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''कविता साधना है, इसको लेकर कोई हड़बड़ी नहीं होनी चाहिए''- अरुण कमल

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, नवंबर 04, 2012 | रविवार, नवंबर 04, 2012


‘खुली खिड़कियों वाला तहखाना’ के बहाने कविता की पड़ताल !
- कविता लिखने का कोई फार्मूला नहीं होता - खगेन्द्र ठाकुर
- स्त्री विमर्श या किसी अन्य विमर्श पर लिखी गई कविताएं कमजोर होती है- कृष्ण कल्पित।
- कविताओं को विमर्श से नहीं समझा जा सकता, कविता एक लंबी बहस है - आलोक धन्वा

पटना
बांयें से- पटना दूरदर्शन निदेशक कृष्ण कल्पित,
कवि आलोक धन्वा, आलोचक खगेन्द्र ठाकुर,
कवयित्री रानी श्रीवास्तव, कवि शहंशाह आलम,
राजकिशोर राजन एवं अरविन्द श्रीवास्तव
रविवार को पटना में कवि और आलोचकों का अद्भुत संगम प्रगतिशील लेखक संघ, पटना इकाई द्वारा आयोजित कवयित्री रानी श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘खुली खिड़कियों वाला तहखाना’ के लोकार्पण समारोह में दिखा। जिसकी  अध्यक्षता पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस ने की तथा संचालन कवि राजकिशोर राजन ने किया। इस मौके पर आलोचक खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि कविता का कोई फार्मूला नहीं होता और न आलोचना किसी फार्मूले पर लिखी जाती है। रानी श्रीवास्तव की कविताएं यही बोध कराती है और विश्वास को पाले रखती है। इनकी कविताओं में मनुष्यता की चिंता है। 
वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि कविता लिखना साधना का काम है, इसको लेकर कोई हड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। रानी श्रीवास्तव की कविताएं पढ़ने पर वेदना दूर होती है। रश्मिी रेखा, सविता सिंह, पूनम सिंह, अनामिका जिस तरह से समकालीन हिन्दी कविता में सक्रिय हैं मेरा विश्वास है कि रानी श्रीवास्तव दूसरी पंक्ति में दिखाई देगी। उन्होंने आगे कहा कि हिन्दी में सबसे बुरा हाल छंदों का है, छंद लिखना सबसे कठिन काम है। दुनिया का हर श्रेष्ठ कवि छंद को जानता है...। कवि आलोक धन्वा ने कहा कि कविता एक लंबी बहस है और रानी श्रीवास्तव ने इसमें सुखद हस्तक्षेप किया है। इनकी कविताओं में किसी तरह की चालाकी, कौशल या छद्म दिखाई नहीं देता। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री रवीन्द्र राजहंस ने रानी श्रीवास्तव की कविताओं में संभावनाओं की प्रचूरता को रेखांकित किया। विधान पार्षद केदार नाथ पाण्डेय ने कविता को जनसाधारण का हथियार बताया। 
पटना दूरदर्शन के निदेशक और कथाकार कृष्ण देव कल्पित ने कहा कि समकालीन हिन्दी कविता में पिछले दस वर्षों में कवयित्रियों की जितनी संख्या बढ़ी है वह चैकाती है। स्त्री विमर्श या किसी अन्य विमर्श पर लिखी गई कविताएं कमजोर होती है। रानी श्रीवास्तव की कविताएं अलग-अलग विषयों पर लिखी गई है। कथाकार विजय प्रकाश ने रानी श्रीवास्तव की कविताओं पर समग्रता से प्रकाश डाला। कवि शहंशाह आलम ने कविता की सहजता और इनकी कविताओं में विषयगत वैविध्यता के साथ-साथ गहन सूक्ष्मता को रेखांकित किया।  
अरविन्द श्रीवास्तव ने कहा कि रानी श्रीवास्तव की कविताओं से गुजरना किसी नर्म मुलायम कोमल फर्श पर चलने का अहसास नहीं बल्कि पथरीली पगडंडियों का कठिन सफर के साथ दुष्चक्रों का चक्रव्यूह तोड़ने का नाम है, इनकी कविताओं में यर्थाथ और भोगा हुआ सच का अद्भुत सामंजस्य है, कोलाज है। ...कवयित्री का अपनी निजी दुनिया से अनुबन्ध है जिसे बगैर किसी लाग लपेट और भाषिक चमत्कार के बेझिझक सुधी पाठकों के समक्ष साझा करती है। चुप्पी भरे समय में इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी ? 

आलोचक रेवती रमण, कवयित्री पूनम सिंह, मिथिलेश कुमारी मिश्र, डा. बीएन पाण्डेय, राकेश प्रियदर्शी आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन राजकिशोर राजन एवं धन्यवाद ज्ञापन शहंशाह आलम ने किया। पटना में प्रगतिशील लेखक संघ के इस आयोजन की धमक काफी समय तक सुनाई पड़ेगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है। 
जो एक प्रखर हस्ताक्षर हैं। 
फिलहाल मीडिया प्रभारी सह प्रवक्ता
बिहार प्रलेस के पद पर रहते हुए 
संस्कृतिकर्मी के रूप में साहित्य की सेवा में हैं।
अशेष मार्गमधेपुरा (बिहार),
मोबाइल- 09431080862.इनका संपर्क सूत्र है
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