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हेमंत शेष के संस्मरण में रिजवान ज़हीर उस्मान

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, नवंबर 09, 2012 | शुक्रवार, नवंबर 09, 2012

(हेमंत शेष ये संस्मरण डायरीनुमा तरीके से फेसबुक पर क्रमश: साझा कर रहे हैं। यहाँ गैर फेसबुकी पाठकों के हित को ध्यान में रखते हुए फिर से प्रस्तुत कर रहे हैं-सम्पादक )

दिवंगत रंगकर्मी रिजवान ज़हीर उस्मान 
फेसबुकी शीर्षक 
एक दिन उसे भी जाना ही था पर यों नहीं....
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जयपुर के किशनपोल बाज़ार में घुसते ही बाएं हाथ को ‘हिंदुस्तान टेंट हाउस’ के एन पडौस में एक अनूठी जगह थी- जहाँ न ‘रवि स्टूडियो’ का कोई बोर्ड टंगा था न कोई राहगीर ही जान सकता था- कि वह हम सब के पक्के दोस्त कमाल के आदमी–फोटोग्राफर रवि जैन के कब्जे में है ! हाँ, बात सत्तर के दशक की ‘रवि स्टूडियो’ की है....जो किशनपोल बाज़ार के पोस्ट ऑफिस के एन पडौस में हमारा अड्डा होता था. ....यों वह फ़ोटो-स्टूडियो था, पर स्टूडियो कम–जयपुर के बहुतेरे रचनात्मक लोगों से अनायास मिलने की जगह ज्यादा! 



हर शाम अलग अलग मिजाज़ और पृष्ठभूमि के लोग वहां बेनागा आते और एक दो पुराने से सोफों और कुछ टूटी कुर्सियों पर लम्बी गप्प-गोष्ठी जमती....अच्छी-बुरी सब तरह की बातें होतीं....अश्लीलता से ले कर अस्तित्ववाद तक !बहुत साल पहले तब हम कई दोस्त रवि जैन द्वारा संचालित ‘रवि-स्टूडियो’ के सदस्य थे- श्रीगोपाल पुरोहित, ज्योतिस्वरूप, विद्यासागर उपाध्याय, अशोक आत्रेय, विनय गोस्वामी, प्रदीप दास, उमेश पारीक, रवि झाँकल, अक्षय भंसाली, एन के जैन, डॉ. पी के श्रीवास्तव (मजाज़ जयपुरी) सुभाष मेहता.... जब भी कभी उदयपुर से मशकूर जावेद, कैलाश जोशी, प्यारचंद’साथी’, शाहिद अजीज़, या चरन शर्मा में से कोई भी जयपुर आता – उनका ‘रवि स्टूडियो’ आना या उन्हें खींच लाया जाना जैसे अनिवार्य था! 



कई बार तो होता यह था कि रोचक बातें इतनी देर रात तक चलतीं- कि रात दो बजे रेलवे स्टेशन या मेडिकल कॉलेज या सवाई मानसिंह अस्पताल के सामने जा कर चौथी बार चाय पीना लाजिमी होता था- क्यों कि पूरी रात चाय सिर्फ वहीं नसीब हो सकती थी....शहर की बाकी चाय की सब दुकानों पर ताले लग चुके होते थे....कई दफा तो पूरी रात ही सड़क पर कट जाती.....ऐसे बेफिक्र और मजेदार दिनों में एक दिन अचानक हम सब से मिलने मशकूर जावेद के साथ उदयपुर से एक नवयुवक ट्रक-ड्राइवर आया !



काली कमीज़ और पुरानी सी पतलून पहने एक ऐसा नौजवान, जो असल में एक लेखक ही था- सांवला, पर सुदर्शन- लम्बा, मज़बूत कद-काठी का आर. ज़ैड. उस्मान! तब उस्मान की कहानियां और कवितायेँ हम ‘मधुमती’ समेत कुछ पत्रिकाओं में देख चुके थे और एक दूसरों के नामों से सुपरिचित थे... उन दिनों आर. ज़ैड. उस्मान अपना या अपने किसी रिश्तेदार का ट्रक चलाया करता था... यह हम सब के लिए एक अचम्भा था क्यों कि आजीविका के लिए वह एक ट्रक-ड्राइवर था... पहली भेंट में ही उसने अपनी बहुत सी चीज़ें सुनाईं और हमें पहली ही भेंट में उसके मेवाड़ी लहजे की हिन्दी बोलने के अंदाज़ ने मोह लिया! 
जितनी बार मैं उदयपुर गया हूँ कवि नन्द चतुर्वेदी, निर्देशक भानु भारती, लेखक पूनम दैय्या चित्रकार सुरेश शर्मा, शैल चोयल लक्ष्मीलाल वर्मा, समीक्षक विश्वम्भर व्यास, और वहां कई लोगों से मिलता रहा हूँ....पर आर. ज़ैड. उस्मान से मिलने उनके घर कभी जाना नहीं हुआ–‘भूत-महल’ नाम का कोई मोहल्ला या इलाका है, उदयपुर का जहाँ रिजवान ज़हीर उस्मान का मकान था पर वह रात को बस सोने के लिए ही घर जाते, पूरे दिन-दिन भर और प्रायः हर शाम को आप उन्हें सूचना केंद्र के परिसर में बैठा देख सकते थे. 

