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विस्तृत रिपोर्ट :-समता लेखक सम्मलेन-2012 में दिए वक्तव्य

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, नवंबर 29, 2012 | गुरुवार, नवंबर 29, 2012

  समता लेखक सम्मलेन में दिए वक्तव्य 
12-14 अक्टूबर ,2012 के सम्मलेन की विस्तृत रिपोर्ट 
  • मीडिया के कारपोरेटीकरण के कारण लोकतन्त्र पर खतरा: डॉ. रत्नाकर पाण्ड
उदयपुर। 


खबरों को बाजारू बनाने वाले या पैसे लेकर खबर छापने वालों को जेल भेजना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतन्त्र में मीडिया की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। उसे बनाये रखने कि जिम्मेदारी सभी पत्रकार की है। आज वैश्वीकरण के दौर में मीडिया पर कारपोरेट जगत पर कब्जा हो जाने से लोकतन्त्र खतरे में पड़ गया है चुनावों में पैड न्यूज से ग्रसित समाचार पत्र जनता को धोखा दे रहे है। 

ये विचार महावीर समता संदेश पाक्षिक के 20 वर्ष पूर्ण होने पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय उत्सव में लोकतन्त्र मीडिया और संस्कृति विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि साहित्यकार एवं पूर्व सांसद रत्नाकर पाण्डे ने डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के ओडियोटिरियम में व्यक्त किये। डॉ. पाण्डे ने मीडिया धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि पत्रकार स्वयं के लिये नहीं जिता उसका पहला कर्तव्य आम जनता की आवाज को बुलन्द करना है। उन्होंने महावीर समता संदेश के 20 वर्ष पूर्ण होने पर बधाई देते हुए कहा कि समता संदेश ने सार्थक एवं निर्भिक पत्रकारिता का एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने इस अवसर पर समता संदेश की दो दशक की यात्रा की प्रदर्शनी की सराहना करते हुए विद्यार्थियों को सलाह दी के वे लघु पत्र-पत्रिकाओं पर शोध करे इन की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करें। 

पूर्व राज्यसभा सदस्य साहित्यकार डॉ. रत्नाकर पाण्डे ने पूर्व वक्ता की बात पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज पत्रकार के लिये अपने स्वाभीमान की रक्षा करन दुष्कर हो गया है। हिन्दी पत्रकारिता वर्तमान का सिर दर्द साबित हो रही है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय की हिन्दी पत्रकारिता के स्वरूप पर नजर डालते हुए उन्होंने कहा कि उस समय की पत्रकारिता का लक्ष्य लोकमानस में जागृति लाना था। यही कारण था कि आन्दोलन कारियों को भी पत्रकार बनना पड़ा उनके लिए पत्रकारिता औपनिवेशक दासता के विरूद्ध लड़ाई का एक माध्यम था। लेकिन आज की पत्रकारिता पर व्यवसायिकरण की छाया पड़ गई है। जो जीवन के सत्य का साक्षात्कार भी नहीं करवा पाती। उन्होंने सम्मेलन में भाग लेने वाले छात्रों से आव्हान किया कि आज जब विदेशी शक्तियों जनतन्त्र को तोड़ने के लिए कटिबद्ध है विद्यार्थियों के हाथों क्रान्ति का शंखनाद हो व पत्रकारिता में आये ताकि सत्य के दर्शन हो। वे इन तीन दिनों के सम्मेलन के विचार विमर्श को ग्रंथ के रूप में लाये।कार्यक्रम का आगाज मेहनत कशो के कवि हंसराज चौधरी की कविता नमो नमस्ते श्रमजन शक्ति नमोनमः परिवर्तन धारा के उद्देश्य उद्घोष के द्वारा हुआ।
  • प्रो. नन्द चतुर्वेदी
समारोह के स्वागताध्यक्ष एवं कवि प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए महावीर समता संदेश के 20 वर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि यह पत्र जिस दृष्टि व उद्देश्य को लेकर प्रारम्भ किया गया था वहीं संदर्भ आज भी बरकरार है। यह प्रधान सम्पादक हिम्मत सेठ के संघर्ष, दृढ़ निश्चय व संकल्प का ही प्रतिफल है कि यह पत्र अपनी सम्मान जनक पहचान कायम रखने के साथ अपने पाठक वर्ग में भी इजाफा कर पाया है। यह एक टीम वर्क है जिसमें डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया, जो केवल एक प्रोफेसर ही नहीं बल्कि क्रान्तिकारी एक्टिविस्ट प्रबुद्ध व्यंगकार की भूमिका में भी जिनकी विनोद प्रियता काबिले तारीफ है। इस पत्र से डॉ. नरेश भार्गव जैसे लोग जुड़े हुए है जिन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, दलितों के अध्ययन में समर्पित किया। लघु पत्र-पत्रिकाएं जब मूल्य आधारित हो तो उसके मार्ग में अनेक व्याध्यान आते है। 

यही कारण है कि लघु पत्र पत्रिकाओं का अवसान आज के दौर में हो चुका है। ठीक उसी प्रकार जैसे छोटी पूंजी आधारित स्कूल, हास्पिटल, व्यवासाय, उद्योग आदि आपने आपको वैश्वीकरण की आंधी में महफूज नहीं कर पा रहे है लेकिन हिम्मत सेठ एक कर्मठ नागरिक है जो गैर बराबरी के विरूद्ध संकल्पबद्ध है, उन्होंने अपने सत्ता विरोधी तेवर बरकरार रखे एवं व्यवसायिक लेन-देने से समझौता नहीं किया। नंद जी का प्रश्न यह है कि अन्य अनुशासनों में लिखने वालों को लेखक माना जाए या केवल साहित्य रचने वालों को ही यह दर्जा मिले? स्वयं ही प्रश्न का उत्तर देते हुए बोले यदि केवल साहित्य रचने वाले ही लेखक माने जाए तो गांधी, नेहरू, लोहिया के लेखों को किस श्रेणी में स्थापित किया जाए। दरअसल अलग-अलग अनुशासन में लिखने वाले बुद्धिजीवियों का मेल ही लेखक सम्मेलन है जो समय-समय पर अपनी सेवाएं इस समाज को देते रहते है। 

