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आशीष कुमार त्रिवेदी की 4 लघु कथाएँ

Written By Manik Chittorgarh on गुरुवार, दिसंबर 27, 2012 | गुरुवार, दिसंबर 27, 2012

                          यह सामग्री पहली बार 'अपनी माटी डॉट कॉम' पर प्रकाशित हो रही है।

(1) दर्द का रिश्ता 

शहर में सन्नाटा पसरा है। ऐसा लगता है की पिछले दिनों हुए मानवता के नंगे नाच को देखकर वक़्त भी थम कर रह गया है। यूं तो शहर शांत है किन्तु राख के ढेर में अभी भी चिंगारियां दबी हैं। ज़रा सा कुरेदने पर धधक उठेंगी। लोगों में तनाव है। दोनों पक्षों की ओर से आरोप प्रत्यारोप जारी हैं।मेरी ड्यूटी शहर के अस्पताल के शवगृह में लगी है। अपने परिजनों के शव तलाश करने वालों का ताँता लगा है। मेरे सामने दो महिलाएं बैठी हैं। एक कुछ स्थूल शरीर की मुस्लिम महिला है जो अपने दुपट्टे से अपने आंसू पोंछ रही है। दूसरी सफ़ेद साड़ी में एक हिन्दू महिला है जो आंसुओं से अपना आंचल भिगो रही है। दोनों ही फसाद में मारे गए अपने पुत्रों का शव लेने आई हैं।

औरों की तरह मेरे मन में भी दूसरे पक्ष के प्रति क्रोध है। मैंने एक हिकारत भरी दृष्टि उस मुस्लिम महिला पर डाली और फिर सहानुभूति से हिन्दू स्त्री को देखने लगा।उन दोनों महिलाओं की दृष्टि एक दूसरे पर पड़ी। कुछ देर तक एक दूसरे को देखती रहीं। जैसे आँखों ही आँखों में एक दूसरे से कुछ कह रही हों। फिर मुस्लिम महिला अपनी जगह से उठी। हिन्दू स्त्री भी कुछ कदम आगे आई। कुछ देर यूँ ही खड़ी रहीं। मैं साँस रोके देख रहा था। कुछ देर यूँ ही खड़ी रहने के बाद मुस्लिम महिला ने उस हिन्दू स्त्री को गले लगा लिया। दोनों एक दुसरे से लिपट कर सुबकने लगीं।मेरे भीतर कहीं कुछ दरक गया। बहार लोग दो धड़ों में बटे एक दूसरे का खून बहा रहे हैं। यहाँ ये दो स्त्रियाँ मजहब की दीवार गिराकर एक दूसरे का दुःख बाँट रही हैं। क्योंकि वे मुसलमान या हिन्दू नहीं सिर्फ "माँ "हैं।

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(2) वेलकम होम

कार तेज़ी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। कार की पिछली सीट पर रोहन उदास बैठा था। वह अपने दादा जी के घर जा रहा था। उन दादा जी के घर जिनसे उसकी पहचान घर में रखे उनके फोटो और अपने पापा के मुख से उनके बारे में सुनी हुई बातों तक ही सीमित थी। उसके दादा जी की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर उस के पापा ने उस की मम्मी से शादी की थी इस बात से रोहन के दादा जी उस के पापा से नाराज़ थे। यही कारण है की वो उनसे पहले कभी नहीं मिला था।

रोहन अपने बीते जीवन को याद कर रहा था। कितने सुंदर दिन थे। वो और उसे दिलोजान से चाहने वाले उस के मम्मी पापा। एक सुखी परिवार। उस के मम्मी पापा उस की हर ख्वाहिश पूरी करते थे। वह भी उन्हें सदैव खुश रखने का प्रयास करता था। किन्तु एक सड़क दुर्घटना ने उस का सब कुछ छीन लिया। उस के मम्मी पापा उस दुर्घटना में मारे गए। उसे कुछ मामूली चोटों के आलावा कुछ नहीं हुआ। अब वह इस दुनिया में अकेला था। सिवा उसके दादा जी के उसका अन्य कोई रिश्तेदार नहीं था अतः वह अपने दादा जी के पास जा रहा था।

