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कट-कोपी-पेस्ट जिंदाबाद:हेमंत शेष की एकमुश्त 14 कवितायेँ

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, नवंबर 24, 2012 | शनिवार, नवंबर 24, 2012






(एक माफी के साथ कि  हम कट-कोपी-पेस्ट तकनोलोजी से साधिकार यहाँ सामग्री परोसते रहते हैं। पाठक हित और अच्छे रचनाकार के प्रचार-प्रसार में हमें किसी बात की शर्म नहीं आती। हम बेधड़क सामग्री कहीं उठाते हैं और यहाँ चस्पा कर देते हैं।आज वरिष्ठ कवि और कलाविद हेमंत शेष का नंबर आ गया ।मूल लिंक था -सम्पादक )

हेमंत शेष


(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)

संग्रह: “घर-बाहर” ( 1984) में प्रकाशित चौदह कविताएँ

1.
जल गई है ज्यों रोशनी घुप्प रात में
ठहरी हुई कोई बात है मन में
और सब कुछ गुपचुप है

यह कोई घर है या कोई पर्व उचाट

हर चीज़ चहकती है और सुन्न पड़ जाती है
अंजाम जब यहाँ बरसात की तरह गिरता है स्तब्ध हो जाते हैं लोग
क्या होगा अब क्या होगा अलौकिक और अनसुना

जिसके दाँतों में दफ़न है एक आत्मकथा वह तटस्थ और भूरा पालतू कुत्ता
निर्विकार ऊंघता है

कई बार बहुत कुछ घटित हो जाता है पल भर में
और कई बार कुछ भी नहीं होता बरसों तक

यह कोई घर है कि कोई पर्व फिर पूछेंगे लोग और चुप होंगे
लोग लोग हैं और चुप होते और पूछते रहेंगे
फिर भी इस घर-पर्व में

2.
याद आती हैं कुछ घटनाएँ जिनसे बदल गया है यह घर
ज्यों कोई स्वप्न

कमरों में पुराने वस्त्रों की सलवटें भर गई हैं याददाश्त में सांत्वनाएँ

मैं सूँघता हूं आसपास न जाने कैसी सुगंध उड़ती है सवेरे रसोईघर से
वही एक नन्हीं लड़की रोती है जो हर दिन बड़ी होना सीखती है

अपने मामूली मासूम असमंजस में
यकीनन आज दुनिया वैसी नहीं है- थी जो इस घर में कल

3.
कितना निष्प्रभ और निष्कलंक है यह निर्वात जो
हमारे बीच पानी के बुलबुले की तरह सिर उठा कर खड़ा हो गया है

निश्चय ही अपनी माँ को उत्तरदायी नहीं मानता मैं
कि वह क्यों नहीं बोलती मुझ से
जब मैं खूब उद्दंडता का व्यवहार करता हूं

मेरा मन जब करता है दोस्तों के साथ चल देता हूं काम छोड़ कर
या रात को जब वह सोती है
तेज़ रोशनी में कुछ लिखता-पढ़ता हूं

यकीनन रंग बदलते हैं उन रेशमी गुच्छों के
जो संबंधों की सूरत में हमारे बीच हिलना चाहते हैं

माँ के क्रोध और मोह में
सब कुछ आया-गया हो जाता है
भला या बुरा और एक निर्वात उठाता है सिर
और पानी के बुलबुले सा छा जाता है-
पहले सब पर- फिर इस घर पर

4.
शिकायत का मसला है यह कि बिना इत्तला दिये मैं घर से बाहर
खाना खा लेता हूं और रोटियाँ कुत्तों को डालनी पड़ती हैं
गेहूं बहुत मंहगा है इन दिनों और मेहमाननवाज़ी भारी पड़ती है

शिकायतें बहती हैं बिजली के बिल में
शिकायतें लेटती हैं बिस्तरों में
शिकायतें पीनी पड़ती हैं हर दिन चाय में
सहिष्णु है यह घर भी जो सहता जाता है इन अराजकताओं को
हर दिन हर साल, बस, बिना शिकायत
अपने मामूलीपन में...

5.
माँ जो मेरी माँ है- है...
या यह एक घर है यह समूचा विश्व

चीख-पुकार रोना-गाना गुनगुनाना कर सकते हैं यहाँ लोग

शरणगाह है घर और शरण मेरी माँ
जो देखती है सब कुछ निरपेक्ष कि मैं केवल कविता रचना जानता हूँ
परेशान क्यों नहीं हूँ उस कर्ज़ के लिए जो कभी हम पर रहा था

मुझे अनुमान हैवह बहुत सुखी और निश्चिन्त दिखना पसन्द करेगी
जब तब्दीलियाँ छोटी-मोटी होंगी और सब कुछ भला-चंगा छोड़ जाना चाहेगी
वह इस घर में अपने अलावा,
अपनी देह से बाहर जाते, अपने बाद!

