केन्द्रीय साहित्य अकादेमी सम्मान-2012:हमारे समय के सबसे बड़े कवियों में से हैं चंद्रकांत देवताले जी - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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केन्द्रीय साहित्य अकादेमी सम्मान-2012:हमारे समय के सबसे बड़े कवियों में से हैं चंद्रकांत देवताले जी

हमारे समय के सबसे बड़े कवियों में से हैं चंद्रकांत देवताले जी उनके कविता संग्रह 'पत्थर फेक रहा हूँ।' पर उन्हें केन्द्रीय साहित्य अकादेमी सम्मान-2012 दिए जाने पर सम्पूर्ण साहित्य जगत में खुशी है।इन दो कविताओं के प्रस्तुतीकरण के साथ हमारी तरफ से उन्हें बधाई। -सम्पादक 

जहां थोड़ा-सा सूर्योदय होगा 

पानी के पेड़ पर जब 
बसेरा करेंगे आग के परिंदे
उनकी चहचहाहट के अनंत में
थोड़ी-सी जगह होगी जहां मैं मरूंगा

मैं मरूंगा जहां वहां उगेगा पेड़ आग का
उस पर बसेरा करेंगे पानी के परिंदे
परिंदों की प्यास के आसमान में
जहां थोड़ा-सा सूर्योदय होगा
वहां छायाविहीन एक सफेद काया
मेरा पता पूछते मिलेगी

बाई दरद ले !

तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्थर तोड़ने वाले दिन उस सबके बाद
इस वक़्त तेरे बदन में धरती की हलचल है
घास की ज़मीन पर लेटी
तू एक भरी पूरी औरत आंखों को मींच कर
काया को चट्टान क्यों बना रही है
बाई तुझे दरद लेना हैं
जिन्दगी भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए दरद लेना
जल्दी कर होश में आ वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए या ना भी रोए
फटी आंख से मत देख
भूल जा जोर जबरदस्ती की रात
अँधेरे के हमले को भूल जा बाई
याद कर खेत और पानी का रिश्ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस किस हिस्से में कहॉ कहॉ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्थर हो जाता कोख तक का पानी
याद मत कर अपने दुखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता
इतने हैं आंसुओं के सूखे धब्बे
सीता ने कहा था - फट जा धरती
ना जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया
बाई दरद ले!
सुन बहते पानी की आवाज़
हाँ ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियां
सुन ले उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
जिंदा हो जायेगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध दो नन्हें होंठों के लिए
बाई! दरद ले
चंद्रकांत देवताले 
(जन्म १९३६) का जन्म गाँव जौलखेड़ा, जिला बैतूलमध्य प्रदेश में हुआ। उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पी-एच.डी. सागर विश्वविद्यालयसागर से। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य से संबद्ध रहे हैं। देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वरदीवारों पर खून सेलकड़बग्घा हँस रहा हैरोशनी के मैदान की तरफ़,भूखंड तप रहा हैहर चीज़ आग में बताई गई थीपत्थर की बैंचइतनी पत्थर रोशनीउजाड़ में संग्रहालय आदि।[1] 

देवताले जी की कविता में समय और सन्दर्भ के साथ ताल्लुकात रखने वाली सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक प्रवृत्तियाँ समा गई हैं। उनकी कविता में समय के सरोकार हैं, समाज के सरोकार हैं, आधुनिकता के आगामी वर्षों की सभी सर्जनात्मक प्रवृत्तियां इनमें हैं। उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि देवताले जी की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से आप उत्तरआधुनिकता को मानें या न मानें, ये कविताएँ आधुनिक जागरण के परवर्ती विकास के रूप में रूपायित सामाजिक सांस्कृतिक आयामों को अभिहित करने वाली हैं।[2] देवताले जी को उनकी रचनाओं के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख हैं- माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान। 

उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में हैं। उसमें मानव जीवन अपनी विविधता और विडंबनाओं के साथ उपस्थित हुआ है। कवि में जहाँ व्यवस्था की कुरूपता के खिलाफ गुस्सा है, वहीं मानवीय प्रेम-भाव भी है। वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है।

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