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गांधी के चिंतन के केंद्र में अंतिम आदमी काफी पहले आ गया था।-नारायण देसाई

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012 | शुक्रवार, अक्तूबर 05, 2012


तीस जनवरी मार्ग स्थित बापू के शहादत स्थल पर आयोजित गांधी कथा में बापू के प्रिय सचिव महादेव देसाई के 87 वर्षीय पुत्र नारायण देसाई ने बताया कि किस तरह उनमें अहिंसा तथा सत्याग्रह बीजारोपण हुआ।
    
‘वैष्णव जन तेने  कहिये’ एक ऐसा भजन है, जिसमें सभी धर्मों का सार है। उन्होंने बताया कि यह भजन गांधी के दक्षिण अफ्रीका में गाए जाने वाले भजनों में एक था और इसे कभी ‘ मुस्लिम जन’ तो कभी ‘पारसी जन तो तेने कहिये’ के रूप में गाया जाता था।
     
नारायण भाई देसाई ने गांधी कथा का पहला दिन पांच  गीतों के आधार पर केन्दित रखा। इन गीतों में‘ गांधी का चरित्र सदा एक और अखंडित था’, ‘सत्य एक चिंतन,सत्य की अराधना’, ‘प्यारी मां की साक्षी में जो प्रण लिये हैं’ और जोड़ दी हमने प्रीत, जगत संग जोड़ी हमने प्रीत’ आदि थे। बापू के वचपन में उनके सत्य लगन की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए नारायण देसाई ने बापू के मन की उस यात्रा का विवरण पेश किया, जिसमें उनकी सत्य निष्ठा और संकल्पशक्ति का दुर्लभ विकास हुआ। उन संस्मरणों को भी पेश किया जो उनकी आत्मकथा में नहीं मिलता है, लेकिन शोधार्थियों ने खोज की।
                      
उन्होंने कहा कि गांधी की प्रासंगिकता पर सवाल सिर्फ भारत में उठाये जाते हैं। सवाल यह होना चाहिये कि गांधी के लिये हम कितने प्रासंगिक हैं? उन्होंने कहा कि मानवीय मूल्यों के ह्रास ने गांधी को प्रासंगिक किया। सामान्य आदमी की लाचारी के मुद्दे पर गांधी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि नोवाखाली ने उन्होंने बंगला में अपना पहला संदेश दिया कि-‘ मेरा जीवन ही मेरा पहला संदेश है।’ अक्सर होता यह है कि लोग गांधी के एक ही पहलू पर विचार करते हैं कि गांधी राजनीतिज्ञ थे या महात्मा, अर्थशास्त्री थे या नीतिकार, गांधी को समझना है तो समग्रता के साथ समझ सकते हैं। उनकी लाक्षणिकता थी कि वे नित्य विकासशील थे। उन्हें केवल सत्य की परवाह थी। सत्य वोलना, सत्य सोचना , सत्य करना यह उनके व्यक्तित्व में शामिल था। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि सत्य उनके लिये सहज था तथा अहिंसा और अपरिग्रह आयास था। सत्य की एक चोटी से दूसरे चोटी तक उन्होंने आरोहण किया। इसके लिये उन्होंने आत्मनिरीक्षण, आत्मपरीक्षण और आत्मशोधन को अपनाया। छोटी से छोटी गलती को भी वे बड़ा करके प्रस्तुत करते थे ताकि इसकी पुनरावृति न हो।
         
कथा के माध्यम से गांधी के व्यक्तित्व की मीमांसा करते हुए कहा कि संकल्प को वे आत्मा की ताकत मानते थे। इसी संकल्प का प्रयोग उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में किया। मजबूत संकल्प उन्हें उनकी प्रतिज्ञा से डिगा नहीं पाया। विलायत जाने से पहले उन्होंने जब तीन प्रतिज्ञा ली तो इसका निर्वहन आजीवन किया। बीमारी की अवस्था में जब शाकाहार छोड़ने के लिये डाक्टरों ने प्रेरित किया तो गांधी का एक ही सवाल था कि क्या मांसाहार अपनाने के बाद नहीं मरूंगा तो डाक्टर ने एक ही जवाब दिया कि जीना मरना तो ईश्वर के हाथ में है। जब जीना मरना ईश्वर के हाथ में है तो फिर मैं क्यों अपनी प्रतिज्ञा छोंड़ू। उन्होंने कहा कि गांधी कहा करते थे कि प्रतिज्ञा लेने से सत्य का मार्ग आसान हो जाता है।
      
गांधी के चिंतन के केंद्र में अंतिम आदमी काफी पहले आ गया था। सेवाग्राम में जब  अमेरिकी धार्मिक प्रतिनिधिमंडल मिलने आया तो उसके नेतृत्वकर्ता रॉक्टर मार्ट के सवाल के जवाब में गांधी ने कहा था कि संकट की परिस्थिति में जनता के प्रति ही ताकत देती है। बाद में गांधी ने इसे अपनी ताबीज का मंत्र बनाया।
   
अफ्रीका की घटना की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि वहां उन्हें प्रेरणा मिली कि अन्याय सहन करना कायरता है। उन्होंने सीखा कि -‘ जो अन्याय करता है, जो अन्याय सहता है, ईष्वर की घृणा उसे जला डालती है। इस क्रम में उन्होंने डनवर्ग की घटना का उल्लेख किया।  अन्याय का प्रतिकार करना सीखा और इसे लगातार जारी रखा। डरवन कोर्ट में पगड़ी उतारना उन्होंने अपमान समझा और इसका विरोध करते हुए अदालत से बाहर आ गये। बाद में इस घटनाक्रम को वहां के एक अखवार ने ‘अनइनवाइटेड गेस्ट’ यानी एक अनामंत्रित मेहमान शीर्षक से प्रकाशित हुई। बाद में गांधी ने अपना भी पक्ष रखा तो वह भी प्रकाशित हुआ। यहीं से उनकी पत्रकारिता की नींव पड़ी। इस समाचार पत्र में उनके ढाई सौ से तीन सौ पत्र प्रकाशित हुए हैं। बाद में उन्होंन यहां से ‘इंडियन ओपिनियन’ नामक अखवार भी शुरू किया।  उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी कि उनमें लगातार सीखने की प्रवृति थी।
               
उन्होंने कहा कि  पीटर मौरिश की ट्रेन की घटना ने उनमें सत्याग्रह के बीज बोये जिसका इस्तेमाल उन्होंने 13 साल बाद किया। सत्याग्रह का इस्तेमाल उन्होंने समाजहित में किया। उनका विरोध व्यक्ति से नहीं बल्कि व्यवस्था से था। अहिंसा का भी उन्होंने सामाजिक प्रयोग किया। उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी कि परिवर्तन की शुरूआत स्वयं अपने से करते थे। गांधी के व्यक्तित्व पर  जॉन रस्किन, टॉल्सटॉय और श्रीमदराचंद्र का प्रभाव पड़ा।
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