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डॉ मनोज श्रीवास्तव की कहानी 'कम कनिका! आई ऐम रेडी'

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, नवंबर 01, 2012 | गुरुवार, नवंबर 01, 2012

कम कनिका! आई ऐम रेडी
डॉ मनोज श्रीवास्तव

सुबह की चाय पीने के बाद तनुजा जैसे ही टॅायलेट में घुसी, उसे ध्यान आया कि आज तो इतवार की छुट्टी है। वह ख़ुद पर हँस पड़ी, "फ़िज़ूल में मैं इतनी ज़ल्दबाज़ी कर रही हूँ।" लेकिन, टॅायलेट से निकलते ही अपने सामने विट्ठल को देख, वह ठिठक गई, "अरे हाँ, याद आया। कल रात तुम कह रहे थे कि आज तुम्हारे यहाँ कुछ डेलीगेट्स आ रहे हैं। ठीक है, तुम बाथरूम से निपटकर निकलो, मैं तुम्हारा लंच-बॅाक्स फटाफट तैयार करती हूँ..."

विट्ठल के आफिस जाने के बाद वह कुछ मिनट बाहर लॅान में टहलती रही। फिर, वह अंदर चली गई और झाड़ू-पोछा तथा रसोई के बाकी काम से निपटकर वापस लॅान में आ गई जहाँ गुड़हल के तने से पीठ सटाकर बैठ गई। पतझड़ की शुष्क बयार के थपेड़ों की मार से गुड़हल की पत्तियों का सारा रक्त निचुड़ चुका था और अब तो वे शाखाओं से जुड़े रहने का दमखम भी खो चुकी थीं। इसलिए वे डालियों से अपना रिश्ता तोड़कर शुष्क जमीन पर निढाल गिर-गिरकर बिछती जा रही थीं। उसने कुछ निर्जीव पत्तियों को हटाकर जमीन को अपनी दाईं हथेली से टटोला। जमीन में अभी भी नमी बरकरार थी। वह यह सोचकर हैरान हो रही थी कि जब पेड़ के नीचे की जमीन इतनी नम है तो उसमें इतनी जल्दी पतझड़ क्यों आ गया। पर, यह सब तो मौसम की कारगुजारियाँ हैं। इस साल, पतळाड़ कुछ पहले ही आ गया है। कोई सात सालों बाद इतने घने कुहरों का कहर बरपा है। इधर हर साल, ठंड का मौसम कुछेक हफ़्तों में फ़ुस्स बोल जाता रहा है। लेकिन, इस साल बाप रे बाप! भीषण कुहरों के कारण खूब सड़क और रेल दुर्घटनाएं हुईं। लोग-बाग बीस-बीस घंटे लेट-लतीफ ट्रेनों की बाट जोहते रहे और आख़िरकार, मंजिल तक पहुँचकर ही दम लिया।
तनुजा ने अपनी देहयष्टि पर बार-बार निग़ाह फेरी। यों तो पैंतीस की होकर, वह चालीस के आसपास की लगती है; लेकिन, उसके भीतर की औरत अब भी पूरे यौवन पर है और उसमें इतनी ऊर्जा है कि वह कम से कम दस साल तक प्रत्येक दूसरे वर्ष माँ बन सकती है। उसने सूखे हुए पसीने से उठ रही मदिरा जैसी गंध को बार-बार सुड़ककर खुद को यह अहसास दिलाया कि अभी उसकी उम्मीदों पर पानी नहीं फिरा है क्योंकि यह उसकी युवावस्था की गंध है जो अभी भी उसके बदन से उठ रही है।

