Latest Article :
Home » , , , , » 'विस्‍मय का बखान' यतीन्‍द्र मिश्र के कलात्‍मक चिंतन और अनुशीलन का एक और प्रमाण है।-डॉ.ओम निश्चल

'विस्‍मय का बखान' यतीन्‍द्र मिश्र के कलात्‍मक चिंतन और अनुशीलन का एक और प्रमाण है।-डॉ.ओम निश्चल

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, नवंबर 19, 2012 | सोमवार, नवंबर 19, 2012

  • यतीन्‍द्र मिश्र की पुस्‍तक: विस्‍मय का बखान
  • कला-कुटुम्‍ब का अंतरावलोकन
  • ओम निश्‍चल

विस्‍मय का बखान ;यतीन्‍द्र मिश्र ;
वाणी प्रकाशन,
21-ए, दरियागंज,
 नई दिल्‍ली 
;
मूल्‍य 395रुपये
ISBN :
978-93-5072-201-5
(कला, कविता,संगीत और रुपंकर कलाओं में आस्‍था रखने वाले यतीन्‍द्र मिश्र का नाम हिंदी जगत में जाना पहचाना है।यदा कदा , अयोध्‍या और अन्‍य कविताऍ तथा 'ड्योढी पर आलाप' शीर्षक उनके कविता संग्रह खासा चर्चित रहे हैं। गिरिजा जी, सोनल मानसिंह, उस्‍ताद बिस्‍मिल्‍लाह खान पर उनकी किताबें मानक कोटि की हैं। गुलजार, अशोक वाजपेयी व अज्ञेय की किताबें संपादित करने का श्रेय यतीन्‍द्र जी को है। इन दिनों वे लता मंगेशकर पर कार्यरत हैं । विमलादेवी फाउंडेशन की ओर से राजसदन अयोध्‍या में समय समय पर संगीत सभाऍं आयोजित कर वे अयोध्‍या के धार्मिक उन्‍माद में सुरों की सरिता बहाते रहे हैं। कला चिंतन पर आधारित वाणी प्रकाशन से आई पुस्‍तक 'विस्‍मय का बखान' पर हिंदी के कवि-आलोचक-गीतकार डॉ.ओम निश्‍चल ने जनसत्‍ता में लिखा है। प्रस्‍तुत है इस आलेख का मूल पाठ।-सम्पादक)

हिंदी में संगीत, सिनेमा और रूपंकर कलाओं पर नियमित लिखने वाले कम हैं। इस क्षेत्र में ले दे कर कुँवर नारायण, प्रयाग शुक्‍ल, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल आदि कुछ संस्‍कृति चिंतकों के नाम ही हमारे सामने बार बार आते हैं। यद्यपि इस क्षेत्र में अखबारी रपट के नाम पर सांस्‍कृतिक लेखन की उदरपूर्ति अवश्‍य होती रही है। कुँवर नारायण ने एक समय फिल्‍मों पर अनेक जीवंत टिप्‍पणियॉं लिखी हैं, प्रयाग शुक्‍ल और विनोद भारद्वाज ने कला के क्षेत्र की गतिविधियों को हमेशा अपने अवलोकनों और अभिलेखों में शामिल किया है। अशोक वाजपेयी की किताब 'समय से बाहर' अपने क्षेत्र की एक अलग ही पुस्‍तक है जिसे आज भी कला-आलोचना का मील का पत्‍थर कहा जा सकता है। सिनेमाई धुनों पर पंकज राग का काम भी बुनियादी है। यह सौभाग्‍य की बात है कि जहॉं आज के समकालीन युवा लेखकों का बड़ा समूह अपने समय की कलात्‍मक सांस्‍कृतिक गतिविधियों से कटता जा रहा है, यतीन्‍द्र मिश्र  इधर एक सक्रिय कला-संगीत चिंतक के रूप में उभरे हैं। हाल ही कला रूपों पर आई निबंधों की पुस्‍तक विस्‍मय का बखान उनके कलात्‍मक चिंतन और अनुशीलन का एक और प्रमाण है।

