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डालर उर्फ़ नंदिनी की कहानी 'कमली के बहाने'

Written By Manik Chittorgarh on रविवार, दिसंबर 09, 2012 | रविवार, दिसंबर 09, 2012

कहानी-कमली के बहाने
(इस कहानी का प्रसारण पहली मर्तबा आकाशवाणी,चित्तौड़ पर सितम्बर 2012 को हो चुका है हम साभार यहाँ प्रकाशित कर पाठकों तक डालर की ये कहानी पहूंचना चाहते हैं।-सम्पादक )




ये जो ठीक ठाक कद काठी का आदमी, नदी के किनारे बैठा है न। पड़ौस के खेड़े का रामबाबू है। आस-पास के पांच गांवों में डांक बांटता है। अरसा पहले की नौकरी है इसकी। साला बाप-दादे के जमाने में पांच-छः किताब क्या पढ़ लिया, देखों जमारा सुधर गया इसका। आजकल इसकी आवाजाही नदी के इधर वाले तीर पर कुछ ज्यादा बढ़ गई है । अपनी सारी की सारी फुरसत खरचते हुए अक्सर यहीं महादेव की मूर्ति के बांईं तरफ जाते रास्ते पर पिछवाड़े में बने घाट पर रामबाबू मिल ही जाता है। वैसे भला आदमी है। 

मगर रामबाबू का खेड़ा एकदम टीपीकल टाईप का खेड़ा है। सभी कुरीतियों को भलेमन से पालता हुआ, वक्त के साथ बदलती हुई दुनिया में खुद को अनछूए टापू की तरह सम्भाले हुए है। हर जात धर्म की आबादी यहां है। तमाम भेदभाव और तमाम दीवारें यहां मौजूद है। हर पार्टी का जुलूस उसी तल्लीनता से निकलता है। तीज-त्यौंहार की रौनक एकदम शहर की माफिक होती है। यही रामबाबू अपनी नौकरी के चलते सेठ-साहूकारों को सलाम ठोंकता है और अनपढ़ गरीबों की चिट्ठी खुद ही बांच देता। हो सके तो उन लोगों की चिट्ठियां लिख भी देता है। अफसोस! सबकी खबर लेने देने वाले रामबाबू की असल खबर से सभी लोग अनजान ही है।

(ये विचार और बातें उन लोगों के बीच अक्सर होती जो शाम सवेरे गम्भीरी के घाट पर नहाने, चिलम पीने, मछलियों को भूंगड़े डालने और शिवालय में जल चढ़ाने आते है)

रामबाबू का परम मित्र था ये घाट। शहर और खेड़े के बीच पड़ता नदी का यह इकलौता घाट था, जो ढंगढांग से बना हुआ था। एक तरफ शमशान और दूजी ओर गुथ्थमगुथ्था हरियाले पेड़। खेड़े में घुसते ही रामबाबू को कई बेतरतीब सवाल घेरकर उसे चिंतन में डूबों देते थे। परेशान चेहरे सहित रामबाबू अक्सर दुविधा में ही घर तक पहुंचता। घर क्या टापरी थी टापरी। वो भी छः बाई आठ की। मां पिताजी जिंदा थे तभी से वैसी की वैसी।न एक इंच  इधर न एक इंच उधर।  हाँ बाहर की तरफ के खुले आंगन में एक ढ़ालिया जरूर बना लिया था। उसकी नौकरी पक्की सरकारी किस्म की थी। मगर पगार में तीन पेट पल जाते थे बेचारे रामबाबू के । एक रामबाबू का, दूजा सुख-दुःख की साथी पत्नी रत्ना का और तीसरा इकलौती बेटी कमली का।

रामबाबू की मुंडी दरवाजे में घुसी कि रत्ना बोल पड़ी  

‘‘याद है ना, कल कमली का दाखिला कराना है। यूं कब तक मास्टर जी हमारे घर आकर प्रवेशोत्सव का टीका लगाएंगे और कमली को माला पहनाते हुए हमारी मनुहार करते रहेंगे। उसकी उमर की और छोरियां तो स्कूल भी जाने लगी है। ये कब तक मौहल्ले में ढुल्ले-ढुल्ली खेलेगी और कांकरे कूटेगी। कुछ याद भी है? कितने जतन के बाद कमली पैदा हुई थी। कितने देवरे धौके थे हमने। कितनी व्रत, पूजाएं की थी । आखिर काम तो डागदर साहब का ईलाज ही आया ना। अन्धविश्वासों और इन टोटको के भरोसों तो हम बेऔलाद ही रह जाते। अच्छा छोड़ों, यह सब रामायण। मेरी राय सुनो! कल से मैं बकरियां चराने जाऊंगी या फिर सारे ठोर ग्वाली को दे देंगे। कुछ भी न हुआ तो एक दो ठोर रखकर बाकी बेच देंगे।’’

