जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी नहीं रहे: ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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जनकवि दुर्गेंद्र अकारी जी नहीं रहे: ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’

भोजपुर

3 और 4 नवंबर को गोरखपुर में  आयोजित जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान जनांदोलनों के साथ संस्कृतिकर्मियों के गहरे जुड़ाव, आम गरीब-मेहनतकश जनता से सीखने और उसके भीतर मौजूद प्रगतिशील समझ और यथार्थबोध के साथ अंतरंग होकर सांस्कृतिक परिवर्तन को नया आवेग देने की जरूरत पर जोर दिया गया। नगराभिमुख साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म को गांवों और गरीब-मेहनतकशों की ओर मोड़ने और जनभाषाओं की सृजनात्मकता को नई धार देने के बारे में भी विचार-विमर्श हुआ। इस पूरी चर्चा के दौरान जिन साथियों की याद आ रही थी, उनमें विजेंद्र अनिल, गोरख पांडेय और दुर्गेंद्र अकारी प्रमुख हैं। अकारी जी भाकपा-माले का राजनैतिक कामकाज भी करते थे और जनगीत लिखते थे तथा जसम के हर स्थानीय कार्यक्रमों और सम्मेलनों में भी अनिवार्य रूप से मौजूद रहते थे। 

खराब स्वास्थ्य के कारण वे जसम के पिछले सम्मेलन में भिलाई नहीं जा पाए थे, इस बार भी गोरखपुर में उनकी अनुपस्थिति हमें खल रही थी। 2007 में 3 नवंबर को विजेंद्र अनिल का निधन हुआ था, इस बार सम्मेलन का सभागार उनके ही नाम पर था। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में रामनिहाल गंुजन द्वारा संपादित पुस्तक ‘विजेंद्र अनिल होने का अर्थ’ का लोकार्पण भी हुआ था। सम्मेलन काफी जोश-खरोश के साथ संपन्न हुआ। 4 नवंबर की रात से ही नए आवेग के साथ कला-संस्कृति की तमाम विधाओं को धारदार बनाने का संकल्प लेकर साथी अपने अपने क्षेत्रों के लिए रवाना होने लगे थे। अचानक अगली सुबह यानी 5 नवंबर को भाकपा-माले के आरा कार्यालय से का. जितेंद्र का फोन आया कि अकारी जी नहीं रहे। हम सब गहरे शोक से भर उठे। विनम्रता, धैर्य, दृढ़ता और साहस से भरा उनका व्यक्तित्व हमें याद आ रहा था। हमने पूरी कोशिश की कि आरा माले ऑफिस में आयोजित शोकसभा और उनकी शवयात्रा में शामिल हो सकें। गोरखपुर से सड़क के रास्ते हम सब चले थे, रास्ते में गाड़ियां बदलते हुए बक्सर पहुंचे। अफसोस, सारी ट्रेनें लेट थीं। 

हमसब यानी कवि जितेंद्र कुमार, सुमन कुमार सिंह, अरुण प्रसाद, राजू रंजन और मैं- उन्हें आखिरी सलाम नहीं कर पाए। खैर, का. जितेंद्र ने बताया कि जैसा अकारी जी की सोच थी, उसी के अनुरूप उन्हें बिना किसी कर्मकांड के अग्नि के हवाले किया गया। अकारी जी के निधन की सूचना मिलते ही हर पंचायत और गांव से लोग आरा माले कार्यालय में उमड़ पड़े। उनके गांव से लेकर पार्टी आफिस और वहां से श्मशान तक अकारी जी को लाल सलाम, अकारी जी अमर रहे के नारे गूंजते रहे। लाल झंडे लिए सैकड़ों लोग उनकी शवयात्रा में शामिल हुए।