पत्र के प्रधान संपादक हिम्मत सेठ इस प्रकार के सम्मेलनों के पीछे की परिकल्पना स्पष्ट करते हुए कहा जो गैरी बराबरी या शोषण के विरूद्ध संघर्ष करता है चाहे वह साहित्यकार हो पत्रकार हो, राजनेता या सामाजिक कार्यकर्ता समता संदेश उसका सम्मान करता है और ऐसे अनुष्ठानों में उदयपुर शहर सहृदयता से हमारा सहयोग करता है। यह लेखक सम्मेलन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् भारत सरकार नई दिल्ली, राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर, डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट, दाउदी बोहरा युथ एसोसिएशन, कासा संस्थान एवं गांधी मानव कल्याण सोसायटी ओगणा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। अपने पत्र का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि क्योंकि यह जनपक्ष की बात रखता है इसलिए सत्ता पक्ष को विरोधी लगता है सत्य है कि सत्ता पक्ष सामान्यतया जन विरोधी होता है। उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि राज्य में फिलहाल कोई जन आन्दोलन सक्रिय नहीं है। वैश्वीकरण के बाद मत मतांतर की बात समाप्त सी कर दी गई। पूंजीवाद ने सबकों अपने-अपने स्वार्थों के कारण एक कर दिया है। 

  • लोकतन्त्र के भविष्य के लिए मीडिया की आजादी जरूरी है। - उर्मिलेश

तीन दिवसीय सेमीनार का उद््घाटन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार व लेखक उर्मिलेश ने मीडिया व लोकतन्त्र के संबंधों पर बोलते हुए कहा कि मीडिया मंे इतिहास का जो स्वरूप आज सामने आया है वह 20 साल पहले नहीं था लोकतन्त्र तो तब भी था। प्रिन्ट मीडिया के इतिहास पर नजर डालते हुए उन्होंने बताया कि यूरोप में 16 वीं शताब्दी में पत्र छपने लगे थे। 17 वीं शताब्दी में बड़े अखबार निकलने लगे थे। अपने प्रारंभिक काल से ही ये जन-जन की आवाज हुआ करते थे। भारत में 18 वीं शताब्दी के अंत में बंगाल गजट से शुरू हुआ सफर गुजराती समाचार दर्पण व बोम्बे समाचार पत्र से आगे बढ़ा। जब कांग्रेस में मध्यम वर्ग का नेतृत्व सामने आया तब स्वतन्त्रता सेनानियों की आवाज अखबारों के माध्यम से सुनाई पड़ने लगी। गांधी, तिलक, बोस, डॉ. राममनोहर लोहिया ने पत्रकारिता के माध्मय से देश की आवाज बुलंद की। उन्होंने कहा कि यदि साम्राज्यवाद के खिलाफ सरकार को लामबंद करना है तो मीडिया की आजादी जरूरी है। पाकिस्तान के मीडिया का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऑटोक्रसी के बावजूद वहाँ अखबरों के चरित्र में कई बार दृढ़ता के उदाहरण देखने को मिल जाते है। जैसे मुम्बई हमले के बाद कसाब के गाँव जाकर मीडिया ने ही सच उजागर कि पाक हुकूमत झूठ बोल रही है। यूरोपीय मीडिया सभ्यतागत छलांग के कारण 250 वर्ष आगे है। वही चीन में अब प्रेस की आजा के उदाहरण दिखाई पड़ने लगे है।

आज की मुख्य समस्या मीडिया का बढ़ता कॉपोरेटीकरण है जिसमें विषय सूची एवं उसका विज्ञापनों के साथ अनुपात पर कोई आचार संहिता लागू नहीं होती स्थिति इस प्रकार उलट गई है कि पहले कम से कम 60 प्रतिशत समाचार के स्थान पर अब 60-75 प्रतिशत विज्ञापन होते है। यह व्यावसायिकरण की होड अब जनता का दबाव भी महसूस नहीं करती। संपादक के स्थान पर विज्ञापन मैनेजर महत्वपूर्ण फैसले लेता है। सनसनी फैलाने वाली खबरे अधिक स्थान पाती है। टीआरपी की रेटिंग एक अमेरिकन कंपनी निल्सन के साथ एक ब्रिटिश कंपनी तय करती है। इस प्रकार हम देखते है की बाजार का यह चेहरा लोकतन्त्र को किस प्रकार बाधित करता है। व्यक्तिगत तोर पर भ्रष्टाचारियों पर चोट करता मीडिया अपनी छवि निर्विरोध बनाता है। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों की लूट के व घोटाले पर बहस नहीं करवाता। चाहे रियल एस्टेट का मामला हो कोयले का गैर राष्ट्रीयकरण या आर्थिक सुधारों के पीछे का सच।

  • भारत हमेशा बहु सांस्कृतिक देश रहा है-रमेश उपाध्याय
प्रसिद्ध कथाकार रमेश उपाध्याय ने मुख्य वक्ताओं के रूप में बोलते हुए कहा कि जनतन्त्र वास्तव में जन की जगह खासाजन की व्यवस्था बन गई है। आर्थिक सुधारों के नये घटनाक्रम पर गौर करने पर हम पाते है कि दूसरे देश का राष्ट्रपति यह तय करता है कि भारत में क्या सुधार हो। उसे लागू करने के लिए हमारे नेता काम करते है। इस प्रकार नीति निर्धारण का सारा नियन्त्रण बाह्य शक्तियों के हाथों में आ गया ऐसे में जनता को सही स्थिति से अवगत होकर विरोध करने की जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। आज की पूंजीवादी व्यवस्था अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए जनतन्त्र का नाटक करती दिखलाई पड़ती है। इस साम्राज्यवादी अवस्था को बदलना ही होगा।

आज के दौर के व्यवस्थागत संकट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि समाजवाद में आस्था रखने वाले लोग रूस के टूटने एवं चायना के बदलते स्वरूप के कारण इस व्यवस्था को लागू करने के संकटों से जूझ रहे है। पहले तीसरी दुनिया वैकल्पहीन नहीं थी। रूस के पक्ष में खड़े होने का विकल्प उस के पास थी लेकिन आज विकल्प हीनता को नियति बनाकर पेश किया जा रहा है। हमें सोचना पडे़गा कि बेहतर व्यवस्था के लिए लड़ाई कहा से और कैसे शुरू हो फिलहाल हमें अपने ही जनतन्त्र को ठीक करना पड़ेगा। 