पूरी तैयारी से रामबाबू ने उत्तर दिया 

‘‘पगला गई हो रत्ना! बकरी हमारी सम्पत्ति है, टेम बे टेम काम आती है। कभी बकरा ऊंचे दाम में बिकता है तो कभी बकरी और बच्चे जनने के काम आती है। कान मरोड़ा दूध तैयार। इतनी भोली जात के जानवर भी तुम्हें अखर रहे है? चल छोड़, कमली की पढ़ाई की खातर हम सब कुछ करेंगे। तू ये बात मुझ पर छोड़ दे।

(दाखीले से पता लगा कि स्कूल में उसकी जात वहाँ पहले से पढ़ रहे  बाकी छोरे-छोरियों से विलग है। कोई छः सात जनों की खातीर उस ईमारत में बहुत सी व्यवस्थाएं न्यारी थी। संडास, पेशाबघर, पानी का घड़ा, डण्डीदार लोटा, तीन टाट पट्टियां और चाक-डस्टर  के साथ एक अलग रजिस्टर। ओछी मानसिकता और कम अकल के गुरुजी खेड़े के ऊंची जात के लोगों की कही मानते थे। यहीं से कमली के मन में सवाल उपजने लगे। ऐसे ज़रूरी सवाल धीरे धीरे उत्तर ढूंढते हुए रामबाबू के सामने आने लगे।)

रामबाबू कमली की नादानी की दुहाई देता हुआ कमली को अधकचरा उत्तर देता है 

‘‘कमली अभी तू बच्ची है। काहे फिजूल मगज खराब करती है। ककहरे-गिनती में ध्यान बंटा,ये ज्ञान तेरे ज़मारे में कभी काम आएगा। मेरी मान, पढ़ लिख लेगी तो सारे सवाल खुद ही जवाब दे जायेंगे। देख हम छूटजात लोगों का कोई धणीधोरी तो है नहीं । अपनी रखवाली अपनी ही चिन्ता से हो पाएगी। अरि सुन तू भूल के भी तीन चार काम मत करना।

एक तो खेड़े के बड़े मन्दिर में दर्शन।दूसरा घाट वाले शिवाले में जल का चढ़ावा मत चड़ा आना, नहीं तो हमारा जीना हराम हो जाएगा। तेरे संगी साथी सामूहिक भोज में जाए तो सुन तुम लोग सामलाती पंगत में मत बैठा जाना। एक और ज़रूरी बात, बस्ती के बीच वाले बड़े कुएं और खेड़े के इकलौते हेण्डपम्प को छूना हमारी बिरादरी के लिए फिलहाल मना है।  समझी, कुछ काम छोड़े हुए हमें तो उमर बीत गई। आदत हो गयी है । तू ठहरी चंचल। बेटा ज़रा संभल के। ये ही हमारे हिस्से का सुख-दुःख हैं बेटा।

(कम उम्र में पढ़ने-लिखने वाली कमली शुरू से ही जिज्ञासु, तर्कशील और पढ़ाकू बन पड़ी। पूरे स्कूल में अव्वल। इस तरह परिणाम ये हुआ कि वो सभी बड़े घरों में चर्चा का केंद्र बनने लगी। साथ ही बड़े घरों में रहने वाले लोगों की आंख की किरकीरी बन पड़ी । खेड़े में आठ जमात तक ही स्कूल था। अब कमली बड़ी हो गई थी। कुछ बनने की उमंगे उसमें हिलोर रही थी। पास के शहर में उसके दाखिले की सोचने से ही रामबाबू की रूह कांप उठती थी। लड़कियों को शहर नहीं भेजने के गाँव के फैसले के खिलाफ जाते हुए कमली के नौवीं में दाखिले की सोच से ही रत्ना को बुखार आ जाता था। ऐसा लगता था मानो सारा गांव उलाहनों की तगारियां उसके कान में उंडेल रहा हो। खेड़े से अब तक किसी भी जात बिरादरी की लड़की आठ किताब से आगे नहीं पढ़ी थी। कमली को आगे पढ़ाना एक क्रांतिकारी कदम था। आखिर रत्ना ने साहस बंधाया।)

रत्ना ने हिम्मत कर रामबाबू के विचार को मज़बूत करते हुए अपने मन की बात कहने में देर नहीं की।

