Latest Article :
Home » , , » Happy Birth Day to रामनाथ सिंह अदम उर्फ अदम गोण्डवी:

Happy Birth Day to रामनाथ सिंह अदम उर्फ अदम गोण्डवी:

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, अक्तूबर 21, 2012 | रविवार, अक्तूबर 21, 2012

  • अदम गोंडवी के जन्म दिन 22 अक्टूबर पर केन्द्रित 
  • विद्रोह की चेतना जगाती अदम गोण्डवी की कविताएँ
  • आलेख-कौशल किशोर
(उनकी कवितायेँ कालजयी लगती है।वे हमारे बीच से ऐसे कैसे मर सकते हैं।कभी नहीं मरेंगे अदम गोंडवी जी।उनकी रचनाओं के ज़रिये वे आज भी हमारी भटकती जनता में एक होंसला फूंक सकते हैं। उनके जैसी बेबाकी,अब चाटुकारिता के इस दौर में भला कहाँ मिलेगी।उनके जैसी फक्कड़ी और घुमक्कड़ी केवल सपना ही हो सकती है।अपनी माटी वेबपत्रिका परिवार की तरफ से उन्हें शब्दांजली और लाल सलाम।-सम्पादक )

मानवता का दर्द लिखेंगे, माटी की बू-बास लिखेंगे।
हम अपने इस काल खण्ड का नया इतिहास लिखेंगे।

ये काव्य पक्तियां जनता के लिए जनता की जुबाँ में शायरी करने वाले कवि रामनाथ सिंह अदम उर्फ अदम गोण्डवी की हैं जिन्होंने अपनी कविता के माध्यम से न सिर्फ मानवता के दर्द का बयान किया है, अपनी जमीन व माटी के ‘बू-बास’ से रू ब रू कराया है बल्कि उनका साहित्य एक ऐसा आईना है जिसमें हम अपने दौर व इसके इतिहास को देख सकते हैं। यही कारण है कि प्रसिद्ध आलोचक डॉ0 मैनेजर पाण्डेय को भी कहना पड़ा है ‘कविता की दुनिया में अदम एक अचरज की तरह हैं।’ इस ‘अचरज’ को समझा जा सकता है। जहां हिन्दी की समकालीन कविता अभिजन भाषा व जटिल बिम्बों व प्रतीको में उलझी करीब करीब अपठनीय सी हो गई हो, वहां अदम की कविता जनता की भाषा में जनता के दुख दर्द की बात करती है, उसकी जड़ता को तोड़ती है और उसे नई चेतना से भर देती है। यह जहाँ खड़ी है, वह हिन्दी.उर्दू की सियामी जुड़वा जमीन है, जिसकी आत्मा जनभाषा की है। अदम ने जिस फार्म को विकसित किया वह गजल के मूल और पारंपरिक स्वभाव से भिन्न है। ये गजलें देशज और प्रतिरोधत्मक अंतर्वस्तु लिए हुए हैं तथा राजनीतिक व्यंग्य इन्हें मारक बनता है। अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से अदम की गजलें लोगों की जुबान पर तथा उनकी स्मृतियों रच.बस गई हैं। 

अदम गोण्डवी 1980 के दशक में अपनी व्यवस्था विरोधी तथा आंदोलन परक कविताओं से चर्चा में आये। ‘चमारों की गली’ उन्हीं दिनों लखनऊ व इलाहाबाद से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ में छपी। यह कविता अपनी विषय वस्तु और तेवर को लेकर काफी चर्चा में रही। अदम उत्तर प्रदेश के गोण्डा जिले से आते हैं जो राजाओं, सामंती प्रभुओं के दबंगई व उनके अत्याचार के लिए कुख्यात रहा है। सामंतों के दबदबे वाले समाज में ‘चमारों की गली’ जैसी कविता लिखना, सीधे उन्हें चुनौती देना था। अदम की रचनाशीलत इन्हीं प्रभुओं से टक्कर लेती आगे बढ़ी। हम पाते हैं कि उनकी इस रचनाशीलता का विकास आगे के दिनों में व्यवस्था को बदलने की चेतना तक हुआ।

अदम का जन्म 22 अक्टूबर 1947 को अर्थात उस साल हुआ, जब देश आजाद हुआ था। आजादी के जवान होने के साथ वे जवान हुए। उन्होंने इस आजाद हिन्दुस्तान में गरीब को गरीब और अमीर को और अमीर होते देखा और बढ़ती विषमता को अपनी कविता में इस तरह व्यक्त किया: ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है’ और ‘ कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिए, असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है’। अदम की कविताएँ व गजलें इस राजनीतिक तंत्र पर पुरजोर तरीके से चोट करती हैं। इस आजादी के रामराज का भोग कौन कर रहा है ? ‘काजू भुने हैं प्लेट में, व्हिस्की गिलास में। उतरा है रामराज विधायक निवास में।’ यह तंत्र आमजन को तबाह.बर्बाद कर रहा है। वह विपन्नता व दरिद्रता में जीने के लिए बाध्य है। इसके लिए आजादी का कोई अर्थ बचा है क्या ? अदम इसी जनता का पक्ष लेते हैं और पैसे के बूते सत्ता पर काबिज तस्करों व डकैतो की इस व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा खोलते हैं। जनता की जबान में जनता का दुख.दर्द बयाँ करते हैं: ‘आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह/जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में’। अदम इस व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हैं। इनकी कविता में जिन्दगी व समाज को बदलने की ललकार है, व्यवस्था के विरुद्ध बगावत है: ‘जनता के पास एक ही चारा है बगावत/ यह बात कह रहा हूँ मैं होशो.हवास में’।