6.
घर के घमासान में भर गई है सीलन
जिसके नीचे मैं उदासी के नाखून कुतरता हूँ

तारीखों के पत्थर रोज़ हमारी सहनशक्ति के सिर पर बरसते हैं

किसे चिन्ता है कि यह घर किस तरह चल रहा है
हम खुश हैं या उदास किसे परवाह है
हमने कब से नए वस्त्र नहीं सिलवाए
सब इन प्रश्नों के उत्तर भूल गए हैं

बस रोज़ आठ के साइरन पर पिता घर से निकल पड़ता है
स्कूलों में बच्चे और घर में स्त्री पिटने के लिए ही बने हैं
अंधकार का प्लास्टर दृश्यों पर झर रहा है

लगातार और निःशब्द चल रही है जैसे एक लड़ाई

फिर बहेगा अदृश्य खून और बात-बेबात बच्चे पीटे जाएँगे
किन्तु इस प्रसंग पर टीका करने के लिए जैसे
कोई अधिकृत ही नहीं घर की दुनिया में

7.
घर तेजाब की बोतल नहीं महज़ उसकी गंध है
जो माँ की उदासी से शुरू होती है और उसके सपनों पर खत्म

घर के शोरबे में सम्बन्धों की हड्डियाँ खड़कती हैं
स्त्रियों के लिए चहकने की कोई गुंजाइश नहीं

वे जानती हैं कि उनकी जगह सिर्फ़ रसोईघर में है
और उन्हें सबसे आखि़र में करना है भोजन

पर इन दीवारों के पीछे एक और दुनिया है
जहाँ बच्चे अपने रोज़ बेवजह पीटे जाने का सबब ढूँढते हैं

बाबा चाहते हैं कि मरने से पहले वह बेटों का हिल-मिल कर रहना देख लें

यहाँ स्वप्न देखे जा रहे हैं जागते हुए और लोग झगड़ रहे हैं नींद में प्यार करते हुए
मोम लगातार बहता है मोह का
माँ की उदासी हमेशा किसी पुराने नामुमकिन सपने पर खत्म होती है.....!

8.
निरन्तर चल रहा है एक युद्ध घर में सदियों से बेआवाज़
साल-दर-साल लहूलुहान होते जाते हैं लोग और
ताज्जुब यह कि इन चेहरों पर कोई खरोंच या शिकन तक नहीं

रोज़मर्रा की अदृश्य मुठभेड़ों से आहत घर
किसी वारदात पर कभी तो खड़क उठता है सूखे पत्ते की तरह
कभी चहकने लगता है पल भर में
घर की दुनिया के रंग बदलते हैं क्षण-क्षण में

कैसी है यह खामोश चीख़ जो सीने के भीतर से उठती है हूक की शक्ल में
और चारों तरफ़ से अभाव-बोध की पीली रोशनी बरसने लगती है

कागज़-पत्र, बर्तन-भाँडे, द्वार-पाट डूब जाते हैं नतशिर

फिर किसी इन्तज़ार में कि दोबारा कुछ घटेगा अनबूझा
और बहस की सिगड़ी सुलग जाएगी
मौन का नीला बर्फ़ जो झगड़े के बाद इस घर में जम गया है-पिघलेगा
और चाय सुड़कते हुए नाराज़ लोग धीरे से बातचीत का रुख़
फिर आने वाले त्यौहार की तैयारियों ओर मोड़ देंगे !

9.
मैं लौटता हूँ घर आधी रात हो जाने के बाद
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती बत्तियाँ और मन में आशंका के बीज
रात उतरती रहती है निःशब्द और चीजें घुलना शुरू हो जाती है अंधेरे के रसायन में

कौन खोलेगा द्वारा इतनी रात गए ? किसकी नींद खराब होगी ?
हो सकता है घर में जागता हो कोई...

अभी-अभी शहर की घड़ी दो बजा कर सो गई है और मोहल्ले भर में शान्ति है

कितना अशिष्ट है दरवाजा भड़भड़ा कर इसे भंग करना
पर कौन कहे इनसे कि यह महज़ मकान नहीं, घर है
चाहे रात हो या दिन : यह हर हालत में हरने वालों के लिए खुला है
बेलाग और आत्मीय !

10.
कल ये भी बदलेंगे पेड़ों के चेहरे,
और मैं कहूँगा कि न जाने किस रफ़्तार से बदल रहा है विश्व
एक दिन ऐसा भी होगा कि हम अपनी सूरतें तक न पहचानेंगे ....

बदलाव की छायाएँ देखते-देखते गिरफ़्त में ले लेती हैं चीजों के हाथ
असमंजस ओस की तरह बरसने लगता है

एक लड़का एकाएक जिम्मेदार हो जाता है घर में
और पतलून पहनना शुरू कर देता है

उसकी नेकर देखते-देखते अतीत हो जाती है
... बस, हम सब पर हँसते हैं - समय के दाँत!