‘‘भूल गए अपने बचपन के दिन जब मैं ब्याह कर आई थी।  गांव की कितनी सेवा चाकरी की थी। गांव में जूते गांठे, मौतमरण और ब्याह के नूते दिए। घर-घर जाकर ढ़ोल बजाया। जैसे तैसे हमने चूल्हे में आग जुटाई। दूजी बस्ती से रोज सवेरे घड़े भरभर पानी लाती थी। सब याद है खट्टी छाछ के लिए देर तक उनकी भीख का इंतजार। हमारी बकरियां उनके चारागाहों में नहीं चर सकती थी। हम चप्पल पहन उनके मौहल्लों में कदम नहीं धर सकते थे। क्या क्या याद दिलाऊं। मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ।  और तुम्हारी ये दो टकिया नौकरी जिसमें चिट्ठी पत्री का सारा काम वो तुमसे लेते रहें। कुछ नहीं भूली हूँ मैं। अब सुन लो। ज़माना तो लड़कियों का दुश्मन है ही। मगर हमारा तो सब कुछ कमली है ना। हम इसे न पढ़ाकर क्या इसी जीवन को दुहराने के लिए उसे विधाता पर छोड़ देंगे। वही विधाता जिसने हमें ये लाचारी, आँसू, ओछी जमीन और ये सारे उलाहने दिए।’’

(मुफलिसी के वे गीले दिन याद करते ही रत्ना और रामबाबू रो पड़ते थे । कहां पतीली में कभी कभार सब्जी बन सकती थी। अकेले राशन के गेहूं से पकती रोटियां ही भूख शांत कर पाती थी। जरूरत के मुताबिक गेहन रखे हुए खेतों का धीरे-धीरे बिकते जाना अखरता था। वो आंसुओं से लथपथ रातें। चूती हुई टपरी और तयशुदा वक्त पर कसाई की तरह ब्याज वसूलता साहूकार। कोई भी बात ऐसी नहीं जो याद करने लायक हो। ऊपर से आते जाते जात के नाम पर छींटाकसी अलग से। हिम्मत जुटाकर रामबाबू ने फैसला लिया।)

‘‘चल कमली, शहर में छात्रावास और कॉलेज तक की पढ़ाई की व्यवस्था करा आता हूँ। कल हमारे बड़े साहब बता रहे थे। कोई सिरकारी योजना हम गरीबों के लिए हाल में आई है। भला हो साहब का जो ठीक बखत पर बता दिया।’’

(कमली नौवीं से पढ़ती हुई कब एम.ए., बी.एड. कर मास्टरनी भी बन गई इस बात का ढलती उम्र के रत्ना और रामबाबू को अहसास तक नहीं हुआ। कमली की नौकरी लगी। रामबाबू और रत्ना बुढ़ापे में मिली इस खुशी से फिर जवान हो उठे। देर से जन्मी कमली अब तीस बरस की हो चली थी, इधर रामबाबू रिटायर्ड हो गए। रत्ना तो खैर,घर संभालने की जुगत में कभी रिटायर्ड हुई ही नहीं। अपने दुःख की छोटी छोटी कहानियों के बूते जरूर कभी पतलाती-दुबलाती रही। हां कमजोर जरूर हो गई है। एक दिन कमली, रत्ना और रामबाबू एक साथ उसी नदी के घाट पर।)

‘‘बाबूजी, मुझे बहुतों ने बताया आप यहां अक्सर बैठकर नदी को देखा करते थे।’’

‘‘हां कमली तब से जब से ये नदी मेरे दुःख को सुनकर मुझे सहलाती और हल्का करती महसूस हुयी। जब तेरे दादू गुजरे तब भी,  दादी मां गुजरी तब भी और तब तब जरूर आया जब मैं बहुत दुःखी रहा।  यहां आकर मुझे अपना दुःख छोटा लगने लगा। सभी के मन को पूरती ये बेचारी नदी मुझे भी बहुत अपनापन परोसती है। जब भी इसे प्यार से देखा हमेशा बहती मिली। इसे किसी से कोई शिकायत नहीं रहीं। न पानी में डूबी चट्टानों से। न कचरा फैंकते इन लापरवाह लोगों से। न ही नहाते-तैरते इन जात्रियों से। सालों गुज़र गए उसके मुंह से कोई चूं चकारा तक नहीं। ये खुश हो जाती है।जब भी सावन-भादों के बीतने से भरपूर बारिश होती है न ये पूरे उल्लास से बहने लग जाती है। इसकी धारा में एनिकट जरूर रूकावट है। मगर इसकी मुस्कान अबाध गति से सभी को हंसा रही है। रत्ना सब जानती है। जब भी एकान्त ढूँढने का दिल करता है। मैं अल सुबह यहां आकर बैठ जाता हूँ। ऐसा लगता है ये नदी हमेशा आने वालों के इन्तजार में जागती ही रही है।’’