वह यकायक आँख नम कर सुगबुगा उठी, "लेकिन, अगर अगले दस साल ऐसे ही गुजर गए तो क्या होगा?" उसने सिर उठाकर कुछ सालों में ही पौधे से वृक्ष बन चुके गुड़हल के पेड़ को विस्मित होकर देखा, "यह पेड़ दस क्या, बीस-पचीस बरसों तक हर पतझड़ के बाद हरा-भरा होता रहेगा और कम से कम साल के आठ महीने तक सूर्ख़ फूलों से लकदक होता रहेगा। लेकिन, एक बार मुझमें  पतझड़ आ गया तो फिर इस लायक नहीं रह पाऊँगी कि मैं माँ बनने का सपना पाल-पोस सकूँ।"
इसलिए उसके चेहरे पर मायूसी का घना कुहरा छँटने का नाम तक नहीं लेता। चाहे आफिस में हो या छुट्टी के दिन घर पर, वह अब पहले की तरह नहीं रही। शादी के बाद वाले दो-तीन वर्ष उसे अभी भी याद हैं जबकि वह इस खुशफ़हमी से बाग-बाग हो रही थी कि भले ही देर हो गई है, उसके दामन में जमाने भर की खुशियाँ जल्दी ही समाने वाली हैं।

तनुजा की स्मृति का तार उसके अतीत से जुड़कर उसके आगे बीती घटनाओं के चित्र उकेरने लगा। उफ़्फ़! वह, पाँव में चुभे बबूल के काँटे की तरह बरसों तक अपने बाबूजी की पीड़ा का कारण बनी रही। वे उसके लिए लड़के की तलाश में आख़िरकार, थक-हार चुके थे और सब कुछ राम भरोसे छोड़कर अम्मा को बात-बात में यह उलाहना देने लगे थे कि 'अब, जमाना बहुत बदल गया है। लड़के वाले लड़कियों में अच्छे संस्कार और अच्छे गुण कहाँ ढूंढते हैं? उन्हें तो बस! ऐसी लड़की चाहिए जो सिर्फ़ देह से औरत हो और सोने के अंडे देने में कोई कोताही न बरते। अब भला, तनुजा को कैसे बताएं कि उसने जो नारी-सुलभ गुण अर्जित किए हैं, उन्हें वह त्यागकर, शहर में मर्दों से जिस्म रगड़ते हुए, रोजगार-धंधे की तलाश में जुट जाए...'

तनुजा को बाबूजी के आशय को समझने में जरा भी देर न लगी। वह मन ही मन फुसफुसाने लगी, "बाबूजी ने इंटर और बीटीसी पास अम्मा को तो कभी नौकरी करने नहीं दी। कहने लगे कि मेरे इतने बड़े ख़ानदान में कभी कोई औरत इज़्ज़त-आबरू ताक पर रखकर कहीं कमाने नहीं निकली। अच्छा-भला अम्मा को मान्टेंसरी स्कूल में हेड मिस्ट्रेस की जगह मिली थी। बाबूजी को आर्थिक कठिनाइयों से जूझते देख, उन्होंने उनकी इज़ाज़त लिए बग़ैर स्कूल में आवेदन कर दिया था। चुपके से इंटरव्यू भी दे आई थी। लेकिन, जब नियुक्ति पत्र वाला लिफाफा डाकिए ने अम्मा के बजाए, उनके हाथ में थमाया और जब उन्होंने ख़ुद उसे खोलकर पढ़ा तो वे एकदम से बौखला उठे, "ख़सम के ज़िंदा रहते लुगाई को नौकरी-धंधा करने का ख़याल तेरे ज़ेहन में आया कैसे?"

अम्मा ने उन्हें लाख समझाने-बुझाने की कोशिश की; पर मरदाने हुकूमत के उस दौर में अम्मा तो मिमियाकर रह गई थीं। बहरहाल, अब बाबूजी की सोच में आए बदलाव पर उसे हैरत हो रहा है। वे ख़ुद ही चाहते हैं कि उनकी बिटिया पहले नौकरीशुदा हो जाए, फिर शादी-वादी के बारे में सोचा जाएगा। क्या भरोसा, तनुजा की शादी के बाद उसे ससुराल में ही कहीं उपेक्षा या यातना का शिकार न होना पड़े--दहेज की मांग या लड़के के विवाहेतर संबंध को लेकर। तलाक के चलन से अब कौन मुँह बिचकाता है? यह तो एक फैशन में शुमार होने लगा है जो अब आम बनता जा रहा है। शादीशुदा और बालबच्चेदार मर्दों को बेशर्मी से दूसरी-तीसरी शादी करते देखा गया है। बाप रे! बीवी का मोह भले ही न हो, अपने बच्चों का मोह वह कैसे त्याग देता है? अगर यही चलन मक़बूल हुआ तो कुछ ही सालों में तलाकशुदाओं के परिवार को इलीट समाज का सम्मानित अंग माना जाने लगेगा।