मिजाज से कवि यतीन्‍द्र मिश्र ने अयोध्‍या जैसी धार्मिक नगरी में रहते हुए भी उसे अपनी कला और संगीतप्रियता से गुंजान बनाया है और बराबर कलात्‍मक गतिविधियों, कलाकारों, शास्‍त्रीय गायकों, गीतकारों के सान्‍निध्‍य में रहते आए हैं। संगीत और विभिन्‍न कला रूपों पर निबंधों की इस पुस्‍तक में वे पं.मल्‍लिकार्जुन मंसूर, उस्‍ताद अमीर खॉं, पं.भीमसेन जोशी, शैलेन्‍द्र, सत्‍यजित रे, साहिर लुधियानवी, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी, रसन पिया, लता मंगेशकर सहित इस क्षेत्र के अनेक मूर्धन्‍यों, वाग्‍गेयकारों, नर्तक नर्तकियों से रूबरू होते हैं तथा अपनी भाषा के वैभव में इन कलाकारों, कलामर्मज्ञों की संगत और शख्‍सियत को मूर्त रूप देते हैं।

यतीन्द्र मिश्र 
हमारी परंपरा में कला, छंद, साहित्‍य और रंगकर्म आदि के बखान के लिए ही साहित्‍य दर्पण, अलंकार सर्वस्‍व, दशरूपक, नाट्यशास्‍त्र तथा रसगंगाधर आदि ग्रंथों का सृजन हुआ है। साहित्‍य वाक् और अर्थ का सुघर कलात्‍मक विन्‍यास है तो कलाऍं, संगीत, रंगकर्म, और सिनेमा--- मानवीय भावों-भंगिमाओं के उद्घाटन का माध्‍यम। 'रूपंकरण का समय' में संग्रहीत अपनी टिप्‍पणियों में वे लिखते हैं: 'शास्‍त्रीय गायकों के पास क्‍या काल को काटने वाली कोई कैंची होती है, जिससे वे अकसर अपने गायन के समय काम लेते हैं ? 'लता मंगेशकर के अविनाशी सुरों के सम्‍मोहन को अपने शब्‍दों में बॉंधते हुए यतीन्‍द्र कहते हैं: 'यदि किसी रूपक में लता की गायिकी को बॉंधने की जरूरत पड़ी, तो मुझे हमेशा ही यह लगता रहा कि हमारे पास सिर्फ गंगा ही एक ऐसी हैं, जिनकी दिव्‍यता और अहर्निश सजलता से ही उनकी वाणी को रूपक दिया जा सकता है।' उन्‍होंने बिस्‍मिल्‍लाह खॉं का लता के बारे में यह बयान भी याद किया है जिसमें वे कहते हैं : ‘’मैं दावे से कह सकता हूं अगर सरस्‍वती कभी होंगी , तो लता मंगेशकर की तरह होंगी और बरखुरदार इतनी ही सुरीली होंगी।‘’

बाबा पागलदास के पखावज का संदर्भ आने पर यतीन्‍द्र मिश्र अपने घर की चारदीवारी से सटी एक छोटी सी कुटिया में बैठकर किए जाते उनके रियाज को याद करते हैं। और कहते हैं इस शहर के वीतरागी स्‍वभाव की लय को बस उनकी पखावज की थाप ही तोड़ पाती थी। अयोध्‍या और फैजाबाद सरयू और राम की जन्‍मभूमि के अलावा बेगम अख्‍तर जैसी गायिका और मर्सिया लिखने वाले ज़हीन शायर मीर अनीस से भी जाना जाता है जिसका उल्‍लेख करना यतीन्‍द्र नहीं भूलते।

पुस्‍तक के दूसरे खंड चिंतन में यतीन्‍द्र ने कलाओं का स्‍वदेश, संगीत और अवध का समाज, बाईयों का जमाना और हिंदी फिल्‍म संगीत, कलाओं की पारिस्‍थितिकी में रंग, राग और विचार, सिनेमा की दुनिया और प्रेमचंद का साहित्‍य, नृत्‍य के परिसर में अभिनय, कलाओं का प्रदीप्‍त संसार और कुँवर नारायण, 'कभी कभार' में अशोक वाजपेयी की कला और संस्‍कृति संबंधी टिप्‍पणियों तथा 'स्‍मृतियों में काशी' विषयक आलेखों को शामिल किया है तो तीसरा खंड स्‍मरण’, पं.मल्‍लिकार्जुन मंसूर, उस्‍ताद अमीर खॉं, पं.कुमार गंधर्व, पं.भीमसेन जोशी, गीतकार शैलेन्‍द्र और निर्मल वर्मा की शख्‍सियत पर आधारित है और आखिर में यतीन्‍द्र ने रसनपिया पर एक कविता भी टॉंकी है।