भारत में दो विकल्पों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि माओवाद के नाम पर बहुत से आदिवासी मारे जा रहे है। दूसरी और सांस्कृतिक राष्ट्र वाद का नारा बुलन्द किया जा रहा है। लेकिन भारत हमेशा से बहु सांस्कृतिक देश रहा है। आन्दोलन में मीडिया की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जिस मीडिया ने अन्ना को एवं बार नायक बनाया कुछ समय बाद दूसरी बार वे जब अनशन पर बैठे तो मीडिया लगभग गायब दिखा। इस कारण शासक वर्ग के आदेशों का पालन मीडिया द्वारा होता नजर आया। हमें प्रत्येक नागरिक को संघर्षशील व सावधान बनना पड़ेगा व मीडिया के कॉर्पोरेटिकरण का विकल्प ढूढ़ना पड़ेगा।
सम्मान समारोह

इस सत्र में महावीर समता संदेश (पाक्षिक) के 20 वर्ष पूरे होने पर महावीर समता संदेश परिवार की ओर से अपने सहयोगियों, शुभ चिन्तकों और गैर बराबरी के विरूद्ध समता के आन्दोलन में साथ चलने वाले लोगों का सम्मान भी किया गया।

सम्मानित होने वाले विशिष्ट जनों में गीतकार एवं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण कुमार सौरभ भारती, पिछले 48 साल से प्रकाशित समाचार पत्र धौलपुर गजट साप्ताहिक के प्रधान सम्पादक एवं एडवोकेट महेश भार्गव, कोटा एवं बुदी से एक साथ  प्रकाशित  दैनिक अंगद के सम्पादक एवं कवि मदन मदिर, गुजरात मजदूर किसान पंचायत के नेता एवं नव गठित सोसलिस्ट पार्टी के गुजरात एवं राजस्थान के समन्वयक जयन्ति पंचाल, कृषि वैज्ञानिक एवं समाजकर्मी व न्यूटेªशन इम्प्रुवमेन्ट एकेडेमी नागपुर के अध्यक्ष डॉ. शान्तिलाल कोठारी, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति एवं समाजकर्मी डॉ. दिव्य प्रभा नागर, समाजसेवी व गति पत्रिका मासिक के सम्पादक हरिशंकर गोयल अलवर, आस्था संस्थान की संस्थापक व समाज कर्मी डॉ जीन्नी श्रीवास्तव का सम्मान उनकी अनउपस्थिति में आस्था संस्थान के ही अश्विनि पालीवाल को भेंट किया।

साहित्यकार एवं बोहरा यूथ जमात के अध्यक्ष आबिद अदीब, कल्माणी समग्र विकास परिषद के व्यवस्थापक एवं 30 साल से आदिवासियों की सेवा में अपना जीवन बिताने वाले नाहर सिंह भण्डारी, गांधी मानव कल्याण सोसायटी ओगणा के निदेशक एवं 30 साल से ग्रामीण क्षेत्र में सेवा में रत मदन नागदा, सेवा मंदिर से 33 साल की सेवा पूरी करने के बाद डॉ. मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के व्यवस्थापक नन्दकिशोर शर्मा, दैनिक खबर सम्राट के प्रधान सम्पादक एवं महावीर समता संदेश के प्रिन्टर शान्तिलाल सिरोया तथा बम्बई से बोहरा क्रॉनिकल अखबार के सम्पादक सेफूदीन इंसाफ का सम्मान हुसैन उदयपुरी ने ग्रहण किया। सम्मान में अतिथियों ने शॉल ओडाई तथा स्मृति चिन्ह भेट किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष वेद व्यास ने कहा कि निश्चय ही हमारे पुरोधा पत्रकारों ने तथा स्वतन्त्रता सेनानियों ने पत्रकारिता के ऐसे विकास तथा लाभबन्धी की परिकल्पना कभी नहीं की थी। व्य   वस्था परिवर्तन के लिए कलम के सिपाही का उद्देश्य असंगठित समाज को समानता के लिए एक करना थे। 

सांयकाल में आयोजित प्रथम सत्र में लोहिया स्मृति व्याख्यान लोकतन्त्र, निर्माण, आन्दोलन विषय पर बोहरा यूथ कम्प्यूनिटी हॉल में आयोजित हुआ। बोहरा यूथ के अध्यक्ष आबिद अदीब ने कार्यक्रम में भाग लेने आने वाले का स्वागत किया एवं लोकतन्त्र मंे व्यक्तियों को मिलने वाली आजादी की अहमियत बताते हुए कहा कि संख्या बल के साथ जागरूकता ही इस व्यवस्था का असली मकसद हल कर पाएंगी।

सत्र के मुख्य वक्ता - लीलाराम गुर्जर ने पत्र का वाचन करते हुए कहा कि इतिहास में झांकने पर हमें विवेकानन्द अरविन्द, टगौर व बकिम के विचारों में समाजवाद के चिन्ह मिलते है। लाला हरदयाल व रामाकृष्ण पिल्ले ने भी आहार सूत्र प्रस्तुत किये किन्तु भारत में समाजवादी आन्दोलन की शुरूआत 1934 से हुई जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का निर्माण किया। 1934 से 1952 तक इसका रूझान मार्क्सवाद की तरफ था इसके पश्चात डॉ. राममनोहर लोहिया ने मार्क्सवाद से आगे कदम बढ़ाये और कहा कि मार्क्सवाद में रोटी पर विजय प्राप्त करने का आधार सूत्र तो दिया है लेकिन भारतीय समाज की संरचना पर आधारित समाजवादी व्यवस्था लाने में असमर्थ है। इसलिए उन्होंने अर्थ व्यवस्था के साथ-साथ समाज में शोषण व्याप्त गैर बराबरी को करने पर भी जोर दिया। आचार्य नरेन्द्र देव ने भी उसी समय गांधी का उद्भव व अणुबम की खोज, सत्याग्रह को सार्वजनिक किया।