जहां कबीर धार्मिक पाखण्ड को निशाना बनाते हैं, वहीं अदम राजनीतिक पाखण्ड व धोखाधड़ी व बेईमानी पर चोट करते हैं। इनकी कविताओं में कबीर जैसी निडरता व साफगोई है। अदम का जीवन उस किसान की तरह रहा है, जो मौसम और समय की मार झेलता है। अन्न पैदाकर सबको खिलाता है, पर अपने भूखा रहता है, अभाव में जीता है। अदम का जीवन अभाव में बीता। हालत यह रही कि जब वे गंभीर रूप से बीमार पड़े तो उनके इलाज के लिए धन नहीं था। लेकिन इसे लेकर उनके मन में कोई मलाल कभी नहीं रहा क्योंकि वे आम आदमी के जीवन की हकीकत अच्छी तरह जानते थे। उनके लिए कविता करना धन व ऐश्वर्य जुटाने, कमाई करने का साधन नहीं रहा बल्कि उनके लिए शायरी करना, गजलें लिखना सामाजिक प्रतिबद्धता थी, समाज को बदलने के संघर्ष में शामिल होने का माध्यम था। देखने में वे धोती और कमीज पहने गंवार सा लगते लेकिन मंच से जब वे कविता पढ़ते तो सुनने वालों को अन्दर तक हिला देते। जनता की चेतना को बदल देने वाली उनकी कविताएँ ऐसी हैं कि जहां अदम सशरीर नहीं पहुँच पाये, वहां भी उनकी कविताएं पहुँच गई। । यहाँ दुष्यन्त की तरह की तल्खी व बेबाकपन है, वहीं गोरख पाण्डेय की तरह व्यवस्था को बदलने की छटपटाहट है। वे चाहते हैं कि कविता, अदब मुफलिसों की अंजुमन तक पहुँचे, उनकी आवाज बने: ‘भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो/या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।’

आजादी के बाद की ऐसी कौन सी समस्या है जिस पर अदम ने कविताएँ नहीं की है। 1990 के दशक में जब साम्प्रदायिकता जैसी समस्या से देश जूझ रहा था। उन्होंने साम्प्रदायिकता के खिलाफ कविताएँ की। साझी संस्कृति की रक्षा के लिए चले आंदोलन में वे न सिर्फ शामिल थे बल्कि वे जानते थे कि यह सब भूख व गरीबी के खिलाफ चल रही लड़ाई को भटकाने की साजिश है। इसलिए वे कविता में आहवान करते हैं: ‘छेड़िए इक जंग, मिलजुल कर गरीबी के खिलाफ/ दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िए’। 

अदम की दो कविता पुस्तक प्रकाशित हुईं। उनकी गजलों और कविताओं का संग्रह ‘धरती की सतह पर’ और ‘समय से मुठभेड़’ काफी चर्चित और लोकप्रिय रहा है। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार रहे। पहले उनका इलाज गोण्डा में चला, बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ लाना पड़ा जहां पिछले साल 18 दिसंबर की सुबह उन्होंने हमारा साथ छोड़ दिया। जब वे बीमार थे, उनके कविता संग्रह ‘धरती की सतह पर’ की बड़ी मांग थी। पर वह कही उपलब्ध नहीं था। ऐसे में अदम ने इसके नये संस्करण के प्रकाशन की इच्छा जाहिर की। किताबघर प्रकाशन ;24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002, मूल्य: एक सौ रुपयेद्ध ने अदम के परिवर्धित संस्करण को अभी हाल में प्रकाशित किया है। इसमें अदम की चौहत्तर कविताएं संकलित हैं। इस संग्रह में अपने जीवन के अन्तिम दिनों में लिखी उनकी आखिरी गजल भी शामिल है जिसमें वे कहते है।:

‘घूसखोरी, कालाबाज़ारी है या व्यभिचार है/
कौन है जो कह रहा भारत में भ्रष्टाचार है.........../
जब सियासत हो गई है पूँजीपतियों की रखैल/
आम जनता को बगावत का खुला अधिकार है।’ 
 
  1. इससे जुडी हुयी अन्य रचनाओं में कौशल किशोर का लेखन यहाँ पढ़ा जा सकता है 
  2. साथ ही जाने माने शायर अदम गोंडवी साहेब से जुडी रचनाएं यहाँ 

समीक्षक 
जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,
लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,
राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017 है.
मो-09807519227
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template