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कला मेला 2012:लेखकों को कबीर सा फकीरी भाव रखते हुए बेखौफ लिखने-कहने की शैली अपनानी होगी।

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, दिसंबर 29, 2012 | शनिवार, दिसंबर 29, 2012

कला मेला 2012
हम जिस संस्कृति में रहते हैं, जिसकी पैरवी करते हैं, जिस जाति धर्म की दुहाई देते हैं उसमें कहीं न कहीं खोट है। आज 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति के उस घटाटोप को हम जब तक नहीं तोड़ेगे तब तक एक नई संस्कृति जन्म नहीं ले सकती।उक्त विचार यहां एस. आई. ई. आर. टी. के सभागार में राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष  वेद व्यास ने शनिवार प्रातः ‘कला मेला-2012’ में ‘राजस्थान का सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यक्त किए। राजस्थान साहित्य अकादमी एवं कला साहित्य, संस्कृति एवं पुरातत्तव विभाग, राजस्थान सरकार के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में व्यास ने आगे कहा कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण व संस्कृति की पुनर्स्थापना में लेखकों व साहित्यकारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

वेद व्यास ने कहा कि साहित्य मनोरंजन के लिए नहीं होता। साहित्य में यहां सन्नाटा पसरा है। औरतों, आदिवासियों के लिए साहस व नई समझ के साथ संस्कृति के पुनर्स्थापन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आज बाजारी ताकतें कला, संगीत व साहित्य को मनोरंजन में बदल रही हैं। अतः लेखकों को कबीर सा फकीरी भाव रखते हुए बेखौफ लिखने-कहने की शैली अपनानी होगी। उन्होंने आखिर में कहा कि यदि आप हम साहित्यकार नहीं बोलेंगे तो पेड़ व प्रकृति बोलेगी। नीचे वाले नहीं तो उपर वाले बोलेंगे।

संगोष्ठी में संस्कृति व भाषा के रिश्ते को परिभाषित करते हुए राजस्थानी भाषा, साहित्य व संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने कहा कि भाषा अगर जीवित नहीं रहेगी तो संस्कृति लंगड़ी होगी व अंत में बेरंग हो जाएगी। उन्होंने  कहा कि साहित्य व संस्कृति एक दूसरे के पूरक हैं मगर इसमें भाषा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। संगोष्ठी में संस्कृति व प्रजातंत्र के संयुक्त बंधन को परिभाषित करते हुए पुलिस प्रशिक्षण एवं अनुसंधान अकादमी, जोधपुर के कुलपति श्री एम.एल. कुमावत ने कहा कि इस देश को हमारे प्रजातंत्र ने आजादी के बाद, शिक्षा का अधिकार बोलने - कहने की ताकत, वोट का अधिकार और जीने का अधिकार दिया है। कुलपति श्री कुमावत ने कहा कि आप हम सब को खासकर साहित्यकारों को अपने प्रजातंत्र की मूल संस्कृति का संरक्षण करने के लिए आगे आने की आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा संस्कृति के संरक्षण हेतु ज्ञान के द्वार पर दस्तक बेहद आवश्यक है।

संगोष्ठी में महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलपति प्रो. रूपसिंह बारहठ ने कहा कि राजस्थान में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की महती आवश्यकता है। यह एक सही समय है जब हमें साहित्यिक और सामाजिक परिवर्तन के साथ प्रजातांत्रिक मूल्यों में बदलाव की बात पुरजोर स्वरों में करनी चाहिए।कोटा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मधुसूदन शर्मा ने कहा कि दुखद सच्चाई है कि वैश्वीकरण के इस माहौल में भारतीय आगे बढ़ रहे हैं, मगर भारत यथार्थ में पिछड़ रहा है। आंकडे सिद्ध करते हैं कि व्यक्तिवादिता के कारण हमारी संस्कृति के मूल्य विघटन का असर समाज के हर क्षेत्र में है। आज हम विकास और प्रजातांत्रिक स्तर पर पिछड़ रहे हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. हेमेन्द्र चंडालिया ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अकादमी सचिव डॉ. प्रमोद भट्ट ने किया। ‘कला मेले’ के तीसरे दिन के कार्यक्रम में  30 दिसम्बर, 2012 को पूर्वाह्न 11.00 बजे राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के सभागार में ‘कवि-गोष्ठी’ आयोजित होगी। इसमें उदयपुर संभाग के कवि, गीतकार भागीदारी करेंगे। 

डॉ. प्रमोद भट्ट
सचिव
राजस्थान साहित्य अकादेमी,
सेक्टर-4,हिरन मगरी,उदयपुर-313002
दूरभाष-0294-2461717
वेबसाईट-http://rsaudr.org/index.php
ईमेल-sahityaacademy@yahoo.com                     

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