उसके बाद बी.. का रिज़ल्ट आते-आते, तनुजा खुद ही संकल्प कर बैठी कि चाहे कुछ भी हो, वह अपने पैरों पर खड़ी होकर बाबूजी को अपने प्रति सारी ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर देगी। बरसों तक जी-तोड़ मेहनत के बाद उसका संकल्प फलीभूत हुआ और वह एक सरकारी मोहकमे में किसी अफसर की स्टेनो बन बैठी। उसकी सफलता पर बाबूजी उन रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी मिठाई खिला आए जो उनके उस पुराने ख़यालात के कायल थे कि बहू-बेटियों से रोज़गार कराना एक निहायत घिनौना कृत्य है और ऐसा करने से कहीं बेहतर है कि चुल्लूभर पानी में डूब मरा जाए।
 नुजा गुड़हल के पेड़ की ओट से उठकर बरामदे में आ गई और सोफे पर बैठे-बैठे ऊँघने की चेष्टा करने लगी। पर, नितांत खामोशी के बावज़ूद पलभर के लिए भी उसकी आँख नहीं लग सकी। ऐसे तो जैसे ही वह आफिस जाने के लिए ई.एम.यू. ट्रेन में बैठती है, महिला डिब्बे में औरतों की भीषण चाँव-चाँव और चुहुलबाजी के बावज़ूद वह नींद की चपेट में सायास आ जाती है। सहेलियों द्वारा छेड़-छेड़कर जगाए जाने के बाद भी वह उनके कंधों पर लुढ़की रहती है।

कोई आठ साल पहले उसने नौकरी शुरू की थी। विट्ठल यानी उसके पति ने शादी के कोई तीन साल बाद ही बैंक से कर्ज़ लेकर नेहरू कालोनी में एक फ्लैट खरीद लिया था। तनुजा ने उससे कोर्ट मैरिज़ करने के बाद शिमला में हनीमून के दौरान ही साफ कह दिया था, 'विट्ठल, अब हम लवर्स नहीं, कपल हैं। तुम बाबूजी के साथ उनके घर में नहीं रहना चाहते तो मत रहो। पर, मुझे इस तरह, किराए में रहना रास नहीं आता। हमारा अपना घर होना चाहिए--भले ही छोटा हो। तभी, बढ़िया गृहस्थी जम सकेगी...'

यों तो विट्ठल ने उसकी किसी बात को कभी गंभीरता से नहीं लिया था; लेकिन, घर खरीदने के उसके मशविरे पर उसने फौरन अमल किया और डेवेलपमेंट ऍ़थारिटी के एक रीसेल वाले घर को खरीदने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी। यद्यपि तनुजा के बाबूजी उसके नौकरीशुदा होने पर फूले नही समा रहे थे; लेकिन, उसकी कोर्टमैरिज़ से, वह भी अपने से छोटी जाति के कई साल बड़े लड़के से शादी पर वह बेहद ख़फ़ा थे। ख़फ़ा क्या, वे तो सदमे में आ गए थे। बहरहाल, वह बिटिया और दामाद के साथ अपने कोल्ड वार को ज़्यादा लंबा खीचने के मूड में नहीं थे। अपने बुढ़ापा से भी वह बुरी तरह टूट चुके थे और उनसे कमप्रोमाइज़ करने का मन बना रहे थे। विट्ठल से बार-बार गुजारिश कर चुके थे कि वह और तनुजा सारे गिले-शिकवे मिटाकर उनके पास रहने के लिए आ जाएं। लेकिन शुरू में ही कोर्ट मैरिज़ के वक़्त, उनसे उपेक्षित होने के कारण विट्ठल ने उनके प्रस्ताव पर टाल-मटोल करना शुरू कर दिया। दरअसल, तनुजा भी अपने पति के स्वाभिमान को ठेस न पहुँचाने के लिए बाबूजी के प्रस्ताव को उस पर थोपने की कोशिश नहीं करना चाहती थी। लेकिन, जब विट्ठल ने नेहरू कालोनी में अपने घर में गृह-प्रवेश का न्योता बाबूजी को भेजा तो वे इस दूसरे सदमे को बरदाश्त नहीं कर सके।