सूचना केंद्र ही उनका शरणगाह आरामगाह सब कुछ था- जैसे उनका दूसरा घर हो! बेनागा हर शाम दारू पीने का अड्डा भी....उन्होंने नाटकों के लिखने सुनाने और मंचित किये जाने के लिए एक ऐसी जगह चुनी थी जो शहर के बीचोबीच थी... सब दोस्त वहां जमा होते जिन्हें उस्मान प्रायः हर सप्ताह अपना एक नया नाटक सुना देते क्यों कि उस्मान के लिखने की रफ़्तार हैरतअंगेज़ थी. वह घर-बाहर- बाज़ार- भीड़ शोर-शराबे घाट कहीं भी किसी भी जगह बैठ कर लिख सकते थे! 

अनूठी मौलिकता और आधुनिकता के लिहाज़ से हर बार उनका लिखा और मंचित कि या काम लोगों को हैरानी से भरी प्रसन्नता में डाल देता था! “अनहोनियाँ”, “लोमड़ियाँ”, “नमस्कार! आज शुक्रवार है”, “गला काटने वाले आदमी का गला” से शुरू करूं तो उस्मान के नाटकों की सूची अनंत तक जाएगी! किसी हिन्दी नाटककार ने आज तक इतनी बड़ी संख्या में अत्याधुनिक संवेदना के नाटक न तो लिखे न मंचित किये होंगे!

खुद उस्मान नहीं जानते थे उन्होंने अपने जीवन में कुल कितने नाटक लिखे और मंचित क्यों कि वह कभी अपने नाटकों की प्रति नहीं रखते थे- अपने पचासों बेहतरीन नाटकों की पाण्डुलिपियों को फोटोस्टेट कराने लायक पैसे भी उस्मान के पास कभी नहीं रहे क्यों कि वह एक जन्मजात निर्धन कलाकर्मी थे- बेहद मुफलिस! अनेक मौकों पर दोस्तों ने उन्हें और उनके परिवार को भूखों मरने से बचाया था. अंत में हालत ये हो गयी थी जैसा अशोक आत्रेय ने अपने फेसबुक पन्ने पर लिखा है- “उदयपुर के आधे घरों के दरवाज़े उस्मान के लिए बंद हो गए थे”. कई पक्के पुराने दोस्तों ने उनकी उधार मांगने और कभी पैसा वापस न करने की पुरानी आदत से आजिज़ आ कर उनसे संवाद ही बंद कर दिया था- पर हमेशा अभाव और विपन्नता में रहने वाले उस्मान के किसी नाटक में उनका कठिन और दयनीय पारिवारिक जीवन प्रतिध्वनित नहीं हुआ है– जीवन भर अर्थाभाव के भयंकर दुर्दिन झेलने वाले उस्मान की अदम्य रचनाशीलता कभी पराजित नहीं हुई- उन्हें धोखा दिया तो उनकी किडनी ने, जो नियमित तौर पर पी गयी सस्ती दारू से नष्ट हुई और जो उस्मान को खुदा के घर खींच ले गयी हालाँकि वह नमाज़ अदा करने कभी मस्जिद नहीं गए !


बहुत साल पहले तब हम कई दोस्त रवि जैन द्वारा संचालित ‘रवि-स्टूडियो’ के सदस्य थे- श्रीगोपाल पुरोहित, ज्योतिस्वरूप, विद्यासागर उपाध्याय, अशोक आत्रेय, विनय गोस्वामी, प्रदीप के दास, उमेश पारीक, रवि झाँकल, अक्षय भंसाली, एन के जैन, डॉ. पी के श्रीवास्तव (मजाज़ जयपुरी) सुभाष मेहता.... उदयपुर से मशकूर जावेद, कैलाश जोशी, प्यारचंद’साथी’, शाहिद अजीज़, या चरन शर्मा ….मैंने उस्मान के संस्मरण वाली सीरीज़ इस वाक्य से की थी – पर आह ! मैं सरदार कुलवंत सिंह और किशोर सिंह नाथावत को कैसे भूल गया? अब बताने का वक्त आया आज उनमें से कौन क्या है जानिये- 