छोटी मशीन व विकेन्द्रीकरण पर बल दिया लेकिन गांधी सत्याग्रह के पीछे ईश्वरीय शक्ति मानते थे जबकि लोहिया की सत्यागह की धारणा निरपेक्ष थी उन्होंने उपवास को अस्वीकृत किया। गांधी कृषकों को आन्दोलन का हथियार देने के पक्ष में नहीं थे। वे शोषण मुक्त समाज की परिकल्पना के एवं धर्म व राजनीति के सम्मिश्रण के पक्षधर थे। जबकि लोहिया दोनों को अलग-अलग रखना चाहते थे। वे शारीरिक व बौद्धिक विकास पर बल देने के साथ साथ आर्थिक शक्ति के विकेन्द्रीकरण व्यक्ति, समाज, उत्पादन वितरण, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सभी पक्षों की समग्र रूप से रूपान्तरण की विस्तृत योजना चाहते थे। समाजीकरण सहभागिता ओबीसी आरक्षण का विचार प्रस्ताव वंचित वर्ग को साथ लेकर चलने के लिए था जिसे वे शाश्वत नहीं मानते थे। बल्कि कालान्तर में आरक्षण को समाप्त करने हेतु जाति अध्ययन एवं विकास संघ की स्थापना करना चाहिए ऐसा उनका प्रस्ताव था। जिसका चरम लक्ष्य जाति मुक्त समाज की स्थापना, द्विभाषिय सूत्र इन सभी को आन्दोलन की शक्ल में लाना ही लोकतन्त्र की जड़े मजबूत करेगा।

निरंतर विचार-विमर्श में आज जन की भागीदारी तय करनी पड़ेगी। आर्थिक असमानता एक व दस से ज्यादा हुई तो बनने वाली व्यवस्था शोषणाकारी ही साबित होगा। ऐसा उनका मानना था।प्रो. अरूण चतुर्वेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि लोहिया की चिंतन शैली कॉन्टीनेन्टल जर्मनी से प्रेरित होने के कारण ही विश्लेषण में अधिक कठोर व अनुशासित थी। इलाहाबाद से होने के कारण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनों को करीब से समझने का उन्हें मौका मिला। आज के भारत की जनसंख्या स्वतन्त्रता के समय से तिगुनी है व तकनीकी का हस्तक्षेप गहरा व गम्भीर है। अतुल कोहली के पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि आज सम्पन्न वर्ग की संख्या के मुकाबले गरीब की वृद्धि कहीं अधिक है। स्वतन्त्रता के आन्दोलन के समय का नेतृत्व रचनात्मकता में विश्वास रखता था लेकिन विडम्बना यह है कि आज का मध्यम वर्ग रचनात्मकता में अपना स्थान खोता जा रहा है। आज का फावड़ा कम्प्यूटर है जिससे षड्यन्त्र की क्षमता बढ़ जाती है। अन्ना व अन्य आन्दोलनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज के आन्देालन में चमक व खर्च अधिक होता है। इसलिए इनके स्वरूप, आचरण व व्यवहार पर निरंतर नजर रखनी होगी। डॉ. जैनब बानू के अनुसार आज लोकतन्त्र संकट के दौर से गुजर रहा है। जहां श्रमिकों और खेत किसानों का संकट बढ़ा है। मध्यम वर्ग का अपना वैचारिक संकट बढ़ा है आज समाज को अधिक गहरे चिंतन द्वारा सही दिशा तलाशने की आवश्यकता है।

क्रान्तिकारी कवि हंसराज चौधरी का कहना है कि मध्यम वर्ग का बुद्धिजीवी वैचारिक रूप से आज सबसे अधिक भ्रमित है उनका मानना है कि जब तक उत्पादन के साधनों के साथ श्रम संबंधों पर व्यापक बहस नहीं होगी परिस्थितियां बदलने वाली नहीं है। प्रत्येक नागरिक को रोजी रोटी का हक दिलाने की बात करने के स्थान पर इसी शोषणकारी व्यवस्था को स्थिर रखने का खेल चल रहा है। बहस का मुद्दा तो यह है कि लोकतन्त्र को एक आन्दोलन बनाने की शुरूआत कैसे हो।

इस सत्र में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रो. फारूक बक्सी का प्रो. नन्द चतुर्वेदी ने शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया। इस अवसर पर आबिद अदीब ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले लम्बे समय से विश्वविद्यालय में यह पद खाली था जिस पर प्रो. फारूक बक्सी के आने से उर्दू साहित्य के अध्ययन में विकास होगा। 

चिंतक व लेखक मदन मंदिर ने बताया कि दिशाहीनता का कारण इन विरोधाभासों में है कि एक और जहां पद्मिनी की पूजा होती है तो वहीं समाज दूसरी और झांसी की रानी को पूजता हुआ दिखलाई पड़ता है।लोहिया जुल्म के खिलाफ एक ऐसे हस्ताक्षर थे। जिन्हें उस समय सामाजिकता पर सर्वस्व कुर्बान किया। जिन्होंने अपनी सम्पति, परिवार कुछ नहीं बनाया। उन्होंने कहा कि वे स्त्री स्वतन्त्रता के समर्थक थे। आज के पूंजीवादि दौर में समाजवादी लोहिया की प्रासंगिकता बढ़ी है। उर्दू के प्रोफेसर फारूख बक्षी के अनुसार जब तक आम आदमी के स्वाभिमान की लड़ाई रहेगी लोहिया की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने अपने भावों को कुछ यूं बयान किया - 

वतन की रेत मुझे एडिया रगडने दे
मुझे यकी है पानी यही से निकलेगा।

अध्यक्षीय उद्बोधन में नंद चतुर्वेदी लोहिया की देश भक्ति का जिक्र करते हुए बताते है कि जब लोहिया को प्रोस्टेट के ऑपरेशन के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई तब उन्होंने कहा कि यह मेरे डॉक्टर्स का अपमान होगा। आज की दुनिया का सांस्कृतिक बदलाव विचलित करने वाला है। लोहिया को गांधी की ही परंपरा में समझा जा सकता है। नीति निर्माण में परंपराओं का जिक्र करते हुए माओ के शब्दों में कहते है कि यदि मन में नीति संबंधी संकट आये तो जनता के पास जाओं जैसे गांधी कहते थे वहीं नीति अपनाओं जिससे आखिरी आदमी का भला हो लेकिन आज आखिरी आदमी बहुत अधिक संकट ग्रस्त है। इन परिस्थितियों में राष्ट्र का उत्तेजक चरित्र दिखलाई पड़ने की जगह निश्चिंतता का नजर आना गम्भीर मुद्दा है। इस और से आज का लोकतन्त्र, मीडिया व संस्कृति मिलाकर एक ही परिदृश्य की रचना की जा रही है। 

