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गांधी: सेवा का आरंभ अंत्योदय से करना चाहते थे।

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, अक्तूबर 08, 2012 | सोमवार, अक्तूबर 08, 2012



भाग एक 
बापू के 79 वर्ष का अंतिम पचास वर्ष ऐसा बीता जिनका प्रत्येक  दिन सक्रिय था, अनेक रचनात्मक कदम उठाये। लाखों लोगों से संपर्क थे। इस दौरान कई मतभेद हुए, कई मनभेद हुए, कई मतभेद सुलझे। इसकी क्या प्रक्रिया थी इसका विश्लेषण  किया।उन्होंने कहा कि गांधी के व्यक्तित्व की खासियत थी कि उनका प्रयास जिस व्यक्ति से मिलने का होता था, उनके गुण दर्शन का प्रयास करते थे। उनके जीवन में अलग-अलग भतभेद हुए। सबसे ज्यादा मतभेद साधन शुद्धि को लेकर हुआ। गांधी का विचार समग्र समाज को ध्यान में रखकर करने का था। सेवा का आरंभ अंत्योदय से करना चाहते थे। उनके व्यक्तित्व की खूबी को एक उदाहरण के जरिये बताते हुए कहा कि  एक विदेशी इसाई महिला जब गांधी से मिलने आयी और कहा कि आपमें ईसा मसीह के गुण हैं। विनोदपूर्वक बापू ने पूछा कि वे कौन से ऐसे गुण जो ईसा मसीह के समकक्ष है? इसके जवाब में उस महिला ने कहा कि ‘ एक दूसरे से प्यार’, ‘पड़ोसियों से प्यार’ और ‘दुश्मनों से प्यार’। बापू ने प्रतिउत्तर में कहा कि - मैं तो अपना दुश्मन किसी को मानता ही नहीं हूँ। उनकी इसी प्रवृति को कारण मतभेद सुलझते गये।
             
इस परिप्रेक्ष्य में नारायण भाई देसाई ने कई उदाहरणों के साथ इसका विश्लेषण किया।  उन्होंने कहा कि 1924 के आरंभ में पूना के यवरदा जेल में थे । उन्हें 1922 में छह साल की सजा हुई थी। स्वास्थ्य बिगड़ा। डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी और फौरन अपने करीबियों को बुलाने को  कहा । उन्होंने जिन तीन लोगों एन.सी केलकर, श्रीनिवास शास्त्री और हरि को बुलवाया, वे बापू के विरोधी थे। उन्हें यह अहसास कराया कि वे ही बापू के विश्वासपात्र हैं। इस तरह मतभेद दूर हुए।
                   
डॉ अम्बेडकर के साथ उनके भतभेद थे।1931 में गोलमेज कॉन्फ्रेंस के समय जब उन्होंने दलितों के लिये अलग से मतदान के अधिकार का प्रस्ताव रखा तो बापू ने इसका विरोध किया। विदेश के एक संगोष्ठी में जब डॉ अम्बेडकर के बोलने की बारी आयी तो  दलित के संदर्भ में बोलते - बोलते व्यक्तिगत आक्षेप पर उतर आये। जब बापू की बारी आयी तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा- ‘थैंक यू सर’। इस प्रकरण में आगे  जब प्रधानमंत्री के फैसला देने की घोषणा की गयी तो बापू ने कहा कि उसका विरोध करेंगे। स्वदेश वापस आते ही बापू को गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर बापू का फैसला था कि यदि प्रस्ताव हित में नहीं हुआ तो अनशन के जरिये विरोध करेंगे। बापू ने अपने जीवन में तीस बार अनशन किये। दिल्ली में किया गया अनशन आखिरी अनशन था।अनशन के दौरान जब अम्बेडकर मिलने गये तो बापू ने अपना पक्ष रखा। 

