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सितारा बनने से अच्‍छा है गंदी गली का लैम्‍पपोस्‍ट बनना।-अरुण कमल

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अक्तूबर 24, 2012 | बुधवार, अक्तूबर 24, 2012


  •  डॉ ओम निश्‍चल का आलेख




(यह अंश 'तद्भव' के अंक अक्टूबर2012 में किंचित संपादित रूप में छपा है। पाठकों के लिए अपनी माटी द्वारा इस कलेवर में फिर प्रस्‍तुत है। हम अखिलेश जी के संपादकत्व में प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका 'तद्भव' और ओम निश्‍चल के आभारी तो हैं ही। साथ ही युवा कवि अरुण देव के निर्देशन में प्रकाशित समालोचन जैसी वेब पत्रिका के आभारी है जहां ये समीक्षात्मक आलेख पहले छप चुका है उस पर फेसबुकी बहस भी बहुत हद तक आगे बढ़ी है।-सम्पादक)  

मनुष्‍य का जन्‍म किसी भी कविता के जन्‍म से बड़ा है
                        (न हि मानुषात् श्रेष्‍ठतरंहि किंचित् )

जटिल जीवन का श्‍लेष

जिसने सच-सच कह दी अपनी कहानी
उसे कैसे कहूँ कि इसे सजाकर लिखो
जिसके पास कुछ नहीं सिवा इस देह के
उसे कैसे कहूँ आज बाजार का दिन है।
जो खो चुका है घर-परिवार
उसे कैसे कहूँ पानी उबाल कर पियो। 
                               (हिचक, पृष्‍ठ 87)

मैं वो शंख महाशंख
अरुण कमल
राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.,
1 बी, नई दिल्‍ली-110002,
मूल्‍य: 150 रुपये
अरुण कमल के संग्रह मैं वो शंख महाशंख की यह कविता देख कर कहना पड़ता है कि विचारधारा को शिरोधार्य कर चलने वाले कवियों में अनेक ऐसे हैं जिनसे विचारधारा तो सध जाती है, कविता नहीं सधती। लगता है, विचारधारा कवि के सर पर चढ़ कर बोल रही है। इनसे उलट अरुण कमल ने कविता की रचना में विचारधारा का हस्‍तक्षेप उतना ही स्‍वीकार किया है जिस सीमा तक वह कविता के अंतस्‍तत्‍वों को ओझल न होने दे। तभी वे एक कविता में कहते हैं: सितारा बनने से अच्‍छा है गंदी गली का लैम्‍पपोस्‍ट बनना। उनकी कविता गरीबों, मजलूमों और करोडों नागरिकों की ओर से बोलती है तो इसलिए कि कवि के स्‍वर में लोक की पूरी समावेशिता है। इन कविताओं का भले ही कोई स्‍पष्‍ट राजनीतिक एजेंडा न हो, किन्‍तु हर कविता अपने आप में एक राजनीतिक पाठ भी है जिसे कविता की अस्‍थिमज्‍जा में गूँथने का अरुण कमल का अपना सलीका है। वे कविता लिखते हुए राजनीतिक होने के दर्प से परिचालित नहीं होते बल्‍कि विश्‍वसनीयता खोती राजनीति को कवि की अंतर्दृष्‍टि से निरखते-परखते हैं। तभी उनकी कविता राजनीतिक पाठ बनने के बजाय मनुष्‍य की संवेदना में समाते छल-कपट, अमीरों और अभिजात को पोसती व्‍यवस्‍था और जीवन का उपहास उड़ाती सत्‍ता का भाष्‍य बनती है। किसी सरकारी जनगणना के लहजे में नहीं बल्‍कि गिनती से छूट गए और कृपाकोर से छिटके हुए लोगों के जद्दोजहद को अपनी संवेदना, अनुभूति और अभिव्‍यक्‍ति का माध्‍यम बनाने वाले अरुण कमल ने यह गुण किसी समकालीनता के मुहावरे में सेंध लगा कर नहीं, बल्‍कि अपने स्‍वयं के कविता कौशल से आयत्‍त किया है।

उदारीकरण, भूमंडलीकरण और पूँजी के प्रभुत्‍व के चलते निरन्‍तर अकेले और निरुपाय होते जीवन को 'निर्बल के गीत' में पढा जा सकता है तो जिसके  वास्‍ते अदहन में न तो चावल पड़ने वाला है न चूल्‍हे में रोटी पकने वाली है, उस बेहिसाब विषण्‍ण जीवन की गरबीली गरीबी का ग्राफ भी 'जनगणना' जैसी कविता मे देखा जा सकता है। दाई से जैसे पेट का हाल नहीं छिपता, कवि की ऑंखों से भूमंडलीकृत समय का कोई कोना अदेखा नहीं छूटता। यह वही अरुण कमल हैं जो लिख चुके हैं: 'जैसे ही कौर उठाता हूँ, कोई आवाज देता है' । यह आवाज़ उस शख्‍स की है, जिसकी नाव डूब रही है, घर गिर रहा है, जो सिक्‍के-सा धूल में दब गया है, जो बेआसरा और बेसहारा हो चुका है, पंख झड़ते पक्षी की तरह --टूटी हुई सड़क की तरह---एक सूखी नदी की तरह। लेकिन जिसकी आवाज बेसुनी हो चुकी है। केवल कवि है उसकी वेदना पर कान लगाए कविता से गायब होते छंद और खबरों में समाते छंद के आशयों को उलटता पलटता। वह इस मत पर पहुँचता है कि जब कविता की देह से उतरे अलंकार अखबारों में शोभा बढ़ाने लगें तो कविता को और ज्‍यादा सपाट हो जाना चाहिए ताकि सचाई को किसी भी अलंकार और शोभाधायक निर्वचनों से ढँका न जा सके।