लोक व तन्त्र अलग दिखाई पड़ता है। विकल्प नहीं दिखता है यह व्यवस्था जन्य है या दैवीय? सम्पदा के लिए दौरा ने एक आयामी व्यक्ति पैदा किया। शक्ति का अन्य केन्द्र दिखलाई नहीं पड़ता। मध्यम वर्ग विलासिता, पैसा, प्रतिस्पर्धा की दौड़ में लगा हुआ है। लोहिया जैसे प्रश्न आवश्यक है कि आज एक राजनैतिज्ञ पर कितना खर्च किया जाए। इस सत्र का संचालन प्रो. जैनब बानु ने किया तथा धन्यवाद समता संदेश के सम्पादक प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया ने दिया।

सम्मेलन के दूसरे दिन प्रातः 10 बजे से मीडिया का व्यावसायिकरण और प्रतिबद्धता के विषय पर आधारित प्रथम सत्र का कासा सस्थान में प्रारम्भ हंसराज चौधरी के क्रान्तिकारी आव्हान से हुआ। 

  • जन आन्दोलन उम्मीद की किरण जगाते है - सुरेश पण्डित
उठ रे सूरज, खोल टापरी की टाटी
ठिठुराया आंगन में मीठी धूप खिला।

विषय प्रदर्शन में डॉ. प्रमिला सिंघवी ने कहा कि गणतन्त्र के चौथे स्तम्भ यानि मुख्यधारा के मीडिया में खबर एक उत्पाद बन गई है। उसमें अब प्रतिरोध की चेतना का प्रसार करने की सोच नहीं है। ऐसे में लघु पत्रिकाओं में जन की आवाज सुनाई पड़ती है। एक आशा जगती है। शिक्षाविद् व लेखक सुरेश पण्डित का मानना है कि आज की समस्याओं का हल पुराने सिद्धान्तों में नहीं मिल सकता। ठीक उसी प्रकार जैसे पुराने हथियारों से कोई लड़ाई नहीं जीत सकती। हमें सोचना पड़ेगा की इतिहास दोहराया जाता है। यह सत्य है या नीत्शे के अनुसार यह की इससे कोई सबक नहीं मिलता? आज का लोकतन्त्र क्या प्लेटों की कल्पना के अनुरूप है या पूंजीपतियों द्वारा इसका- पूर्ण अपहरण हो चुका है? यदि ऐसा है तो फिर इस जनतन्त्र में जन की भूमिका क्या है? हकीकत तो यह है कि जन इतना अहसाय बना दिया गया है कि उसे यह भी ज्ञान नहीं रहा कि अन्याय, अत्याचार की बात किस एजेन्सी से कहीं जाए। यह बात अब सत्य नहीं है कि जिसका कोई नहीं, न्यायपालिका तक नहीं उसका मीडिया है। केवल कुछ अपवादों जैसे जैसिका लाल काण्ड को छोड़कर फैसला पीड़ित के पक्ष में नहीं जाता है।

यदि सुधार की बात चलती भी है जैसे ग्राम सभा सबल बनाने की तो प्रस्तुति कमजोर रह जाती है। अमल नहीं हो पाती फिर भी जन आन्दोलन का उठना उम्मीद की किरण जगाता है। नर्मदा बचाओं जन आन्दोलन भले ही सफल न हुआ हो पर उसकी भूमिका आन्दोलनों की नींव रखने में महत्वपूर्ण है आज दो आन्दोलन पोपुलर हुए अण्णा व जन संचार आन्दोलन।फर्क इतना है कि जन सत्याग्रह में वंचित लोग हुआ करते थे। आज इन आन्दोलनों की आकृति अलग है। आज मध्यम वर्ग अधिक दिखलाई पड़ता है।

मीडिया की आन्दोलनकारी भूमिका बाजारवादी साम्राज्यवाद में वैसी नहीं दिखलाई पड़ती जैसे मारूती हड़ताल के समय फैक्ट्री में नुक्सान की एक तरफा खबरे आई, पीड़ितों के बारे में गम्भीर बात नहीं हुई कि 500 कर्मचारियों को बाहर कर दिया गया। ऐसे समय में लधु पत्र पत्रिकाओं की प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है। समता संदेश पाक्षिक ने अपने 20 वर्षों के सफर में जनता के कई आन्दोलनांे की अगुवाई की है। जनता की लड़ाई लड़ी है चाहे मजिस्ट्रेट के खिलाफ मुहिम हो या जनार्दन राय नागर विश्वविद्यालय का मुद्दा हो।

लघु पत्र/ पत्रिकाएं कई खतरों के बावजूद जनता की आवाज बने हुए है। यह माना जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद औद्योगिकरण के साथ एक वर्ग की समृद्धि में तेजी आई खाली समय अधिक मिलने लगा। सरकार को इस वर्ग से डर पैदा हुआ कि खाली समय में विद्रोही भावना पैदा होगी तब मनोरंजन उद्योग को पनपाया गया। मानसिक अनुकूलन हर वह एजेन्सी करेगी जो यथास्थिति बनाये रखना चाहती है। धर्म के जरिए भी यही काम होता आया है। ऐसे समय में जन आन्दोलनकारी पत्रकारिता के साथ खड़ा होना अधिक आवश्यक हो गया है। क्रान्तिकारी कवि हंसराज चौधरी ने वक्ता के रूप में बोलते हुए कहा कि मीडिया रचनात्मकता पर व्यवसायीकरण का कुहासा बहुत अधिक हो गया है। उनका कहना है कि मीडिया जीविका उर्जाजन तक सीमित रह कर अपनी जिम्मेदारी निभाने के स्थान पर पूंजी विस्तार में पूर्ण रूप से लग गए है।
आर्थिक सुधारों के शुरूआती दौर में जब भारत ने वर्ल्ड बैंक से पहला कर्ज लिया तभी सजग बुद्धिजीवियों ने इसके दूरगामी नकारात्मक प्रभाव का अंदेशा बताकर उसका विरोध जताया था क्योंकि बहार से पूंजी के साथ शर्ते इस प्रकार की आयी जो उसके जन विरोधी प्रकृति का सूचक थी। आज की मीडिया अभिजन के लिए प्रतिबद्ध ही नहीं प्रायोजित भी है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय पूंजीपति वर्ग सत्ता सत्ता के विरूद्ध राष्ट्रीय हितों में भूमिका निभाई, किन्तु आज बाजारवाद का भयावह चेहरा हमारे सामने है। जिसमें उस समय के जन कल्याणकारी समाजवादी धर्म निरपेक्ष मूल्य तिरोहित कर दिए गए है। आज शिक्षा एक वस्तु एवं स्वास्थ्य एक धंधा बन चुका है। धर्म-कर्म और योग की प्रसिद्धि बाजार के लिए आज मीडिया या किसी भी घटना के एक पक्ष को उजागर करता है। सरकार की नीतियों के खिलाफ हजारों मजदूरों की रैली को मीडिया कवरेज देना आवश्यक नहीं समझता यह वर्गीय जुड़ाव बहुत खतरनाक है। जिसके लिए वंचित वर्ग को साचना पड़ेगा। टीआरपी द्वारा नियंत्रित मीडिया सनसनी पैदा करने वाली खबरे तो छापता है लेकिन गांव के प्यासे या आन्दोलन में पिटते गरीब से कोई सरोकार नहीं रखता है। सरकार की श्रम कानूनों को रद्द करने की नीतियों को मीडिया नहीं उठाता आवश्यकता इस बात की है कि आमजन का अपना मीडिया हो जो सत्ता और पूँजी से विचलित न हो। शुरूआत छोटे मीडिया से हो जो निरपेक्ष हो सर्वहारा वर्ग के प्रति संवेदनशील हो। जन संस्कृति मंच से जुडे़ लेखक रेवती रमण शर्मा अलवर ने भी अपनी विचार रखे।

