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मक़बूल फ़िदा हुसैन पर केन्द्रित शैलेन्द्र चौहान की कविता

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, नवंबर 07, 2012 | बुधवार, नवंबर 07, 2012

शैलेन्द्र चैहान की लम्बी कविता

शैलेन्द्र चौहान
आलोचक और वरिष्ठ कवि है 
जिनका  नया  संस्मरणात्मक  उपन्यास कथा रिपोर्ताज 
पाँव ज़मीन पर बोधि प्रकाशन जयपुर से 
प्रकाशित हुआ है.उनके बारे में विस्तार से 
जानने के लिए  यहाँ क्लिक करिएगा 

संपर्क (दिसंबर,2012 के बाद नया पता )
पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट नंबर 14 ए, अहिंसा खण्ड, इंदिरापुरम, गाजियाबाद -201014, (उ.प्र.)ई-मेल shailendrachauhan@hotmail.com,
मो-07838897877
संपर्क : 34/242, सेक्टर- 3, प्रतापनगरजयपुर- 302033


ए सारंगी तू सुन
--------------------
मुझे, रोना आता है...
रोने पर
किसी की बंदिश तो नहीं
तारों से झरता
करूण रस
हल्का हल्का प्रकाश
कानों में घुलने लगते
मृदु और दुःखभरे गीत
मैं रो पड़ूंगा.

शीर्षहीन स्त्री
नहीं देख पाया वह शिशु
अपनी माँ का चेहरा
अनवरत तलाश चेहरे की 
माँ  के चित्रों में
हाथपाँवधड़स्तन
पर नहीं कोई चेहरा....
मदर टेरेसा ..........ना .........
माधुरी का ................ना ..........
माँ....... 
रिसती है शीत
चांदनी बनकर उभरते
शीर्षहीन स्त्री चेहरे
केनवास पर लगातार ....लगातार .....
कौतुक ............. कुतूहल.......

एक पुरानी सायकिल
दो पहियेहैंडिल और सीट
एक अन-अनुपाती देह
किशोर केरिअर  पर बैठा
गोद में लिए सायकल-शरीर
और
सायकल की गोद में
किशोर देह
ओह कितनी मजेदार कल्पना
ठठा कर हंस पड़ता हूँ मैं

बूंदी से जब भी गुज़रता हूँ
जैसे जैसे शुरू होती
पहाड़ की चढ़ाई
मेरे कानों में बुदबुदाने लगते हैं मक़बूल
देखो
हर मकान में
जीने के ऊपर की चैकोर कोठरी
पुती है गहरे नीले चूने से
विरल है बूंदी का यह सौन्दर्य

देखो-देखो, राजप्रासाद को 
मात दे रही लोक रूचि
हा ...........हा .........हा ......
है न मजेदार !

कितनी गम्मत
पंढरपुर से शुरू होती है जात्रा
छोटी-छोटी पहाडि़यांजंगल
मंदिर, घंट ध्वनियाँ
केनवास पर उभरती रही
जात्रा की खुशियाँदुःख

इंदौर से मुंबई तक 
दौड़ती रहीं पटरियां 
सामानांतर    
तूलिकारंग और 
नित नए रहस्यों की तलाश 
सघन अभिव्यक्ति 
पेंटिंग दर पेंटिंग 

नंगे पांवों की 
कठोर धरती से निरंतर कुश्ती 
मात खाती रही कठोरता 
मैं यहीं पैदा  हुआ 
 इसी धरती पर
ये मुल्क मेरा है
फिर कहाँ हूँ मैं निर्वासित 

मिथआत्माएंशरीरभूगोल
इतिहास
यह मेरा ही है
ये संगीत मेरा है
ये संस्कृति और
ये अहमन्यता भी मेरी है

मेरी चित्र यात्रा
पहूंची है लाख से करोड़ तक
करोड़ से करोड़ों तक.

जिस गरीबी और मुफलिसी ने
मुझे चित्रकार बनाया
मैंने उसे कुचल डाला है
धनवैभव और प्रसिद्धी से

मैं इसी मिट्टी में पैदा हुआ हूँ।
मरना भी चाहता हूँ
इसी सर ज़मी पर

 मक़बूल !
इतना सब पाने और देने के बाद
वो क्या है जो तुम नहीं पा सके
प्रसिद्धि के रोबिनहुड घोड़े  पर सवार
ओ अघाये मदमस्त घुडसवार
तुम्हे किस चीज़ की है दरकार ?

ये यक्ष प्रश्न है
हर किसी अघाये
बोराये  मनुष्य से
चाहे किसी मज़हबजात, देश का हो

क्यों ठीक से नहीं  पड़ते
पाँव ज़मीन पर
वो क्या है हवा में
जो तुम्हे नचा रहा है
वो कौनसे रंग है
जो छण छण  बदल रहे हैं
छवि
कौनसा राग है जो
इतनी उत्तेजना भर रहा है
इन  रंगों में
दीर्घ अनुभवपरम्पराइतिहासदर्शन
मिथ और प्रकृति,

ठहर जा
बस ठहर जा अब
और ऊपर जा नहीं पायेगा
नहीं जा पायेगा
ए  कलाकार .......नेता ...........वणिक  .........
तू गिरेगा रसातल में

सारंगी तू सुन
मद्धम सी धुन
नहीं रहा मक़बूल
अब नहीं है मक़बूल.
(ये कविता पहली बार अपनी माटी पर ही प्रकाशित की जा रही हैं।-संपादक )
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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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