बाबूजी के बाद अम्मा के अकेले घर में रहने, न रहने से न तो तनुजा पर कोई फर्क पड़ने वाला था, न ही विट्ठल पर । तनुजा का तो बाबूजी से उसी दिन से मोहभंग होने लगा था जिस दिन वे उसके लिए लड़के के लिए ताबड़तोड़ तलाश से ऊबकर सोफे पर निढाल गिरते हुए अम्मा पर एकदम बिफ़र उठे थे, "बिटिया पैदा करके हमें जलालत का ऐसा दुर्दिन देखना पड़ेगा, कभी ऐसा सोचा भी न था। अरे भाग्यवान! बिटिया से कह दो कि मैंने उसे पढ़ा-लिखाकर इस लायक बना दिया है कि वह हर प्रकार से सेल्फ़-डिपेन्डेन्ट हो सके। बग़ैर शादी के भी वह अपना गुजर-बसर कर सकती है। हमारा क्या ठिकाना? आज हैं, कल नहीं।" उनकी बात सुनकर अम्मा फटे सूप की तरह भाँय-भाँयकर रोने लगी थी। उसके बाद जब तनुजा ने अपनी पसंद के लड़के के साथ विवाह की बात बाबूजी से कही तो उन्हें लगा कि बिटिया ने जैसे कोई कुकर्म कर लिया हो और वह रसातल में गिरते जा रहे हों।

नुजा उन बीती घटनाओं को यादकर सोफे पर बैठे-बैठे बड़बड़ाने लगी, "विट्ठल से कई बार कहा है कि अगर उसकी मर्दानगी चुक चुकी है और उसमें संतान पैदा करने का माद्दा नहीं रहा तो वह कोई बच्चा गोद ले ले। आख़िर, बुढ़ापे के सहारे के लिए कोई मज़बूत लाठी तो चाहिए ही। यों भी विट्ठल उससे कोई पन्द्रह साल बड़ा है। प्रेम और इश्क़ में तो वह अंधी हो गई थी और उसने इस बात की भी परवाह नहीं की कि जब वह जवानी की मुंडेर पर बैठी चहक रही होगी तो विट्ठल की मर्दानगी थककर निढाल हो चुकी होगी..."

एक दिन आफिस से लौटने के बाद विट्ठल ने उससे कहा, "हेमन्त को तो तुम जानती ही हो। उसकी तीन-तीन लड़कियाँ हैं। उसकी सबसे छोटी लड़की--दंभा की पैदाईश पर तो हम पिछले साल ही बधाई देने गए थे। लेकिन, सच कहूँ, वह तभी से एकदम उखड़ा-उखड़ा रहने लगा है। आज जब मैंने उससे दंभा को गोद लेने की बात कही तो वह खुशी-खुशी राजी हो गया। आख़िर, वह तीन-तीन लड़कियों की परवरिश, पढ़ाई-लिखाई और शादी-ब्याह का बोझ कैसे बर्दाश्त कर सकेगा? जमाने के बदलने से सोच नहीं बदल जाती। लड़की दान की ही वस्तु बनी रहेगी और उस दान के साथ दहेज देने का चलन भी कभी समाप्त होने वाला नहीं है।"