श्रीगोपाल पुरोहित, (स्व.) बीकानेर से निकले- दिल्ली जा के खुद की समाचार एजेंसी खोली पर सारा पैसा डुबोया- बाद में नौकरी पत्रकारिता की- वहाँ जहाँ मन किया- ओम थानवी, यशस्वी संपादक ‘जनसत्ता’ के सगे ससुर!....’राजस्थान पत्रिका’- जहाँ आज है उसकी नींव के पत्थर- उसकी साप्ताहिक ‘इतवारी पत्रिका’ के प्रणेता-राजस्थान के जाने माने पत्रकार, ‘श्रुति-मंडल’ के संस्थापक सदस्य- हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के भयंकर किस्म के ‘कानसेन’, ‘रंगश्री’ के नकली नाम से ‘इतवारी पत्रिका’ ‘ और राजस्थान पत्रिका- में नियमित कला/ संगीत-समीक्षा लिखने वाले ज्योतिस्वरूप, (स्व.) भारत के सर्वाधिक सृजनशील चित्रकारों में से एक विद्यासागर उपाध्याय, भारत के सर्वाधिक सृजनशील चित्रकारों में से एक अशोक आत्रेय, हिन्दी के अलबेले और मेरे सबसे प्रिय परम कथाकार विनय गोस्वामी, सीनियर जज, आतंकवादी न्यायालय, अजमेर प्रदीप के दास, अमेरिका के बेहद महंगे एवेन्यू मे जयपुर के रत्न-कारोबारी उमेश पारीक, बी. एस . सी., मेरे कहने पे एम् ए (समाजशास्त्र), एल एल बी, डिप्लोमा लेबर-लौ .....उत्तरी अफ्रीका में अपने शादीशुदा सुन्दर लंबे –चौड़े बेटे हेतु चीनी-मिल खरीदने वाले, 



चंडीगढ़-निवासी.... स्प्रिंकलर-सिस्टम के विशेषज्ञ, जयपुर की आमेर की घाटी के सौन्दर्यीकरण के लिए अकेले उत्तरदायी- गज़ब के लैंडस्केप-आर्किटेक्ट- चंडीगढ़ ही नहीं कई शहर इन्हें सलाम करते हैं - हर जगह अनगिनत म्यूजिकल-फाउंटेन के कारण! मेरा चड्डी-बदल- दोस्त प्रियतम ....पता नहीं कितने साल का हमसफ़र !रवि झाँकल, नाटकों के पीछे हर वक्त जुनूनी, बेहद मस्तमौला, फेसबुक सहित मेरा १९७५ से दोस्त, धारावाहिक सीरियलों का जाना-माना नाम, एम ए में मुझसे एक साल जूनियर!

अक्षय भंसाली, प्रोफ़ेसर समाजशास्त्र, राजकीय महाविद्यालय, पिम्मो शाह का दोस्त! जयपुर त्याग के भीलवाडा में स्थाई घर!एन के जैन, तीन बार प्रेसिडेंट एल आई सी डाइरेक्ट एजेंट एसोसियेशन, जयपुर के जाने-माने परिक्रमाकर्ता डॉ. पी के श्रीवास्तव (मजाज़ जयपुरी) (अब स्व.) फिलोसोफी के प्रोफेसर , राजस्थान विश्वविद्यालय, उर्दू जगत में मजाज़ जैपुरी के नाम से मशहूर सुभाष मेहता.... चीफ आर्टिस्ट, वन विभाग, संयुक्त निदेशक कृषि : अब कलाकारी करने उदैपुर में स्थाई रूप से–सांसद गिरिजा व्यास के सगे भांजे- इधर श्रीनाथजी पर बनाये हैं –इन्होने बहुत से चित्र और प्रदर्शनियां कीं- गंभीरता से पी एच डी –“पुष्टिमार्गीय चित्रांकन परंपरा” पर!मशकूर जावेद, (अब स्व.) एक समय कुछ बेहद अच्छी कहानियां लिखने वाला और ‘मधुमती’ में ही ज़्यादातर छापा गया- बेहद प्यारा दोस्त- जो हर शाम महंगी बीयर पी कर मुझे साथ लिए उदैपुर के कई पार्कों में महज़ जवानियाँ घूरने ही जाया करता था इस असफल उम्मीद में कि काश ! चलते चलाते कोई दिल ही दे बैठे .... 

कैलाश जोशी, इनके बारे में दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने लिखा ही है!प्यारचंद ’साथी’, कवि और मित्र शाहिद अजीज़, क्यूरेटर- राजकीय संग्रहालय उदैपुर और हंसमुख प्रेमालु शायर चरन शर्मा …. आप सब ही तो जानते है- ये क्या चीज़ है!उस्मान ने तब एक साहित्यिक संस्था बनाई ही थी- नाम था- 'उपशाम'! याने दोस्तों के नामों के पहले हर्फ़ को जोड़ कर बनाया गया नाम- 'उपशाम' जिसके संस्थापक सदस्य थे- उस्मान, प्यारचंद साथी, शहीद अजीज़ और मशकूर जावेद।

जब भी उदयपुर गया- अशोक आत्रेय और असद जैदी ने, जिनसे मेरा तार्रुफ पहले से जयपुर के दिनों से, बरसों से था-मुझे हाथों हाथ लिया! उस्मान वहाँ फिर मिला! ये तीनों लेखक तब सेवा-मंदिर नामक संस्था में थे- उस्मान- प्रौढ़ शिक्षा संबंधी नुक्कड़ नाटक स्व. मोहन सिंह मेहता द्वारा स्थापित उदयपुर की इस नामी-गिरामी संस्था के लिए रचता-करता था! तब वहाँ एक कमला भसीन नामक एक सुन्दर आधुनिका और थीं- अंग्रेज़ी अखबारों में शिक्षा को ले कर लगातार लिखने वाली- जिन के लखनवी पारदर्शी कुर्ते के बटन बेहद कामोत्तेजक ढंग से खुले ही रहा करते थे- वह चोली से नफरत करती होंगी शायद- इसलिए मुझ जैसे दर्शक के लिए नज़ारा हमेशा ही बेहद मारक होता था ! थीं वह राजस्थान की चर्चित पर्यटन मंत्री बीना काक की बडी बहन, शायद- बडौदा से पढ़ कर आयीं ! खैर! 

