सुबोध श्रीवास्तव की कवितायेँ - अपनी माटी

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रविवार, नवंबर 25, 2012

सुबोध श्रीवास्तव की कवितायेँ


( सामाजिक यथार्थ की पीड़ा को अपनी रचनाओं में उकेरते युवा कवि सुबोध का ये स्वर बहुत दूर तक सुना जा सकता है। उनकी ये कवितायेँ अपने आसपास को व्यक्त करती हुयी वहीं से प्रेरित होती हुयी बड़ी होती हैं।-सम्पादक )

सुबोध श्रीवास्तव,
(नई कविता, गीत, गजल, दोहे, कहानी, व्यंग्य, रिपोर्ताज और बाल साहित्य  रूचि है। रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण के बहुतेरे अवसर प्राप्त रचनाकार)

संपर्क:-'माडर्न विला', 10/518,खलासी लाइन्स,कानपुर,(उप्र)-208001,मो.09305540745,ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in पूरा परिचय यहाँ




(1)
सूरज का दर्द
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आजकल कुछ अनमना सा है सूरज,
रोज़ उठता है अंधेरे मुंह यंत्रचालित सा
नापने रोशनी से अंधेरे तक का फासला।

दिनभरचपटापेट लिए लड़ता है/
जि़न्दगी के लिए,
झांकता है ऐडिय़ों के बल उचककर
उजाले के बीच अंधेरों में कैद घरौदों में,
सुनता है 
झरोखों से छनकर आती फुसफुसातीआवाज़ें,
देखता है
रोशनी के खिलाफ साजि़श करते लोग।

देर शाम घर लौटते कंधों पर लाता है
अनकहा दर्द रातभर करवट बदलता 
सोता नहीं सुबकता है सूरज
रोज़ व्यर्थ जाती अंधेरे के खात्मे की 
खुदकी कोशिश पर..
...........

(2)

वक्त आदमी नहीं..
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वक्त 
आदमी नहीं
चट्टान सा होता है।
उस दिन-जि़न्दगी
इक मौत बचाने को 
जिन्दा दफऩ हो गयी
छाती में किसी याद की तरह मगर
वह नहीं रुका चलता रहा
बचपन,  
जवानी और बुढ़ापे की मानिंद।
.........

(3)
करता रहूंगा इंतज़ार
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मैंबोलूंगा तब तक / 
जब तक थम नहीं जाता तुम्हारी आवाज का शोर,
मैं नहीं रोकूंगा
अपने पांव
जब तक तुम्हारे मदमस्त कदम
नहीं हो जाते थक कर चूर,
मैं
देखता रहूंगा
जब तक घोर अंधकार में भी काबिल  हो जाऊं सच देखने के
मैं खाता रहूंगा 
ठोकरें जब तक बूटों में फंसे तुम्हारे अथक पांव 
जवाब नहीं दे देते तुम्हें।
मैं
बूंद-बूंद जमा होता रहूंगा
जब तक हो  जाऊं
तुम्हारे-अथाह अस्तित्व के बराबर।
और मैं,
करता रहूंगा इन्तज़ार
तब-तक / 
जब तक नवजात सूर्य रात की नाभि का अमृत सोखकर   बैठेगा
सुनहरी सुबह की गोद में।
......

(4)
अनाम देवता से
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तुम, क्यों समझते हो
खुद को
बेकार / अकेला
और एक बोझ..?
तुम भले ही
न जुटा पा रहे हो
भूखी अंतडिय़ों के लिए
खुराक / और
सूखी हड्डियों के लिए आड़
फिर भी अद्भुत हो तुम
क्योंकि-
तुम्हें, सिर्फ महसूसते हुए
कवि जन्मता है
एक कालजयी रचना
जिसे सराहतीं हैं
ऊंची इमारतें / और
लकलकाते कपड़ों में सजे लोग।
फिर, महान हो जाता है
वह कवि
जो लेता है तुमसे ही
कविता लिखने की प्रेरणा..!

(सभी रचनाएं काव्य संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' से)

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