  • दागी लोगों को चुनाव में उम्मीदवार न बनाये पार्टिया - वेदान सुधिर
  •  पार्टियों में आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव संकट की मूल जड - सेठ

द्वितीय सत्र- विषय पर आधारित सत्र में लोकतन्त्र और चुनाव सुधार पर बोलते हुए वैददान सुधीर ने कहा कि लोकतन्त्र आज चंद परिवारों की मुट्ठी में है। बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां भी परिवार के आधार पर चलायमान है। मतदाताओं की इसी हताशा के कारण स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता उन्होंने बलतन्त्र को रोकने के कुछ उपाय सुझाव जैसे चुनाव में धन की भूमिका को नियंत्रित करने के लिए चुनाव आयोग पैसा दे। ऐसा कानून लाया जाए जिसमें आरोपी लोकसभा विधानसभ में नहीं जाए पाएं इत्यादि।

हिम्मत सेठ ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि अमेरिका में भी सारे लोकतन्त्र पर एक प्रतिशत का कब्जा है। इसलिए अध्यक्षिय लोकतांत्रिक व्यवस्था भी हल नहीं दे सकती। प्रत्येक नागरिक वोट डालने के लिए प्रतिबद्ध हो 50 प्रतिशत वोट पाये के बिना विजेता घोषित नहीं किए जाएं। पार्टियों मंे आन्तरिक लोकतन्त्र का अभाव सभी संकटों की जड़ है। उन्होंने कहा कि पार्टी जिसको उम्मीदवार बनाये उसका 5 साल पार्टी का सदस्यता अनिवार्य किया गया।वक्ता के रूप हरिशंकर गोयल ने कहा कि चुनाव सुधार दोस्तरों पर लागू हो एक केन्द्रीय स्तर पर दूसरा राज्य/ग्रामसभा स्तर पर साथ ही राजनैतिक दलों का काड ऑफ कण्डेक्ट बनना आवश्यक हो स्थानीय स्तर पर सरपंच साधारण हिन्दी पढ़ा हुआ हो 

  • विकल्पहीनता फिल्म जगत का हिस्सा बन गई है- हिमाशू
तृतीय सत्र में फिल्म संस्कृति एवं लोकतन्त्र विषय बोलते हुए हिमांशु पण्ड्या ने कहा कि आज राष्ट्रीय दलों के बीच विकल्प हीनता की स्थिति बन गई है। ऐसे में चुनाव सुधार की व्यवहारिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है जैसे यदि विश्वविद्यालय चुनाव पर पोस्टर आदि पर खर्च बंद कर दिया जाता है तो मतदाताओं को लुभाने के लिए अन्य तरीका खोज लिया जाता है।

यही विकल्पहीनता फिल्म जगत् का भी हिस्सा बन गई है एक खास ढर्रे पर लगभग सभी फिल्में बनती नजर आती है। उनमें से बेहतर का चुनाव जनता कर लेती है। लेकिन जो तकनीक आती है वो जन सामान्य के काम भी आती है जैसे रेलगाडी इसी प्रकार जन सिनेमा के विस्तार की संभावना आज बढ़ी है। भले ही समानान्तर सिनेमा का दौर आज नहीं है जिसमें एनएफसीसी पैसा देता था पर एक इनडिपेन्टर जन पक्षीय सिनेमा विकसित हुआ है। आज डीजिटल सिनेमा बनाना आसान है क्योंकि यह अधिकतकनीकि आधारित नहीं है। यह भविष्य की उम्मीद है।

चार्ली चेपलिन ने प्रश्न किया था कि क्या जनता जानती है उसे क्या चाहिए? संस्कृति एवं लोकतन्त्र पर बोलते हुए डॉ. सुधा चौधरी ने कहा कि जिन आदर्शो की बात करते हुए आधुनिकता की बात शुरू हुई थी। लोकतन्त्र जिस जोर शोर से केन्द्र में जनता को रखता दिखलाई पड़ता था। वे लोकतान्त्रिक मूल्य आदर्श जीवन का हिस्सा क्यों नहीं बन पा रही है। दरअसल पूंजीवाद अपने स्थापित होने के लिए जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में समानता की बात करता था वह इस बंटे हुए समाज में सम्भव नहीं। क्योंकि इस व्यवस्था में सत्ता व जनता का तन्त्र एक नहीं हो सकता। अम्बेडकर का लोकतन्त्र गांधी के लोकतन्त्र से अलग है। बाजारवाद ने दो स्तर पर दुनिया बांट ली जिसमें आज का संकट मूल्यों और नैतिकता का संकट बताया जाता है। 