उस्मान ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए इतना काम किया किया था कि राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति और 'राज्य सन्दर्भ केंद्र' उसके ही पर्यायवाची टाइप लगते थे! तब जयपुर आने पर आर. जेड. उस्मान हमेशा उन के 'गेस्ट-हाउस' को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते कई दिन तक बिना धेला दिए ठहरा करता था! शाम को उस से मिलने जाने पर सस्ती दारू की बोतल हाथ में लिए ठेके से आता वह अकसर मुझे दिखता- अपनी सफ़ेद झक्क घनी दाढ़ी और चमकीले साबुत दांतों समेत! उस्मान ने तभी शायद अपना- एक और लोकप्रिय अमर नाटक "वनदेवी" भी लिखा था- जो डूंगरपुर-बांसवाडा के आदिवासियों को अभिनय में प्रशिक्षित करने से पूर्व ! आज भी डूंगरपुर-बांसवाडा के अनगिनत अनपढ़ भोले भाले स्त्री-पुरुष आदिवासियों को उस्मान का प्रकृति-रक्षा का सन्देश देता वह नाटक "वनदेवी" कंठस्थ है! मुझे बताते खुशी है कि आर. जेड. उस्मान का नाम आज ऐसे कई लोग जानते हैं जो दबे-कुचले सताए हुए आदिवासी हैं- हर तरह से मजलूम और गरीबी की सीमा से बहुत नीचे रहते आये मजबूर - स्वाधीन भारत के नागरिक !

हमारे गेंग के एक बेहद मजाकिया किशोर सिंह नाथावत एक बड़े राजपूत परिवार के सदस्य, जयपुर राजपरिवार के नज़दीकी हैं! उनके बेटे की शादी में मैंने अपने समय की सबसे सुन्दर स्त्रियों में से एक- महारानी गायत्री देवी और उनके पुत्र स्व. ब्रिगेडियर भवानी सिंह के अलावा राजकुमारी दिव्या से नज़दीकी परिचय पाया था! अपने पिता- बेहद ख्यातनाम वनस्पति-विज्ञान प्रोफ़ेसर, फेलो ऑफ रोयल सोसाइटी के सदस्य स्व. जी .एस. नाथावत के देहावसान के बाद अब वह "ठाकुर किशोर सिंह जी खम्माघणी" कहलाते हैं! 

जोबनेर के पास के पञ्चकौडिया ठिकाने के भूतपूर्व जागीरदार, मेरे सेन्ट्रल स्कूल के आठवीं क्लास से सहपाठी, जिनकी दिलचस्पी संसार भर की चौपहिया 'गाड़ियों' में गहरी है- किस गाड़ी में कौन सा इंजन लगा है - वह आप को पूछने पर बता देंगे! वह आजीविका के लिए जयपुर के मालवीय नेशनल इंस्टीट्यूट के सिविल एन्जीनियरिंग विभाग में रहे हैं!उस्मान से ये सब लोग भी मेरे माध्यम से मिले थे! ये अटपटी पृष्ठभूमि वाले भिन्न भिन्न व्यवसायों वाले लोगों का समूह था- जिनके बीच बस कुछ था तो मैत्री.....और रवि स्टूडियो की छत !