गोद लेने की विट्ठल की मंशा तो तनुजा को बेहद भली लगी; लेकिन, एक लड़की को गोद लेने के प्रस्ताव पर वह तुनक गई। उसने तल्ख़ लहज़े में उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया, "अगर गोद ही लेना चाहते हो तो किसी लड़के को गोद ले लो। लड़की को पाल-पोसकर बड़ा करने और ससुराल भेजने का कुव्वत तो मुझमें नहीं रहा। देखो, मैं भी लड़की हूँ। पर, मेरी तरफ से बाबूजी को जितनी निराशा हुई थी, उसे आसान शब्दों में नहीं बताया जा सकता। उन्होंने मुझे यह सोचकर लाड़-प्यार से पाला था कि मैं उनके बुढ़ापे का सहारा बनूंगी। पर, वे मेरे लड़की होने के अभिशाप को ताउम्र झेलते-झेलते भगवान को प्यारे हो गए जबकि आज अम्मा, दमा और टी.बी. से जर्जर होकर एक-एक गिलास पानी के लिए मोहताज हैं। उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। आख़िर, बाबूजी के आदर्शवादी होने का यही हश्र होना था? काश! उन्होंने मेरे बाद एक बेटा पैदा करने से मुँह न फेरा होता। अच्छा-बुरा जैसा भी होता, वह कम से कम उनके पास तो होता..."

तनुजा की आँखें आँसुओं से भरभरा गईं जबकि विट्ठल मुंह बिचकाते हुए कंप्यूटर पर अपने ई-मेल मैसेज़ेज़ देखने ड्राइंग रूम में चला गया। तनुजा जब भी अपनी अम्मा की दुर्दशा पर आँसू टपकाती है तो विट्ठल बहटियाकर या तो कंप्यूटर के आगे बैठ जाता है या फिल्मी पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगता है।

उसके बाद से दो-तीन महीने तो गुजर ही गए। न तो तनुजा ने यह पूछा कि बेटा गोद लेने के लिए उसने अब तक क्या कार्रवाई की है या इस बाबत किसी अख़बार में कोई विज्ञापन दिया है या नहीं, न ही विट्ठल ने उसे यह बताया कि हेमन्त को उसने किस तरह इन्कार किया। कहीं यह तो नहीं कह दिया कि मेरी वाइफ़ तुम्हारी बेटी--दंभा को गोद लेने से मुकर गई है। आख़िर, दुनिया के आगे उसे हर तरह से दोषी साबित करने में विट्ठल को कितना मज़ा आता है!
तनुजा को अच्छी तरह याद है कि जब दो साल तक वह गर्भवती नहीं हो पाई थी तो विट्ठल किस तरह इसके लिए उसे ही दोषी करार देता था। किंतु, जब मेडिकल जाँच से पता चला कि दोष उसमें नहीं, बल्कि विट्ठल में है तो उसका मुँह कैसे फूलकर कुप्पा हो गया था! काफ़ी दिनों तक दोनों के बीच ख़ामोशी ऐसे पसरी रही जैसेकि उनका एक-दूसरे से दूर-दूर तक का कोई रिश्ता न हो। यहाँ तक कि वे एक-दूसरे को छूना भी पसंद नहीं करते थे। जब वह बाथरूम से बाहर निकलता था तो वह चुपचाप उसके हाथ में चाय का प्याला थमा देती थी और जैसे ही वह आफिस जाने के लिए स्कूटर निकालता था, वह उसका बैग डिक्की में डाल आती थी। विट्ठल तो उससे पूछता तक नहीं था कि वह आफिस जाने के लिए कब निकलेगी; वर्ना, पहले तो वह आफिस जाते समय रोज़ उसे रेलवे स्टेशन तक छोड़ ही देता था। तनुजा की सहेली--कनिका उनके बीच चल रहे तनाव को पहले ही भाँप चुकी थी और उसने उसको पेट से होने के कुछ ऐसे नुस्खे सुझाए थे कि उनसे उसके सारे संस्कार ही ढहते जान पड़े।

