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घोर स्त्री विरोधी समय में स्त्री के पक्ष में कविताओं का अनुवाद:By प्रेमचंद गांधी

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, अक्तूबर 18, 2012 | गुरुवार, अक्तूबर 18, 2012





हिन्दीजगत के युवा रचनाकारों की जमात में अच्छा खासा नाम रखते है।
देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं.इनका एक ब्लॉग है।
'कुरजां' पत्रिका के सम्पादक हैं. मूल रूप से कवि है।
कविता संग्रह 'इस सिंफनी में', निबंध संग्रह 'संस्कृति का समकाल' प्रकाशित।
जानेमाने स्तंभकार, कुरजां जैसी पत्रिका के प्रवेशांक से ही चर्चा में हैं। 
लक्ष्मण प्रसाद मंडलोई और राजेन्द्र बोहरा सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। साहित्य के साथ ही सिनेमा में भे लेखनगत रूचि है।
कुछ समय से  'हे मेरी तमहारिणी'  श्रृंखला से कवितायेँ लिखी है।







मो 09829190626,



(ये कवितायेँ और अनुवाद कहीं न कहीं इस घोर स्त्री विरोधी समय में महिलाओं के बारे में विलग ढंग से सोचने को प्रेरित करता हुआ लगता है। ये अनुवाद कार्य भाई प्रेमचंद गांधी ने किया है जो हमेशा नए रास्ते बनाने के आदी प्रतीत होते हैं। एक धारणा ये भी बन रही है कि एक तरफ इस अनुवाद कार्य और नवरात्रि जैसे पर्व के समान्तर रूप से आगे बढ़ने को लेकर भी कुछ वैचारिक अर्थ छीपा हुआ है।हमारे समाज के पुरुष वर्ग को प्रश्नों के ढ़ेर में खड़ा करने के मकसद से किये गए अनुवाद को हम यहाँ छाप कर एक दायित्व के निपटान का भी अनुभव करते हैं।-सम्पादक)




(1)
मां के आंसू 
............ 
यह बहुत ही गंदी और ख़तरनाक दुनिया है 
किसी भी बच्चे को जन्म देने के लिए, 
फिर चाहे लड़का हो या लड़की 

बिना इस बात से डरे कि कहीं उन्हें 
ना चाहते हुए भी किसी गैंग में शामिल हो जाना है
या कि जीना है किसी नशेडि़यों वाली गलियों में 
बेफिक्र उस डर से जिसमें उन्हें तोड़ने हैं तमाम कानून 
और इन्कार करना है किसी भी स्कूल में जाने से
और भटकना है सड़कों पर आवारा
उन ख़तरों से अंजान बनकर जो टकरा सकते हैं
जिंदगी के किसी भी मोड़ पर
बिना इस बात से डरे कि कम उम्र में ही
वे जन्म दे देंगे बच्चों को
कि विद्रोही हो जाएंगे अपनी मांओं से
उन सब डरों से डरे बिना जो कि वे हो सकते हैं

एक ऐसी सरकार जो कहती है कि
‘’आइये और सेना में शामिल हो जाइये’’
मांओं के आंसुओं से कब्रिस्तानों में बाढ़ आ गई है
और मैं महसूस करती हूं कि
मैं वो वह कभी नहीं चाहूंगी
जो मेरे पास अभी तक नहीं है।

मूल कविता :-*शेरी एन स्लॉटर *



(2)

एक खाली कोख 
__________

मैंने नहीं देखी कोई कविता 
मासिकधर्म की बदसूरती के बारे में 
वैसे ऋतुचक्र चमत्कारिक होते हैं 
चंद्रमा की चाल नियंत्रित रखती हैं हमारी जिंदगियां 
रक्तिम लाल फूलों के सुंदर अवशेष 
वे हमारे स्त्रींत्व की निशानियां हैं 
हमारी शक्ति
कुदरत के साथ हमारा पक्का रिश्ता

मैंने कभी नहीं देखी कोई कविता
जो बताती हो उस उत्सुक इंतज़ार को
ना पाने की नहीं
बस रक्तिम निशान पाने को
बारंबार फिर से
यह जानते हुए कि मासिकधर्म
चमत्कारिक नहीं हैं
गहरे लाल फूल सिर्फ निशानी हैं
एक खाली कोख की

मैंने कभी नहीं पढ़ी कोई कविता
जो बताती हो कि मासिकधर्म एक मानसिक अवस्था है
यह कि एक खाली कोख भी
बहुत खूबसूरत होती है

जब मैं देखती हूं ये कविताएं
मैं जान जाती हूं कि
बांझ स्त्री भी लिखती है कविताएं।

मूल कविता:-*एलिसन सोलोमन *



अनुदित कवितायेँ उनके फेसबुक लिंक से ली गयी है। जहां वे लगातार अनुदित रचनाएं साझा कर रहे हैं।
उनकी और रचनाएं यहाँ देखिएगा।
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