जब जब मौका मिला- दोस्तों ने प्रशंसकों ने उस्मान की भरपूर/ यथाशक्ति मदद की! कहानीकार (हमारे रवि-स्टूडियो गेंग में –काकाजी नाम से ख्यात ) अशोक आत्रेय उनमें से एक हैं (जिन्होंने अपनी धर्मपत्नी से छिप-छिपा कर) अपनी गाढ़ी कमाई अक्सर उस्मान को जिंदा रखने में लगाई..... ...पर उस्मान पता नहीं कैसी दरिद्र-रेखा हाथ में लिए अवतरित हुआ था कि वह हमेशा तकलीफ में मिलता- बराबर सिगरेट पीना उसका व्यसन था- और शराब एक ज़रूरत.....दोनों पर उस्मान ने खूब धन लुटाया या अपने ‘बड़े’ परिवार के लिए राशन-पानी भरवाने में ! अशोक आत्रेय ने ही उस्मान की बीमारी के दौरान राजस्थान की “संस्कृति-मंत्री” बीना काक से मिल कर, जो खुद उस्मान की घनघोर प्रशंसक रही हैं, एक बड़ा सा अनुदान, पता नहीं शासन के किस कोष से दिलवाया था! 
बात १९९२-९३ की है! तब मैं जवाहर कला केंद्र का अतिरिक्त महानिदेशक होता था- उस्मान मियाँ हाथ में कागज का पुलंदा लिए एक दिन हमेशा की तरह बड़ी सी मुस्कान लिए हमें जवाहर कला केंद्र की तरफ आते दिखे- कंधे पे गुलाबी अंगोछा टाँगे जो उनके व्यक्तित्व का अटूट भाग हो चला था (उस्मान को पसीना बहुत आता था!)- हवाई चप्पलें- काली पेंट और टी-शर्ट में जो उनके लड़के की रही होगी! 
आते ही हम चार्ल्स कोरिया द्वारा बनाई गयी केन्टीन के पथरीले आसनों पे जम गये- उस्मान उस दिन- अद्भुत चीज़ साथ उदयपुर से साथ लाया था- “अनहोनियां” एक सम्पूर्ण नाटक- जिसे मैंने वहीं बैठे २ सांस रोक कर सुना....नाटक इतना नया और मौलिक था कि मैंने तुरंत फैसला कर लिया कि भले दो महीने लगें- या एक माह, ये नाटक आज से जवाहर कला केंद्र का ‘इन हाउस’ प्रोड्क्शन बनेगा! ‘अनहोनियां’ के बारे में स्व. सरताज नारायण माथुर को, जो वहाँ नाट्य अनुभाग के निर्देशक थे, मैंने कुछ नहीं बताया- एक लाख रुपये का बजट स्वीकृत कर उस्मान को कह दिया कि वह दो माह के लिए- राज्य सन्दर्भ केंद्र का गेस्ट हाउस छोड़ दे और अपने डेरे डंडे लेकर जवाहर कला केंद्र की अतिथिशाला में आ जाए ताकि यहीं कास्टिंग हो, और रोज नियमित रिहर्सल!     
तो तय पाया गया कि ‘अनहोनियां’ सरकारी खर्च पर होगा- और एक माह में उस्मान पूरा नाटक मंचित करवा कर ही उदयपुर लौटेंगे! लाख रुपये में सब चीज़ें होनी थीं- लेखकीय पारिश्रमिक, निर्देशकीय-फीस, रंगसज्जा, अभिनेताओं पर होने वाला दैनिक व्यय, संगीतकार-फीस...ब्रोशर की छपाई वगैरह! दवा-दारू- भी इसी राशि से...

तब उस्मान की खर्च-राशि में बचत करने के लिए मैंने तब उसी दिन दफ्तर में बैठ कर “अनहोनियां” का ए-४ साइज़ वाला सचित्र-ब्रोशर खुद डिज़ाइन कर डाला, जो सीपिया रंग में जब छप कर आया तो हर देखने वाले को भाया ! सवाल था कि ऐसे विचित्र कथानक वाले नाटक के पात्र कौन हों? मैंने सुझाया-स्थापित नामों की बजाय, भले उस्मान को ज्यादा मेहनत क्यों न करनी पड़े, क्यों न एकदम नए चेहरों को ही लिया जाए?

उस्मान को ‘हाँ’ कहने में ज़रा भी देर नहीं लगी और हमारे कुछ पूर्वपरिचित युवा अभिनेताओं- दिलीप भट्ट, आयुष्मान गोस्वामी, अमित शर्मा और कई बच्चों को मुफ्त में काम करते हुए भी उस शक्सियत- आर. जेड. उस्मान से नाटक की कला नए अंदाज़ में सीखने का अनूठा मौका मिला जो तहलका मचाने वाले अपने कुछ बहुत जानदार नाटकों- "मछली का घोंसला", "नमस्कार! आज शुक्रवार है!", "सुन लड़की! दबे पाँव आते हैं सब मौसम", 'कल्पना-पिशाच", "अनहोनियाँ", "गला काटने वाले आदमी का गला", “इतिहास”, “ बंदूक की नाल से दुआएं नहीं निकलतीं और चाकू पैगम्बरों की तरह नहीं मुस्कुराते” आदि-२ के लिए दूर दूर तक जाना जाता था!

मैं देखता था- रिहर्सल के दौरान या काम के दौरान उस्मान बहुत संजीदा रहते थे- शराब से भी कोसों दूर...चाहे कितनी ही देर हो जाए काम खत्म करके ही वह मधुशाला का डाट खोलते थे, पहले नहीं...निर्देशन की बारीकियों को अपने पात्रों को समझाते वह पहले हर पात्र का खुद अभिनय कर के बतलाते और दूसरों को प्यार से सिखलाते- मंच के अवकाश का सर्जनात्मक इस्तेमाल अलग-अलग ढंगों से कैसे किया जाय!

