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रिज़वान ज़हीर उस्मान:बिना पड़ाव के अबाध रंग यात्रा

Written By Manik Chittorgarh on शनिवार, नवंबर 10, 2012 | शनिवार, नवंबर 10, 2012

एक हुतात्मा की आहूति: 
(रंग-समीक्षक और मेरे फेस-बुक दोस्त भानु भारविकी कलम से रिज़वान ज़हीर उस्मान)-हेमंत शेष 


वह खुदा का बन्दा था एक जिसने थियेटर को ही अपना खुदा समझा और चल पड़ा...... इसी को खुदाबन्दगी की राह बना कर.........। दीन-दुनियां से बेखबर......। लगभग आधी सदी की अपनी इस यात्रा में उसने कभी कोई पड़ाव नहीं लिया फकत अपनी गंभीर रुग्णता की अवधि को छोड़ कर। 
अपना घर-बाहर, देह, आत्मा सभी कुछ थियेटर की इबादत में ही फूंक डाला। कंटकाकीर्ण पथ के इस अविराम पथिक की यह यात्रा 3 नवम्बर को सदा-सदा के लिए थम गई। उनके इन्तेकाल की खबर उदयपुर से आई तो हक्का-बक्का रह गया। पांवों तले से जमीन खिसकती लगने लगी। मस्तिष्क ने जैसे काम करना बन्द कर दिया था। मोबाइल पर नम्बर तो बहुतेरे थे किन्तु, हड़बड़ी में सिर्फ तीन जनों- असद जैदी, अशोक आत्रेय तथा हेमन्त शेष को ही रिजवान भाई के निधन के समाचार दे पाया। ये तीनों ही उनकी रचनाधर्मिता के अन्तरंग सहयात्री रहे हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार असद जैदी ने कहा, ‘‘वे मेरे लिए एक सम्माननीय व्यक्तियों में से एक थे। वे मेरे, मुझसे कहीं ज्यादा अच्छे दोस्त थे। उन्होंने दुनियां को बहुत कुछ दिया। उनकी याद चिरकाल तक बनी रहेगी।’’ निःसन्देह जिस किसी को भी उनका साहचर्य मिला उन्होंने अपने आपको एक अच्छा सहचर हो कर ही बताया। जवाहर कला केन्द्र के अतिथि गृह में उनका लम्बा ठहराव हुआ करता था । उनके इन ठहरावों के दौरान कम से कम एक बार मैं उन से जरूर मिलता। चौड़ी मोहरी वाला पायजामा या पतलून, पेन्ट के बाहर लटकता ढ़ीला-ढ़ाला कमीज, कभी सिर पर टोपी व पांवों में हवाई चप्पलें बस- कंधे पे नेपकिन.... ये था उस सीधे-सादे भले मानुस का लिबास। हमेशा काले य ग्रे रंग की पतलून जिसकी नीचे से मोहरी मुड़ी हुई होती को, मैंने उन्हें कई बार पहने हुए देखा। 

एक भले, सरल व सहृदयी इन्सान कि साथ-साथ वे एक उत्कृष्ट नाट्य निर्देशक, लेखक एवं प्रशि क्षक थे। लोग उन्हें प्रयोगवादी नाट्य निर्देशक मानते हैं। सही मायने में बात कहने की उनकी अपनी भाषा थी। किसी एक ढर्रे पर चलना उन्हें कभी नहीं सुहाया। पुराने सिलसिलों को तोड़ कर नया सिलसिला पैदा करना और उसे अभिमंचीय धरातल पर सिद्धि के साथ स्थापित करना उन्हें बखूबी आता था। किसी भी चीज को स्थापना देने के पीछे उनके पास अनेक तर्क होते किन्तु, तर्क के सहारे उन्होंने मंचीय सम्प्रेषण को कभी तबज्जो नहीं दी। रिजवान के निर्देषित नाटकों में प्रेक्षक नाट्य के परिवेश में इतना प्रवाहित हो जाता कि वह यह नहीं समझ पाता कि वह प्रेक्षक है या उस नाटक का हिस्सा । नाटक देखने के बाद यह प्रष्न एक लम्बे समय तक उसके जेहन मंय कौंधता रहता। 