अरुण कमल जी 
निर्बलों के पक्ष में अरुण कमल अपनी आवाज शुरु से ही उठाते रहे हैं। वे तप रहे ब्रह्मांड की वेदना और तलवे जलाती रेत से निकली धाह की थाह लेने वाले कवि हैं। वे अपनी ही परंपरा की रूढ़ियों का समादर करने वाले, श्राद्ध के अन्‍न को कठिनाई से निगल पाने की पीड़ा से भरे और फल्‍गु नदी के अभिशप्‍त जल में तर्पण से अतृप्‍त चूल्‍हे की राख  में अपना पिंड ढ़ूढ़ते पितरों की संवेदना को शब्‍द देते हैं। वह जीवन के कर्मकांड के महज द्रष्‍टा नहीं, कर्मकांड के अनुष्‍ठानों को महज एक क्रिया में बदलते हुए देखने वाले कवि हैं जब अंतिम संस्‍कार के वक्‍त भी बंधु-बांधव हँसी मजाक में डूबे होते हैं, शव के स्‍वभाव पर मसखरी करते हैं, खैनी ठोंकना स्‍थगित नहीं करते और अंत में कानी उँगली से तप्‍त भूमि पर राम नाम लिख कर गंगा जल माथे पर छिड़क कर वापस चल पड़ते हैं। यही अवलोकन 'अंत्‍येष्‍टि' में है यही 'शोभायात्रा' में जहां हनुमान के नाम पर पैसा उगाहने का अभियान चलाया जा रहा है। ऐसे में एक सच्‍चा भक्‍त गर्भगृह की चौखट तक लगे दानकर्ताओं के नामपट्ट को देख  हतप्रभ है कि यह कैसी भक्‍ति है कैसा विनय कि तुम्‍हारे ही दिये को देकर दानी बन रहे?’ इस तरह अरुण कमल की कविता केवल राजनीतिकों की किये धरे की ही आलोचना नही करती, कर्मकांडों, अंधविश्‍वासों और धर्म के नाम पर अपकर्म में लगे लोगों की निंदा भी करती है।

अरुण कमल ने कभी शब्‍दों की शोभायात्रा नहीं सजाई। भारी भरकम शब्‍दों से सदैव परहेज किया। जन कवि न सही, जनता की पीड़ा को महसूस करने वाले कवि के तौर पर ही, तद्भव, अपभ्रंश, होठों पर आ धमकने वाले शब्‍दों की पूरी आवभगत उनके यहॉं दिखती है। भोजपुरी इलाके की आबोहवा उनकी कविता की निर्मिति में इस तरह गुँथी दिखती है कि वह अपनी बंकिम भंगिमा से दूर से ही पहचानी जा सकती है। गॉंव-देस के गठीले पद-प्रत्‍ययों से उनकी प्रीति पुरानी है। स्‍त्री को धान की बाली और जवा कुसुम से उपमेय मानते, पके जामुन की गंध से उसकी उपमा देते, आँख के कोवे-सी गंगा की चमक निहारते और पेड़ की देह की छूटी हुई छाल में एक वृद्धा की छाया अगोरते अरुण कमल भोजपुरी जन-जीवन के शब्‍दों, मुहावरों को लाने की कभी सयत्‍न कोशिश करते नही दीखते बल्‍कि सॉंसों की सहज आवाजाही की तरह वे अपनी कविता की पूरी मिट्टी ही जैसे इस आबोहवा से नम रखते हैं।

अचरज नहीं कि उनकी कविता में वंचितों, ठगे हुए लोगों, निरुपाय बच्‍चों और स्त्रियों के सबसे ज्‍यादा मार्मिक वृत्‍तांत हैं। 'चॉंपा' ऐसे ही अभागे बच्‍चों की कहानी है जो चोखा बनाने के लिए तेल लेकर लौटते हुए तेज भागते ट्रक की चपेट में आ गया है। कवि मान बहादुर सिंह की नृशंस हत्‍या पर एक मार्मिक कविता है यहॉं। एक कविता में खेत, जेवर सब कुछ गँवा चुके गरीबों और अभागों को देख कवि अचरज करता है कि अब कोई नहीं पूछता यह दुनिया ऐसी क्‍यों है बेबस कंगालों और बर्बर अमीरों में बँटी हुई। यही वह विडंबना है जो उन्‍हें छत्‍तीसगढ़, मणिपुर या कश्‍मीर में मारे जाते किसी शख्‍स और विदर्भ में जान देने वाले किसानों के लिए शोकार्त करती है, बजट की आलंकारिक खबरों में दबी सचाई से बाखबर करती है। उन्‍हें यह संसार एक निगेटिव फोटो सा दिखता है।