चिंतन खंड के पहले ही निबंध 'कलाओं का स्‍वदेश' का शीर्षक देख कर एकबारगी लगता है कि यह शीर्षक तो अशोक वाजपेयी-जैसा है। पर वाजपेयी के गुणग्राहक यतीन्‍द्र का यह अपना 'स्‍वदेश' है: कलाओं का स्‍वदेश। कलाओं के वृहत्‍तर संसार  की चर्चा करते हुए यतीन्‍द्र विनम्रता से स्‍वीकार करते हैं कि वे संगीत के विशेषज्ञ नहीं है, मूलत: कवि हैं और कविता और साहित्‍य के बहाने ही वे संगीत और कलाओं की दुनिया में प्रवेश करते हैं। यतीन्‍द्र अवध के हैं तो अवध की सांस्‍कृतिक धरोहर से पूरी तौर पर परिचित हैं। इस निबंध में उन्‍होंने संत गोविंद दास और उनके शिष्‍य पलटूदास की  एक रोचक कथा दी है। शिष्‍य बनने की आकांक्षा के साथ पलटूदास जब गोविंद साहब के पास गए तो उन्‍होंने उनकी परीक्षा यह कह कर ली कि मैं छिपता हूँ,  आप  खोजिए मैं कहॉं छिपा हूँ। यह कह  कर वे एक छोटी मछली बन कर आश्रम के तालाब में छिप गए। पलटू ने फौरन जाल बन कर उन्‍हें खोज लिया। अब बारी पलटू की थी कि वे छिपें और गोविंद साहब उन्‍हें खोजें। पलटूदास तालाब का जल बन गए, फलत: गोविंद साहब उन्‍हें न खोज सके और हार स्‍वीकार कर पलटू को पुकारा। यह है एक गुरु-शिष्‍य का संबंध।

यतीन्‍द्र कहते हैं, कलाओं की दुनिया स्‍वायत्‍त होती है। कलाकार इस बात से निरपेक्ष रहते हुए कि समाज उसकी कला को किस तरह देखेगा, अपनी कला के साथ समर्पित होता है। उसे शेष दुनिया का भान नही होता। पर वहीं यह बात भी कहते हैं कि कलाओं की दुनिया इतनी बहुविध है कि उसे देखना वाला विस्‍मय से भर उठता है। अक्‍सर कला की बखान के लिए हमारे पास उपयुक्‍त भाषा नही होती। चाहे प्रदर्शनकारी कलाऍं हों या संतों निर्गुनियों के वचन पद उलटबॉंसियॉं, या उनकी उपासना पद्धति, यतीन्‍द्र के शब्‍दों में, 'एक तरह से यह श्रद्धा और साधना सुर और लय में विलीन होती हुई प्रतीत होती है।' अवध के संगीत और समाज पर यतीन्‍द्र का गहरा अध्‍ययन है। इसके लिए वे वाजिद अली शाह के 'रहस' (रास और कथक का समाहार) से लेकर शरर के 'गुजिश्‍ता लखनऊ' से होते हुए बेगम अख्‍तर की गायकी, मुहर्रम के दिनों में गाये जाने वाले 'स्‍यापा', तथा नवाब शुजाद्दौला के दरबार में सोज़ख्‍वानी और मर्सियाख्‍वानी के महफिलों तक की चर्चा करते हैं तो अवध के सोहर गीतों, बनारस के बुढवा मंगल, झूला, कजरी, चैती, बारामासी व फाग गायकी के साथ  साथ अवध के समाज में कथिकों की परंपरा का जिक्र भी करते हैं। गीत संगीत के क्षेत्र में बाइयों और तवायफों की भी एक समृद्ध परंपरा रही है जिसने हिंदी फिल्‍मों के गीत संगीत की आधारशिला रखी है। यतीन्द्र इतिहास के तहखाने को खँगालते हुए यह बात बड़ी शिद्दत से कहते हैं कि 1945 के बाद पेशेवर शास्‍त्रीय गायक गायिकाओं के उदय के बाद भले ही बाइयॉं और तवायफें गुमनामी के अंधेरे में खो गयी हों, किन्‍तु बसंत बहार, बैजू बावरा और चित्रलेखा  जैसी फिल्‍मों के उत्‍कृष्‍ट संगीत तक पहुँचने में इन बाइयों और तवायफों की गायिकी का अहम रोल रहा है।