उस रोज़ वह कनिका के साथ कैंटीन में काफ़ी पीकर आफिस के कैम्पस में चहलकदमी करते हुए बाल दिवस पर लगी छायाचित्र प्रदर्शनी को उचक-उचक कर देख रही थी। उसे तस्वीरों में बच्चों पर लाड़-प्यार लुटाते देख, कनिका का जी भर आया। बच्चों की विभिन्न मुद्राओं और भाव-भंगिमाओं में खोकर वह एकदम भावुक हुई जा रही थी। अचानक कनिका उसकी कमर में हाथ डालकर उसे निचाट में ले गई, "चलो, आज मैं तुम्हारी लाइफ़ के लिए कुछ ज़रूरी बातें बताना चाहती हूँ।"

घास पर बैठते हुए कनिका ने उसके कंधे को दबाया, "देखो, इस अंधी दुनिया में जो तुम्हें ज़रूरत पूरी करनी है, उसे येन-केन-प्रकारेण चुपचाप पूरी कर लो। जब किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा कि तुम्हारी ज़रूरतें किस तरह पूरी हो रही है तो किसी को क्या ग़रज़ पड़ी है कि वह तुम्हारी अंदरूनी नैतिकता की बखिया उधेड़ेगा?"
तनुजा ने उसकी आँखों में अपनी नज़रें गड़ा दीं, "मैं समझी नहीं, तुम क्या कहना चाह रही हो?"
कनिका आदतन आँख मारते हुए मुस्कराई, "सुनो, तुम्हारे रिलेशन्स या फ़्रेंड सर्किल में कुछ ऐसे मर्द तो होंगे ही जिनसे तुम कान्टैक्ट बनाकर..."

तनुजा उसका आशय अच्छी तरह समझ गई थी। उसका चेहरा तमतमाकर एकदम लाल हो गया, "कन्नू! तुम मेरे बारे में ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? मैं एक ख़ानदानी औरत हूँ। मेरे जीवन में मोरल वैल्यूज़ की बड़ी अहमियत है।"
कनिका ठठाकर हँसने लगी,"अच्छा! ये बताओ, तुम्हें आजीवन बेऔलाद रहकर क्या सुख मिलेगा?" उसने तनुजा के कंधों को जोर से पकड़ लिया ताकि वह उठकर जा न सके।
"मुझे अपने हसबैंड के प्रति कोई विश्वासघात नहीं करना है..." उसने खुद को कनिका की पकड़ से रिहा करने की असफल कोशिश की।

"देखो, तुम विट्ठल की खुशी चाहती हो, ना!" उसने अपनी दृष्टि उस पर गड़ाते हुए उसे सम्मोहिनी पाश से बाँध लिया।
"बेशक!" उसने यंत्रवत प्रतिक्रिया की।
"और उसे फ़्रस्ट्रेशन से उबारना चाहती हो, ना!"
"हाँ!"
"तो तुम मेरी बात मान लो।"

असमंजस में तनुजा कोई प्रतिक्रिया नहीं कर सकी। शायद, कनिका की लाज़िक उस पर असर कर रही थी।
कनिका ने फिर उस पर अपनी निग़ाहें टिका दीं, "मैं तुम्हारी फ़्रेंड हूँ और तुम्हारे ज़ज़्बात बख़ूबी समझ सकती हूँ। जब तुम चित्र प्रदर्शनी में अनजाने-अनदेखे बच्चों की तस्वीरों पर अपनी ममता लुटा रही थी तो मुझे तुम्हारी पीड़ा का अहसास हुआ था। निःसंदेह, तुम अपनी पीड़ा से छुटकारा पा सकती हो। मैं तुम्हारी मदद करूंगी..."
"लेकिन...।" तनुजा का गुस्सा हिचकिचाहट में तब्दील होता जा रहा था।
"लेकिन-वेकिन करने से क्या फ़ायदा होगा? बस! दस मिनट में मैं तुम्हारी दिक्कत दूर कर दूंगी। विट्ठल को भनक तक नहीं लगेगी। मैं अपने बच्चों की कसम खाकर कहती हूँ..."
"अच्छा!" तनुजा को आश्चर्य हो रहा था कि वह इतनी हठधर्मी होकर भी, कनिका के कहने में कैसे आती जा रही है। उसे लगा कि जैसे वह कनिका के हाथ का एक खिलौना बनती जा रही है जिसकी चाबी उसके हाथ में है--जैसे ही वह चाबी भरेगी, वह नाचने लगेगी...