पिछले बारह वर्षों में उसके दादा जी ने उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखा। जब रोहन के पिता ने उन्हें रोहन के जन्म की खबर फ़ोन पर दी तो भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। खबर सुनकर चुपचाप फ़ोन रख दिया। रोहन के मन में दुविधा थी न जाने वे उसके संग किस तरह पेश आयें। अपने मम्मी पापा का दुलारा रोहन किसी के घर भी अनचाहे मेहमान की तरह नहीं जाना चाहता था।

कार एक बड़े से बंगले के पोर्टिको में जाकर रुकी। एक बटलर ने आगे बढ़ कर उसका स्वागत किया। रोहन लंगड़ाते हुए उसके पीछे चलने लगा। बंगले में अजीब सा सन्नाटा था। बटलर के साथ चलते हुए वह एक लाइब्रेरी नुमा बड़े से कमरे में पहुंचा। वहां व्हीलचेयर पर रोहन के दादा जी बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे। बटलर ने रोहन के आने की सूचना दी। उन्होंने किताब बंद कर दी। अपनी व्हीलचेयर को धकेल कर कुछ आगे लाये। वे बहुत कमज़ोर लग रहे थे।वे बड़े गौर से रोहन को देखने लगे । उनकी आँखों में अकेलेपन की पीड़ा साफ़ दिखाई दे रही थी। 

रोहन चुपचाप एक बुत की तरह खड़ा था वह समझ नहीं पा रहा था की क्या करे। रोहन के दादा जी की आँखों से टप टप आंसू गिरने लगे. उन्होंने अपने दोनों हाथ फैला दिए। रोहन पहले तो कुछ झिझका फिर दौड़ कर उनके गले लग गया। दोनों कुछ देर यूं ही गले लगे रहे। उसके दादा जी ने भर्राई हुई आवाज़ में कहा " वेलकम होम सन।" रोहन के दिल से उदासी के बादल छट गए। वो कोई अनचाहा मेहमान नहीं था। वह तो किसी के सूने जीवन का उजाला था।

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(3) सामने वाली बालकनी

 मैं अपनी व्हीलचेयर को खिड़की के पास ले गया। खिड़की खोलकर सामने वाली बालकनी की तरफ देखने लगा। किसी भी समय वो दोनों आकर बालकनी में बैठेंगे। पहले पति आयेगा और उस के पीछे चाय की ट्रे लिए पत्नी आयेगी। दोनों चाय की चुस्कियां लेते हुए एक दूसरे से बातें करेंगे। कभी हसेंगे तो कभी ख़ामोशी से एक दूसरे के साथ का आनंद लेंगे। सुबह शाम दोनों वक़्त का यही सिलसिला है।दोनों की उम्र 65 से 70 के बीच होगी। मेरी नौकरानी ने बताया था की दंपति निसंतान हैं। उनका एक भतीजा कुछ वर्षों तक इनके घर पर रह कर पढ़ा था वही कभी कभी मिलने  आ जाता है। इस उम्र में पति पत्नी ही एक दूसरे के सुख दुःख के साथी हैं।

दो वर्ष पूर्व एक सड़क दुर्घटना में मैंने अपनी पत्नी को खो दिया। रीढ़ की हड्डी में लगी चोट ने मुझे इस व्हीलचेयर पर बिठा दिया। अकेलेपन की पीड़ा को मैंने बहुत शिद्दत से महसूस किया है। किसी के संग अपने मन की बात कह सकने की आकुलता को मैं समझता हूँ। यही कारण है की उन्हें एक दूसरे के साथ बात करते देख मन को सुकून मिलता है।कभी कभी मन में एक अपराधबोध भी होता है की मैं उनके इन अन्तरंग पलों को दूर से बैठ कर देखता हूँ। किन्तु मेरे सूने जीवन में यह कुछ पल ही ख़ुशी लाते हैं।