प्रेमचंद की कई कहानियों का रिश्‍ता सिनेमा से रहा है। सत्‍यजित रे ने 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'सदगति' पर, तो मृणाल सेन ने 'कफन' पर फिल्‍में बनायी हैं। यतीन्‍द्र रे और मृणाल के निर्देशन के अंतस्‍तत्‍वों की तलाश करते हुए साहित्‍यिक कहानियों और सेल्‍यूलाइड के पारस्‍परिक रिश्‍ते पर भी प्रकाश डालते हैं, पर साथ ही यह कहना भूल नही जाते कि प्रेमचंद की कहानियों की मूल संवेदना, उसके सुसंगत यथार्थवाद एवं मानवतावाद को फिल्‍मी भाषा में अपेक्षित तरीके से व्‍यक्‍त नही किया जा सका। इस खंड के दो निबंध क्रमश: कुंवरनारायण और अशोक वाजपेयी के कला-भाष्‍य को लेकर हैं। कुंवर जी ने शास्‍त्रीय संगीत और सिनेमा पर एक समय में बहुत कुछ लिखा है और अशोक वाजपेयी तो बहुत पहले से ही ऐसे प्रयत्‍नों को अपनी टिप्‍पणियों के केंद्र में रखते आए हैं। वे 'कभी-कभार' को सांस्‍कृतिक पत्रकारिता के एक कालजयी नमूने के रूप में दर्ज करते हैं तो कुँवर जी की कला-आलोचना को वे एक संयत और आत्‍मसजग कलाकार का लेखन मानते हैं।

चिंतन खंड में जहॉं यतीन्‍द्र अपने ब्‍यौरों को अध्‍ययनाधारित बनाते हैं, स्‍मरण खंड में वे मल्‍लिकार्जुन मंसूर, उस्‍ताद अमीर खॉं, कुमार गंधर्व, पं.भीमसेन जोशी, शैलेन्‍द्र व निर्मल वर्मा पर लिखते हुए एक अलग किस्‍म का भाव संसार रचते हैं। यह विभोरता उनके शीर्षकों में भी दिखती है, यथा: आलाप कुसुम, गान पुरोहित का आंगन, आत्‍मा के कल्‍पतरु का संगीत और निर्मल धुन। कुमार गंधर्व पर 'बहुरि अकेला' कविता लिख कर अशोक वाजपेयी ने कलामर्मज्ञों पर काव्‍यात्‍मक प्रणति निवेदित करने की पहल की है। अन्‍य कवियों में मंगलेश डबराल आदि ने भी केशव अनुरागी और उस्‍ताद अमीर खां पर कविताऍं की हैं। इस परंपरा को ही आगे बढ़ाते हुए यतीन्‍द्र ने भी अंत में रसनपिया पर अपनी एक कविता प्रस्‍तुत की है जिसकी आखिरी पंक्‍तियॉं  हैं: 'आज भी तुम्‍हारी जराजीर्ण आवाज़ में गंगा उतनी ही साफ और उज्‍ज्‍वल दिखाई देती हैं।' जाहिर है कि रसनपिया के स्‍वर लहरियों की निर्मलता गंगा की लहरियों से ही तुलनीय है। ज्ञातव्‍य है कि रसनपिया के नाम से भी मशहूर लगभग 104 वर्षीय उस्‍ताद अब्‍दुल रशीद खॉं पर यह कविता यतीन्‍द्र ने उनकी सौवीं वर्षगांठ पर लिखी थी।