वादे के मुताबिक काम पूरा हुआ.. “अनहोनियां” जिसे मैं अपने द्वारा सम्पादित पत्रिका ’कला-प्रयोजन” में ससम्मान छाप चुका था, जवाहर कला केंद्र की ‘स्वग्रही-प्रस्तुति’ के बतौर नाट्य-समारोह में शरीक हुआ! मंचन से पहले मन में डर सा था- कि मेरी अपनी इज्ज़त दाँव पर लगी थी, मैं डर रहा था- कि लोग नाटक को कैसे लेंगे?पर उद्घाटन के दिन प्रेक्षाग्रह में उस्मान पूरे दिन चुप रहे ...नाटक शुरू होने से पूर्व वह दबे पाँव आये... और सबसे पीछे वाली कतार में एक मामूली दर्शक की तरह कोने की कुर्सी पर बैठ गये !

नाटक के सफल मंचन के बाद जब संस्कृति मंत्री समेत अनेक गणमान्य दर्शक नाट्य-लेखक- निर्देशक - वेशभूषा –प्रभारी, सेट-नियंत्रक, ध्वनि-संयोजक, पार्श्व-संगीत, और प्रकाश-व्यवस्था के लिए छःअलग अलग लोगों के नाम सुनने की उम्मीद कर रहे थे- मंच के पीछे से पुकारा गया- ".....तो यह था नाटक “अनहोनियां”....जिसके नाट्य-लेखक-निर्देशक-पार्श्व-संगीतकार-वेशभूषा–प्रभारी, सेट-नियंत्रक, ध्वनि-संयोजक और प्रकाश-व्यवस्थापक हैं- रिजवान ज़हीर उस्मान!..."

उस्मान की मदद के लिए न किसी कलाकार ने मेहनताना लिया था न और किसी ने एक धेला ही...'अनहोनियां' उस शाम हुआ ज़रूर... पर जैसा डर था , हुआ बिलकुल वही, शायद डेढ़ घंटे का वह यादगार नाटक, जिस पर हर एक ने जी-तोड़ मेहनत की थी, अधिकतर दर्शकों/ मीडियोकर लोगों के सर के ऊपर से निकल गया....

उनकी नाट्य-प्रतिभा और बेजोड़ नाट्य-शैली से जलने-भुनने वाले रद्दी किस्म के मरियल समीक्षकों / स्थानीय पिलपिले निर्देशकों ने न दूसरे दिन के अखबारों में, न बाद में कहीं उस्मान के उस रंगकर्म की विशिष्टता का कोई गंभीर मूल्यांकन कभी किया- बल्कि कुछ एक ने उन्हें बस एक 'प्रयोगवादी नाटककार’ कहते हुए अपने अज्ञानी होने का सबूत ज़रूर दे दिया ! कितनी विडम्बना है कि उस्मान की केवल एक किताब (शायद) 'कल्पना-पिशाच’, उनके जीवन-काल में छपी- जब कि उनके नाटकों की विपुल संख्या के आधार पर उनके लिखे आधुनिक हिन्दी नाटकों के कई खंड छापे जा सकते थे!

असद जैदी ने पहले किसी कवितांक में उस्मान की बेजोड़ कवितायेँ प्रकाशित कीं थी पर उनकी पत्रिका ‘जलसा’ के पन्नों पर मैंने उस्मान को कभी नहीं पढ़ा! उस्मान एक जलती हुई मोमबत्ती था- उसे गलना और बुझना ही था....बहाना कोई तो होता ही ....आंशिक-अन्धता, मधुमेह, रक्ताल्पता, अंततः गुर्दे की मशीन का फेल हो जाना....

....बराबर सस्ती सिगरेट पीना उसका व्यसन था- और शराब एक ज़रूरत.....बस इन दो चीज़ों पर उस्मान ने खूब धन लुटाया या अपने ‘बड़े’ परिवार के लिए राशन-पानी भरवाने में ! पर परिवार, बच्चे, दोस्त, और सगे-संबंधी उस्मान को अकेला छोड़ते उस से क्रमशः दूरतर होते चले गये... हालत ये हो गयी कि उस्मान को उदयपुर ही छोड़ना पड़ा- पास के एक गाँव- "थूर" में अकेले जा कर रहने के लिए ताकि कम खर्च में जीवन की गाड़ी चल सके....अंतिम महीनों की लंबी बीमारी ने उनकी फिर पाई-पाई झाड़ ली और उस्मान, जो मध्य-प्रदेश के मंदसौर कस्बे में १९४७ से साल में जन्मे थे, पेंसठ साल इस अनोखी-जीवन-शैली में बिता कर बिलकुल खाली हाथ संसार से चले गये....

..... मुझे पता नहीं उस्मान की मैयत में कौन-कौन शामिल हुआ होगा, कितने शिष्य, कितने प्रशंसक, कितने दर्शक, कितने रिश्तेदार, कितने असली-नकली दोस्त, कितने नाट्य-आलोचक ? मुझे आज तो यह भी पता नहीं थूर गाँव या उदयपुर के किस कब्रिस्तान की खाक में उस्मान ज़मींदोज़ हुआ??? .... यह एक दुर्दम्य-सर्जनात्मक, पर घनघोर उपेक्षित-प्रतिभा का दारुण-सामाजिक-अंत है ....जैसे उनकी मृत्यु में भी एक भयंकर दुखांत-नाटक छिपा है..... एक ऐसी शोकांतिका, जिसके अपराधी-पात्र- वह, आप, मैं- हम सभी तो हैं! 
(समाप्त)                         