उसके बाद कनिका उसका कंधा पकड़कर साथ-साथ उठते हुए कहने लगी, "तुम्हें कोई फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। जिस दिन विट्ठल घर पर न हो, तुम मुझे सिर्फ़ एक एस.एम.एस. कर देना--'कम कनिका! आई एम रेडी।' मैं तुम्हारा काम कर दूंगी।"

तनुजा सोफे पर काफ़ी देर तक लाख कोशिश करने के बावज़ूद न सो सकी। गुड़हल के पेड़ से सटकर बैठने के कारण कोई चींटी उसकी ब्लाऊज़ में घुसकर तंग कर रही थी जिसे वह पीठ पर हाथ फेरकर मसलते हुए यकायक उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में एक अज़ीब-सी चमक आ गई थी। उस चमक ने उसके अंग-प्रत्यंग में जोश भर दिया। उसने उठकर टी.वी. के ऊपर रखे मोबाइल को उठाया और एक मैसेज़ लिखते हुए कनिका को भेज दिया, "कम कनिका, आई एम...।"

फिर, वह बाहर आकर लॅान में टहलने लगी। किसी का इंतज़ार करने का ज़ुनून उसकी चहलकदमी की सरसराहट में साफ़ उतर रहा था। उसकी निग़ाहें लॅान के चारो ओर खड़ी दीवार का मुआयना करते हुए बार-बार मेन गेट पर टिक जा रही थी। फिर, जैसे ही वह गुड़हल के पेड़ के तने से पीठ सटाकर बैठने के लिए झुकी, वह गेट के बाहर एक स्कूटर के रुकने की आहट से चौकन्ना हो गई। इसके पहले कि गेट पर दस्तक होता, उसने गेट खोल दिया।

"हाय, तनु!" कनिका खिलखिलाते हुए एक युवक के साथ रू-ब-रू हुई।
उसने तनुजा को आलिंगन करते हुए उसकी हथेली चूमी, "डोन्ट यू नो? ही इज़ मॅाय हसबैंड--डॅाक्टर मिथुन...!"
पता नहीं क्यों कनिका के पति को हाथ जोड़कर नमस्कार करते समय, तनुजा पसीने से नहाई जा रही थी। लेकिन जब मिथुन बिना किसी औपचाकरिता के, धड़ल्ले से ड्राइंग रूम में आकर सोफे पर बैठ गया तो गेट के पास खड़ी कनिका ने तनुजा को आँख मारी और उसकी कमर में हाथ डालकर पतझड़ की पत्तियों को रौंदते हुए पेड़ के नीचे आकर खड़ी हो गई। कुछ देर तक दोनों में फ़ुसफ़ुसाहट चलती रही। ऐसा लग रहा था कि जो कुछ कनिका कह रही थी, तनुजा उससे असहमत थी। वह कुछ देर तक उसकी बात पर नकारात्मक में सिर हिलाती रही। लेकिन, फिर वह कुछ असमंजस की स्थिति में पड़कर ख़ामोशी से उसकी बातें सुनने लगी। कुछ देर बाद कनिका ने, किंकर्त्तव्यविमूढ़ खड़ी तनुजा को खींचते हुए ड्राइंग रूम में धकेल दिया और बाहर से सांकल लगाकर लॅान में टहलने लगी।