यह भ्रम फैलाया जाता है कि भारतीय संस्कृति आध्यात्मवादी है जिसमें विकृत भौतिकतावादी पश्चिमी संस्कृति की घुसपैठ हो गई है। पणिकर के अनुसार संस्कृति व्यवस्था का रिफलेक्शन होती है। व्यक्ति मूल्य तथा सामाजिक सत्ता है इन विभाजित समाज में संस्कृति भी विभाजित ही होगी। लेकिन मूल को हुए बिना रिफलैक्शन की बात करना गलत कारणों की पहचान करना खतरनाक है जो अन्ततः विकास का रास्ता रोक देती है। इस प्रकार संस्कृतियों का संकट व्यवस्था की कुरूपताओं का संकट है। रंगकर्मी महेश नायक ने भारतीय सिनेमा के इतिहास एवं उसके समाज को योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि फिल्मों द्वारा जाति भेद, सामंती मानसिकता, स्त्री के पक्ष में फिल्म बनाई एवं हिन्दी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया लेकिन आज का सिनेमा प्रोजेक्ट आधारित होने के कारण दस परिवारों की जेब में है। इसी प्रकार टीवी पर चैनल्स की भीड होते हुए भी जन पक्षिय नहीं नजर आते है। क्योंकि इसकी रीढ़ कोरपोरेट सेक्टर है। हमें वैकल्पीक मीडिया की तलाश करना होगी जो सम सामयिक मुद्दे उठाए। 

महावीर समता संदेश के 20 वर्ष के सफर पूरा होने पर आयोजित तीन दिवसीय उत्सव 12 अक्टूबर से 14 अक्टूबर पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार के सफल आयोजन में भाग लेने वाले सभी सहभागियों का समता संदेश आभार व्यक्त करता है। तीन दिवसीय इस सेमीनार में अतिथि दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश और राजस्थान के अलवर, कोटा, धौलपुर, भीलवाड़ा, बुंदी, बांसवाड़ा, चितौड़गढ़ और उदयपुर जिले के विद्वान साथियों ने भागीदारी की।तीन दिवसीय इस समारोह में कई विद्यार्थियों, युवाओं और महिलाओं ने भाग लिया। विशेषतौर पर जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के एमएसडब्ल्यू के छात्र छात्राएं महिला अध्ययन केन्द्र के छात्र-छात्राएं सुखाड़िया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहे छात्र-छात्राए महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ ही राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय के फैक्लटी मेम्बर्स ने इस सेमीनार में भागीदारी की।


आदिवासी क्षेत्र में 6 दशकों से भी अधिक समय के बाद हालात बद-से-बदतर होते जा रहे है। भारत के अन्य भागों की मुख्य समस्याएं जैसे जल, उर्जा, भोजन, स्वास्थ्य, आवास, संचार आदि को अत्यन्त विकराल रूप में यहां देखा जा सकता है। बिजली नहीं है। बच्चे कुपोषण के शिकार है। अंधनंगे बच्चे (लड़किया भी) शिक्षा से वंचित शोषण के शिकार इस क्षेत्र की अत्यन्त निराशाजनक तस्वीर पेश करते है। स्वतन्त्रता के 65 वर्षों बाद यहां विकास के नाम पर सरकारों ने क्या किया है? स्कूल है, लेकिन नियमित शिक्षक नहीं है विद्यार्थी मित्र है। जिन्हें स्वयं शैक्षणिक प्रशिक्षण की आवश्यकता है। कहीं-कहीं गांवों में अनपढ़ महिला सरपंच है तथा वास्तविक सरपंच उनके प्रति है। जिन्हें एसपी कहा जाता है। सरकारी धन एसपी के माध्यम से खर्च होता है। इनके पास पक्का मकान है। अच्छी कार है जिसमें बैठकर वे अपना वीक एण्ड मनाने उदयपुर चले जाते है। ग्राम सभा में जिसमें महिलाएं व पुरूष बैठकर विकास की बातें तो करते है लेकिन नीतिगत निर्णय और उनके कार्यन्वयन का जिम्मा कहीं और से रिमोट कन्ट्रोल से चलता है। सारा धन कहा चला जाता है?

भारत सरकार व राज्य सरकार ने शिक्षा के सम्बन्ध में जो कार्यप्रणाली निर्देशित की है (जो विकारित सोच से परिपूर्ण है) उससे प्राथमिक, माध्यमिक, सैकेण्डरी व सीनियर सैकेण्डरी शिक्षा भयंकर रूप से प्रभावित हुई है। आठवी कक्षा तक कोई परीक्षा नहीं हो सभी छात्र उर्त्तीण हो। एक छात्र से पूछा कौनसी कक्षा में पढ़ते है। जवाब मिला चौथी में। तुम्हारा नाम क्या है, बोला रमेश लिख सकते हो अपना नाम बोले और लिखकर दिखाया। इसके आगे ना तो किसी वर्णमाला का ज्ञान है ना लिख सकते है, और ना पढ़ सकते है अपने पिता का नाम भी नहीं लिख सका। स्कूल भोजन, वस्त्र, किताबों का स्रोत है। भोजन में सरकार द्वारा उपलब्ध अनाज का इस्तेमाल नहीं होता। उसे बेच दिया जाता है और निम्न गुणवत्ता वाले अनाज का उपयोग होकर भोजन बनता है। लगभग 95 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार है। इससे उनकी शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हुआ है। अनेक बच्चे ऐसे दिखाई दिये जिन्होंने एक हफ्ते से स्नान नहीं किया। फटे हुए वस्त्र तथा पांव में जूते/चप्पल नहीं। स्कूल की बदहाली देखकर लगा कि यह शिक्षा का स्थल न होकर कोई जानवरों का बाड़ा है। वास्तव में स्कूल के खुले दरवाजे से कुत्ते, गाय भैसों का आमदरफत भी इस दुर्दशा का एक विचित्र, भयावह व दुःखदायी नजारा पेश करता है।