(देर तक सोचती और बाप-बेटी की बातें सुनती रत्ना अचानक बोल पड़ी)

सारी रामायण छोड़ों, ढंग का लड़का देख कमली को ब्याह दो। उमर भी हो गई है छोकरी की अब तो। नौकरी तो है ही। कुछ पता भी है इसके साथ की लड़कियां दो-तीन,दो-तीन की मां है।

(पिछड़े परिवार में समय के साथ बदलती ये अवस्थाए किसी से छूपी नहीं थी। संस्कारवश जो बात कमली अब तक नहीं कह पायी थी आज कमली ने अपनी ही बिरादरी के लड़के से उसकी मित्रता की बात मां पिताजी को कहने की हिम्मत जुटा ली। बात सुनकर सभी का खुश होना लाजमी था। विवाह हुआ। ठाठ बाट से बारात आई। उसी खेड़े में बींद घोड़ी पर बैठा। बिन्दौली निकाल तोरण मारा गया। खेड़े के लोगों की मानसिकता अब बदल रही थी।यहाँ कभी ओछी जात के लोग बिन्दोली नहीं निकाल पाते थे। घोड़े पर चढ़ना तो बहुत दूर की बात मानो। मगर अच्छी बात ये थी कि समय के साथ अब सबकुछ बदल गया है। उन्हें अपने ठेठ किए व्यवहार पर पछतावा था। जातपात की दीवारें कुछ हद तक नीची हुई। स्कूल के गुरुजी की बदली हो गई। सेवक जातियों को पूरा मान मिलने लगा। एक दो नई स्कूलें और खूल गई। कमली की नौकरी के जलवे देख खेड़े की लड़कियां भी पढ़ने लगी। रामबाबू साधारण डाकिया ही नहीं रहा गाँव में एक उदाहरण बन गया। जब लोग रामबाबू की बात करते तो रत्ना के त्याग और हिम्मत को जरूर याद किया जाता। इस तरह बीतते हुए समय के साथ यदा कदा चौपाल पर होती बातों के केन्द्र में कमली आ जाती।)

एक दिन अपनी मस्ती में रामबाबू ने रत्ना को कहा 

‘‘अरे रत्ना सुनती हो। चलो आज की फुरसत गम्भीरी वाले उसी घाट पर खरचते हैं। जहां हमारे मन के सभी सपनों ने आकार लिया था। जहां हमने अपने मन के कोने देर तक टटोले। जहां पहली बार तुम हरियाली अमावस के मेले में मुझे मिली थी। वहीं। दिल कर रहा है तुम्हे फिर से साईकिल पर पीछे बिठाकर ले चलू। पांच किलोमीटर ही तो है। उम्र भले साठ पार है तो क्या हुआ, अभी बाजू मज़बूत है। बहुत सी तमन्नाएं तो पूरी हो गई। ये भी पूरी कर लें।’’

(रत्ना सकुचाती हुई रामबाबू के संग चल पड़ती है। आम गंवई पत्नी की तरह। लम्बे घूंघट में पर्याप्त लाज शरम सहित। खेड़े के बड़ों बुजुर्गों की इज्ज़त रखती हुई रत्ना ने अपने पूरे जीवन में गाँव की मर्यादाओं का मान रखा। उस दिन भी रत्ना बस्ती के बाहर तक पैदल चलती हुई आई। फिर रामबाबू की जोर जबरदस्ती की मनुहार पर रत्ना साईकिल पर साथ हो लेती है। दोनों में रास्ते भर बातें होती है। जीवन में मुश्किल से गुजरे अतीत की सभी बातें और आखिर में उनके बीच उस तसल्ली पर भी बात होती है जहां कमली अपना वैवाहिक जीवन अच्छे से जीने लगी है। अपने हाल बने पक्के मकान में बसर होती जिन्दगी को सोचते हुए रास्ता जल्द कट गया।)
इस तरह कमली के बहाने बहुत से उलझे सवाल अपने ज़वाब पाकर खुद-ब -खुद शांत हो जाते हैं।

डालर उर्फ़ नंदिनी

डी -39,कुम्भा नगर
चित्तौड़गढ़,राजस्थान
मो-9460711896
manik@apnimaati.com
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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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