‘‘अनहोनियां’’, ‘‘सुन लड़की ! दबे पांव आते हैं सब मौसम ‘‘, ‘‘लोमडि़यां’’ आदि सहित शताधिक नाटकों तथा अनगिनतकविताओं कहानियों का लेखन उन्होंने किया। अपने अनेकानेक नाटकों के प्रभावपूर्ण निर्देशन के द्वारा उन्होंने लोगों को स्वस्थ मनोरंजन दिया। इनमें से कई नाटकों की स्थान-स्थान पर दर्जनों पुनरावृत्तियां भी हुईं। सैंकड़ों नुक्कड़ नाटक उनके निर्देशन में खेले गए। आपकी कहानियां, एकांश तथा नाटकों का धारावाहिक प्रकाशन देश की कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत रूप से होता रहा है। अपने आत्मीयजनों में ‘‘आर.जेड’’ के निकनेम से संबोधित किए जाने वाले 65 वर्षीय इस समर्पित रचनाकार ने राज्य में साक्षरता व प्रौढ शिक्षा के लिए उल्लेखनीय काम किया। साक्षरता व प्रौढ शिक्षा को केन्द्र में रख कर उन्होंने लगभग डेढ़ दर्जन एकांश-रूपकों की रचना की तथा इस विषयक अनेक कार्यशालाओं में रचनात्मक भागीदारी निभाई।

आपके पिता एक ट्रान्स्पोर्ट कारोबारी थे। कारोबार के सिलसिले में उन्होंने देश-विदेश की अनेक यात्राएं कीं। किन्तु, इन यात्राओं के दौरान आपका ध्यान व्यवसाय की तरफ कम लेखन और पठन-पाठन की ओर अधिक रहा। इन व्यावसायिक यात्राओं के दौरान आपने अधिक समय साहित्यिक अध्यवसाय में ही लगाया। रिजवान ने भारतीय रंगमंच को नया मुकाम दिया। उनके इसी विषिष्ट योगदान के लिए राजस्थान संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2000-01 में ‘‘लाइफ टाइम एचीवमेन्ट अवार्ड’’ से सम्मानित किया तथा ‘‘कल्पना पिशाच‘‘ के लिए श्रेष्ठ नाट्य लेखन का ‘‘देवीलाल सामर’’ पुरस्कार भी उन्हें मिला। जवाहर कला केन्द्र में प्रस्तुत उनका एकांकी ‘‘वही हुआ जिसका डर था तितली को ’’ को सर्वश्रेष्ठ एकांकी का पुरस्कार भी मिला। अजातशत्रु रिजवान भाई के विद्यार्थियों की एक लंबी खेप रही है। दो-तीन सहस्त्र के आस-पास उनके सिखाए नाट्यकर्मी देश भर में नाट्य कला का प्रदर्शन कर रहे हैं।

रिजवान भाई अभी और जीना चाहते थे। अपने अधूरे कामों को पूरा करने की ललक उनमें थी। किन्तु, बीमारी के चक्रव्यूह में वो ऐसे घिरे कि निकल ही नहीं पाए।‘‘कर्माश्रम’’, ‘‘द मेनेजर’’, ‘‘आश्रय’’, ‘‘राजस्थान फोरम’’ आदि संस्थाओं के आर्थिक सहयोग व राज्य के हजारों रंगप्रेमियों की दुआएं भी उनकी जीवन रक्षक नहीं बन पाईं और ‘‘भूतमहल’’ में अपने जीवन के 65 वसन्त गुजारने वाला यह रंगशिल्पी उस मुकाम तक पहुंच गया जहां से किसी का भी लौटना नामुमकिन होता है।  

भानु भारवि

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2 टिप्‍पणियां:

  1. भानु भारती (bhanu bharti) ने नहीं भानु भारवि- (Bhanu Bharvi) ने लिखा है ये आलेख, कृपया संशोधन करें -तुरंत!

    उत्तर देंहटाएं
  2. भानु भारवि का समीक्षात्मक लेख बहुत उम्दा है जो उस्मान साहब के कलात्मक पक्ष और उनके रंगमंच के ऑब्सेशन को एक चतुर रंगसमीक्षक की हैसियत से प्रस्तुत करता है. लेखक को इस सुन्दर लेख के लिए बधाई.
    कमलानाथ

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