अब्दुल ज़ब्बार का चित्तौड़ की वन्दना में एक प्रतिनिधि गीत - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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अब्दुल ज़ब्बार का चित्तौड़ की वन्दना में एक प्रतिनिधि गीत


अब्दुल ज़ब्बार,चित्तौड़ की धरती का एक हस्ताक्षर जो लाल किले से लेकर देशभर में अपने गीतों के कारण पहचाना गया नाम है।गंगाजल जैसी प्रतिनिधि कविता के रचनाकार ने श्रोताओं को खूब सारे प्रधान गीत दिए हैं।गोष्ठियों के साथ बड़े मंचों पर कविता पढ़ने के आदि अब्दुल ज़ब्बार चित्तौड़ की लगभग सभी संस्थाओं में भाईचारे के लिए जानेजाते हैं।गंगा- तहजीब का एक अच्छा उदाहरण हैं अब्दुल ज़ब्बार।किसी ज़माने में राजस्थान सरकार में  रहे जाबार साहेब सादगी संपन्न इंसान हैं।इन्हें शेरो-शायरी में भी खासी रूचि रही है।इनका संपर्क :-कुम्भा नगर बाज़ार,चित्तौड़गढ़,राजस्थान,मो-9414109181 है।



इस गीत को सुनकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस इंसान की लेखनी का रस किस हद तक आमजन को आकर्षित करती है।इसे उदयपुर के मुजिक मेकर्स स्टूडियो में रिकोर्ड किया गया है।संगीतकार डॉ प्रेम भंडारी हैं।वहीं इसे पामिल भंडारी मोदी और अरुण सनाढ्य ने गाया हैं।रिकोर्डिंग साथी थे सुशील चौधरी।पूरी टीम को बधाई देने हेतून आप डॉ प्रेम भंडारी से यहाँ 9414158358 पर संपर्क कर सकते हैं।

अपनी माटी वेबपत्रिका के ऑडियो प्रोजेक्ट के तहत इसे यहाँ साझा कर रहे हैं।प्रथम दृष्टि में ये गीत अतिशयता के साथ वर्णन का आभास देता है मगर किसी भी इंसान का अपना अपना भाव और माटी के प्रति अनुराग है जिसे वो अपने तरीके ज़ाहिर करता है।अब्दुल ज़ब्बार जी तकनिकी तौर पर बहुत जानकार नहीं हैं।मुझे लगा ये गीत एक बारगी तो चित्तौड़ के गुणगान को आगे बढ़ा सकता है सो यही सोच 
यहाँ आप साथियों के हित साझा कर रहे हैं।आशा है आपको पसंद आयेगा आप इसे साधिकार डाउनलोड करके अपने मित्रों से साझा कर सकते हैं।हो सके तो गेताकर को एक फोन लगाकर बधाई दे दीजिएगा।-शुक्रिया।



माणिक 
अध्यापक

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