किन्तु आज माहौल कुछ बदला बदला लग रहा है। उनके घर के सामने कुछ लोग ख़ामोशी से खड़े हैं। एक लाश गाड़ी भी घर के पास खड़ी है। मैं क़यास लगा ही रहा था की मेरी नौकरानी कमरे की सफाई करने आ गई। मैंने इस विषय में उस से पुछा तो उसने बताया "वो सामने वाली माताजी को कल रात अचानक छाती में दर्द उठा डाक्टर के पास ले जाने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया।" यह कह कर वह कमरे की सफाई करने लगी।मैंने खिड़की बंद कर दी। पति का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूम गया। उसके दिल का दर्द मेरी आँखों से बहने लगा।

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(4)आत्म बल


देर रात जब ऑफिस कैब ने उसे छोड़ा तो वह अपने साथियों से विदा लेकर तेज़ कदमों अपने घर की ओर चल दी। बस कुछ और कदम और वह अपने घर की सुरक्षा में होगी। तभी एक वैन आकर उसके बगल में रुकी। जब तक वह कुछ समझती दो हाथों ने बलात उसे वैन के भीतर खींच लिया।भीतर वासना से लबरेज़ आँखें उसे घूर रही थीं। वो मदद के लिए चीखी चिल्लाई किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। वैन सूनी सड़क पर दौड़ रही थी। वैन के अन्दर  सांप और बिच्छू उसके जिस्म पर रेंग रहे थे। उसकी जलन वह अपनी आत्मा में महसूस कर रही थी।

एक मोड़ पर वैन रुकी और उसे बहार फ़ेंक दिया गया। वह पड़ी थी उस सियाह रात में उस ठंडी सड़क पर। तन और मन दोनों घायल थे। उसकी आँखों में अपने प्रियजनों के चहरे घूमने लगे। उसे अपनी माँ की याद आ रही थी। वह होती तो उसे सीने से लगा कर उसकी सारी पीड़ा हर लेती। उसके ह्रदय में विचारों का झंझावात उमड़ने लगा।क्या होगा जब सब लोगों को इस बात का पता चलेगा। क्या बीतेगी उसके परिवार पर। कैसे करेंगे वो लोगों का सामना। जब वह अपने छोटे से शहर से यहाँ आ  रही थी तो उसके ताऊ ने उसके पिता से कहा था " तू बहुत छूट  दे रहा है इसे शहर में अकेली रहेगी उस पर देर रात की नौकरी कल कोई ऊँच नीच हो गयी तो बिरादरी में मुह दिखाना मुश्किल होगा।" अब क्या होगा। किन्तु उसके मन ने विरोध किया। तो इसमें उसका क्या दोष है। वह तो यहाँ आई थी की पिता को बड़ा बेटा न होने का अफ़सोस न हो। वह उनकी जिम्मेदारियों में कुछ हिस्सा बटा सके। अपने छोटे भाई की आगे बढ़ने में सहायता कर सके। पर हुआ क्या।

उसके ह्रदय में पीड़ा थी। उसे एक वस्तु  की भांति इस्तेमाल कर फ़ेंक दिया गया। यह बात रह रह कर उसे कचोट रही थी। जिन लोगों ने उसके साथ ऐसा किया उनका अहम् आज फूला नहीं समां रहा होगा। उनके भीतर जलती वासना की आग और भड़क गयी होगी। अब वे तलाश करेंगे एक और लड़की की जिसे मसल कर फ़ेंक सकें। उस के मन में द्वन्द उठ खड़ा हुआ।तो क्या वह उन्हें ऐसे ही छोड़ देगी। तो क्या करे लोग क्या कहेंगे। किंतु वह दुनिया से क्यों डरे। उसने कोई पाप नहीं किया। वह उन वहशियों को जीत के एहसास के साथ नहीं छोड़ेगी। वह लड़ेगी। डगमगाते कदमों किन्तु दृढ इरादे के साथ वह पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ने लगी। उसके भीतर आत्म बल की शक्ति प्रज्वलित थी।


आशीष कुमार त्रिवेदी
युवा और रुचिशील 

C -2072 इंदिरा नगर 
लखनऊ-226016
omanand.1994@gmail.com
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