हेमंत शेष

(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत साल पहले तब हम कई दोस्त रवि जैन द्वारा संचालित ‘रवि-स्टूडियो’ के सदस्य थे- श्रीगोपाल पुरोहित, ज्योतिस्वरूप, विद्यासागर उपाध्याय, अशोक आत्रेय, विनय गोस्वामी, प्रदीप के दास, उमेश पारीक, रवि झाँकल, अक्षय भंसाली, एन के जैन, डॉ. पी के श्रीवास्तव (मजाज़ जयपुरी) सुभाष मेहता.... उदयपुर से मशकूर जावेद, कैलाश जोशी, प्यारचंद’साथी’, शाहिद अजीज़, या चरन शर्मा ….मैंने उस्मान के संस्मरण वाली सीरीज़ इस वाक्य से की थी – पर आह ! मैं सरदार कुलवंत सिंह और किशोर सिंह नाथावत को कैसे भूल गया? अब बताने का वक्त आया आज उनमें से कौन क्या है जानिये-
    श्रीगोपाल पुरोहित, (स्व.) बीकानेर से निकले- दिल्ली जा के खुद की समाचार एजेंसी खोली पर सारा पैसा डुबोया- बाद में नौकरी पत्रकारिता की- वहाँ जहाँ मन किया- ओम थानवी, यशस्वी संपादक ‘जनसत्ता’ के सगे ससुर!....’राजस्थान पत्रिका’- जहाँ आज है उसकी नींव के पत्थर- उसकी साप्ताहिक ‘इतवारी पत्रिका’ के प्रणेता-राजस्थान के जाने माने पत्रकार, ‘श्रुति-मंडल’ के संस्थापक सदस्य- हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के भयंकर किस्म के ‘कानसेन’, ‘रंगश्री’ के नकली नाम से ‘इतवारी पत्रिका’ ‘ और राजस्थान पत्रिका- में नियमित कला/ संगीत-समीक्षा लिखने वाले
    ज्योतिस्वरूप, (स्व.) भारत के सर्वाधिक सृजनशील चित्रकारों में से एक
    विद्यासागर उपाध्याय, भारत के सर्वाधिक सृजनशील चित्रकारों में से एक
    अशोक आत्रेय, हिन्दी के अलबेले और मेरे सबसे प्रिय परम कथाकार
    विनय गोस्वामी, सीनियर जज, आतंकवादी न्यायालय, अजमेर
    प्रदीप के दास, अमेरिका के बेहद महंगे एवेन्यू मे जयपुर के रत्न-कारोबारी
    उमेश पारीक, बी. एस . सी., मेरे कहने पे एम् ए (समाजशास्त्र), एल एल बी, डिप्लोमा लेबर-लौ .....उत्तरी अफ्रीका में अपने शादीशुदा सुन्दर लंबे –चौड़े बेटे हेतु चीनी-मिल खरीदने वाले, चंडीगढ़-निवासी.... स्प्रिंकलर-सिस्टम के विशेषज्ञ, जयपुर की आमेर की घाटी के सौन्दर्यीकरण के लिए अकेले उत्तरदायी- गज़ब के लैंडस्केप-आर्किटेक्ट- चंडीगढ़ ही नहीं कई शहर इन्हें सलाम करते हैं - हर जगह अनगिनत म्यूजिकल-फाउंटेन के कारण! मेरा चड्डी-बदल- दोस्त प्रियतम ....पता नहीं कितने साल का हमसफ़र !रवि झाँकल, नाटकों के पीछे हर वक्त जुनूनी, बेहद मस्तमौला, फेसबुक सहित मेरा १९७५ से दोस्त, धारावाहिक सीरियलों का जाना-माना नाम, एम ए में मुझसे एक साल जूनियर!
    अक्षय भंसाली, प्रोफ़ेसर समाजशास्त्र, राजकीय महाविद्यालय, पिम्मो शाह का दोस्त! जयपुर त्याग के भीलवाडा में स्थाई घर!
    एन के जैन, तीन बार प्रेसिडेंट एल आई सी डाइरेक्ट एजेंट एसोसियेशन, जयपुर के जाने-माने परिक्रमाकर्ता
    डॉ. पी के श्रीवास्तव (मजाज़ जयपुरी) (अब स्व.) फिलोसोफी के प्रोफेसर , राजस्थान विश्वविद्यालय, उर्दू जगत में मजाज़ जैपुरी के नाम से मशहूर
    सुभाष मेहता.... चीफ आर्टिस्ट, वन विभाग, संयुक्त निदेशक कृषि : अब कलाकारी करने उदैपुर में स्थाई रूप से–सांसद गिरिजा व्यास के सगे भांजे- इधर श्रीनाथजी पर बनाये हैं –इन्होने बहुत से चित्र और प्रदर्शनियां कीं- गंभीरता से पी एच डी –“पुष्टिमार्गीय चित्रांकन परंपरा” पर!मशकूर जावेद, (अब स्व.) एक समय कुछ बेहद अच्छी कहानियां लिखने वाला और ‘मधुमती’ में ही ज़्यादातर छापा गया- बेहद प्यारा दोस्त- जो हर शाम महंगी बीयर पी कर मुझे साथ लिए उदैपुर के कई पार्कों में महज़ जवानियाँ घूरने ही जाया करता था इस असफल उम्मीद में कि काश ! चलते चलाते कोई दिल ही दे बैठे ....
    कैलाश जोशी, इनके बारे में दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने लिखा ही है!
    प्यारचंद ’साथी’, कवि और मित्र
    शाहिद अजीज़, क्यूरेटर- राजकीय संग्रहालय उदैपुर और हंसमुख प्रेमालु शायर
    चरन शर्मा …. आप सब ही तो जानते है- ये क्या चीज़ है!