11.
दुर्घटना के नाख़ून आहत कर देते हैं घर की देह
और स्त्रियों की आँखें आंसुओं से भर उठती हैं

इन्हीं दृश्यों को देखते हैं हम बारंबार:

औरतों का रुदन बच्चों की जिद और घर के आदमी का क्रोध
इस घर ने सर्दियों से वही बरसाती पहन रखी है

जिसकी बाँहों पर महत्वाकांक्षा की धूप के चिकत्ते हैं
गहरी उदासी भर गई है उम्र की अलमारी में

कागज़ों पर मैं उथल-पुथल करता हूँ अभाव और अपनत्व की एक दुनिया
जिसका रंग बाप के गुस्से और माँ की निरीहता से बहुत कुछ मिलता-जुलता है

बेफ़िक्र एक बच्चा मेरे भीतर अभी तक पतंग उड़ा रहा है
जिसे दरअसल इस वक्त पहाड़े रटने के लिए स्कूल में होना था !

12.
यह चीख़ बेआवाज जैसे उदासी में विलीन होती चिड़िया !
बहुत बदरंग है जहाँ-जहाँ जीवन का टाट
मैं उस मुहिम से अपनी बात शुरू करता हूँ

आयु के कोट पर फफूँद जम गई है और
घर की खिड़कियाँ अभाव की बरसात से रंगहीन हो गई हैं

इस छोटी बच्ची को उस शिला का क्या पता
जो उसके पैदा होते ही पिता के सिर पर लद गई है

हर संताप एक शिला की तरह लदा रहता है उम्र भर
और विरासत में छोड़ जाते हैं हम अभाव

बरसता रहता है जो- घर भर पर जीवन भर

13.
चक्की चल रही है घर के कारोबार की
वक़्त  पर दूध न मिलने की विवशता में वह छोटी बच्ची निरंतर रो रहा है
क्रुद्ध पिता का वास्ता इस बात से कतई नही
दफ़्तर जाने से पहले बस इसी बात को ले कर उसकी मां पर उबल पड़ सकता है

मैं कविता की खिड़की पर खड़ा-खड़ा दृश्यों की एकरसता के मोम में भीगता हूं
देख सकता हूं लगातार उपेक्षा और कफ़ ने बाबा को अशक्त और जर्जर बना डाला है

इस फालतू सामान से ज्य़ादा उनकी कोई अहमियत अब नहीं घर में
जहां स्वेटर बुनती पड़ौसनें दोपहर में इकट्ठी होकर
गुलगपाड़ा करती हैं और मैट्रिक में पढ़ता लड़का बीजगणित से माथापच्ची
उसी घर का पालतू कुत्ता धूप में बस ऊँघ रहा है

रात में रोशनियाँ व्यर्थ जली न रहें या सर्दियों में शाम आठ बजते-बजते लोग खा पी लें या
नियम से दूध वाले और अख़बार वाले का हिसाब चुकता कर दिया जाय या
हर सोमवार दीवालघड़ी की चाबी बेनागा भर दी जाय

इन सब क्रियाओं का एक ही अर्थ है-
घर की चक्की को चाहिये पीसने को हमारी नींद, हमारी सेहत, हमारी महत्वाकांक्षाएँ,
घर में वह चल रही है शताब्दियों से और लोग
उदासी के सन्ताप में खुश हैं पिसते हुए !

14.
बिल्कुल यही वक्त है घर लौटने का हार-थक चुकने के बाद
सड़कों पर बत्तियाँ धुंधली पड़ गई हैं और
दुकानों के शटर गिर रहे हैं
बाजार में तुम्हारी कोई बाट नहीं जोहता

प्रतीक्षा और व्यग्रता का रंग गाढ़ा होता है घर के बर्तनों में
पदचापों का इन्तजार कर सकते हैं केवल घर के कान
यह दरवाज़ा तुम्हें अक्सर देर रात गए घर लौटते देखता है
आश्चर्य की लौ डबडबाती है खिड़कियों की आँखों में
और प्रतीक्षा बहनी शुरू हो जाती है

कल भी यह दृश्य ऐसा ही रहेगा
वैसा ही रहेगा इन्तज़ार
वैसे ही सड़कों की बत्तियाँ धूमिल पडे़गी और
इन्तज़ार करती वही एक सृष्टि अपने क्रोध और बेबसी के बावजूद
तुम्हारे लिए खुली रहेगी : हमेशा सी अन्तरंग और बेलाग !!
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2 टिप्‍पणियां:

  1. हेमंत शेष की सभी कवितायेँ अलग अलग मनःस्थितियों और संवेदनशीलताओं में जीती हैं और पाठक के मन को उन्हीं अहसासों से भिगो देती हैं. हर कविता को पढ़ कर रोज़मर्रा की कशमकश नए चेहरे लगा कर चली आती दिखाई देती है और झकझोर देती है.
    इन नायाब कविताओं के लिए मानिक जी आपको धन्यवाद. हेमंत शेष तो हमेशा और हर बार आनंद देते रहते ही हैं.
    कमलानाथ

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