जैसा कि कहा जा चुका है, पुस्‍तक के शुरुआती अध्‍याय में यतीन्‍द्र मिश्र की खुद अपनी डायरी के अंश हैं जिनमें कला, संगीत, रंगमंच, सिनेमा और अन्‍य रूपंकर कलाओं, सांस्‍कृतिक गतिविधियों के बारे में उन्‍होने अपने अनुभवों और अहसासातों को कलमबद्ध किया है। ये इंदराज बताते हैं कि एक कवि के रूप में वे कलामर्मज्ञों से भी अपना नाता कायम रखते हैं और अंतरानुशासन को महत्‍व देते हैं। यतीन्‍द्र मिश्र ने कला रूपों पर एकत्र इन निबंधों को प्रकारांतर से 'विस्‍मय का बखान' कहा है तो शायद इसीलिए कि कला-संगीत-रूपंकर कलाओं में रमने वाला ही जानता है कि यहॉं आकर बखान का सारा कौशल 'विस्‍मय' में बदल जाता है। हम निश्‍शब्‍द रह जाते हैं। विस्‍मय का बखान यतीन्‍द्र मिश्र के इस कौशल का परिचायक तो है ही कि उनमें बखानने का संयम है, यह सलीका भी है कि वे सारी कलाओं को एक बड़े कला-कुटुम्‍ब का हिस्‍सा मानते हैं।
  


समीक्षक  

बैंकिंग क्षेत्र में वरिष्ठ प्रबंधक हैं.
अवध विश्वविद्यालय से साठोत्तरी हिन्दी कविता पर शोध.
अपनी माटी पर आपकी और रचनाएं यहाँ 
मार्फत : डॉ.गायत्री शुक्‍ल, जी-1/506 ए, उत्‍तम नगर,
नई दिल्‍ली-110059, फोन नं. 011-25374320,मो.09696718182 ,

Share this article :

5 टिप्‍पणियां:

  1. आभार मानिक जी कि इस पुस्‍तक की महिमा से अवगत कराने के लिए इसे अपनी माटी के प्रशस्‍त कैनवस पर पुन: संजायो है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ओम जी सच तो ये है की हम जितना हो सके कला और संस्कृति के लिए इस तरह के गहरे काम को आगे बढ़ा रहे हैं।यतीन्द्र बाबू और आपके समीक्षा के ज़रिये यहाँ हम फिर से एक बड़े काम को चर्चा में अगर ला पायें तो हमें संतुष्टि ही होगी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यतीन्द्र जी की पुस्तक पर डॉ. निश्चय का समीक्षात्मक आलेख बहुत सुन्दर है. उनको और मानिक जी को बधाई. किसी भी कारण से हालाँकि पाठकों की टिप्पणियां कम ही आती हों, मुझे विश्वास है कि ऐसे साहित्यिक लेख वे निश्चित ही पसंद करते हैं. विभिन्न नमकीन पदार्थों के बाद स्वादिष्ट मिष्टान्न किसे अच्छा नहीं लगता?
    कमलानाथ

    उत्तर देंहटाएं
  4. कलानाथ जी शुक्रिया। हमारा दायित्व हम पूरा कर रहे हैं .साथी पाठक पढ़ते भी हैं वैसे रोजाना इस पत्रिका को पांच सौ के लगभग साथी पढ़ते हैं मगर टिप्पणियाँ कम ही आ पाती है।इस बात को स्वीकारने में हमें कोई हर्ज़ नहीं है। तीन सौर के लगभग साथे ईमेल के ज़रिये पढ़ाते हैं।एक जहार के लगभग फेसबुक के ज़रिये टच में हैं।सफ़र चले भी तो अभी तीन साल रहे हैं।दिसंबर से चौथे साल में प्रविष्ट हो जायेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वर्तनीगत अशुद्दियां दूर करने के बाद फिर से कमेन्ट-
    ---------------------------
    कलानाथ जी शुक्रिया। हमारा दायित्व हम पूरा कर रहे हैं .साथी पाठक पढ़ते भी हैं वैसे रोजाना इस पत्रिका को पांच सौ के लगभग साथी पढ़ते हैं मगर टिप्पणियाँ कम ही आ पाती है।इस बात को स्वीकारने में हमें कोई हर्ज़ नहीं है। तीन सौर के लगभग साथी ईमेल के ज़रिये पढ़ते हैं।एक हज़ार के लगभग फेसबुक के ज़रिये टच में हैं।सफ़र चले भी तो अभी तीन साल रहे हैं।हम अपने साथियों के सहयोग से दिसंबर से चौथे साल में प्रविष्ट हो जायेंगे।

    उत्तर देंहटाएं

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template