अरुण कमल अपनी कविता में एक ऐसा अलबम सजाते हैं जहॉं किसी दृश्‍य में पालथी मारे त्रिलोचन हैं कहीं पॉंव मोड़ बैठे केदारनाथ अग्रवाल, कहीं केशों, बरौनियों से बुहारे हुए रास्‍ते पर आते हुए दिनकर, कहीं विजेन्‍द्र एक पीले फूल को देख उसका नाम पूछते, घनी मूछों के पीछे मुस्‍कराते सुदीप बैनर्जी और कहीं समूह चित्र में उनके अनेक प्रिय लेखक-कवि। नामवर जी पर एक अलग ही कविता है यहॉं---'आलोचना पर निबंध' जिसके फ्रेम में नामवर जी की पूरी शख्‍सियत जैसे एक निगेटिव फोटो की तरह चमक उठती है। वे दिखते हैं यह कहते हुए: 'सबसे कठिन है कविता से प्‍यार। उससे भी कठिन उस कविता के पक्ष में संग्राम।' यह है प्रगतिशील कवि का अपना कुलगोत्र---जहॉं वह एक अर्द्धाली में कविता के शहद की टोह लेता हुआ यह चुटकी लेने से नहीं चूकता कि 'कितनी कम है कला कलावादियों में अलि!'

जैसा कि ऊपर कहा गया है, अरुण शब्‍दों की शोभायात्रा के कवि नहीं हैं। उनकी कवि चिंता से ऐसी कोई चीज परे नहीं है जो किसी एक का भी रोयॉं दुखाती हो। सरकार और भारत के लोग कविता सरकार की उस हर कारगुजारी पर एक सटीक टिप्‍पणी है जहॉं कोई भी चीज अपनी धुरी पर मुकम्‍मल नहीं है। एक जुगाड़ जैसी चीज में तब्‍दील होते गए सरकारी तंत्र का यह हाल है कि अस्‍पताल अस्‍पताल नहीं रहे, स्‍कूलों में बच्‍चों के पास पढ़ने के अलावा दीगर सारे काम हैं---राशन की दुकानों में राशन, घासलेट की दुकान पर घासलेट, नलों में पानी--- सब कुछ नदारद। हर दो मील पर रंगदारमौत जहॉं एक संभावना भर नहीं, दुश्‍चिंता का दूसरा नाम है, जिसकी जद से कोई भी बाहर नहीं है और सरकारी तंत्र को विफलता के चरम बिन्‍दु तक ले जाकर सारे दुधारू कल कारखाने बेचने पर तुली व्‍यवस्‍था। ----कवि की अकेली यह कविता और  मैं किसकी ओर से बोल रहा हूँ  जैसी कविता हमारे आधुनिक होते लोकतंत्र के पीछे हमारे रुढ़िवादी चिंतन की कलई खोलती है। संधिपत्र जीवन में समाए दोगलेपन की कहानी है तो इच्‍छा थी एक ऐसे अकिंचन नागरिक का यथास्‍थितिशीलता में जीवन बिता देने का नियतिवादी आख्‍यान है जब इतना कट गया, बाकी भी गुज़र जाएगाजैसी मस्‍ती कवि के स्‍वरों में बोल रही हो तो आम नागरिक की भला क्‍या बिसात। मैं वो शंख महाशंख  इसी आम नागरिक  की जीवन चर्या का विह्वल कर देने वाला कवित्‍त है जिसकी अनुगूँज में जीवन का वह छंद सुनाई देता है जो हर तरफ छल-छंद से भरा है।

अरुण कमल अपने हर नए कविता संग्रह में अपने पिछले संग्रहों से आगे बढ़ते हैं। अपनी केवल धार, सबूत, नए इलाके में और पुतली में संसार से होते हुए इस संग्रह में उन्‍होंने फिर कविता का एक वैविध्‍यपूर्ण संसार रचा है। उनकी कविता दीन दुखियों के ऑंसू पोछती है तो सम्मुख दीखती दुनिया के भीतर चलते हाहाकार की खबर भी लेती है। भाषा के सीधे सादे स्‍थापत्‍य में वे अकसर ऐसी बातें कह जाते हैं जो अलंकरणों से लदी फँदी कविता नहीं कह पाती। अभिधा को अगर अभिव्‍यक्‍ति की एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जाए तो उनके यहॉं इसका सौष्‍ठव देखते ही बनता है। गौरतलब यह कि अब वे इकहरी संवेदना को लॉंघ कर अभिधा की उस ऊँचाई पर आ गए हैं जहॉं पहुँच कर ही इस जटिल जीवन के श्‍लेष को व्‍यक्‍त किया जा सकता है।



समीक्षक  

बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ
    ♥(¯*•๑۩۞۩~*~विजयदशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाएँ!~*~۩۞۩๑•*¯)♥
    ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ

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