    उस्मान ने तब एक साहित्यिक संस्था बनाई ही थी- नाम था- 'उपशाम'! याने दोस्तों के नामों के पहले हर्फ़ को जोड़ कर बनाया गया नाम- 'उपशाम' जिसके संस्थापक सदस्य थे- उस्मान, प्यारचंद साथी, शहीद अजीज़ और मशकूर जावेद-

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  2. जब भी उदयपुर गया- अशोक आत्रेय और असद जैदी ने, जिनसे मेरा तार्रुफ पहले से जयपुर के दिनों से, बरसों से था-मुझे हाथों हाथ लिया! उस्मान वहाँ फिर मिला! ये तीनों लेखक तब सेवा-मंदिर नामक संस्था में थे- उस्मान- प्रौढ़ शिक्षा संबंधी नुक्कड़ नाटक स्व. मोहन सिंह मेहता द्वारा स्थापित उदयपुर की इस नामी-गिरामी संस्था के लिए रचता-करता था! तब वहाँ एक कमला भसीन नामक एक सुन्दर आधुनिका और थीं- अंग्रेज़ी अखबारों में शिक्षा को ले कर लगातार लिखने वाली- जिन के लखनवी पारदर्शी कुर्ते के बटन बेहद कामोत्तेजक ढंग से खुले ही रहा करते थे- वह चोली से नफरत करती होंगी शायद- इसलिए मुझ जैसे दर्शक के लिए नज़ारा हमेशा ही बेहद मारक होता था ! थीं वह राजस्थान की चर्चित पर्यटन मंत्री बीना काक की बडी बहन, शायद- बडौदा से पढ़ कर आयीं ! खैर! उस्मान ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए इतना काम किया किया था कि राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति और 'राज्य सन्दर्भ केंद्र' उसके ही पर्यायवाची टाइप लगते थे! तब जयपुर आने पर आर. जेड. उस्मान हमेशा उन के 'गेस्ट-हाउस' को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते कई दिन तक बिना धेला दिए ठहरा करता था! शाम को उस से मिलने जाने पर सस्ती दारू की बोतल हाथ में लिए ठेके से आता वह अकसर मुझे दिखता- अपनी सफ़ेद झक्क घनी दाढ़ी और चमकीले साबुत दांतों समेत! उस्मान ने तभी शायद अपना- एक और लोकप्रिय अमर नाटक "वनदेवी" भी लिखा था- जो डूंगरपुर-बांसवाडा के आदिवासियों को अभिनय में प्रशिक्षित करने से पूर्व ! आज भी डूंगरपुर-बांसवाडा के अनगिनत अनपढ़ भोले भाले स्त्री-पुरुष आदिवासियों को उस्मान का प्रकृति-रक्षा का सन्देश देता वह नाटक "वनदेवी" कंठस्थ है! मुझे बताते खुशी है कि आर. जेड. उस्मान का नाम आज ऐसे कई लोग जानते हैं जो दबे-कुचले सताए हुए आदिवासी हैं- हर तरह से मजलूम और गरीबी की सीमा से बहुत नीचे रहते आये मजबूर - स्वाधीन भारत के नागरिक !

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  3. हेमंत शेष की डायरी संस्मरणात्मक तो है ही, इसे उन्होंने अनौपचारिकता और बेहद आत्मीयता के साथ लिखा है. उस्मान साहब का ज़िक्र जिस बेतक़ल्लुफी और स्नेह किया गया है, वह इस डायरी को हृदयस्पर्शी भी बना देता है. एक बेहतरीन साहित्यकार का बेहतरीन अंदाज़-ए-बयां.
    ‘अपनी माटी’ को भी धन्यवाद कि इस डायरी को मेरे जैसे बे-चेहरा (गैर फ़ेसबुकी) लोगों के आनंद के लिए यहाँ प्रकाशित करने का सोचा. हेमंत जी ने जहाँ ‘गैंगस्टर्स’ का परिचय दिया है वहाँ विरामादि की कुछ गलतियों से थोड़ा भ्रम होता है, लेकिन ये लोग इतने सुपरिचित हैं कि इनके कार्यकलापों से इनको बखूबी पहचाना जासकता है.
    हेमंत शेष और आपको पुनः बधाई. अगली किश्तों का इतज़ार है.
    कमलानाथ

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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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