आखिरकार पूना पैक्ट हुआ और 141 सीटे मिली। जबकि गोलमेज कान्फ्रेस में 71 सीटों की बात चल रही थी। इतना ही नहीं उन्होने  दिल्ली में जबाहरलाल नेहरू को संविधान सभा के लिये कानूनी सलाहकार बनाने , तथा मंत्रिमंडल में शामिल करने की न सिर्फ सलाह दी बल्कि सूची में स्वयं नाम भी लिख दिये। जब जवाहर लाल नेहरू ने आपत्ति की तो गांधी का जवाब था कि मंत्रिमंडल कांग्रेस का बनाना है या राष्ट्र का? इस तरह अनेक मतभेद बापू ने मिटाये।  पर जिन्ना, चर्चिल, हरिलाल गांधी ,वीणाबाड़ज्ञ के साथ मतभेद बरकरार रहे।उन्होंने कहा कि  बापू सत्याग्रह को जीवन जीने की जहां शैली मानते थे, वहीं अहिंसा को शक्ति के रूप में देखते थे। सत्य की ताकत को समझते थें।

भाग-दो 

बापू द्विराष्ट्र् के सिद्धांत के प्रवल विरोधी थे । इस परिप्रेक्ष्य में उन्होंने कई उदाहरण दिये। भारत के विभाजन के सवाल पर गांधी ने कांग्रेस के समझौते का भी विरोध किया क्योंकि यह विभाजन धर्म आधारित था।बापू ने इस विभाजन को नहीं माना।
  
नोआखाली में बापू ने दो मंत्र दिये। पहला जिन पर जुल्म हुए हैं वे निर्भयता से रहें। इसे बापू ने अभयमंत्र कहा। अभय की परिभाषा देते हुए बापू ने कहा कि-‘ भय का वातावरण न डरकर और न डराकर पैदा करना ही अभय है। दूसरा जिन्होंने हमला किया है वे धर्म के सही अर्थ को सीखें और समझें। दुनिया का कोई भी धर्म किसी को मारना नहीं सीखाता है। अपने साथियों से कहा कि इसका प्रचार करें। पहले तो बापू ने सबको अकेले घुमने को कहा, फिर भाषा अवरोध को घ्यान में रखकर दो-दो की टोलियां बना दी। इस प्रकार बापू की टोली में तीन लोग रहे। उन्होंने इस प्रसंग को बड़े ही रोचक ढंग से रखा कि बापू के तीन अनुयायियों प्यारेलाल, डॉ सुषीला नायर और अमतुल सलाम ने लोगों को अभय, सेवा और तपस्या का पाठ पढ़ाया। आरंभ में उन्होंने कोलकाता उस प्रसंग की भी व्याख्या की जिसके प्रतिषोध में नोआखाली की घटनाएं हुई।

उन्होने बताया कि बापू ने शांति स्थापना के काम को कठिन माना और यहीं के एक गांव से नंगे पांव चलने का संकल्प लिया। नोवाखाली की यात्रा में बार -बार और निरंतर व्यवधान उत्पन्न किये गये। इसका जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक यात्रा में मनु वहन बापू के आगे- आगे चल रही थी। रास्ते में गोबर और मानव मल पड़े हुए थे। मनु वहन ने जाने से मना किया, लेकिन बापू ने सन के सीकें के झाडू से सफाई आरंभ कर दी। आसपास के लोगों ने बापू को सफाई करते देखा तो वे भी बापू के साथ शरीक हो गये। बापू ने उन लोगो से सिर्फ इतना ही कहा - ‘ यहां जो कुछ हुआ, वह धर्म के अनुसार नहीं हुआ। इसके कुछ ही दिनों के बाद बापू के अन्न छोड़ दिया और सिर्फ 600 कैलोरी प्रतिदिन ग्रहण करते थे और 16 घंटे काम करते थे। नोआखाली ने बापू को खबर मिली कि विहार मे भी दंगे हो रहे रहे हैं। यहां छह जिले प्रभावित हैं। उन्होंने अनशन की धमकी दी। इसका जादुई असर हुआ और दंगे बंद हुए।
  
बापू द्विराष्ट्र् निर्माण के विरोधी थे। इस बात को लेकर उनके मतभेद रहे। इसका विरोध यदि जिन्ना के पास किया तो पंडित जबाहरलाल नेहरू के पास भी। बापू के मुताविक द्विराष्ट्र् के मसले जनक मुस्लीम लीग नहीं , बल्कि अंग्रेज नौकरशाह थे। 1937 के चुनाव के बाद से ही इसकी पृष्ठभूमि बननी शुरू हो गयी और 1946 में यह हकीकत में बदलना शुरू हो गया। उन्होंने कहा कि बापू ने इसका विरोध किया।श्

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कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
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मो - 09304706646
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