अकारी जी का जन्म 1943 में भोजपुर जिले के एक गांव अकिल नगर एड़ौरा में हुआ था। मत कर तू बनिहारी सपन में- उनका एक गीत था, जिसे उन्होंने अभिनय के साथ पेश किया था, और जिसे सुनकर कई हलवाहों ने हल जोतने से मना कर दिया था। चूंकि बनिहारों की पीड़ा को उन्होंने गीत और उसकी प्रस्तुति के दौरान आकार दिया था, उसी कारण जनता ने उन्हें अकारी नाम दे दिया। उस गीत का असर देखकर नौजवान अकारी का मन गीत रचने में ही लगने लगा। इसी बीच नक्सलबाड़ी की चिंगारी भोजपुर में गिरी और उससे जुड़े सवाल और संघर्ष के मुद्दे इनके गीतों में आने लगे। वे सामंतों और सरकार के खिलाफ गीत लिखने लगे। उन्होंने पुलिस-सीआरपीएफ से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी कम्युनिस्टों के बहादुराना प्रतिरोधों और उनकी शहादतों की घटना को अपने गीतों में पिरोया। जब वे लोकदल में थे, तब भी कम्युनिस्ट योद्धाओं और शहीदों पर गीत लिखते थे। 

अकारी जी को श्रद्धांजलि देते हुए भाकपा-माले के राज्य सचिव का. कुणाल ने कहा कि वे गरीब, भूमिहीन, खेतमजूदरों की आवाज थे। उनकी लेखनी को रोकने के लिए प्रलोभन और धमकी भी दी गई, हमले भी किए गए, पर संघर्षशील जनता का साथ उनकी ताकत थी, वे कभी विचलित नहीं हुए और हमेशा जनसंघर्षों और क्रांतिकारी राजनीतिक परिवर्तन के पक्ष में खड़े रहे। शोकसभा में माले के पोलित ब्यूरो सदस्य का. नंदकिशोर प्रसाद, का. अमर, पूर्व सांसद रामेश्वर प्रसाद, राज्य कमेटी सदस्य का. सुदामा प्रसाद, का. संतोष सहर, जिला सचिव का. जवाहरलाल सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक रवींद्र्रनाथ राय, जसम के राकेश दिवाकर, सुनील चौधरी, कृष्णकुमार निर्मोही समेत कई वामपंथी नेताओं, कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।  

अकारी जी को स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। आंदोलन के दौरान ही उन्होंने कुछ लिखना पढ़ना सीखा। अपने गीत वे दूसरे साथियों से फेयर कराते थे। अकारी जी गरीब भूमिहीन जनता के जुबान में उनके अनुभवों को अपने गीतों में प्रस्तुत करते थे। उनके गीतों में ठेठ भोजपुरी का ठाठ देखने को मिलता है। आंदोलनात्मक अभियानों और जनसंघर्षों पर उन्होंने ढेरों गीत लिखे, इस दौरान अपने आसपास के यथार्थ के अपेक्षाकृत कई अनछुए पहलुओं पर उन्होंने बड़े लोकप्रिय गीत लिखे। छोटी रेलवे लाइन के बंद होने पर लिखा गया उनका गीत ‘हमार छोटको देलू बड़ा दिकदारी तू’ तथा जेल में कैदियों की परेशानी पर लिखा गया गीत हितवा दाल रोटी प हमनी के भरमवले बा, इसी की बानगी हैं। 80 के दशक में किसान आंदोलन के उभार के दौरान उनका गीत ‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ बहुत मशहूर हुआ। 

कवि कृष्णकुमार निर्मोही ने उनकी शोक सभा में उनके इन गीतों-‘बताव काका कहवां के चोर घुस जाता’ और ‘हितवा दाल-रोटी पर हमनी के भरमवले बा’ को गाकर सुनाया। अकारी जी ने इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, लालू-राबड़ी, नीतीश, अटल, आडवाणी- सबका नाम लेकर उनकी गरीब विरोधी नीतियों और उनके दमनकारी व्यवहार के खिलाफ गीत लिखा। उनके गीत कहत ‘अकारी बिहार मजदूर पर, सहत बाड़ ए भइया कवना कसूर पर’ की गूंज तो देश के बाहर भी गई। अकारी जी भूमि सुधार के हिमायती थे।


सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959


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