-सम्मानित  किया जा चुका है। 

इसके अलावा उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि द्वारा  भी सम्मानित किया गया है। डा0 रैणा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में 1999 से लेकर 2002 तक अध्येता रहे हैं, जहां इन्होंने ‘भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद की समस्याएँ ’ विषय पर अनुसंधान-कार्र्य किया है। 
ई-मेल -skraina123@gmail.com,मो-09414216124
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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने जिस तरह चित्रित किया है उससे तो ये किताब पढने की उत्कंठा जागृत हो गयी …………कविता सच मे भोगी हुयी त्रासदी को इंगित करते हुये सोचने को मजबूर कर रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पिछले कई वर्षों से कश्मीर में जो होरहा था, ज़ाहिर है उससे किसी भी संवेदनशील मन का इस तरह हाहाकार करना स्वाभाविक ही था. यह सहज मानसिक उद्वेलन ही इतनी मार्मिक कविताओं में फूट पड़ा है. जिस विस्थापन की पीड़ा को ब्रजनाथ 'बेताब' और उन्हीं के साथ अन्य कश्मीरी पंडितों ने जी और मर के भोगा है, काफ़ी हद तक इन कविताओं के माध्यम से दिखाई पड़ती हैं. ब्रजनाथ सचमुच एक सशक्त लेखक हैं.
    डा.रैणा की यह पुस्तक समीक्षा भी काबिले दाद है. बहुत सुन्दर.
    दोनों को बधाई और आपको भी कि यह समीक्षा यहाँ छप पायी.
    के.एन. शर्मा

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमारे वरिष्ठ आलोचक-अध्येता डॉ. शिबन कृष्ण रैना, जो खुद कश्मीर के हालात से व्यक्तिशः पूरी तरह वाकिफ हैं, एक तटस्थ किन्तु संवेदनशील समीक्षक के बतौर कवि-व्यथा का मूल्यांकन कर सके हैं, बधाई!

    उत्तर देंहटाएं

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