कोई नौ महीने बाद गुड़हल के पेड़ में गाढ़े हरे-हरे पत्तों के ऊपर खिले असंख्य बेहद लाल-लाल फूलों पर तितलियों और भौंरों का मनमौजी ढंग से मंडराना यह संकेत दे रहा था कि जैसे वहाँ पतझड़ ने कभी दस्तक ही न दिया हो। तनुजा के घर के अंदर भी कुछ अलग-सी ही रौनक़ छाई-सी लग रही थी। उसके बच्चे के जन्म पर मेहमानों और रिश्तेदारों के अतिरिक्त, कनिका और डॅाक्टर मिथुन भी आमंत्रित थे। बधाइयों से अभिभूत होने के बाद, विट्ठल ने उपहारों को एक आलमारी में सहेजकर रखा। उसके बाद काफ़ी देर तक गरमजोशी से खानपान का दौर चलता रहा। महिलाओं ने बरामदें में आकर बच्चे के जन्म पर नृत्य-संगीत में भरपूर शिरकत किया। देर शाम, मेहमानों के जाने के बाद विट्ठल ने सन्नाटा चीरते हुए ठहाका लगाया और तनुजा से लिपट गया, "यार! जो तुमने अभी किया है, उसे बरसों पहले करना चाहिए था।"

"मतलब!" तनुजा को अचानक यह सोचकर अपराधबोध हुआ कि कहीं विट्ठल को सब कुछ पता तो नहीं चल गया; लेकिन वह खुद को काबू करते हुए उसका चेहरा पढ़ने की चेष्टा करने लगी।
"मतलब यह कि बच्चा पैदा करके तुमने मेरा सारा फ़्रस्ट्रेशन दूर कर दिया। मैं अपनी फ़्रेंड सर्किल में कितनी इनफ़ीरियारिटि से सिर झुकाए फिरता था! मुझे उससे निज़ात दिलाने के लिए तुमने जो कुछ किया है, उसके लिए मैं तुम्हारा अहसानमंद हूँ। अब मुझे कोई इम्पोटेंट नहीं कहा करेगा..."

तनुजा ने दोबारा अपनी दृष्टि उसके चेहरे पर टिका दी, जैसेकि उससे कोई भी बात छिपी नहीं हो। जैसेकि वह कह रहा कि 'मेडिकल रिपोर्ट ने तो मुझे नाक़ाबिल मर्द ऐलॅान कर दिया था। फिर, यह बच्चा कहाँ से आया? लिहाज़ा, यह चाहे जैसे भी पैदा हुआ हो, इसके लिए मैं तुम्हारा बड़ा आभारी हूँ।"

उस रात तनुजा उधेड़बुन में बिल्कुल न सो सकी। वह कई बार बच्चे को दूध पिलाने के लिए बेड पर बैठे-बैठे दिन में आए मेहमानों की बातों को याद करती रही। उसे अपनी अर्जित उपलब्धि पर ग्लानि नहीं हो रही थी; क्योंकि उसने बरसों पुरानी अपनी मायूसी दूर करने के साथ-साथ विट्ठल को भी खुश कर दिया था। किंतु, उसे ताज़्ज़ुब ज़रूर हो रहा था कि कनिका ने अपने पति को यह काम करने के लिए कैसे तैयार किया होगा। वह बार-बार सोच रही थी कि 'बिलाशक! बड़े दिल-वाली, जीवट औरत है कनिका! न कोई डाह,   भय। उसके लिए उसने अपने पति को भी एक ऐसे काम के लिए उकसाया जो एक पत्नी कभी नहीं कर सकती।' उसे न केवल कनिका पर, बल्कि उसके पति की खुली सोच पर भी अत्यंत गर्व हो रहा था। पिछली सुबह, जब वह उनसे मुखातिब थी तब भी उनके चेहरों पर कोई अपराधबोध नहीं था। डॉक्टर मिथुन कितने निर्विकार-भाव से उसे पूरा सम्मान देते हुए, "भाभी जी, भाभीजी" का रट लगाए जा रहे थे।

डामनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी. 
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां (काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)आवासीय पता-.सी.66  नई पंचवटीए जी०टी० रोड ;पवन सिनेमा के सामने,जिला-गाज़ियाबादउ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249,drmanojs5@gmail.com  


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