आंगनवाड़ी के कार्यकर्ता है लेकिन वे भी इस माहौल में कुछ विशेष करने में असमर्थ है। कागज पर कारावाई होती रहती है। योजनाओं पर धन आता है, बंट जाता है विकास कहां हो रहा है? इस प्रश्न से संबंधित लोग बोखला जाते है जवाब नहीं है। कुछ भी दिखाने लायक नहीं है। अपने कार्य के लिये कोई प्रतिबद्धता नहीं है। जिम्मेदारी नदारद है कोई समय बद्ध पूरी होने वाली योजना नहीं है। योजना है तो क्रियान्वयन विकारित है कोई फीड बैंक नहीं गलतियों में सुधार की कोई संभावना नहीं है। 
चिकित्सा व स्वास्थ्य की सुविधाए लचर है। एक सभा में जिसमें महिलाएं अधिक थी। मैंने पूछा क्या आपको अपनी इस बदतर हालात पर गुस्सा नहीं आता। एक महिला बोली क्या करसकते है हम हमारा कार्य क्षेत्र घर संभालना है। बच्चे है तो उन्हें सरकारी स्कूलों में भेजते है। कम से कम कुछ तो मिलता है। वैसे वोट लेने वाले 5 साल में एक बार जरूर हाथ जोड़ते आते है। लेकिन फिर दिखाई नहीं देते। किससे शिकायत करें? कौन सुनता है? प्रताड़ित होने का डर रहता है। गांव के मर्द खेतों में काम करते है। मक्का उगा रखा है। अनाज को विक्रय करने ओगणा जाना पड़ता है। अपने गांव में कोई सरकारी कृषि समिति नहीं है। 10-12 साल के बच्चे बीटी कपास की मजदूरी करने गुजरात जाते है।कई गांवों तक पहुंचना जटिल है। क्योंकि सड़के खराब है। नरेगा तो जेब भरने की परियोजना है। ग्रामीण अंचलों में नरेगा का लाभ दिखाई नहीं देता है। समता संदेश के माध्यम से इन गांवों की पड़ताल की गई। आदिवासियों का रहन-सहन शहरी जीवन से प्रभावित हुआ है। बिजली नहीं है लेकिन कहीं-कहीं लोगों के पास मोबाइल दिखते है। बैटरी वाले रेडियों, ट्रांजिस्टर है इस क्षेत्र में महुआ तथा अन्य प्रकार की औषधीय व फलदार वृक्षों के बहुत घने जंगल है। जैव विविधता का यह एक अनूठा क्षेत्र है। यहां के औषध, शहद, छाल, फल का उपयोग रोगों के उपचार में लोग करते है। महुवे के फूल एकत्र करके बेचते है।

शराब पीना, मोताणा चढ़ोतरा जैसी कुप्रथाएं अभी विद्यमान है। लड़कियों की शिक्षा पर कोई जोर नहीं है। वास्तव में शिक्षा पर ही कोई जोर नहीं है। सभी बातें सांकेतिक रूप से दिखाई देती है।आदिवासी समुदाय सरल स्वभाव से ओतप्रोत है। उनकी जीवन प्रणली, शहरी जीवन से 5-6 दशक पीछे है। यहीं हाल उनकी सोच का है। सपने का भी।व्यक्तिगत रूप से मुझे ओगणा के आसपास के आदिवासी गांवों में जीवन का स्वरूप देखकर घोर निराशा हुई तथा पीड़ा भी। इस क्षेत्र में अनेक एन.जी.ओ. भी है। सरकारी योजनाएं ग्राम पंचायत है। ग्राम सभाएं है। एमएलए है, पंच/संरपच है, शिक्षा व चिकित्सा अधिकारी है। आंगनवाडियां है। शिक्षक/विद्यार्थी मित्र है। प्रधानाध्यापक (हैड मास्टर) है। बीडीओ है। क्या ये सब विशेषज्ञों इलेक्ट्रोनिक प्रिन्ट मीडिया के साथ बैठकर समस्याओं का पंजियन कर ऐसी योजना बना सकते है। जो समय बद्ध तरीके से कार्यन्वित हो। जिसका वार्षिक ओडिट हो तथा कमियों (नीति व कार्यव्नयन में) समाधान ढूढा जा सके।

आदिवासी क्षेत्र वन सम्पदा, जैव विविधता आदि में बहुल है। इस क्षेत्र की संस्कृति रूढीवादी अब आधुनिकता की और अग्रसर है। प्रथाओं को समझना जरूरी है। राजस्थान में जनजाति विश्वविद्यालय बनने जा रहा है। इसकी क्या प्राथमिकता होगी। आदिवासी महिलाओं लड़कियों के सशक्तिकरण के लिये गुणावतपूर्ण शिक्षा वैज्ञानिक सोच व कार्यप्रणाली आवश्यक है। बदलते हुए परिप्रेक्ष्य में आदिवासी समाज किस प्रकार अपनी संस्कृति को संरक्षित कर विकास का मार्ग चुने और उनके युवा अपने समाज राज्य व देश के लिये प्रभावशाली योगदान कर सके। यह विचारों के मंथन संवाद तथा संप्रेषण का विषय है। यह प्रक्रिया सतत् रूप से चलती रहनी चाहिये। अब बातों से नहीं क्रियान्वयन प्रमुख है।सरकारी योजनाओं एनजीओ और अन्य कारकों में गहन समन्वय की आवश्यकता है। इनमें एकरूपकता नहीं दिखती है दोनों ही भटके हुए लगते है।

आदिवासियों को उनके क्षेत्र से बेदखल कर उनकी जमीन जैव विधिता, खनिजों का दोहन ही यदि प्राथमिकता बन जाए तो विकास का यह मॉडल जो पिछले 65 वर्ष से चल रहा है इन क्षेत्रों में अनेक जटिलताएं पैदा करेगा। इनकी सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है। यदि सरकार एनजीओ, इलेक्ट्रोनिक व प्रिन्ट मीडिया इसके प्रति जागरूक व संवेदनशील हो। भारत के अन्य क्षेत्रों में आदिवासियों की बड़ी जनसंख्या नक्सलवाद माओवाद से प्रभावित है। विषमता से परिपूर्ण समाज जिसका दशकों से शोषण हो रहा है तथा जिसको विकास के पैसे से भीख जैसा कुछ मिल रहा है। कब तक आंख मूंदकर कान बन्द कर व गूंगा बनकर रहेगा।वैसे गेजवी गांव के लोगों को बेरोठी में बनने वाले मानसीवाकल बांध के दूसरे चरण से होने वाले विस्थापन का भय भी सता रहा है।


हिम्मत सेठ

वरिष्ठ साथी पत्रकार,
उदयपुर से प्रकाशित 'समता सन्देश' 
पत्र के सम्पादक और 
समतावादी लेखक हिम्मत सेठ

फोन: 0294-2413423,  मो. 94606.93560


डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया 
समता लेखक सम्मलेन
आयोजन सचिव मो.  09460822818
प्रकाशकीय कार्यालय
एफ-30, भूपालपुरा, उदयपुर-313001
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